कृपाण घनाक्षरी
बिरिजकुँवर बर कोंवर कोंवर सूत,
अंगरखा गढ़े माँघा बीनौ मोरे लाल।
चरखा चलावौ सूत कातौ बुनकर भाई,
रेशम पितामरी बना दौ मोरे लाल।
अलमल-झलमल धूप-छाँव पंछा धोती,
ढीक जरी-सोनहा लगा दौ मोरे लाल।
बीच-बीच बेल-बूटा फूल-पान ला उकेर,
चुक-चुक ले रंग रंगा दौ मोरे लाल ।।
सोन-पिंयर रंग छींट-बुंदकी सरभर,
छाप-छाप बस्तर बना दौ मोरे लाल।
पातर पातल पागा फेंटा अउ मुरेठा बर,
सतरंग लहर सजा दौ मोरे लाल। ।
शोभामोहन के हरि झम-झम ले पहिर,
मन मोहत रेंगत जोवै मोरे लाल।।
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
Sunday, 30 November 2025
रुचि रुचि भोग लगावौ हे राजीवनैन,
रुचि रुचि भोग लगावौ हे राजीवनैन,
नेवता नेवत के जोहारौं मोरे राम।।
चंदन के चौंकी में बइठारौं राजीवनैन,
जेवन जेंवावौं मैं पधारौ मोरे राम।।
छप्पनभोग जेंवन राँधे हौं राजीवनैन,
जिमिकाँदा परवर जेंवौं मोरे राम।
लछमी दाई ला लानौ हो राजीवनैन ।
गरुड़ सवारी चढ़ आवौं मोरे राम।।
पिड़िया अड़सा खाजा पपची राजीवनैन,
रुचि रुचि भोग लगावौ मोरे राम।।
दुबराज भात ममहाती हे राजीवनैन,
सबला प्रसादी देवौ खावौं मोरे राम।
पान सुपारी खाके मुँह रंगौं राजीवनैन,
भक्तन के गति ला बनावौ मोरे राम ।।
शोभामोहन राजीवनैन के बियारी गावै,
किरपा छँइहा जीव राखौ मोरे राम।।
नेवता नेवत के जोहारौं मोरे राम।।
चंदन के चौंकी में बइठारौं राजीवनैन,
जेवन जेंवावौं मैं पधारौ मोरे राम।।
छप्पनभोग जेंवन राँधे हौं राजीवनैन,
जिमिकाँदा परवर जेंवौं मोरे राम।
लछमी दाई ला लानौ हो राजीवनैन ।
गरुड़ सवारी चढ़ आवौं मोरे राम।।
पिड़िया अड़सा खाजा पपची राजीवनैन,
रुचि रुचि भोग लगावौ मोरे राम।।
दुबराज भात ममहाती हे राजीवनैन,
सबला प्रसादी देवौ खावौं मोरे राम।
पान सुपारी खाके मुँह रंगौं राजीवनैन,
भक्तन के गति ला बनावौ मोरे राम ।।
शोभामोहन राजीवनैन के बियारी गावै,
किरपा छँइहा जीव राखौ मोरे राम।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
मोक्षदा एकादशी अगहन २०८२
शुभ स्थान-महुदा पाटन दुर्ग( छत्तीसगढ़)
Saturday, 29 November 2025
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा
तुम प्रात: गोधुली के वंदन ,
सुरभित केसर संदल के वन।
छवि व्योम सदृश तन मृदु कंचन,
मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम हो परिणय के पुष्प पत्र,
तुम सुहागिनी के अंग वस्त्र।
तुम निश्चत विजय अमोघअस्त्र,
तुम शास्त्र सार विज्ञान सत्र।।
मैं नयनों से बिखरी कजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम कार्तिक सरिता दीपदान,
तुम पार्थिव शंकर के समान।
तुम सदा धर्मधूरी विधान,
तुम संस्कृति के अमर प्राण।।
मैं नववधु अलकों की गजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम विभावसु अर्चित शुभफल,
प्रांगण पूजित शुभ तुलसीदल,
हृदकोश अपरिमित परम अतल,
तुम सदा सरल तुम सदा नवल,
मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम अर्थित आवाहित आगम,
अवग्राही राही पथ परम।
तुम पथ पाथेय अपार अगम,
तुम अचल अवस्थित सुख चरम,
मैं श्वासों की पथ हूँ अधरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम हो अनुनादित मधुरनाद,
शांतिदायक हर्ताविशाद।
विश्वंभर के पावन प्रसाद,
दैदीप्यमान दिनकर संवाद।
मैं नववधु अलकों की गजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम सदा सुवासित शुभ सुगंध,
भाषित भाषा पथ भाव बंध।
प्रेमिल प्रलाप के महानंद,
मैं मैं तू कर बढ़ती झगड़ा।।
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
सुख उदित भानु सम युगल चरण,
तुम परे पार पथ जन्म मरण,
मन व्योम वृहद तन मृदु कंचन,
मैं मरूथल मिथ्या मृग लहरा
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम प्रात: गोधुली के वंदन ,
सुरभित केसर संदल के वन।
छवि व्योम सदृश तन मृदु कंचन,
मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम हो परिणय के पुष्प पत्र,
तुम सुहागिनी के अंग वस्त्र।
तुम निश्चत विजय अमोघअस्त्र,
तुम शास्त्र सार विज्ञान सत्र।।
मैं नयनों से बिखरी कजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम कार्तिक सरिता दीपदान,
तुम पार्थिव शंकर के समान।
