चोला भटकत देस बिरान
मुँड़वार
तिलरिया माने तीन ठन लरी दू लरी के दोहा, चार लरी के मुक्तक कविता पढ़े हन जानथन, फेर पहली तिलरिया "चोला भटकत देस बिरान" पढ़े बर मिलिस अउ लिखे बर घलोक मिलिस। चंदवा ला टोपी पहिरे के ओखी मिलगे। उठत-बइठत हुरहा कोहनी हर ठेंसा जथे तौ कइसे जनाथे ? अंगरी समेत जम्मो हाथ झनझन्ना जाथे, तइसने तिलरिया "चोला भटकत देस बिरान" ला पढ़ेंव तब मोला लागिस, अभी घलोक गुदगुदासी लागत है। वइसे तो ये पुस्तक ला पढ़े बर एकेच घंटा लागही, न हिरदे लगाना हे न बुध, आँखी भर देखत देखत दउड़त जाही किताब पढ़े के किरवा झर जाही। फेर हिरदे अउ बुद्धि लगा के पढ़बे तब तो तिलरिया में चोला भटकत रही। मोला पांँच घंटा लागिस, अपने अपन ठोठक जाबे तहाँ ले अथाह में थाह लगावत रह एक लरी हर एक बात कहिथे, दूसर लरी हर वोकर फूरा-जमूगा करथे अउ तीसर लरी हर कन्झा देथे। ये लरी के सीखा ला देखौ भला का कहिथे ।
मनखे घलोक बजरहा होगे।
अंतस अतेक अजरहा होगे।
बइठे हाट बेंचान रे ।।
कबीर ला जनैया मन तिलरिया 'चोला भटकत देस' बिरान ला ठउका जान पाही, नहीं तो बिरान देस में तो भटकतेच रहना हे।
जगत दिखै नइ जगत चलैया ।
जग के मुँहरन ओकर छँइयाँ । बिरथा मन अनुमान रे ।।
अब का एला अइसने कविता कहिबे ? कबीर, सूर, चैतन्य, गुरूनानक डायोनीज, अउ गुर्जिएफ असन गियानी के संगे संग रेंगे ला धरत हे ये हर तो, अइसन लागथे छत्तीसगढ़ी भाखा में बेद पुरान ला बांँचत हौं। शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन के लबेदा हर तो ओ पार नाहकत हे। छत्तीसगढ़ी बोली भाखा में कविता कहिनी लिखई हर चित्रगुप्त धरमराज के खाता-बही असन अब्बड़ झाफर हे जेन हर सबो ला जियान परथे, सरकारी काम-कारज में उही पाय के छत्तीसगढ़ी के नाम ले साहब सूभा
03
मन के पोटा कांँपथे। जीव कलकुत असन छत्तीसगढ़ी लेखक कवि मन हर बोली भाखा ला ढेखरा असन थाम्ह के राखे हें। शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन के लिखा मन हर छत्तीसगढ़ी बोली भाखा के एहवांँत आय, फूलत-फलत रहै, सदा सोहागी रहै अभी तक ले तो गंँवावत आय रहे हवन अब तो पाय लागत है तेला तो पोटार लन।
बाठबतैया भठहा भइगे।
आसा खाँधा रटहा भइगे।।
चल मन पिय सोरियान रे।
छत्तीसगढ़ी में पढ़ैया लिखैया मन हर मोर जब्बर गोहार ला सुनौ तिलरिया ल खत्ता में पढ़ौ गुनौ अउ सीखा हर का बोलत हे तेला थोरिक थीरथार सुचेतहा होके धरौ खच्चित अघा जाहू भाई । शंकर पार्वती के भाँवर लगा के गनेश जी हर संसार के परकम्मा करे के बात मनवा लिस वइसने तिलरिया में तीन लोक, चउदाभुवन के मरम समाय हे, निमार के देखौ ।
सौ में सतहा लाख में जतिहा। थोरिक मनुख अति ननजतिया।।चिन्ह ले अपन घरान रे।
लिखा-लिखा ला सकेल के एक संघरा परूसना नोहै, तिलरिया हर आगर हे, सब मिला के कहे के मतलब सोच-समझ हे। शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन हर अवैया दिन के बिहनिया ला आजेच देख लेथे। सिरतोन में मनखे असकटागे हे जीयत हे, तब मरे बर मरत हे तव जीये के असूसी।
साध पुरे मन चुप नइ होवैं।
अउ दूसर उपका के रोवैं।।
कइसे नरक खंँटान रे।
राबिया नाव के एक झन बाई घलो लिखे हे, अइसने का कबीर का राबिया संसार में रहिके नहीं रहत रहिन ? उही में शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन ला मैं हर समोखथौं राग में पाग हावय, सन्यासी, विरागी मन संग ठाढ़े हे वोकर तिलरिया "चोला भटकत देस बिरान" हर।
चार खाँध जब जाय जवैया।
आगू रोवैया पाछू गवैया।।
सत हे पिया के नाव रे।
04
एक लिखैया हर लिखे हे "हाट सूना हो गया गोरी चली गयी" शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन हर गोमची आय, गोमची चल देथे फेर ओकर बानी नहीं जावै देखौ :-
हाट उसल के सुन्ना होही।
हठवारा नवा जुन्ना होही ।।
सब जग मरी-मसान रे।
एही ओरी में देखौ :-
बुध ला माया तोपे बइठे।
मेर्री मारे मोह हे अँइठे ।।
चल भक्ति उपकान रे।
सांझर मिंझर जिनगी में तिलरिया के अरझे-ओरमे सुर्रत सुरता ला
अरियावत है-
काँटा खूँटी पाप करम के।
इचनी-बिचनी रकम रकम के ।। अरझे बिकट गठान रे।
तिलरिया तिखारत हे सरेखत हे सरेरत हे अपनेच पूछत हे अउ अपनेच हर बतावत है।
बइठे अलहन पाटी पारे।
मंदमाते तैं कहाँ निहारे।।
फेर परगे पछतान रे।
लिखत हंँव तेमा बड़े-बड़े उठेंवा देवत हौं, इंकर लिखा ला नींद-पुदक के देखे हौं लिखना हे कहिके आधा सीसी नहीं पढ़े हौं पूरा सीसी करे हौं थाह अथाह है-
मन अइसे जइसे तैं मान ले।
मैं नोहौं वो मन ये जान ले।।
मन हर मुरुख सुजान रे।।
05
गंगा-जमुना के पबरित पानी के धार में कमल नहीं फूलै, हर घोंघी में मोती नहीं होवै छत्तीसगढ़ हर ओरी और गंँवावत आवत हे, हम तो पछतानी करत-करत थक गेन। शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन हर झन गंँवाय मैं नहीं रहूँ तौ का भइस तिलरिया के लिखा-सीखा घरोघर टंगाय रही, आवत-जावत लोगन पढ़हीं अउ जीव जुड़वाही। तिलरिया हर छत्तीसगढ़ी साहित्य समाज ला कुबेर के कलम दे दिस। अब अंगूठा झन लगाव । बस !
