Thursday, 29 January 2026

एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।

एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।

१/
भूख लगही तौ अन डहर देखे बिगन,
पेट अँइठत कलकला के कभू देखबे।
प्यास लगही तौ पानी कोती बर पीठ कर,
मुँह ला सुखा के अइला के कभू देखबे।।
जब मया लागही मयारू मेर सुख पाय,
दुरिहा रहिके छटपटा के कभू देखबे।
अकेल्ला लइका-बाला के सुध में सुरर,
बिन मुँह ला देखे बँबा के कभू देखबे।।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
२/
भुँइया दसना नभ चंदा अउ चंदैनी ओढ़,
भुसड़ी अउ कीरा ला चबा के कभू देखबे।
सैनिक शहीद के बियाकुल दाई कस,
अपन रतन ला गँवा के कभू देखबे।।
पिंउरी धोवाय नहीं गवन कराये नहीं,
वीरवधू से आँसू झरा के कभू देखबे।।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
३/
साँकुर-सुरंग बिखहर कस फोसनत,
घिसल-घिसल सलमला के कभू देखबे ।।
बारूद सुलगे लपटत आगी-धुँगिया में,
चिटक बेरा तैं अकबका के कभू देखबे ।।
हाड़ा-गोड़ा टोरवा के बैरी के बसेर मेर,
अउ मुँह सिलना लगा के कभू देखबे।
शेर-माँद में खुसरबे बनके सवा शेर,
अउ जीव अपन बचा के कभू देखबे।।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
४/
आगी के ऊँच उठत लपटा में कूद-फाँद,
अपन बदन ला झँवा के कभू देखबे।।
बरफ-चद्दर बिन सुख अउ सुभित्ता रहि,
शीतलहरा में ठुनठुना के कभू देखबे।
जेठ के नौतपा में रबि ले मुँहजोरी कर,
माँस टघलत ले घमा के कभू देखबे ।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
५/
जलरंग समुन्द लहरा संग झगर के,
भारत बेड़ा पार लगा के कभू देखबे।
डोंगरी दर्रा जंगल निधड़क नहकत,
छाती बज्र असन बना के कभू देखबे।
चढ़के डोंगर के शिखर में तिरंगा धर,
वंदे मातरम् गीत गाके कभू देखबे।
अपन फिकर में मरत हस रात दिन,
देशमया हिया ला सना के कभू देखबे।

शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
२९/०१/२०२६
महुदा दुर्ग छत्तीसगढ़


Tuesday, 27 January 2026

छत्तीसगढ़ी घनाक्षरी दोहा

मनहरण घनाक्षरी 


बृषभानु राउर के अँगना खेलत राधा,
छुमछुम छनकत पैजनिया पाँव के।
पबरित घर द्वार पबरित बेवहार,
पबरित धुर्रामाटी राधारानी गाँव के।
पबरित अन-जल पबरित फूल फल,
सब ला हे आस राधा के अँचरा छाँव के।
बिरिज में गली गली फूल पान नार कली,
गोप ग्वाल लाल बाजे डंका राधा नाव के।। 