तुम सदा धर्मधूरी विधान,
तुम संस्कृति के अमर प्राण।।
मैं नववधु अलकों की गजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम विभावसु अर्चित शुभफल,
प्रांगण पूजित शुभ तुलसीदल,
हृदकोश अपरिमित परम अतल,
तुम सदा सरल तुम सदा नवल,
मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम अर्थित आवाहित आगम,
अवग्राही राही पथ परम।
तुम पथ पाथेय अपार अगम,
तुम अचल अवस्थित सुख चरम,
मैं श्वासों की पथ हूँ अधरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम हो अनुनादित मधुरनाद,
शांतिदायक हर्ताविशाद।
विश्वंभर के पावन प्रसाद,
दैदीप्यमान दिनकर संवाद।
मैं नववधु अलकों की गजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
तुम सदा सुवासित शुभ सुगंध,
भाषित भाषा पथ भाव बंध।
प्रेमिल प्रलाप के महानंद,
मैं मैं तू कर बढ़ती झगड़ा।।
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
सुख उदित भानु सम युगल चरण,
तुम परे पार पथ जन्म मरण,
मन व्योम वृहद तन मृदु कंचन,
मैं मरूथल मिथ्या मृग लहरा
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।
करमा सोहरराजा घर फूल फुले, दशरथ घर फूल फुले ।
करमा सोहर
राजा घर फूल फुले, दशरथ घर फूल फुले ।
राजा घर फूल फुले, दशरथ घर फूल फुले ।
गिंया गड़ी सगुन माँगे ।
गिंया गड़ी सगुन माँगे ।
जा..... के गिंया गड़ी सगुन माँगे ।।
जा..... के गिंया गड़ी सगुन माँगे ।।
सोन मोहर चाँदी मोहर धोती अउ सारी।
राजा लुटावत कोस गहना महतारी।।
रबिकुल के भाग हे जागे।
राजा घर फूल फुले, दशरथ घर फूल फुले ।
गिंया गड़ी सगुन माँगे ।
गिंया गड़ी सगुन माँगे ।
जा..... के गिंया गड़ी सगुन माँगे ।।
जा..... के गिंया गड़ी सगुन माँगे ।।
सोन सुरुज रिगबिग ले, राजमहल छागे ।
मोती तोरन झालर लर-लर टँगागे ।।
नवा जमाना नवा चलन हे,
बेटा करवा डारिस वालकेयर पुट्टी।
दाई ददा के मुँह में झूमत घुनघुट्टी।।
राजा घर फूल फुले, दशरथ घर फूल फुले ।
राजा घर फूल फुले, दशरथ घर फूल फुले ।
गिंया गड़ी सगुन माँगे ।
गिंया गड़ी सगुन माँगे ।
जा..... के गिंया गड़ी सगुन माँगे ।।
जा..... के गिंया गड़ी सगुन माँगे ।।
सोन मोहर चाँदी मोहर धोती अउ सारी।
राजा लुटावत कोस गहना महतारी।।
रबिकुल के भाग हे जागे।
राजा घर फूल फुले, दशरथ घर फूल फुले ।
गिंया गड़ी सगुन माँगे ।
गिंया गड़ी सगुन माँगे ।
जा..... के गिंया गड़ी सगुन माँगे ।।
जा..... के गिंया गड़ी सगुन माँगे ।।
सोन सुरुज रिगबिग ले, राजमहल छागे ।
मोती तोरन झालर लर-लर टँगागे ।।
नवा जमाना नवा चलन हे,
बेटा करवा डारिस वालकेयर पुट्टी।
दाई ददा के मुँह में झूमत घुनघुट्टी।।
Monday, 10 November 2025
असकुस होगे मन मतंग हर, लोभ हरा के आगे (सार छन्द )
असकुस होगे मन मतंग हर, लोभ हरा के आगे
धमकिस लोभ सगा बन मन घर, साध सँवारत बड़का ।
मान-गउन नइ करिस ललक के, मन हर देइस हड़का।।
हीनमान ले लोभ भड़क के, लगिस ओरझे मन ले ।
मन हर हिरक निहारिस नइ तौ, ठाढ़ भइस दनदन ले।।
सगा-सहोदर अपन बलाइस, झगरा-रार कराये ।
लिगरी-लाई करिस लुहाइस, ओखी करिस सताये।
सबझन धमकिन दनदन-दनदन, मन हलहलित मताये।
मन मिटकाये रहिस कलेचुप, ओरझिन सब बगियाये।।
अपन-अपन ले जोर लगा के, लहुट गइन लस खाके।
फेर लहुट के जब-जब आइन, गइन अनादर पाके।।
असकुस होगे मन मतंग हर, लोभ हरा के आगे ।
छुछुवावै बर छोड़िस तब ले, डहर-डहर सुख छागे।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
१०/११/२०२५
धमकिस लोभ सगा बन मन घर, साध सँवारत बड़का ।
मान-गउन नइ करिस ललक के, मन हर देइस हड़का।।
हीनमान ले लोभ भड़क के, लगिस ओरझे मन ले ।
मन हर हिरक निहारिस नइ तौ, ठाढ़ भइस दनदन ले।।
सगा-सहोदर अपन बलाइस, झगरा-रार कराये ।
लिगरी-लाई करिस लुहाइस, ओखी करिस सताये।
सबझन धमकिन दनदन-दनदन, मन हलहलित मताये।
मन मिटकाये रहिस कलेचुप, ओरझिन सब बगियाये।।
अपन-अपन ले जोर लगा के, लहुट गइन लस खाके।
फेर लहुट के जब-जब आइन, गइन अनादर पाके।।
असकुस होगे मन मतंग हर, लोभ हरा के आगे ।
छुछुवावै बर छोड़िस तब ले, डहर-डहर सुख छागे।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
१०/११/२०२५
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