कृष्णा रंजन जी
महाराज राजिम
ब्रम्हचर्य आश्रम (संत)
06पेज
"शुभ कामना"
मानव का मन अद्भुत है वह मन ही मन अन्वेषण करता है, फिर चिंतन-मनन की कसौटी कस कर, अपने विचार प्रकट करना चाहता है। अपनी उपलब्धि को दुनियाँ को बाँटना चाहता और वह अपने विचार को पुस्तक का रूप देता है। प्रत्येक रचनाकार की रचना उसका स्वगत-कथन है।
"चोला भटकत देस बिरान" शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन का स्वगत कथन है। छोटी- सी उम्र में इतनी प्रौढ़ता की मैंने कल्पना नहीं थी, इस पाण्डुलिपि को पढ़कर मैं अचंभित रह गई। एक-एक शब्द को चिंतन मनन की कसौटी में कसकर शब्दों में पिरोया गया है, इसकी खुशबू दूर तक जाएगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है-
जिनगी के सब ताग गठनहा। सबके रीत अलग अनबनहा।।
फेर कइसे पतियान ।
कसने रेंग निहर के तन के।
टिकली मोल नहीं ए तन के।।
काबर गरब गुमान रे ।
मानव-मन बड़ा जटिल है, वह सुख की चाह में, लोभवश, रीति-नीति को बिसार कर ऐसी राह पर भटक जाता है, जहाँ उसे सुख की जगह, दुख दर्शन होते हैं, पर हम सभी जानते हैं कि सुख और दुख के कारण हमारे अपने कर्म ही होते हैं-
दँउड़ावै सुख मिरगा-पानी
परे टकर बेरा धुरधानी ।।
पानी फेर गुनान रे।
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कबीर को पढ़ कर मैं अभिभूत हो जाती हूँ। बड़ी-बड़ी बातों को कबीर एक दोहे में कह देते हैं। उसी लीक पर चलते हुए शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन बहन ने जो तीन- तीन पंक्तियों के तिलरिया में जो कुछ कहने की चेष्टा की है, इसकी यदि व्याख्या की जाये तो इन तीन-तीन पंक्तियों पर एक सम्पूर्ण आलेख लिखा जा सकता है। कविता इसीलिए दुनियाँ भर में इतनी लोकप्रिय है कि वह वेद-उपनिषद् और दर्शन के सूक्ष्म-संवाद और सार को बहुत कम शब्दों में हमें समझा देती है-
"माटी मिलथे राजा-राठी।
माटी ले झन बोल उराठी।
माटीच मीत मितान रे।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन एक भाषा विज्ञानी भी हैं इसलिए उनके तिलरिया चोला भटकत देस बिरान रे में शब्दों से उत्पन्न चमत्कार के साथ ही साथ छत्तीसगढ़ी चारुता और लालित्य भी यत्र-तत्र है। यह पुस्तक उनकी दूसरी प्रकाशित पुस्तक है हर पंक्ति में स्वयं के लिए और समाज के लिए सुंदर सीख है। उनके एक-एक शब्द छत्तीसगढ़ी के भावों की गगरी भर रही है। तिलरिया चोला भटकत देस बिरान रे पुस्तक पाठक के मन को बाँधकर रखने में समर्थ तो है ही, ज्ञान-गठरी, विधि-निषेध को विवेकपूर्वक परोसा गया है मेरी दृष्टि में कवियित्री की यह सब से बड़ी उपलब्धि है कि उसने छत्तीसगढ़ी भाषा में गूढ़ सनातनी परंपरा का निर्वाह किया है मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तक छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास में मील का पत्थर सिद्ध होगी और पाठकवर्ग इस कृति का अभिनंदन कर इसे पढ़कर अपनी जीवन सार्थक करेंगे।
शुभकामनाओं सहित जेठ पूर्णिमा-2017
शकुन्तला शर्मा
भिलाई - 490006
288/7 मैत्रीकुँज मो.- 1.- 9302830030
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बेबाक, फक्कड़ तिलरिया का अंदाज
"चोला भटकत देस बिरान" परमात्मा और जीवात्मा के बीच आच्छादित दुष्चक्रों का बारीक व मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है। पुस्तक के शीर्षक के साथ जो निर्गुण भावमय यात्रा शुरू होती है वह सतत् पाठक के मन मस्तिष्क को गतिमान करते हुए अंत में सगुण रूप तक अपने शीर्षक के साथ घोषमय, भावमय, शब्दमय व चित्रमय शैली में पाठकवृंद को यात्रा कराती है। कवयित्री की भाषा कहीं बिंबात्मक तो चित्रात्मक है। सबसे महत्वपूर्ण बात इस पुस्तक में यह है कि प्रत्येक पद में कवियित्री स्वयं अपने उद्घोषणाओं के समानान्तर खड़ी हुई प्रतीत होती है। नाना प्रकार के सांसारिक जंजालों में छटपताते जीवात्मा की व्याकुलता कहीं-कहीं विहल कर देने वाली है।
सुभ सम दया मया बो लेतेन । पाप बकर बोमफार रो लेतेन ।।
होतिस हरू परान रे।
मानवीय दुर्बलताओं की सभी कोटियों को कवियित्री ने स्पर्श करते हुए स्वयं के प्रति निषेधाग्रह किया है ताकि जीवात्मा परम विश्रांति को प्राप्त हो सके। अपने आत्मा से दूर रहने के कारण ही जीवात्मा दुःखी है यदि जीव आत्मस्थ हो जाय तो विकाररहित व पवित्र होता है। कायस्थ (काया में स्थित) रहने पर स्वस्थ रहती है। और मनस्थ रहने पर सदैव दुःखी व रुग्ण रहता है। मन के महीन परतों को खोलकर मन के मालिकपन से निवृति हेतु कवियित्री ने अपनी साहित्यिक दक्षता व छत्तीसगढ़िया आत्मा की अतुल्य अनुभूति को शब्दों में आकार देने का स्तुत्य प्रयास किया है। यथा :-
मन खेवास बन चंँवर डोलातिस ।
चलतिस जइसे चेत चलातिस।। फेर बनगे सुलतान रे ।
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कवयित्री कभी सजग प्रहरी की भाँति आह्वान करती है तो कभी तटस्थ भाव से वस्तुनिष्ठ प्रश्नकर्ता की भाँति प्रश्न करती है।
सौ में सतहा लाख में जतिहा।
थोरिक मनुख अति ननजतिया ।
चिन्ह ले अपन घरान रे।
अर्थात सौ में कोई एक सत्यनिष्ठ होता है, लाखों में कोई एक यति अर्थात् साथक, तपस्वी होता है। बहुत ही अल्पमात्रा में इस धरती में मनुष्य मिलते। हैं और पथभ्रष्ट और निम्नकोटि के लोगों की सबसे ज्यादा संख्या इस संसार में है, तुम किसी घराने से संबंधित हो अपना घराना पहचान लो इन पंक्तियों में कितना बेबाकी व निर्भिकता है।
छत्तीसगढ़ी में मन जीवात्मा और परमात्मा के विषय में इतना विश्लेषणात्मक और गूढ़ रहस्यों को प्रकाशित करने वाला मौलिक सृजन संभवतः अब तक प्रकाश में नहीं आया है। कवयित्री ने एक कुशल मनोवैज्ञानिक की भांति मन, गति मन की चालाकी, मन की चतुरता गूढ़ता को सुघड़ता से अनावृत किया है।
यथा :-
देख कले चुप मन के लहरा।
उठत हवै कइसे बिन दहरा।
मुड़पुरूस बुड़ जान रे ।
अर्थात् शांतचित्त होकर मन के लहरों को देखो। मन की गति इतनी वक्रीय होती है कि मन जो नहीं होता उसकी कल्पना कर लेता है और अपने आनंदित रहने का मिथ्या उद्यम करता है। मन बिना नदी, तालाब या समुद्र के मिथ्या लहर पैदा कर लेता है और भ्रम के लहर में सिर तक डूब भी जाता है। कितनी हास्यास्पद बात है कि आलम्बन के बिना ही उद्दीपन की रचना केवल मन ही कर सकता है। कवयित्री ने किसी मनोवैज्ञानिक की भांति मन का बहुत बारीकी से विश्लेषण किया है। "चोला भटकत देस बिरान" की पंक्तियों को पढ़ते-पढ़ते कभी ऐसी भी प्रतीत होता है कि कहीं यह ग्रंथ अपने ही जीवन व तन-मन पर किये गये प्रयोगों और अनुभवों की टीप प्रतिटीप तो नहीं है।
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चोला भटकत देस विराम के पुस्तक के तीन पंक्तियों की तिलरिया में प्रत्येक पद में मानव जीवन की विद्रुपताओं संवेदनाओं के जिस भी आयाम को स्पर्श किया गया है उसे पूरी सार्थकता के धरातल पर उतारने का पूरे मनोयोग से प्रयास किया गया है। उक्त ग्रंथ मनोविलास नहीं अपितु चिंतन का ग्रंथ है। भारत देश के आध्यात्मिक वांग्मय चिंतन और हितोपदेश में छत्तीसगढ़ी भाषाशक्ति, भाषा सामर्थ्य, भाषायी सामाजिकता और सात्विकता केन्द्रित छत्तीसगढ़िया आत्मा होने का श्रेष्ठ प्रमाण है। यह सम्पूर्ण प्रबंधकाव्य आत्म प्रबोधन और आत्म संबोधन का ग्रंथ है जो स्वानुशासन आत्मचिंतनपरक छत्तीसगढ़िया आत्मा का उद्गार होने के कारण छत्तीसगढ़ के ग्राम्य जीवन ग्राम्यविम्बों, चित्रों और शिल्पों से अभिसिक्त छत्तीसगढ़ी के सुगंध से सुगंधित " चोला भटकत देस बिरान" को छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रतिनिधि ग्रंथ कहना अतिश्योक्ति नहीं है।
कवयित्री की कथ्य के प्रति निष्ठा, बेबाकी और फक्कड़ तिलरिया को विलक्षण बनाती है।ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रत्येक उद्घोषणा स्वयं के लिए है और स्वयं के प्रति उनका व्यवहार उदारतापूर्ण नहीं है। आत्मपरक शैली में लिखे होने के कारण यह ग्रंथ सबको स्वयं की ही निजानुभूति जान पड़ेगी यह तिलरिया, आत्मपरक शैली में रचित साहित्य को सदैव उत्कृष्ट माना जाता है। मेरे विचार से बिना लागलपेट के फक्कड़पन और जीवन की निःसारता और जीवन जीने के उचित ढ़ग को तिलरिया ग्रंथ के माध्यम से सहज ही उजागर किया गया है। जीवात्मा को चेतावनी देने के लिए छत्तीसगढ़ी में जिन प्रतीकों, बिंबो का लालित्य बिखेरा गया है वह छत्तीसगढ़िया जनमानस की अन्तरात्मा को जोड़ने, झकझोरने और सहज ही संप्रेषित करने की अपूर्व क्षमता से परिपूर्ण है।
चिथरा होही काया गरबिन।
अउ जगरीत लहुटही करबिन।।
जीव रही कोरवान रे।
यह गर्व से फूला हुआ शरीर एक दिन चिंदी की तरह जर्जर हो जायेगा और मानव समाज को निर्देशित करने वाले रीति-रिवाज एक दिन बृहन्नला
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हो जायेगी किंतु जीवात्मा फिर भी नये कपड़े की भाँति परम पवित्र है भले ही शरीरी यात्रा में पराये देश में न जाने कहाँ-कहाँ भटकते रहना पड़ रहा है। कवयित्री का परमसत्ता पर अमोघ विश्वास है। अंत में परमात्मा को
गुहारती हुई कहती है-
मायागढ़ ले पिया बला ले।
आरूग करे अगिन नहवा ले।
अंगिया ले भगवान रे।
चूंकि शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन छत्तीसगढ़ के महान विभूति स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, प्रबंधकाव्य प्रवर्तक पुरोधा पुरूष पण्डित सुन्दर लाल शर्मा जी की चौथी पीढ़ी की वंशज हैं और इन्हें साहित्य विरासत में मिली है इनके साहित्यिक प्रतिभा के विषय में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। मुझे गर्व है कि ये ये सौभाग्य से मेरी अर्धांगिनी हैं।