शोभामोहन श्रीवास्तव

छत्तीसगढ़ी दोहा

शुभ मुहरन साँवर बदन, गोसैंया श्री राम।
तोर छोड़ अब हे नहीं, अउ ककरो ले काम।।

कान जुगल कुंडल जुगल, चरन जुगल महराज।
नयन जुगल अउ कर जुगल, हिरदे हमर बिराज।

केसरटीका माथ में, गर-भर रिगबिग हार।
सीतामाई प्रान धन, रामचन्द्र सरकार।।

बिन सुमरन बिन भाव के, कइसे दरसन पान।
पापी जीव बिहाल ला, सूझत नइ भगवान।।

जइसे तरिया भर फुले, कमल सुगंध लुटाय।
भजन रमे जीउ आतमा, झटकुन दरसन पाय।

धनुष धरे रघुबर हमर, अंतस माँझ बिराज।
तोर भार अब जीव हे, तहीं राख जीव लाज।। 

कोटि-कोटि ब्रम्हाण्ड में, नइ जइसन आनंद। 
रधिया मुखमंडल कमल, हे अइसन मकरंद।। 

संतन-भौरा नाम रस, पीयत नहीं अघाय।
बिन चटके जग में फिरै, परमधाम घर जाय।। 

काम-कोह ला छोड़ झन, ओकर रद्दा मोड़। 
रोग-दोख कटही सहज, रख तो हरि मग गोड़।। 

जीव जबर हरि सँग जुड़े, उपजै तभे बिराग।
शोभामोहन गुरुकृपा, तहूँ जगा ले भाग।। 

शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव

(ददरिया) राधा गोरी-नारी न्यारी मन के मिलौनी हे, गोरी-नारी।।

राधा गोरी-नारी न्यारी मन के मिलौनी हे, गोरी-नारी।।
राधा गोरी-नारी न्यारी मन के मिलौनी हे, गोरी-नारी।।
बोहे जमुन जल भरे गगरी।
बोहे जमुन जल भरे गगरी।
ठोठके कदम फेर मन अगरी ।
राधा गोरी-नारी न्यारी मन के मिलौनी हे, गोरी-नारी।।
राधा गोरी-नारी न्यारी मन के मिलौनी हे, गोरी-नारी।।
नीला हे लुगरा पिंयर पोलखा।
नीला हे लुगरा पिंयर पोलखा।
बिहारी बसे हे हिया खोलखा।।
राधा गोरी-नारी न्यारी मन के मिलौनी हे, गोरी-नारी।।
राधा गोरी-नारी न्यारी मन के मिलौनी हे, गोरी-नारी।।
कदम के डारी हलरहइया।
कदम के डारी हलरहइया।
बँसुरी फूँकत बइठे साँवर सँइया।।
राधा गोरी-नारी न्यारी मन के मिलौनी हे, गोरी-नारी।।
राधा गोरी-नारी न्यारी मन के मिलौनी हे, गोरी-नारी।।

