Wednesday, 22 July 2020

छत्तीसगढ़ी शिवभजन

जय जय जय भोलेशंकर 
(लावणी छंद) 

जयजय जयजय भोले शंकर,
जग के गोसइया हरहर।
देंह देव अउ भिन्ना जग के ,
दुख ला टारे गंगाधर ।।
जय जय जय भोले शंकर.....

तोर उघारत तीसर आँखी,
रतिपति बरगे भर-भर-भर।
गर करैत डोमी के माला,
रेंगत हावय सर-सर-सर।।
जय जय जय भोले शंकर.....

हवय बिराजत चंदा मस्तक,
गंगा जटा झरत झरझर ।
शंकर करत अपावन पावन,
अंग-अंग मा राख चुपर ।।
जय जय जय भोले शंकर.....

सृष्टि ल खपले लहुटाये,
ताण्डव नाचत डमरू धर ।।
तोर दुवारी नंदी बइठे,
टहल करत अउ गौरी हर ।
जय जय जय भोले शंकर.....

शोभामोहन
मो. 9171096309 

जूड़ चुल्हा ओकरे हे, जेन टोरत हाड़ हे

जूड़ चुल्हा ओकरे हे, जेन टोरत हाड़ हे

जूड़ चुल्हा ओकरे हे, जेन टोरत हाड़ हे
उवत बूड़त जे कमाथे,ओकरे सुख आड़ हे ।
का करे मनखे भला जब,भाग ब्रम्हा हे लिखे।
लागथे अँधियार जग हा, बाट कोनो नइ दिखे।।

शोभामोहन

छत्तीसगढ़ी कायाखंडी भजन फरथे ओहर झरबे करथे

फरथे ओहर झरबे करथे 

डेरा उसलत सँझा बेरा,
रोआराही परबे करथे।।

चाहे कोनो बइद बलाबे,
जमराजा जीव हरबे करथे।।

मरे नता सँग कोन ह मरथे,
आगी माटी करबे करथें ।

अटल नियम हे सरी जगत के
फरथे ओहर झरबे करथे ।।


शोभामोहन

कोनो खंधेला ले लुगरा ला,
पहिने तव जंजाल अबड़ ।
शोभामोहन

मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा

मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा

तुम प्रात: गोधुली के वंदन ,
सुरभित केसर संदल के वन। 
हृद व्योम वृहद तन मृदु कंचन, 

मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम हो परिणय के पुष्प पत्र,
तुम सुहागिनी के अंग वस्त्र। 
तुम निश्चत विजय अमोघअस्त्र,
तुम शास्त्र सार विग्यान सत्र।। 
मैं नयनों से बिखरी कजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम कार्तिक सरिता दीपदान,
तुम पार्थिव शंकर के समान। 
तुम सदा धर्मधूरी विधान, 
तुम संस्कृति के अमर प्राण।। 
मैं नववधु अलकों की गजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

शोभामोहन


छत्तीसगढ़ी चेतौना भजन सुन्ना घर पहुना झन बन

सुन्ना घर पहुना झन बन

उजरा दे माटी के मुहरन।
गोड़ गड़े काँटा झन गन।।
सुन्ना घर पहुना झन बन।

झन अँजोर ले रख अनबन।
बेरा ले झन धर झगरन।।
सुन्ना घर पहुना झन बन।

सुन्ना घर पहुना झन बन।
भिनसरहा ले कर सुमरन।।
सुन्ना घर पहुना झन बन

छोड़ सबो गिंजरन घुमरन।
बेरा ले झन धर झगरन ।।
सुन्ना घर पहुना झन बन

शोभामोहन

स्वर तिरोहित मुग्ध है मन

स्वर तिरोहित मुग्ध है मन

स्वर तिरोहित मुग्ध है मन।
कामनाएंँ ऊष्ण बन ठन ।।
पाँव घुँघरू छनन छन छन ,
ओंठ छाया मदिर कंपन।
स्वाँस झरते फूल बन-बन,
उँगलियाँ पकड़े लड़कपन ।।
स्वर तिरोहित मुग्ध है मन ।।