"चोला भटकत देस बिरान" भक्ति, चिंतन, आत्म विश्लेषण, आत्म शोधन व आत्म प्रबन्धन का छोटा सा किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली, आध्यात्मिक वांग्मय से परिपूर्ण लोकभाषा शैली में लिखित स्वयं के प्रति आग्रही ग्रंथ है। यह सबके के लिए उपयोगी है अतः प्रस्तुत पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा में अब तक रचित उत्कृष्ट ग्रंथों की श्रेणी में स्थान व महत्व रखेगी तथा सदैव प्रासंगिक रहेगी इन्हीं शुभकामनाओं के साथ-
मोहन श्रीवास्तव (कवि )
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दू टप्पा लिखेरी के गोठ
'चोला भटकत देस बिरान' हर आध्यात्मिक बेड़ा के छत्तीसगढ़िया अंतस के उछींद गुनान आय। भारत के आध्यात्मिक चेतना सदाकाल ले पोठ हे कतको सिद्ध, सुजान, ज्ञानी, ध्यानी, साधू संत के भारत हर जनम भुँइया आय उँकरे भाव गुनान के झीप में मोरो अंतस हर भींजथे, तेकरे उतारा आय ये पुस्तक चोला भटकत देस बिरान रे हर। बुधियार मनखे मन सरेखहीं तौ लिखई फलित पर जाही। मय तो अपन अंतस के जुड़वास खातिर कागद करिया कर डारेंव, बेरा के संग पूरा कस पानी कब उतर जाहूँ नहीं जानव, फेर मोर चुलूक मरत ले झन छूटे, इही मोर भगवान ले अर्जी हे काबर कि मोर ये चुलूक हर मोला मनमाने सुख देथें। गीता, रामायण अउ उपनिषद मन ला ननपन ले पढ़त अउ सुनत बाढ़ेन अउ मति, गति हर असंग बिरंग धीरलगहा होवत गइस तेकर गम नहीं मिलिस।
पटपटहा जिनगी म बैराग उपकथे कहै हमर बबा हर तेन ठउकाच कहै
आय। 'चोला भटकत देस बिरान' कोनो ला सिखोना दे बर सकेले गंँठरी नोहै भलुक अपने भरमाये मन ला संँवागे के दिये चेतौना सिखौना आय। बारा बिपत के जिनगीबाठ में रेंगत कोनो पयडगरी कोनो धरसा, कोनो अरकट्टा में अभराय जनास मन ला ओलियाय हौं, मोर कोनो जनास उढूँवा नोहै एक्के धरसा में रेंगत-रेंगत घलोक सबके जनासा आनेच आने होथे सबके रामकहिनी आने आने हे गुनान के बोझा रचरचात ले होथे तब बेरा के सगुन- असगुन ला भंजाय बिगन कागद कलम के थेमा में अपन अंतस के गरूआपा ला हरू करत- करत मन हर बिरंग असन होथे तब "चोला भतकत देस बिरान" के मूड़वार धराथे।
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मोर उथली गुनान में न तो सर हे न सेवाद हे फेर एक धुन हे जेन भाव हर डंगनी में नहीं में अमरत बनै तेला अँगरी म छुवे के साध। देख के तो कतको झन हाँसहीं कही तब मैं राम नहीं बोलौं।
कोनो बाठ रेंगे ले जीव के संताप कमती नइ होय अउ जीव हर
जइसे ही चेतत हे कहिके लागथे मन फेर खेल-खेल देथे। पीरा थकासी ले जीव गरूआवत जतके रेंगत हे ततके कुकरी असन थकत हे अउ एक दिन निथोथिया बीचबाठ में देह थक जाथे, अउ बेरा कहिनी पूर जाथे फेर चवरासी के मूड़ी-पूछी दिखबे नइ करै। ये घुमरन गिंजरन हर अबड़ बियापने वाला है-
माटी बरतिया माटी घरतिया।
माटी संग सुते सुख रतिया।।
माटीच फेर बियान रे
चोला भटकत देस बिरान रे
ये फेर ले न तो जीव उबरत है, न थकत हे, न थिरात हे, भले जीव जात हे फेर साध-सधवरा मन नइ छूटत हे। निरबुद्धि जनम घर के निबुद्धि माटी में पटा जथन अउ अनचिन्हार बाठ के बठचल्लापन ला संँवास लेवन। ये मानूस तन पाँच जिनिस के तमूरा हे, ये तमूरा ला बजाय के मरम ला जाने बिगन पंचतन गुन (रूप, रस, परस, दरस गमक) के भांग धधूरा के नसा में मताय अबूझहा के अबूझहा रही जाथन। जीव के कभू नहीं सिराने वाला रामकहिनी ला अपन बोली- भाखा में निभाय के ये डउल हर मन के लपकत धार के बोहाय उतारा धरसा आय छत्तीसगढ़ी बोली हर मोर मन के भाव ला समोखे सकथे अउ किरवार कर सकथे मोर साध सधौरा हर चिटरा उदिम ले जादा नोहे छत्तीसगढ़ महतारी के कतको झन चाकरी करैया हें उही पाँत म महूँ अपन महतारी भाखा में पोथी लिखे-लिख के मन ला भूलवारत हौं अउ बोलीभाखा के अपार सक समरथ ला अपन नानुक अँजरी म झोंक झोंक के झलकत हौं मोला एकर ले सरस, नीक अऊ गुरतुर भाखा खोजे ले नइ मिलै। अड़हा के गोठ ला बुधियार मन तउलहू।
जय छत्तीसगढ़, जय छत्तीसगढ़ी
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
पाॅंच जिनिस के रचे पुतरिया। होवत हावय छिछिकुतरिया।। कर एकर सनमान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चौंरासी के चकरघुमरिया
फेर जनम फेर होवत मरिया
मानुस तन गति जान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
घाट घठौंदा के पगचिन्हा।
बने रहिस वो भइगे गिनहा ।।
गढ़ ले नवा सुजान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बारा - बाठबतइया आगें।
बाठ बता अरझइया आगें।।
कोन करै पहिचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
काॅंटा -खूंँटी पाप करम के ।
इचनी-बचनी रकम-रकम के।।
अरझे बिकट गठान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बुरजा खावत अंतस धनहा ।
काॅंदी लूवत मगन किसनहा ।।
परछो कठिन अजान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
टिकरी चढ़े चोला हर बोले ।
मोला देख सचेतहा होले ।।
फेर तोरे सुध आन रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
दुखबाठी के देखासीखी ।
जम्मो फोरत हें दुख पीकी ।।
हीनहर जबर जहान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चौंरासी के चारापानी ।
दू पन ले मुॅंहजोर जवानी ।।
सिट्ठा लगै पुरान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतस भीतर सिपचत आगी।
पानी डारत सुख-दुख भागी ।।
गरज लगिस घिरलान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
महल- अटारी के सुख जोरन ।
साध मुॅंहाटी बाॅंधे तोरन ।।
लटपट छूटै परान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कलकुतहा मन बोंवै पीरा।
राख रपोटै फेंकैं हीरा ।।
उदिम नहीं समझान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लस लहगर के मान बढ़ाई ।
कंगला कोन सरेखै भाई ।।
धनधर के जयगान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मया मोहाय मगन हे चोला ।
आरूगअंतस संग अनबोला ।।
जग भेंड़ियाधंॅंसान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
भठहा भइगे जिनगी धरसा।
खंडिया भइगे मंगलकरसा।।
खटिया धरे ईमान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
गुरतुर लागै बिखहर बैगुन ।
थिरकत तन लगवारी के धुन ।।
बिख बिजहा बगरान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जमराजा के बाजा - रूँजी।
उरकावत सांँसा के पूंँजी।।
लेगन करेजा चान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जिनिस बजरहा आँखी बइहा।
निस्तारी के रद्दा कइहा ।।
कर समरथ हीनमान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन पंचालिन चाल चलैया ।
तन सुखरमता नाच नचैया ।।
बिगड़त गति सुजान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चरदिनिया सब चलत तियारी ।
सबदिन के सब बात बिसारी ।।
उटकट रीत बिधान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जब गठरी सुख के छरियाथे।
सुखसंगी आगर लोरियाथे ।।
दुख के भाग उतान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हे सुखसाध अबड़ हरहुन्ना ।
दिनभर मेला रतिहा सुन्ना ।।
कहाॅं परे चितखान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
डिंडवा घर पहुना बन आये ।
मूड़ मुड़ायें करम ठठाये ।।
घानीमुनी जीव जान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हरि सरधा सुमिरन के करनी ।
कहे सुजानिक घाट उतरनी ।।
कखरो तोे बुुध मान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बिरथा हे सब जोखा - तोरा ।
बेर करन नइ देय निहोरा ।।
जानत पाप कमान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जिनगी के सब ताग गठनहा ।
अउ जगरीत अलग अनबनहा ।।
कइसे फेर पतियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
रेंग निहर के चाहे तन के ।
टिकली मोल नहीं ये तन के ।।
का के गरब गुमान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पंथीभेद करावत झगरा ।
आँखी वाले भइगेे अंधरा ।।
लेवत अपने परान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बिखहर लोभ खड़े मुॅंहफारे ।
अंतसकोती कोन निहारे ।।
आँखी ल परै जियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पाॅंच जिनिसहा नश्वर चोला ।
अबिनासी जीव संग अनबोला ।।
कइसे लगन लगान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँखी गिंजरत लोभ सिल्होथे ।
साॅंसा धुकना उमर पुरोथे ।।
चेत सुते गोड़ तान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
माटी ओढ़ना माटी दसना ।
माटी में तन हवै उरसना ।।
माटी म हमर मिलान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
माटी बरतिया माटी घरतिया ।
माटी संग सुतन सुखरतिहा ।।
माटीच फेर बियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
माटी महल मटासी काया ।
दागलगाये बिच्छल माया ।।
मर लागिस भरमान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चटक-मटक के साध-सधौरा ।
फुलवारी भर भटके भौंरा ।।
रस फाॅंदा झोरसान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
असलग लाग नता के बंधना ।
गरज गुॅंथे अलकरहा गॅंथना ।।
छिंहीबिंही पहिचान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लर-लर लटके आसा-लरिया ।
मुॅंह तोपत हे लिखे लिलरिया ।।
मन बिसराम करान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
माटी मिलथें राजा-राठी ।
माटी संग झन बोल उराठी ।।
माटीच मीत मितान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
राखसात होबे बजरंगा ।
बिरथा गरब-गोहार भुजंगा ।।
कर झर अपन बखान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मूड़ मुड़ाय बने बैरागी ।
नहीं बुताइस मन के आगी ।।
पानी बुड़े न निदान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लाग नता बन बैरी-काॅंटा ।
मरमठाॅंव कर पारत घाँठा ।।
छेदत बोलीबान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बैरी पिठेरी बैरी पिठेरा ।
पाग ताग अनुराग गॅंठेंरा ।
बिखहर भइस जबान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पंचतंत्री तन तार तमूरा ।
पंचतनगुन के भाॅंग धथुरा ।।
अजगुत गुन मनुसान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चेत परावत बुद्धि हरावत ।