शोभामोहन श्रीवास्तव 

(आखर महिमा) मत्तगयंद सवैया संशोधित

(आखर महिमा) मत्तगयंद सवैया


आखरपौंदर फूल दसै उहि में चलथे सब भावकुँवारी।

भावअनंग सलंग-बलंग फलंग-फलंग उठाय सवारी।।

मस्त मलंग महानउतंग करै मन चंग बिया सुख सारी।

आखर के बल देवल सेवल केवल ये जगती फुलवारी।।

आखर मेलमिलाप अलाप बिलाप कलापक्रिया करतारी।

आखर नाथत भाव बलात् हलात चलात सुबाट सोझानी।

आखर में सरधा रखिके सिरजे सब वेद मुनि बिगियानी।।

आखरजाप जपे जपनीधर वो सुख भोग करै मनमानी।

आखरहार बना पहिनावत भक्तहिया प्रभु ला मन बानी।।

का का भोगत नइ चोला।



का का भोगत नइ चोला।


घेरीबेरी देवत फेरा।

जनमन मरन बरोठा घेरा।।

कुलकत फुदकत दुबकत झुझकत,

उतरत जगदुखघर डोला। 
का का नइ भोगत चोला।।

नानुक नाम धरे नइ हरि के।

लाटा-फाँदा दसठन परि के।।

कहरत सिहरत दँदरत कँदरत,

जीवपरे दुखमुखि टोला।। 
का का नइ भोगत चोला।

एकछिन खो झन शोभामोहन।

सुखकलशा सुंदर मुड़ बोहन।।

सटकत लटकत चटकत मटकत,

कलजुग भोगत हे तोला।। 
का का नइ भोगत चोला।।

शोभामोहन

खुमरी पहिर डरे, चराये गउ

खुमरी पहिर डरे, चराये गउ


उँदना फुँदना झूलत झलमल, मोती मणि लहरे।
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ
पागा झाँगा मलमल झलमल, झक्क अँजोर भरे।
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ
लोभलोभावत जीवजुड़ावत, मधुरस गोठ झरे।
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ
आय सगाने नवा बिहाती, देखन साध मरे।
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ
बेलबेल बेलबेल कर संगी चल, मधुबन कहि हुदरे।।
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ
दाऊ भइया पहिर भँदइया , लकर धकर हबरे।
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ
रेरी पारत गाय हँकारत, हरि उदबिरिज करे।।
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ
जमुना जल ला निचट निहारत, डारी कदम धरे।
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ
धरे बँसुरिया सुघर सँवरिया, रुनझुन ले सँभरे।।
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ


शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव 

परे कइसन संग पाला हे*


परे कइसन संग पाला हे*


जसुदा तोर बलकवा के सुन, बड़ उतलंगहा चाला हे।
फोर डरे हे दुहनी मरसा, टोरे बेड़ी ताला हे।
देख अपन लाला के करनी, टूटे कौस्तुभमाला हे।।
मूड़ाछाड़ परावत वोला, देखिस मोरे घरवाला हे।
नंदरानी हउहावत कहिथे, फेर चोराये काला हे। ।
दनन दनन घर भीतर आगेव,घर में पउढ़े लाला हे।।
पीछू परगे हौ लाला के, लाला भोलाभाला हे।।
पटपटहिन हौ तुम सब डउकी, तुँहरे बिगड़े चाला हे।।
कथरी ओढ़ा सुताये हावँव, ठुनठुनात जड़काला हे।
ओखी कर कर देखे आथौ, लाला मोर निराला हे।।
हुदर दिहौं तुम भागौ नहीं ते, रखे बानोधा भाला हे।
पतिया गँउटिन सिरतो कहिथन,जादू मंतर वाला हे।।
दूठन बनके बिलवा छलिया, करत जबर घोटाला हे।।
मिटकाये मुड़सुद्धा ओढ़े, सुनत बिरिज उजियाला हे।
कहत मने मन मुचकत उचकत, परे किसन संग पाला हे।

शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८०
कार्तिक - अँजोरी पाख, तिथि तेरस, बार सनिच्चर

***********************
तोर नाम के मुड़सरिया में, मुड़ टेकाये हौं जगहार।
मुड़पिरवा होगे जगनत्ता, असलग लराजरा लगवार।। 
जब आही गौंतरिहा सजन हर हमार।। 
अतरही बोहाना आँसू कर भेट अउ जोहार।। 
धीरलगहा शुभ सगुन जनाही निरधार। 
आँखी निच्चट जोहत फरिका ला उघार।
धरे दिन अगोरा के लागत हे पहार।।
जरे जीव कहत जरै अइसन रोजगार।। 

शोभामोहन श्रीवास्तव 
तोर नाम के मुड़सरिया में, मुड़ टेकाये हौं जगहार।
मुड़पिरवा होगे जगनत्ता, असलग लराजरा लगवार।। 
जब आही गौंतरिहा सजन हर हमार।। 
अतरही बोहाना आँसू कर भेट अउ जोहार।। 
धीरलगहा शुभ सगुन जनाही निरधार। 
आँखी निच्चट जोहत फरिका ला उघार।
धरे दिन अगोरा के लागत हे पहार।।
जरे जीव कहत जरै अइसन रोजगार।। 

शोभामोहन श्रीवास्तव 

ददरिया जसगीत महरानी जय आदिभवानी, तहीं बरदानी तोरे पँइया लागौं घेरीबेरी ।

करसा के पानी करसा में अँटाय।
शरन में आवै उहीच सुख पाय।
महरानी जय आदिभवानी, तहीं बरदानी तोरे पँइया लागौं घेरीबेरी ।

रन्नभन्न जिनगी के कर देबे सिंगार।
जागौं नेवरात तोला घर में पधार।।
महरानी जय आदिभवानी, तहीं बरदानी तोरे पँइया लागौं घेरीबेरी ।