कर रही है खनन खन खन,
चुलबुली चूड़ी व कंगन ।
मनमहल उत्सव विलय प्रण,
वासनाओ का अमरपन ।।
स्वर तिरोहित मुग्ध है मन।
घन करे घन घनन घन घन
बिजुरी करती गगन नर्तन
करे कंपित जब मृदुल मन
घिसते हम उमर चंदन ।।
स्वर तिरोहित मुग्ध है मन।

पवन चलता सनन सन-सन,
सुगंधित पाकर निमंत्रण ।
स्वप्न पालित चरण यौवन,
नाम गाये सजन धड़कन ।।
स्वर तिरोहित मुग्ध है मन।

शोभामोहन

मुक्तक

निच्चट ललहूँ दिखत अगास।
पकलाके सेठरागे आस।।
उम्मरधन के होगे नास।
आँखी होगे हवै रोआस।।

शोभामोहन



गीत मधु का प्याला है

गीत मधु का प्याला है
शब्द साधना गहन,गीत मधु का प्याला है।।
मुखरित अनुभूति का नव उजियाला है ।।
गीत पुरातन पथ पर चलकर
गढ़ना चाहे नव प्रतिमान ।
मन आँगन उतरे आतुर से,
भावों का बनके तन प्राण ।।
हृदय बिंधे पीड़ाओ की यह कंठीमाला है ।
शव्द साधना गहन, गीत मधु का प्याला है ।।
आग लगे बौराये जग में,
बरसाती है गीत फुहार ।
होने राख हुई है आतुर,
विस्तृत भय के आकर पार ।।
विधिरहित जीवनपथ, मधुमय मदिरा वाला है।
शव्द साधना गहन, गीत मधु का प्याला है ।।
शोभामोहन
16/16
कोरा गंगा-जमुना लहरा
रतन भरे भंड़ारी दहरा ।
हिमडोंगर मन देवत पहरा ।
दमकत माथा चमकत चेहरा।
होन न देवन तोला खंड़िया ।
रहिबे तीनो काल अखंडिया ।
जीव देवइया हें बलिदानी ।
सब बियाय तोर बचकानी।।
गुरु गहीर बुध आनी बानी
तपसी साधू ऋषि मुनि ज्ञानी।।
ल इका जम्मो तोर पहरिया ।।
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गीत मधु का प्याला है
शब्द साधना गहन,गीत मधु का प्याला है।।
मुखरित अनुभूति का नव उजियाला है ।।
गीत पुरातन पथ पर चलकर
गढ़ना चाहे नव प्रतिमान ।
मन आँगन उतरे आतुर से,
भावों का बनके तन प्राण ।।
हृदय बिंधे पीड़ाओ की यह कंठीमाला है ।
शव्द साधना गहन, गीत मधु का प्याला है ।।
आग लगे बौराये जग में,
बरसाती है गीत फुहार ।
होने राख हुई है आतुर,
विस्तृत भय के आकर पार ।।
विधिरहित जीवनपथ, मधुमय मदिरा वाला है।
शव्द साधना गहन, गीत मधु का प्याला है ।।
शोभामोहन
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फिर अटल विश्वास का बदला धरातल
सकल अर्जित शब्द से पीछा छुड़ाने,
मौन को जब साधनाओं ने मनाये।
प्रश्नचिन्हों पर सभी विराम निश्चित,
श्वांस यह पूर्णाहुति के काम आये ।
अब किसी संदर्भ से विचलित नहीं,
हो रहा है मन सहज ही अब अचंचल ।
शब्दों से व्यवधान जब होने लगा।
फिर अटल विश्वास का बदला धरातल ।।
अब नहीं व्यभिचारिणी हो भावना,
घूमती मस्तिष्क में स्वच्छंद होकर।
मात्र अनहत नाद की आवृत्तियाँ ,
सुन रही हूँ आज अपना स्वत्व खोकर ।
मौन से अगणित हुआ आनंद जब ,
हो रहा मृदुभाव से परिपूर्ण पल पल ।।
शोभामोहन
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संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...