मायाठगिया नाच नचावत ।।
उल्टा परे गुनान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँखी के एँहवाती सपना ।
डारत हे ओलवार कलपना ।।
गुनत न लाभ न हान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
करमडंड के फेके पासा ।
रूप सुभाव करम गुनबासा ।।
अनबुझरीत बिधान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तिल-तिल जोरे धनधोगानी ।
नइ तोर बानी जान अड़ानी ।।
बिरथा जोरन जान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बइठे अलहन पाटीपारे ।
मंदमाते तैं कॅंहा निहारे ।।
पाछू फकत पछतान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चारोजुग तिरिया के कहिनी ।
गजब कठिन भुॅंइया हे रहिनी ।।
कतको धरै गुन ज्ञान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बुधियारी बड़ बँहकर बानी ।
गोठ पटकनी गोठ छलानी ।।
बिनगुन जग निंदरान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पोथी पढ़े न नाम उचारे ।
अंतस कोती नहीं निहारे ।।
बाॅंचे पीरा पुरान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चुनियाजल ले लेवना हेरे।
मथे गजब अउ उदिम जंजेंरे ।।
कहूँ न सकिन समझान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बुध बिबेक तप सत ले अँइठे ।
मार मेड़री लालच बइठे ।।
कस सतगुन पनकान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नीक खीख खीख निकहा लागै
मिटकाये हर कइसे जागै ।।
ऊपरे - ऊपर उड़ान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
दंँउड़ाथे मन मिरगापानी ।
परे टकर बेराधुरधानी ।।
पानी फिरत गुनान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सौ में सतिहा लाख म जतिहा ।
थोरहे मनुस अति ननजतिया ।
चिन्ह ले अपन घरान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बने गिनहा कोनो बोनी ।
होनी मन नोहै अनहोनी ।।
बिकट बिटौना जान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
करे न डउल सवाॅंगे जाने ।
अलहन कर भोगे मनमाने ।।
मन नइ भरिस गलान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लिपसा बाॅंधे हे चमचम ले ।
मोह भोगाये हे दमदम ले ।।
बिगड़े नता गोतान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
का करना अउ का कर डारे ।
करम करत बिधना गढ़ डारे ।।
दुखबिरवा उपजान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चारोखुॅंट घपटे अँधियारी ।
अंतसबल हो गइस बिचारी ।।
असगुन करत गुनान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
रीसराॅड़ हर बुध ला खावै ।
बुद्धि भखे बर प्रान ललावै।।
गुनधर चतुर सुजान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन हरूवाय मया बो लेतेस।
पाप बकर बोमफार रो लेतेस ।।
होतिस हरू परान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हरि गुन गा के पिरित गढ़ाते।
करत मड़ौंना बड़ सुख पाते ।।
चेत जते धर कान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन बइठे हे बने गोंसइया ।
सब ला समझ खेवास करैया।।
चल चल चाल नठान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
भूतबहेरा गिंजर बहीतरी ।
राज चलावत बाहिर भीतरी ।।
चलवन्तिन मन जान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन खेवास बन चँवर डोलातिस।
चलतिस जइसे चेत चलातिस।।
फेर बनगे सुल्तान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चलन अँजोरे अंतस डीह ला ।
खोजत हे जीव तेने पिय ला ।।
अभरे मति धुनियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बिरथा संसो अरझे परबस।
कचरा कूहा उलदे अंतस।।
टकर न छुटिस नदान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चिथरा होही काया गरबिन।
अउ जगरीत लहुटही करबिन।।
जीव रहिहै कोरवान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पुरूत-पुरूत परदा सब टारे ।
आरूग आतम रूप निहारे ।।
चल अब उदिम लगान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सुख तो अपन जनासा में हे।
मन हर बिलमे आसा में हे।।
मुॅंहरन परे मलान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतस आरो निच्चट अनसुन ।
रंग रंग के उपकत बैगुुन ।।
नीत सुनत टेडुवान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बिरथा जिनगी कभू अंँखरतिस ।
आसा तिसना काॅंदा मरतिस ।।
हो जातिस कलियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मरेआसरा मरीबोहैया ।
सुख बर पर के बाटजोहैया ।।
दुखखच्चित परमान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हाय कहे ले जीव नहीं छूटै।
लाग नता चेम्मर नइ टूटै।।
जानत छुटै गठाॅंन रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सबले बरकस जात दुगोड़िया ।
प्रभुवर हाथ पुतरिया डोरिया ।।
टूटत ले झन तान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हाट उसलही सुन्ना होही ।
मुॅंहरन नावा जुन्ना होही ।।
सब जग मरीमसान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लाखजुगन के भटके भौंरा ।
चोला धर बन बेराकौंरा ।।
तभो न होइस भान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बन जा अब तो अपनगोंसैया ।
मुॅंह सीले बर जगतहॅंसैया ।।
भिड़ जा सतपरमान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
गुन में नून अउ झन करबे ।
का मुॅंह ले जाबे जब मरबेे ।।
पर जाही भुगतान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पानी के फोटका फूट जाही ।
हाटबजार सबो छूट जाही ।।
कर ले हरिगुनगान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
झन उटके कर दयाधरम ला ।
पार छेदरा ठाॅंवमरम ला ।।
फाॅंकन जिभिया लाम रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बुध सिखोय मया उबजारे ।
काम न आवै मान तो जा रे।।
होबे लहूलोहान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पियतम रखही छाॅंव हथेेरी ।
झन कर संसो घेरी-बेरी ।।
अटकर मन झन लान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँखी नाचत हाट लोभावत।
अउ ठोठकत तन गरूवावत।।
झन धर गजब समान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चार खाॅंध जब जाय जवैया।
आगू रोवैया पाछू गवैया ।।
सत हे पिया के नाम रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
काया बन में जीव गॅंवागे ।
कउखन जावनबेरा आगे ।।
अब का जुुगुत लगान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लाग-नता कुछु काम न आवै ।
सुख-दुख में कतको जुरियावैं।।
फेर का गर कसवान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
रेंगत बीन अँचरा गंँठियाथन।
पाॅंव तरी गउकिन अभराथन ।।
उही अलहन अंजान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सिरजैया हरि पल पल पासत।
देख हमर बुध मुचकत हाॅंसत।।
दे करनी बरदान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नइ कठपुतरीसउत सुहावै।
जीवबपरी हर तभो निभावैं।।
जीयत भर झींकतान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पटपटही अंँखफुट्टी बइठे ।
बाठछेंक गरकट्टी बइठे ।।
सुख देरान-जेठान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बैरी जनावत अपनगोंसैया ।
हाॅंसत हाटबजार हॅंसैंया ।।
ये हाॅंसी नइ बान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बाठ बतैया भठहा भइगे ।
आस के खांँधा रटहा भइगे ।।
अब काला सोरियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पंचतनगुन बड़ नाच नचाथे ।
राजा लंगटा सब बइहाथें ।।
कतको धीरज बाॅंध रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
परसुख देख गजब सिसियाथन।
अपनदुःख में रोथन गाथन ।।
अइसन चाल रोगान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
साध भले पुरही नइ पुरही ।
पानी परही ढेला घुरही ।।
अब प्रियतम मन लान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कतको खावन नहीं अघावन।
काके सेती अतिक खखावन।।
गुन के कभू न लजान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बाठ चलत काॅंटा बीन लेतेन।
का का करेन सबो गिन लेतेन ।।
लग जातिस अनुमान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बाजारूॅंजी झाॅंझ मंजीरा ।
चिहुर में बुड़गे अंतस हीरा ।।
सुन्नाबाट गियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नाव सोर के भूख जगे हे।
अपन बिरान सरीख लगे हे।।
अहम लगिस बर्रान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अइसन चुलुक लगें हे मन मेें ।
बउराये तन अन धन जन में ।।
ओरीधर ओरियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सरधा बिरवा ठाठा परगे।
अउ आँखी के पानी मरगे ।।
कइसे पिया मेर जान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
साॅंसा-साॅंसा पिया अमाही ।
अपने अपन बैगुन टर जाही ।।
करत करत अहवान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हमर पिया सिरजे सब झन ला ।
टारत हे पग-पग अलहन ला ।।
उदिम करन पधरान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
भुॅंइया नीर अगास बियैया।
जगत बयार अगन सिपचैया।।
ओकर कर गुनगान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जनम-मरन के माॅंझा जिनगी ।
धूरसनाय टॅंगावै फुनगी।।
करवावै दहकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मायागढ़ ले पारकरैया ।
आरूग करन अगननहवैया।।
ओरखत भाव जहान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
भाखा नइ हे गुुन गोठियाये।
बुध नइ हे छँइहा अभराये।।
अगम अपार महान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
खोजत-खोजत मरिन खोजैया ।
गोमही-गोमहा भइन पवैया ।।
बइठे अतिक उचान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जिनगानी के छोड़ झमेला।
रेंगन सुन्नाबाट अकेल्ला।।
आरूग अश्रु बहान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
घपटे जिनगी करिया बादर ।
चिन्ह मयारूक भाव दयाकर।।