आँखीपचरी ठेलागे आँसू धार।
मोर गति ला भवानी तहीं अब सुधार।।
महरानी जय आदिभवानी, तहीं बरदानी तोरे पँइया लागौं घेरीबेरी ।

फूल जभे झरै तब फल फलै माँ ।
तोर देवाला अखंड हे जोत जलै माँ।
महरानी जय आदिभवानी, तहीं बरदानी तोरे पँइया लागौं घेरीबेरी ।

सृष्टि डेहरी गमकत हे। छत्तीसगढ़ी गीत


ममहाती अँचरा सुगंध ले, 
सृष्टि डेहरी गमकत हे।
झुमरत डारा घुमरत भौरा, 
फूलगमक सुँघ ठमकत हे।।

चालबसंती में सब संयम,
भितिया भारा भसकत हे।
काँदी पौंदर हरियर-हरियर,
नभ चमचम चम चमकत हे।।

कोनो पाँव लिखावत माहुर,  
कोनो पैजन झमकत हे।
निरमल चंदा के अँजोर में, 
रूप रूपसी दमकत हे।
चटक-मटक लुकरा के अँचरा,
चमचम चमचम चमकत हे।

रसवन्तिन पुरवइया ठमकत 
भुँइयाअँगना छाय बसंती ।
गोठ बसंती बात बसंती,
सहन-रहन बरताव बसंती।।  

करौ भारत के जयजयकार।


करौ भारत के जयजयकार।
जात-पंथ में झन भँगियावौ, करौ देश बढ़वार ।
करौ भारत के जय-जयकार।
इही हमर छँइहा-भुँइया हे, अउ जिनगी आधार।
करौ भारत के जयजयकार।
इहें हमर हे धर्म संस्कृति, अउ सभ्यता चिन्हार।
करौ भारत के जय-जयकार।
परमतत्व साक्षात इहें हे, धर लीला अवतार।
करौ भारत के जय-जयकार।
सब स्वारथ ला पाछू राखौ, पहिली देश बिचार।।
करौ भारत के जय-जयकार।
बैरीदल के छाती टोरे, सब होवौ तैयार।
करौ भारत के जय-जयकार।
जुड़ जावौ सब बाँह जोड़ के, जब्बर करे प्रहार।
करौ भारत के जय-जयकार। 

Monday, 26 January 2026

सिंहनाद वर्णिक छंद

सिंहनाद वर्णिक छंद 112 121 112 2) 10 वर्ण प्रति चरण का वर्णिक छंद, 4 चरण दो दो सम तुकान्त।

ललला ललाल लललाला

कतको हवौं अधम चोला ।
तबले हवै अजम मोला।।
सरनागती अपन देबे।
दुख दोख ताप हर लेबे।।
बिगड़ी बना हमर स्वामी।
सबले तहीं जबर नामी।।
करहूँ सदा टहल तोरे ।
रहिहौं मया सरस घोरे।। 

संयुत वर्णिक छंद

संयुत छंद
112 121 121 2) 10 वर्ण प्रति चरण का वर्णिक छंद, 4 चरण दो दो सम तुकान्त।
ललला लला लल लालला।।

दुख दोख ला दुरिहा भगा।
बस राम नाम भँजा सगा।।
बिरथा सबो करनी करे।
बस पेट खातिर तैं मरे। ।
नइ राम के सुरता करे।
बुध चेत तोर हवै सरे।। 
हितगोठ ला सुन ले बने।
अउ छोड़ दे बिफड़े तने।।
नइ काम आय कहूँ नता।
बिन ज्ञान के छछले लता।। 

शोभावती वर्णिक छन्द

शोभावती छंद
(222 222 222 2) 10 वर्ण प्रति चरण का वर्णिक छंद, 4 चरण दो दो सम तुकान्त।

