१/
भूख लगही तौ अन डहर देखे बिगन,
पेट अँइठत कलकला के कभू देखबे।
प्यास लगही तौ पानी कोती बर पीठ कर,
मुँह ला सुखा के अइला के कभू देखबे।।
जब मया लागही मयारू मेर सुख पाय,
दुरिहा रहिके छटपटा के कभू देखबे।
अकेल्ला लइका-बाला के सुध में सुरर,
बिन मुँह ला देखे बँबा के कभू देखबे।।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
२/
भुँइया दसना नभ चंदा अउ चंदैनी ओढ़,
मुँह ला सुखा के अइला के कभू देखबे।।
जब मया लागही मयारू मेर सुख पाय,
दुरिहा रहिके छटपटा के कभू देखबे।
अकेल्ला लइका-बाला के सुध में सुरर,
बिन मुँह ला देखे बँबा के कभू देखबे।।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
२/
भुँइया दसना नभ चंदा अउ चंदैनी ओढ़,
भुसड़ी अउ कीरा ला चबा के कभू देखबे।
सैनिक शहीद के बियाकुल दाई कस,
अपन रतन ला गँवा के कभू देखबे।।
पिंउरी धोवाय नहीं गवन कराये नहीं,
वीरवधू से आँसू झरा के कभू देखबे।।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
३/
साँकुर-सुरंग बिखहर कस फोसनत,
घिसल-घिसल सलमला के कभू देखबे ।।
बारूद सुलगे लपटत आगी-धुँगिया में,
चिटक बेरा तैं अकबका के कभू देखबे ।।
हाड़ा-गोड़ा टोरवा के बैरी के बसेर मेर,
अउ मुँह सिलना लगा के कभू देखबे।
शेर-माँद में खुसरबे बनके सवा शेर,
अउ जीव अपन बचा के कभू देखबे।।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
४/
आगी के ऊँच उठत लपटा में कूद-फाँद,
अपन बदन ला झँवा के कभू देखबे।।
बरफ-चद्दर बिन सुख अउ सुभित्ता रहि,
शीतलहरा में ठुनठुना के कभू देखबे।
जेठ के नौतपा में रबि ले मुँहजोरी कर,
माँस टघलत ले घमा के कभू देखबे ।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
५/
जलरंग समुन्द लहरा संग झगर के,
भारत बेड़ा पार लगा के कभू देखबे।
डोंगरी दर्रा जंगल निधड़क नहकत,
छाती बज्र असन बना के कभू देखबे।
चढ़के डोंगर के शिखर में तिरंगा धर,
वंदे मातरम् गीत गाके कभू देखबे।
अपन फिकर में मरत हस रात दिन,
देशमया हिया ला सना के कभू देखबे।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
२९/०१/२०२६
महुदा दुर्ग छत्तीसगढ़
सैनिक शहीद के बियाकुल दाई कस,
अपन रतन ला गँवा के कभू देखबे।।
पिंउरी धोवाय नहीं गवन कराये नहीं,
वीरवधू से आँसू झरा के कभू देखबे।।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
३/
साँकुर-सुरंग बिखहर कस फोसनत,
घिसल-घिसल सलमला के कभू देखबे ।।
बारूद सुलगे लपटत आगी-धुँगिया में,
चिटक बेरा तैं अकबका के कभू देखबे ।।
हाड़ा-गोड़ा टोरवा के बैरी के बसेर मेर,
अउ मुँह सिलना लगा के कभू देखबे।
शेर-माँद में खुसरबे बनके सवा शेर,
अउ जीव अपन बचा के कभू देखबे।।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
४/
आगी के ऊँच उठत लपटा में कूद-फाँद,
अपन बदन ला झँवा के कभू देखबे।।
बरफ-चद्दर बिन सुख अउ सुभित्ता रहि,
शीतलहरा में ठुनठुना के कभू देखबे।
जेठ के नौतपा में रबि ले मुँहजोरी कर,
माँस टघलत ले घमा के कभू देखबे ।
देश के पहरिया देवत कइसे पहरा हे,
एक दिन सीमा में बिता के कभू देखबे।
५/
जलरंग समुन्द लहरा संग झगर के,
भारत बेड़ा पार लगा के कभू देखबे।
डोंगरी दर्रा जंगल निधड़क नहकत,
छाती बज्र असन बना के कभू देखबे।
चढ़के डोंगर के शिखर में तिरंगा धर,
वंदे मातरम् गीत गाके कभू देखबे।
अपन फिकर में मरत हस रात दिन,
देशमया हिया ला सना के कभू देखबे।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
२९/०१/२०२६
महुदा दुर्ग छत्तीसगढ़
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