अवसर दिही उजरान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
ओरझाये जग पिटही मांदर ।
लपट झपट करही रंगझांझर ।।
मूॅंद ले आँखी कान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सबदिन के ये जीव हेरौठा ।
जुग जुग बइठे डेहरी पौंठा ।।
मरूवा धर गोसान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
प्रियतम सुध में छिनछिन जीले।
जहर देत जग तैं चुप पीले।।
बन झन जगतसियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
साधपूरे मन चुप नहीं होवै।
फेर दूसर उपका के रोवैं।।
नरक में कइसे खंँटान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जीव में सिरजम मनखे के तन।
माढ़ेमऊरे जेमा भगवन ।।
बाॅंचे अबूझहा जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तिरिया-मनूस मया चरदिनिया।
कटकट पूरथे भरे मंझनिया।।
अउ तन गरू संँझान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।।
छोंड़ के जग होजा थीरमंडिल।
छोड़छाड़ के जगतिकचिलचिल।
मनगति ला कलथान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।।
मन के कर दे खात खवाई।
अमरित पी ले नाव दुहाई।।
झटपट जीव उबरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतस माॅंगत अपन जेठासी।
देंह बँटैतिन मुँह रोवासी।।
फकफकहा मुस्कान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
साॅंसा-साॅंसा नाव सुमरही।
अंतस झिरिया तभे पझरही।।
चल ना डउल लगान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।।
का सुखसुम्मत का दुखगम्मत।
सुमिरन करबो सुधर जही गत।।
सब उदेल रेंग जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
उही हंडेरा उही मुडे़रा।
उही गोतियार जीवजगडेरा।।
सब तो पियाघरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कोइली गढ़े हरि कॅंउवा होगे।
धरमछंडी कलउहा होगे।।
नामेच दिखत निदान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नाव में हाॅंसी नाव रोआसी।
छोड़ जगत बन पियाखेवासी। ।
भवदहरा बुड़ जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पाॅंचजिनिसहा तन छरियाही।
अपन-अपन बेड़ा मिल जाही।।
बाॅंच जाही जसोगान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन सर जाही पी के धुन में।
बूड के वो सरबस के गुन में
धर मन ओकर ध्यान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बडे़ बडे़ बूड़ती में बूड़गे।
नान-नान पाॅंखी धर उड़गे।।
अइसन चलिस तूफान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
धन हर जन के नाव धराथे।
परसू परसाराम कहाथे।।
गुरबा कुकुर समान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तइहा बतिया बइहा लेगे।
सूरूज अपन संग छँइहा लेगे।।
बड़हर बेर गोंसान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हाॅंसी आज रोआसी होगे।
मयापिरित गरफाॅंसी होगे।।
परे गरज जोजियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
दूध दुहनी दूनो जावत।
चरझनिया सब गालबजावत।।
मतिगति हे अनजान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
फोकट पाय मरत ले खाये।
दुसर भरोसा मुॅंह चिकनाये।।
कहि के अपन बिरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
ठाॅंव ठाँव में चारापानी।
बइठे-बइठे करे देवानी
करमइता जीबरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
काठ घंँसरबे गन सिपचथे।
गोरस मथ तब लेवना दिखथे।।
धुनन सार उफलान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हिजगा खेती भलुवा खावै।
बइठ अकरमी रोवै गावै।।
दुरगत का गोठियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।।
बनगे बनगे नइ तो तनगे।
डेना पाॅंखी सबो उखनगे।।
करनी धर उलटान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।।
पर ला बइठ सीखौना देना।
अपन बइठ रवनिया लेना।।
अइसन रचन बिधान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।।
मैदा लोई बरन सुघर तन।
राखेच होही जादा तन झन।।
गरब बूता बचकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हंड़िया मुँह परई तैं डारे।
मनखे के मुँह कोन संभारे।।
दुख ले नहीं उबरान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बारा कुँआ बाॅंस ला डारे ।
अंतसठाॅंव दिया नहीं बारे।।
टमड़त मूॅंड़ फोरान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जेखर खाय तेखर नइ गाये
लातलगैया ल लेवना लगाये
गुनहगरापन ठान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तपे खपै अउ बरे बुतावै।
नियम प्रकृति इही बतावै।।
जान अउर पहिचान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हाॅंसे घर तो फिर बस जाथे।
उजरे बसे घर दाॅंव लगाथे।।
मनखे बुध बचकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
खेला कूदा के नाव न होबे।
गिरा-परा तन दाग लगाबे।।
ठउका बात भुलान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तीन तेल के भाजी खाये।
मार मुसेटे जीव करलाये।।
अइसन भये सुजान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।।
जीयत बियैया छातीजोरी।
मरे में पानी पोरी -पोरी।।
देवत मुरुख सुजान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
गंँठरी में अउ गंँठरी जोरन।
मयामताये पीका फोरन।।
मातन अउ मतान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पानी के फोटका फूटे बर।
हाटबजार सबो छूटे बर।।
तब ले गरबगुमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चुगली-चारी में सुख भारी।
अपन चिन्हे बिन जगअंँधियारी।।
मानस ते झन मान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जस-अपजस के बोलीभाखा।
सुख-दुख लहरबटोर दचाका।।
उपकन बुड़न समान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
एकघाट हे सब ला जाना।
कोन ला अपन-बिरान बताना।।
फोकट मन भरमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चटक-मटक के साधसधौरा।
नंगा डरेन दूसर मुँह कौंरा।।
अपजस फकत कमान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँखी पइधे साधकुॅंआरी।
जग संग पटन न देवै तारी।।
धँस मनसाध बयान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मार मेड़री माया ठगिया।
बना डरे हे परमुँहदेखिया। ।
ऐती-वोती छुछुवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चेत परागे बूध हरागे।
रिंगींचिंगी में मन बउरागे।।
अइसे बेर पहान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जीव संग चोला टोर बहाती।
लिखत मया के नेवता-पाती।।
मिरगाजल ललचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
उटकट नता-गोता के बंधना।
बोचकत छरियावत हे गंँथना।।
कोनेच ला सोरियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तातलहू के मति बिटोहिल।
सब बैरी ला कहत पिरोहिल।।
शुभ कइसे पधरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
रूप के गाॅंव हवै धूपछॅंइहा।
जेमा चेत भये हे बइहा।।
बिरथा जनम गॅंवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
रंगहा-भंगहा साध सिरातिस ।
तब आरूगअंतस हो पातिस।।
भूलभाल बइहान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बुधियारी के बिखहर बानी।
सोग करै नइ देख अजानी।।
कस चेतन भगवान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
करे सवाॅंगा माया बइठे।
कन्नेखी मुॅंह अंँइठे-अँइठे। ।
तब ले जा झोरसान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सुख दुख आथे ओरी-पारी।।
लेन मनुसपन सक चिनहारी।।
जेमा हमन चिन्हान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कोन लिखे हे भाग लिलरिया।
सुख बर दंँउड़त कटत उमरिया।।
दुख के पढ़त पुरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हंडिया मुँह परइ हर तोपै।
गोठकार जीभ थरहा रोपै।।
बागनबिगन जबान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
ये काया हे धरम धरे बर।
काया में भगवान घरोघर।।
तब का खोजन जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
माटी के मटकुलिया सुंदरी।
झमकझमाझम ओढ़े चुंदरी।।
देखतसाठ नठान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पार न पावै जेखर देवता।
मनखे ला वो भेजे नेवता।।
चलन दूनो मिल जान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चढ़े छोड़ के सरगनिसैनी।
परन फकत लेनी अउ देनी।।
फेर पाछू पसतान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
उही बियैया उही जियैया।
उही जीवहर देह सुतैया।।
काबर फेर भुलान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पानीभरे तन नहीं ठिकाना।
संगी बैरी दूनो जमाना।।
अउ कतका अजमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मनखेजात बजरहा होगे।
अंतस अतेक अजरहा होगे।।
बइठन हाट बेचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सुखचाहना म दुख ओरियावन।
रोगसोक परघान बलावन।।
अस जुुक्ति ओरियान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
एकमूड़ा बैरागीपन के।
साधसधौरा बरतअगन के।।
माँझ म तोर मिलान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बेरा लेवत सब बकठउनी।
पूछ ससुरारी मुँहदेखउनी।।
करत हवै हलाकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतस माॅंगत अपनगोसानी।
देह पदोवत आनी-बानी।।
चरन धरन गोसान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सबो बनाथे अपन बनउकी।
परहितवा कमती हे गउकी ।।
कइसे का गोठियान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अपन दुःख में मरै मरैया।
कलपै तलफै मयाकरैया।।
बँटै न करम बिधान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
गोतनता के सूतक सोहर।
सूँत गठनहा डोहर डोहर।।
घेरीबेरी खोधियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लागनता बन साँटिकसाँटा।
कहूँ न लेवन दुख के बांँटा।।
सब सुखहितवा तान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जब-तक साॅंस बसुरिया बाजे।