(साँसों की माला से)
लालाला लालाला लाला
लाला ।

देबी-काली माई तोला बंदौं ।
संगी-साथी तोरे भोला बंदौं।।

कारी-कारी-चुन्दी कारी काया ।
कोनो ना जानै तोरे माया।।

काली माई तोरे शोभा भारी।।
पूजै तोला जम्मो संसारी।

काली माई तोरे राचे माया ।
तोरे दाई काया-माया  छाया।।

तोरे माया देबी आनीबानी।
जानै जेला कोनो-कोनो ज्ञानी।।

तोरे गाना गाथें देवा माई।
जै कालीमाई जै काली माई।।

पद्ममाला वर्णिक छंद

पद्ममाला छंद
लाललाला ललालाला ।

श्याम मोला बलाये हे ।
प्रेम जादू चलाये हे।।

बाँह झूला झुले जाहूँ।
प्रीत के गीत ला गाहूँ ।।

गाँव में होत हे चारी।
देत दाई घलो गारी।।

जेन बोलै कहै कोनो ।
नैन हे मोहनी दोनों।। 

हाथ में हाथ ला फाँसे।
मातबो रास मा रासे।।

मोर तो भाग जागे हे।
मोर वो हाथ माँगे हे।।

मधुमती वर्णिक छंद

 (मधुमती छंद)
*मधुमती छंद* विधान:- "ननग" गणन की
'मधुमती'।। "ननग" :- 111 111 2 (नगण नगण गुरु) चार चरण, दो-दो चरण समतुकांत

लललल ललला ।

निकलिन घर ले।
सब झर-झर ले ।।
सिर धर करसा।
दहियन मरसा ।।
गउरस भरके ।
सखि सँग करके।।
बुलकत डगरी ।
सब मन अगरी।।
सखि खमखम ले।
हरि झमझम ले ।
सिर रख पगड़ी।
कर धर बँसुरी।।
हरि जब पँहुचे ।
जँह सखि उँहचे।।
अपलक रहिगें।
धन धन भइगें।।

सारवती वर्णिक छंद

सारवती वर्णिक छंद
(211 211 211 2)
लालल लालल लालल ला ।
सोवत जागत राम रटौं। 
राम रटौं घनश्याम रटौं।।
कारज में दिन-रात खँटौं।
फेर नहीं जग में लपटौं।
रामदयाल दया करबे।
अंतस के दुविधा हरबे।। 

शुभमाल वर्णिक छंद

शुभमाल छंद
121 121 ) 6 वर्ण प्रति चरण का वर्णिक छंद, 4 चरण दो दो सम तुकान्त।

लला लल लाल।
बना अब काम।
तहीं प्रभु राम।।
धरे धनु बान।
सुजान महान ।।
हवै जग बाम ।
बना अब काम।
तहीं प्रभु राम।।
मिटा दुख-राग ।
जगाव सुहाग।।
करौं परनाम ।
बना अब काम।
तहीं प्रभु राम।। 

Sunday, 25 January 2026

शीर्षा वर्णिक छंद

शीर्षा छंद
(222 222 2) 7 वर्ण प्रति चरण का वर्णिक छंद, 4 चरण दो दो सम तुकान्त।
लाला ला लालालाला।

गावौ रे गावौ भाई।
गावौ पाहू गोसाई।।
रामारंगी हो जावौ।
सीतागोसैया गावौ।।
लागे ना कौड़ी पाई।
गावौ रे गावौ भाई।
जेने जम्मो के राना।
गाना वोला ही गाना।। 
गोसैंया दाई भाई।।
गावौ रे गावौ भाई।
गावौ पाहू गोसाई।।
वो ही दाना पानी दे।
धन्ना ला वो दानी दे।।
ले लेवै पाई पाई।
गावौ रे गावौ भाई।
गावौ पाहू गोसाई।।

शारदी वर्णिक छंद

शारदी छंद
(121 211 1) 7 वर्ण प्रति चरण का वर्णिक छंद, 4 चरण दो दो सम तुकान्त।

लला लला ललल,
जपौ सियारमन ।
कहौ सियारमन।।
बने करौ करम ।
धरे सदा धरम ।।
मिटा सबो भरम।
सुखी बनौ चरम।।
भजौ सियारमन ।
भजौ सियारमन।। 