संग निभावैं काने-लाजे।।
फेर अगन बर जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लाई कस सुनता हे बगरे।
नतागोता सब झगरे झगरे।।
दुख कोन मेर गोठियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चारोपन के अलग बिटौना।
अलग-अलगपन अलग मतौना।।
चेत असार जुझान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नाचत कूदत पन बचकानी।
साधपुरोवत जात जवानी।।
बुड़हतकाल गुनान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आय कहाॅं ले केती जाना।
कतका दिन के हवै ठिकाना।।
सब कुछ हे अनजान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
का गुनथन कइसन हो जाथे।
बेरा अपन रूआब देखाथे।।
अधर रचे ढ़ेलवान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
टिकली मोल नहीं ये तन के।
अलख जगाबे कब सुमिरन के।।
कर सतसंग गुनवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन के बैगुुन में तन आके।
नेवतत हे अलहन ला जाके।।
जग भर मुरूख कहान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कोनो तोर संगवारी नइ हे।
अउ जगबाठ चिन्हारी नइ हे।।
तोर संग भगवान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँखी जेमा तोर धिरोये।।
बाहिर गुजगुज लोयेपोये।।
भीतरेभीतर गठान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नत्तासत्ता तागगठनहा।
मनमहराज अलग अनबनहा।।
लड़भिंड़ मूँड़कटान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नभपथपंछी छेल्ला हेल्ला।
बिनधरसा के उड़त अकेल्ला।।
मेटत गोड़ निशान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
धरमधरे ले असगुन टरही ।
काल जतिकबेर जीव सुररही।।
बेर रहत पहिचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
माटी सस्ती अउ महॅंगुलिया।
माटी मरहा अउ हुलहुलिया।।
माटीमरम ला जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कर ले बूता कुछु सिरजनहा।
नइ तो बनजा सजनभजनहा।।
उबरे मन दंँउड़ान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतस अपन सुभाव भुलाये।
रिंगीचिंगी बर लहर लगाये।।
हो जातिस सगियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतसभूल फिरत अहमइती।
बनबदउर पहावत पइती।।
जाके कहाॅं जोगान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अनमन करमन कल्लाकाटे।
कइसे अंतसतल सुख बाॅंटे ।।
कतको गाल बजान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अथको जोरत सुरतासक्ती।
सार सरत हे सावन लगती।।
कोचके ले बगियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नैन सुहावन दिरिस सकेले।
अटपटबाठ चलन लाहो ले।
भोटकुल ले अनजान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँही-बाॅंही तोर मतौना।
ठाँव-ठाँव लटकन अरझौना। ।
देखन नहीं सोझान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
भावभजन भवभंजन बिरती।
करन सकारथ उमर उतरती।।
लेगन आही बिमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन के बात गड़रिया जाने।
मनगुनिया पतियावै आने।।
बुक्का फूटत आन रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन हर भइगे बइला हरहा।
दंँउड़त बिनबागन अलकरहा।।
नाथे बिन नथान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
साध छिंचे तनभर गमकउवा।
मनमिलौना पार बलउवा।।
भाव लहर लहरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
उरकतभाखा मया बखानते।
सरे नता ला छोलत चानत।।
छेंकत कलपनिधान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मूड़ी पथरा गोड़ कचारन।
का करना अउ का करि डारन।।
बुध चिखला में सान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सिरोमनी बन गइस धरेला।
बिसरा गइस धरे बर जेला।।
काखर मुॅंह अमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
खरकत साॅंस तभो मेछरवना।
खिरसा लहुटत जिनगी लेवना।।
थोरको बरजे मान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
छाॅंड़ जगत आरूगबुध हो जा।
अंतस लोक हिरासुध खो जा।।
भटके बुध बहुरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बेरा खोल दिहै सब पतिया।
करनी करम करे मंझरतिहा।।
कोन मेर मुॅंह लुकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
फुटहाड़ोगी बिगनखोवैया।
माॅंझधार जल अगम अथैया।।
जलरंग समुन्द तूफान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सबले सिरजम जोनीमनखे।
बइठे हन अदियावन बनके।।
धरके अटपट ज्ञान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
झन करबे जीव सुमिरन नाॅंगा।
बाँध जगतिहा बँधनापागा।।
झूठलबारी सान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
का करना अउ का करि डारे।
करम करत बिधना गढ़ि डारे।।
संझा लगिस चेतान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
घर-घर पइधे बिमता हाँसै।
काजबिगाड़ निटोरत पासै।।
ओरखे नइ सब जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पाॅंव तरी अलहन अमरावन।
बिखहर बेरा अगन झँवावन।।
अचरित नइ पतियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तिसना बैरी पोसे मटिया।
नेमधरम लहुटावत खटिया।।
जिनगीबाट भठान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँखी बने परेतिन लपके।
अगम लुकाके सइत्ता चपके।।
सेवा ओकर बजान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
हाथधरे गिंजरत लगवारी।
अपन-अपन ले तीरत भारी।।
दँउरी फंदाये जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बने-बने सब हाठ बेचागे।
गिनहा घुरवा डहर फेंकागे
अथको भरे जहान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
परधन देख गिरै जब सइत्ता।
तब कर देवै अंतस हइत्ता। ।
हिरनप्यास ललचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मुॅंह उपास मन चरथे चारा।
जगसपना सत हारी-हारा।।
मूड़भरसा गिरवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
231
छरियावत हे उमर पानी।
परबुधियापन के पी मानी।।
दूध असन उफनान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जोर-जोेर जर पाई-पाई।
मूड़काट असलग बंदभाई।।
हाथ झर्रावत जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतसखेत डंगरहा भइगे।
उजबक चेत पँगुरहा भइगे।।
लराजरा सोरियान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
गरबिन भइस मटासीकाया।
गम नइ पायेन बिगड़ेपाया।।
बिच्छलघाट डुबान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आपन जाने आपन माने।
जगमानी झन पी मनमाने।।
आगे हवस ढलान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
खाये एकसरिया दूसरिया ।
अपन भुला दूसर के मरिया।।
चीपा दे दे तान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कइसन बीजा का रुख होगे।
भवजल तँउरत जगदुख भोगे।।
बिन पानी हरियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
238
हाड़मास के गजब फिकर हे।
चिटको नहीं गोसैंया डर हे।।
तन मनमुखी सियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
माँदा काॅंदा ठाठा परगे।
लगवारी के बोइर झरगे।।
छुच्छा भइस बगान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
झरती सुन्ना फरती मेला।
जीव जगत फिरत अकेल्ला।।
उबरे धर ले ध्यान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
परदा गरदा जाला झारे।
कहें सुजानी नाम उचारे।।
गोठ गुनिक मन लान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बइठे काल सदा मुड़सरिया।
जिनगानी के अरझट घरिया।।
भीतर करे बियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
रोय गाय ले बहुर न आवै।
जीव देह ले जभे परावै।।
रमताजोगी तान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तीखा पहिर चिता में चढ़बो।
भरभर भरभर आगी बरबो।।
देखही नता गोतान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जतका दिन के दानापानी।
ततके दिन के जगदहकानी।।
आगर कुछु नइ मान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सबला भाथे अपन बड़ौना।
सबले जिक्कसहा अउ नौना। ।
डोरी कस अंँटियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जाये के कर जोखा-तोरा।
भूॅंज नहीं छान्ही चढ़ होरा।।
फेर नरक झोरसान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नाम चिन्हार कुछू नहीं बाॅंचै।
आरूग करे जीव जब काॅंचै।।
काबर दाग लगान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बानी लगाये हे जमराजा।
करत ईशारा आजा आजा।।
हरहिन्छा हो जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँखी हे अब्बड़ सितलेखा।
भाव कुभाव के राखै लेखा।।
बिगन सुते सपनान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
धरे भरे बैगुन छरियाथे।
जम्मो जीव सुभाव बताथे।।
कोटिस उदिम लुकान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पवनझकोरा संग लहरावन।
भुँइया छोंड़ अगास उड़ावन।।
चिठिया असन चिरान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पिया नाव के खोंटनीभाजी।
खोंट रे मन जीव हावै राजी।।
तजबिरथा बोंबियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बाटअगम हे जीव एकसरुवा।
भोटकावत हें बाट कुकुरूवा।।
साॅंसत परे परान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
गुड़ी लेव सब चोहरा-मोहरा।
रूप लुकात बनत नइ दोहरा।।
गोंदली पुरुत हेरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
संँउख साध के चटिया-मटिया।
चालचलत हे बड़ उटकटिया।।
कस बाँधना बोचकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सस्ती जिनिस बेेचात मलोना।
लेत लेवैया गोना-गोना।।
मोल बिगन पहिचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बेचभाँज सब सुख मोलियाये।
मनखे जोरे लाये बलाये।।
कहत नही अँगिया रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कइसे उसरै निक्ता बोली।
बोली ठोली मारे गोली।।
लहुटावत हे जबान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मया के थौना मोह बोंवागे।
आके हंँसात-हंँसात रोवागे।।
मता डरिस उदियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नत्ता बिजहा बोदरा होगे।
बैरी बंधु सहोदरा होगे।।
ठगथें अपनेच जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सरलग चलत अचेतन मनवा।
जिनगीरद्दा लपट अगनवा।।
कलथत बेरबिधान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अलकरहा हें साध संँचरहा।
पार न बाॅंध सकै मनमरहा।।
आँसू करत असनांँद रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मानललाय अउ धन सोंटे।
जस लिपसा ऊॅंचआस रपोटे।।
उदिम हजार लगान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
धन वैभव जस पात बड़ौना।
हीनहर के मन उठत बिटौना।।
भोगत मनसातान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मया बाट ला हे मन ठनके।
अहमइती झगरत हे तन के।।
अटपट जगत रेंगान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
झोरमया रीस आगी अंँउटत।
रीस धर जात रीसे धर लउटत।।
रीसधर मूड़ कटान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
असल धोगानी घुरूवा फेकन।
पर के भुर्री हाथ ला सेकन।।
अइसन मति सठियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मनसाखेत में बोये बीजा।
फरै फुलै नइ होय अबीजा।।
बों बों बीख पगलान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
इंद्री साध हे बिकट अबुझहा।
देखब में निच्चट गुजगुजहा।।
छूवत टूटै गुमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
झूठ मूठ ये छमन्छल माया।
मायानगर भूलन खुँद काया।।
रेंगत बाट नठान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सुमिर सुमिर मन मइल धोवाही।
धोआअंतस नइ बउराही ।।
मगज खूंँटी ओरमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँखी भजभज आरूग होही।
दिरिस बदलही जग के त्योही।।
एकपइत अंजमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बिमता के बनहारी करथन।
मायावीआगी में बरथन।।
सुनगुन अगन बुतान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
गरहाफूटत चिन्है नइ मनखे।
जगतबयारी बिकटबरन के।।
तन फोकट रेढ़वान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सुभगुनान के खेती सुन्ना।
फरत फुलत दोखहा हरहुन्ना।।
अनफभ करम मितान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अपनबंधाय उदिम नइ छोरे।
छूटै मन जब गाॅंठी टोरे।।
इही गोमजा निदान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जान अपन तौ वहू जनाही।
मान अपन तौ आगू आही।।
कहिगै संत सुजान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मोरपना खोंटहा मै आरूग।
मैं ला पाय बिगन नइ हे सुख।।
मैं मोर पहिचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
देहबियाये देह नसनहा।
रूपअसत भरमाये मन हा।।
मुँहरन करत मलान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सतसरूप के नास न जनमन।
जीव जान ले अउ मान मन।।
जिहाँ जाड़ ना घाम रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तन मन दूनो अनपरतितहा।
मैं जानू बन होय सुभीतहा।।
नहीं तेला झन मान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
माने तेला जान मनैया।
कोन मिटैया कोन बनैया।।
जाने में कलियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मैं निकालही मैं के काॅंटा।
फेर नहीं होही दू बांँटा।।
मैं ला चल खोदियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मैं तो सबो सिधोवै कारज।
एक मैं आरुग एक कुभारज।।
मैं मैं नोहै आन रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मैं हर जतका मैं ला जानौं।
मैं के वतके गुन बखानौ। ।
मैं हर मोर पहिचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मैं ला मानौं ते झन मानौं।
मैं ला जानौं ते झन जानौं।।
मैं में जम्मो गियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सब में एकरूप ये मैं हे।
एक्के मैं में समा सब गै हे। ।
पसरे छत्तर तान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मनसिज फूल फूले चरचर ले।
मन के मुड़ियामेट तैं कर ले।।
मन दू करथे मान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन हर एक ला दस कर देथे।
मन सकेल जगकचरा सेथे।।
मन सिरजै दुख जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतसजीव माॅंझ मन रुँधना।
ओरमावै रंगरंग के फुँदना।।
मन मारे बर ठान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन बइठे माया मेछरावत।
बाठ छेंकथे आवत-जावत।।
मन भांड़ी भसकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मगमाया संसारअगम में।
अटकत भटकत जीव भरम में।।
दुख में सुख खोधियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन तन धधक लगावत आगी।
एकक कर सब ले कर बागी।।
अधर करत मनुसान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कतिक सहन दुख मन म टेके।
बाॅंधे पार चलन मन छेंके।।
मन के जर उपकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
धर बैराग छोड़ मन फेरी।
मिलै न ये तन घेरीबेरी। ।
मन ले नइ बउरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन अउ मुॅंह रास एक हावै
कतको भर उना रहि जावै
कर कर उदिम बुढ़ान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
देहगरब ला नाम गलाही।
दरस परस प्रभुवर सपड़ाही।।
कुछु नइ जेकर समान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बाठ बताय चले बैरागी।
परछो लेही नहका आगी।।
भेटे लक्कलकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन कइसे रे कइसे मानौं।
मैं नोहौं ते ये मन जानौ।।
मन मग गगन समान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन के गिंजरनखार जगतिया।
अंतसजग नइ जानै बतिया।।
मन भुवना भसकान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन भेट्ठिन के चालअड़ानी।
गुनजानै ओकर गुनि ज्ञानी।।
महिमा बिकट बखान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जग में दिखै न जगत चलैया।
जग के मुँहरन ओकर छॅंइहा।।
जगधर उही महान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आरूग मैं ला हरि मिल जाही।
छुतहा मैं नइ नाचनचाही।।
आरूगपन मन लान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन छेंके ले जीव करलाही।
सावचेत रहिबे तिरियाही।।
मन सुभाव पहिचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बरजे ले उभरौनी पाथे।
देख कलेचुप थीर हो जाथे।।
उल्टा मन के छाॅंद रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन बिलमै नइ एको छिन बर।
रेंगै रातरात अउ दिनभर।।
बिलमत छुटै परान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मनआनंद उत्सव ला खोजे।
निकले रहिथे चित्त ले सोझे।।
माॅंझ परै बेवधान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन लगवार कसैया जइसे।
एकर पार जनावै कइसे।।
देंहदगली घिरलान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन ला जेन हेेरौठा करही।
मन ले जाके उही उबरही।।
मन न सहै अपमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नूनपुतरिया गरब भुलावन ।
हाँसतबदन प्रभु गुनगावन।।
सुख के समुन्द नहान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँसू टोर कगार बोहाही।
जनमासू मालिक मिल जाही।।
छोड़त गरबगठान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
वो खेलवार उही देखैया।
फांँदाखेल उही अरझैया।।
करिहै उहिच निदान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन के छाँव गजब डरभुतहा।
मन के ठाँव गजब कलकुतहा।।
मनसरवा गोहनान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जेकर सब कारज बिनकारन।
बिन सेती जगराखन धारन।।
सेती में कस पान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मनखे जिनगी आय जनउला।
ओरख पाय नहीं चटघउला।।
गुपचुप मिलन मिलान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सहज हुलास भरे अंतस में।
सब परबस हो जाथे बस में।।
फेरी छोड़ थिरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बाहिर के सबसुख चरदिनिया।
कोनो दाता कोनो रिनिया।।
अंतससुख बरदान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तिसना पझरत मनघट चुआ।
हार जीत के खेलत जुुआ।।
पगपग ठेंसरा खान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बिलमाये नदिया नइ बिलमै।
तइसे मन हर बिलमन नइ दै।।
ठाढ़ हो देखत जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
शक्ति रहत ले पंँखुरी डेना।
उड़बे गगन सधाय परेवना।।
आबे भूमि सुस्तान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन हर सुखअंतस में पाही।
अंतस कुँदरा जीव जुड़ाही।।
फेर न करै मनमान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जगतरूपघर बसे बसैया।
हे समभाव महासुख भैया।।
देखताक के मान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सहजदसा के तप में बइठे।
होजा सहज छोड़ के अँइठे।।
चेत ला धर बइठान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चोलागढ़ के जीव रहैया।
गिंजरत आये हे अनगँइहा।।
कोनो लाग न मान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पाॅंचजिनिस के पाग में पागे।
चोला माया मोहनी जागे।।
भरुहा महल टेकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे।
हाड़ भारवट तन ला बोहै।
खड़े लगै फेर सीरतोन नोहै।।
जोरंगही ये मकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
उपरीमाटी सादा-करिया।
जात-पात दस बात जबरिया।।
पानी मरत कोचरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मनेच थिराथे मन दँउड़ाथे।
मन बंधना ला मने छोड़ाथे।।
मन बाँधे कुगियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन ला जे रंग रंगे रंगैया।