विमला वर्णिक छन्द

विमला छंद
112 222 111 12 = 11 वर्ण चार चरण। दो दो समतुकांत।
ललला लालाला ललललला।

अरजी मोरो तो सुन मइया।
बइठे हौं तोरे धर पँइया ।।
तन तारे दे सुंदर बिदिया । 
नइ चाही मोला रिधि सिधिया।।

विमलजला वर्णिक छंद

विमलजला छंद
112 111 12 = 8 वर्ण चार चरण। दो दो समतुकांत।


जिउ नेत धरत हे ।
जिउ पेट भरत हे।।
सुख ले चटकत हे।
दुख में अटकत हे।।
नइ ज्ञान सुनत हे।
बस आस तुनत हे। ।
कइसे अब करही ।
भव पार उतरही।।
नइ ज्ञान धरत हे ।
बस मान मरत हे।।

छंद समोहा (म. ग. ग. )वर्णिक छन्द)ध्यावै जे चोला ।पा जावै वोला ।।

छंद समोहा (म. ग. ग. )वर्णिक छन्द)
ध्यावै जे चोला ।
पा जावै वोला ।।
सीता के रामे ।
राधा के श्यामे।।

जेने हा जानै ।
तेने हा मानै ।।
छाया हे घामे।।
सीता के रामे ।
राधा के श्यामे।।

जेने मोहावै ।
तेने बोहावै ।।
लेवै वो नामे।।
सीता के रामे ।
राधा के श्यामे।।

जेने मोकावै।
तेने पोखावै।।
बीजा हा जामे।
सीता के रामे ।
राधा के श्यामे।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
25/01/2025


Saturday, 24 January 2026

मनविश्राम वर्णिक छंद

(मनविश्राम छंद)
मनविश्राम छंद विधान:-  "भाभभुभाभनुया"=भगण की 5 आवृत्ति फिर नगण यगण। 211 211 211 2,11 211 111 122 कुल 21वर्ण, यति 10,11, चार चरण 2-2 समतुकांत

लालल लाललला ललला, ललल ललल लाला ।

जोहत नैन थकै नइ हे, सजन मिलन आजा ।
प्रीत लगे जबले तबले,
धिड़कत हिय बाजा।।
होत मतंग उड़ावत हे, मन हर नभ कोती ।
साज-सिंगार सिंगारत हे, नैन बरत जोती।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
25/01/2025

कामिनी (भृंग वर्णिक छंद)

कामिनी (भृंग छंद)
*भृंग छंद* विधान:- "ननुननुननु गल" पर यति, दश द्वय अरु अष्ट। रचत मधुर यह रसमय, सब कवि जन 'भृंग'।। "ननुननुननु गल" = नगण की 6 आवृत्ति फिर गुरु लघु। 111 111 111 111 // 111 111 21 20 वर्ण,यति 12,8 वर्ण, 4 चरण 2-2 तुकांत

जगर-मगर शहर-शहर, कहर-महर गाँव।
गुनत-धुनत कहत-सुनत,चलत सँभल पाँव।।
अगुन-छगुन गुनत-गुनत, कटत जबर बेर ।
गिरत-परत मनुख उठत, हलत-चलत फेर ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
25/01/2025

सेकूलर चमचा छत्तीसी सब चमचों को समझिऐ, सेकूलर पर्याय।

सेकूलर चमचा छत्तीसी 

सब चमचों को समझिऐ, सेकूलर पर्याय। 
अंडबंड बातें करे, देखें ना अन्याय।। 

राष्ट्र वादियों के संग रहते । 
वे सेकूलर स्वयं को कहते ।। १।। 

भारत में ये पाये जाते। 
जगह-जगह हड़काये जाते।।२।। 

अपशब्दों से गंध मचाते । 
जातिवादियों के गुण गाते।।३।। 

नया-नया गढ़ गढ़कर नारा। 
खूब निभाते भाईचारा ।।४।। 

और जब ये बन जाते चारा। 
तब दिखता है दिन में तारा।।५।। 

चाटुकारिता निरत तपस्या
राम नाम से उन्हें समस्या।।। ६।। 

ना तो पढ़ लिख ज्ञान बढ़ाते । 
ना भविष्य की करते बातें ।। ७।। 

ना दिखती पत्नी ना बच्चा। 
दिखता नहीं उन्हें दिन अच्छा।।८।। 

चाल सुहाती भेंड़ों वाली। 
क्रोध नाक में मुँह में गाली।। ९।। 

अपने घर में आग लगाते। 
सत्य छुपाते झूठ बिछाते ।।१०।। 

पकड़े रहते झूठ का खंभा । 
नाक कटे तो होता लम्बा।। ११।। 

लुप्तप्राय हो रही प्रजाती। 
लड़े-भिंड़े वे ताने छाती।।१२।। 

वही श्रेष्ठ चमचे कहलाते । 
झूठा चरखा जो नित काते।।१३।। 

भले आपके जैसी काया।। 
लेकिन अतिविचित्र है माया।।१४।। 

रटते रहते बापू-चाचा । 
भले तड़ातड़ पड़े तमाचा।। १५।। 

झूठ चलाते पिद्दी-पिद्दी। 
चाल-चलन से होते जिद्दी।।१६।। 

सोये बेसुध बेचके घोड़ा । 
होते मगन छुपाकर फोड़ा।।१७।। 

वंशवादियों में रम जाते। 
चरण चूमते शीष झुकाते।।१७।। 

बातें करते ठकुरसुहाती। 
धर्म से बढ़कर कहते जाति।। १८।। 

झूठ परोसें कर-कर चर्चा। 
तब चलता है इनका खर्चा।। १९।। 

भेस बदलकर छद्म ये ढ़ोंगी।
अपनी अलग बजाते पोंगी।।२०।। 

खरपतवारों को सहलाते। 
कीट-कीटाणु इनको भाते।। २१।। 

स्वच्छ भले ऊपर का ढाँचा। 
दूषित है वैचारिक साँचा ।।२२।। 

वे अनगिन षडयंत्र रचाते । 
और कहानी रच बहलाते।।२३।। 

पहन मुखौटा जनता छलते। 
परजीवी बनकर वो पलते।। २४।। 

छलावरण में वो हैं आते। 
छ्द्म डिग्रियों से भरमाते।। २५।। 

है अत्यन्त परिष्कृत शैली । 
और भावना कलुषित मैली।।२६।। 

भ्रष्ट बीजाणु से ये जनमे । 
दया धर्म ना इनके मन में।। २७।। 

विकट रोगाणुओं के कारक । 
यही विदेशी डिग्री धारक ।।२८।। 

दाँत पेट में इनके होते ।
देश बढ़े तो जमकर रोते।। २९।। 

डफली बजा बजाकर गाते। 
आतंकी से इनके नाते।। ३०।। 

देश हेतु हैं ये बीमारी । 
इनके नस-नस में गद्दारी।। ३१।। 

बनकर बैठे गुंडा-दादा । 
खतरनाक दिल लिए इरादा ।। ३२। । 

देशवासियों अब पहचानो। 
कहे लक्षणों को सच जानो।। ३३।। 

गद्दारों से देश बचाओ । 
सब जन उठकर आगे आओ।। ३४।। 

पढ़ कर सेकूलर छत्तीसी। 
बात कहो तुम बस इत्ती सी।। ३५।। 

वंदे मातरम जो गायेंगे। 
वही भारतीय कहलायेंगे।। ३६।


शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव 

१७/१२/२५

राजा घर के लाला (भक्ति छंद वर्णिक)

भक्ति वर्णिक छंद

विधान तगण यगण, गुरु
221 122 2
7 वर्ण 4 चरण दो-दो चरण समतुकांत
लाला लल लालाला

राजा घर के लाला।
घूमे बनके ग्वाला।।
माला गुँगची गोई।
राजा कहिहै कोई ।।
भारी बिगड़े चाला।।
राजा घर के लाला।
घूमे बनके ग्वाला।।