रंग जाय मन वो रंग भैया।।
मन हरिरंग रंगान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन बर देह सदासुख खोजै।
इंदरीसुख खइहा में बोजै।।
मन अड़जंग हे जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
परसबियाये सुख दुखदेवा।
छिन सोहागी छिन में बेंवा।।
हरिरस सुख मनमान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
धिरलगारी साध बुताही।
भावभजन में मन सुख पाही। ।
बिन खोजेे हरि पान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
देख कलेचुप मन के लहरा।
जगलहरा सुखदुख बिन दहरा।।
जानन अउ जनवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन के देह बिगरिहा चाकर।
चमचम कड़िक बँधाये साॅंकर। ।
हरि संग मन भंँवरान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन इंद्री ला नाच नचाथे।
सुख सोरियाथे दुख अभराथे।।
मन ला पटक गिरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सब फरहार सुहावै सतहा।
आरूगझोर पदोय न रतिहा।।
सतगुनी जेवन खान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अम्मट करू नून रजरासी।
दुखसंसो दस रोग उदासी।।
नेवता जेवन जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बासीजेवन तामस भरथे।
सरहा-गलहा जे भख डरथे।।
वोकर सरै गुनान रे ।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मनबनवट राजस तमगुनिया।
सतगुन बर तप करथे मुनिया।।
तब हे कहूँ निदान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लाग-लपेट बियावै दुख ला।
चिन्ह अपन बिरान के मुख ला।।
जिभिया मारै बान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चोला घर उजराये साबुन।
सेवा राख मॅंजावै अपगुन।।
नाम ले मन उजरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सतसंग जगबंधना ढ़िलियाही।
बंधना छूटत गति बन जाही।।
मन सतसंग लगान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सतसंग रंग में जीव रंगावन।
सतसंग सुखसतधार नहावन।।
सतसंग चित्त टेकान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतस मुँहाठेठी होही।
लोभ रकरकी नहीं पदो ई।।
गुरु संतन पतियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पहिन अड़ानीपन के ठेला।
भटकत भीड़ भड़क्का मेला।।
बेरा अब नइ गॅंवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
परछिन करके भीतरी बाहिर।
हो निसोत्ता तप बइठे थीर।
हरि के करन गुनान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
दोख सोक हेरौठा करके।
दुखिया मन बर सोग हदरके।।
बिरती असत तिरियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नन्हे बुद्धि बियाय हतासी।
अपन मरन बिरान के हांँसी।।
खेल झेल जग जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मगज सिरज के साध बियाथे।
लीला कर कर भाव जाथे।।
समझ न सकै सुजान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आठे दिना के जग हठवारा।
सुमिरन पंथ गजब पेंडारा।।
पानी परत घुर जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
राम रमउवा सुमिरन खेती।
कर ले रे जीव अपन सेती।।
अंतसतल पधरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जग हठवारा हाठ उसलती।
चलै इहाँ नइ कखरो चलती।।
फुलवारी सुनसान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आस अंजोरी जोरै सपना।
एकक कर सब होत कलपना ।।
धुँगिया कस गुंँगुवान रे
चोला भटकत देस बिरान रे
मन बस होही जगत जिताही। ।
मन के हारे हर जगत हंँसाही। ।
हो जाही निंदरान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
तन सिखथे मन के सब सीखा।
मान अढ़ोना मेटथे लीखा।।
चोला चाकर जान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन सुभाव करत निगरानी।
चेत हो जाही पानी -पानी।।
भूल जही मेछरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
ये मन रागी अउ बैरागी।
एक बर पानी एक बर आगी।।
एक बर मरे समान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जीव दई एकमई होवत ले।
माँज बने केरवछ खोवत ले।।
सुमिरन कर भगवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जतके आरूग मन के माटी।
सहज समझ लगवार उचाटी। ।
चेत ला चल खुडुवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन दाँडे़ बिन बात न मानै।
कतको कोनो मन ला जानै।।
भले मान झन मान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बिछल जही कतको धर मरूवा।
ये जग में सबझन एकसरुवा।।
कहूँ नइ नता गोतान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मनखे बनगे हे बहिरूपिया।
ठाट खड़े हे धरके रूपिया।।
सब सुख ला मोलियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जोगी बर जग राख के ढ़ेरी।
जान के देथे उल्टा फेरी।।
बड़हरसुख ला जान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मन के सिरजे मेकरा जाला।
अरझे वोहर देखै काला।।
तलफत फकत परान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
भले कपाट देवाय दुवारी।
फेर भीतर हे वो मनहारी। ।
कर ले चिन्ह पहिचान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
पग तो डार पिया के कोती।
सौ पग लकठानी धुतिजोती।।
कहूँ नइ हरि समान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
चोला चिथरा तोर चिराही।
चेम्मर चेत परान पिराही।।
काबर फेर रचड़ान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जीव भर जाही छेल्ला गुँइया।
ठाठ परे रही जाहय भुँइया।।
कतको छत्तर तान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
बेरा के संग तन रचावत।
अउ जनास के गाॅंव गॅंवावत।।
थोरिक तो धर ध्यान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कतको रपोटे जाबे छुच्छा।
अंतस रहि जाही अनपुच्छा।।
कर ले सरेख निदान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
रोज उठत हे ककरो टिकरी।
गोठ चलत हे लिखरी तिखरी।।
भुल गोलहत्थी खान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अपन पीरा में सबदिन रोये।
अउ दूसर बर काॅंटा बोंये।।
खात सराप बखान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जोंरगत हे बिसवाॅंस बिचारी।
गारी बनगे कान के बारी।।
कुछु तो जुगुत लगान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
माते बर हे अबड़ मतौना।
गिंजरत बिकट लुहाय लुहौना।।
दंँउड़ नरी फंँसवान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
आँखी सबदिन के मिनमेखिया।
चोला निच्चट अपन सरेखिया।।
परसुख कहाॅं गुनान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
गंँठरी में अउ गाॅंठी डारन।
गरूवासी में बाठ कचारन।।
अपटन गिरन उठाने रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जम्मो घोरे रंग सिराही।
देख देख जग नैन पिराही।।
रंग न आन रंगान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मया मयारू छेंक न पाही।
पिया मिलन जब दंँउड़त जाही।।
पिंजरा छोड़ परान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
मूड़ हे तौ मूड़पिरवा होही।
गुन धुन तोर सहाई वो ही।।
छोड़ सबो झींकतान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
नीत-रीत बोलत गोठकारी।
छेंकत बाठ मया मिलतारी।।
छेड़ अकेल्ला तान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जग के घाट मसनहा होगे।
सुक्खा हृदय रसनहा होगे।।
जेन करिस पहिचान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंँधियारी में मूड़ फोराये।
सुखअंजोर चीखा नइ पाये।।
अंतस उविस न भान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
भसकाये तन भितिया-भारा।
मोह मतौना देय उतारा।।
कर किरपा भगवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
ररुहा के ररुहा रही आँखी।
रूप रही ना डेना-पाॅंखी। ।
नामे हरि निदान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतस दियना बार सुरूत्ती।
अब झन देखौं उत्ती बुड़ती।।
साॅंस पिया पधरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
काॅंटा ले काॅंटा जग हेरै।
फेर काॅंटा ला संग संघेरै।।
काॅंटा फेर गोभवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
कहे बुध उपजाय मया ले।
चेत चढ़ै नइ बिगन दयाले।।
अंतस हरि भंँजान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
परबिहाव हुलसही सुवासिन।
अब नइ बनन गिनन गवनदिन।।
कतको आय तूफान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सुन रे कान पिया के गुन ला।
झन धर तैंहर गुनअपगुन ला।।
मतिगति सुमिरन सान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
अंतस के अनगड़हन देवता।
पायमान ले अड़हानेवता।।
आवन तोरे घरान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जिनगानी के मंँझनीमंँझनिया।
रेंग जीव झन ताप रवनिया।।
तैं झन बइठ थिरान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
लालच सुवारथ डर के सेती।
दुख बगरे हे चारोकोती।।
सब तज हरि मोलियान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
करम गुनान रचे दुखरचना।
सुखदुख नाचेन नाचनचनिया।।
मन भर गइस गलान रे
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जग में अबड़ बेचाय लबारी।
सत के टोरा अउर तिखारी।।
का दुरगत करवान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
परभल में सुख सबले जादा।
कठिन बरत हे जिनगी सादा।।
गुन सुन गति बनान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जग मथनी सुख-दुख के नेती।
मथत हवन सब लेवनासेती।।
पार एकर हो जान रे।।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
399
धनगरबैती जिनिस बिसावै।
तभो सारसुख ला नइ पावै।।
धरे रीत उलटान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
जम्मो सुख में दुख के उरथी।
जीव होत चौरासी पुरती।।
जगमग दीप जलान रे।
चोला भटकत देस बिरान रे ।
सिरागे
शुभचंद्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
27/06/14 रचना काल