हावै भँदई गोड़े।
कारी-कमरा ओढ़े।।
वो हे नखरा वाला।
राजा घर के लाला।
घूमे बनके ग्वाला।।

लाहो अबड़े लेथे ।
गारी कतको देथे।।
घेपै वह तो काला।
राजा घर के लाला।
घूमे बनके ग्वाला।।
फोरै मरकी गोई ।
डारे गर में नोई।।
लोक्खन के गोपाला।
राजा घर के लाला।
घूमे बनके ग्वाला।।

जाबो अब ये दारी।
देबो घुड़की-गारी।।
वो हे दिल के काला ।
राजा घर के लाला।
घूमे बनके ग्वाला।।

हेरै गुजरी तारा।
आये धर संगवारा।।
खाये अउ लौना ला ।
राजा घर के लाला।
घूमे बनके ग्वाला।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
25/01/2025

तुलसी ज इसे बिरवा नइ हे विस्तार से

तुलसी जइसे बिरवा नइ हे, नदिया नइ देवसरी जइसे ।
महदेव सहीं अउ देव नहीं, जगराखन हे न हरी तइसे ।।
कतको हरि भक्त भले जग में, नइ भक्त कहूँ सबरी जइसे ।
कबि के कुल के सिमोर सदा, कबि सुंदरलाल गड़ी तइसे ।।

धरती अनपब्बर रत्न भरे, नइ रत्न कहूँच मनी जइसे।
जग में कतको सग लाग-नता, प्रिय होय कहूँ न धनी जइसे ।।
जगजन्तुन देह भले कतको, नइ देह मनुष्यतनी जइसे।
कबि के सिरमौर छत्तीसगढ़ी, कबि सुंदर लाल  गनी तइसे ।।

जग कतको बजरंग तभो, नइ हे बजरंग बली जइसे ।

कतको रहि भक्ति रमे तबले, नइ हे वृषभानुलली जइसे।
सुख द्वारिका हे कतको हरि के, प्रिय हे नइ कुंज गली जइसे ।
मइके न सुहाय बिना मइया, ससुरार बिना सँइया जइसे। 

Sunday, 18 January 2026

जय जय नंदलला

जय जय नंदलला

जय-जय नटवर-नागर, करुणाकर हे।
यसुमति के प्रिय प्रान, जय-जय नंदलला।।
पिंयर-पिंयर ढ़िक-हरियर, पीताम्बर हे।
लर-लर गर-भर हार, जय-जय नंदलला।।
सहस-सुरुज कस चमकत, छबि दमकत हे,
जीवजगत रखवार, जय-जय नंदलला।।
जझरंग भसरंग मनरंग, दह कूदत हे,
सखिन सखा चिचियात, कहि जय नंदलला।
देखिन छेंकिन नागिन, कउवा गिन हे,
कहिन सुन लौ सुकुमार, जय-जय नंदलला ।
लड़-भिड़ फन चढ़ बिखहर, कर दिस थर हे।
नागिन कर जोर मनात, जय-जय नंदलला ।।
फन चढ़ नाथत बिखहर, मुरलीधर हे,
देवतन फूल बरसात, जय जय नंदलला।।
अकबक-सकपक-ब्रजजन, सब अपलक हे,
करमन देखि डरात, कहि जय-जय नंदलला।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन 

Sunday, 4 January 2026

सबमें तो बँसुरीवाला । (सखी छंद)

 सबमें तो बँसुरीवाला । (सखी छंद)


सबमें तो बँसुरीवाला । (सखी छंद)

सब आरो हरि के आरो ।
वोकर धुन मूड़ा चारो ।।

ककरो संग नइ गुर-लाटा।
नइ कोनो बैरी-काँटा।।

सबला जोहारौं भेंटौ ।
दुआ-भेद बिमता मेटौ।।

करथौ अपन-तुपन काला ।
सबमें तो बँसुरीवाला ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव



संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...