१/
कतको चित्र बनत उझरत हे,
बड़हर चित्त अगास हमर।
तोर नाम ले सगुन जनावत,
आवत जावत साँस हमर।।
तोर डहर बिसराये सेती,
होवत रहिस बिनास हमर।
रुँआरुँआ हर कुलक पुलकअब,
पोठ करत बिस्वास हमर।
तैं उच्छल मंगल के बासा,
सिद्ध करैया आस हमर।।
लख चौरासी घाट डोंगहरा,
भोरहा जमो सँवास हमर।।
भुला जगत के कथा कंथली,
भर हिरदे में हुलास हमर।
शोभामोहन श्रीवास्तव
२/
आय हन रतियाय हावन फेर जाना हे।
देह के ये बंसुरी में सुर सजाना हे।।
आय ते झन आय फूँके बस बजाना हे।
उपजना बढ़ना सिकुड़ना अउ खियाना हे।
पँचजिनिसिया हरि गढ़े ये जगत खजाना हे।
हम कुच्छु जानन ना तानन जगत सयाना हे।
भोथवाये चेत के लोहा ला पजाना हे।
एक ले दू चार होना गजगजाना हे।
दुःख भोगत कँदरना अउ छटपटाना हे।
छाय घन अंँधियार बेरा पंगपंगाना हे।
गाँव गौंतरी कर अपन घर द्वार जाना हे।
३/
करमा गीत छत्तीसगढ़ी
करम के रुखवा अँजोरे।
गिंया चलिन खाँध जोरे।
हाय रे गिंया चलिन खाँध जोरे।।
पवन संग अँचरा हिलोरे।
गिंया चलिन खाँध जोरे।।
हाय रे गिंया चलिन खाँध जोरे।।
करमा खेले चलिन ओरे ओरे।।
गिंया चलिन खाँध जोरे।।
हाय रे गिंया चलिन खाँध जोरे।।
कोने जाही तेंदूपाना टोरे।
गिंया चलिन खाँध जोरे।।
हाय रे गिंया चलिन खाँध जोरे।।
बहुरहीं फूटत अँजोरे।
गिंया चलिन खाँध जोरे।।
हाय रे गिंया चलिन खाँध जोरे।।
मया गमक जीउ चिभोरे।
गिंया चलिन खाँध जोरे।।
हाय रे गिंया चलिन खाँध जोरे।।
शोभामोहन श्रीवास्तव।
४/
बेरा हर जब जब ललियाथे।
गीत गमक मन धीर धराथे।
डगमग डगमग गोड़ देखके,
धरपछरा धर हाथ बढ़ाथे।
धुर्रा पोंछ अपन अँचरा ले,
मुँहरन ला परछिन कर जाथे।
सुघ्घर ओग्गर भाव सँभर के,
छत्तर तान सरेख सजाथे।।
आखर के दगदग ले ओग्गर,
मन में सौ सौ सुरुज उवाथे।
शोभामोहन
५/
भोला के मूड़ फभै शुभजटा अटपटा।
मुख तीन नयन सोभाय ओ।
चिकमिक चिकमिक अँधवा साँप के लरी,
मउर बनाये लटकाय ओ।।
गंगा के धार बोहावै रझरझ रझरझ मूड़ी,
दूइज के चंदा टँकाय ओ।।
बघवाछाली के पागी पटका बैरगिया के,
गँउहाडोमी कन्हिया कसाय ओ।।
डमरू डमक डम झनकत हिमालय,
तिरसूल धरे चोखियाय ओ।
नंदी सवार हो बिहाये चले गिरिजा ला,
अंग अंग भभूत लगाय ओ।
कान में झूलत गड़ी साँप डेड़ू के कुंडल,
तिरपुंड चंदन लिपाय ओ।
मणिधर साँप उगल मणि रतन ला,
रिगबिग अंजोर बगराय ओ।।
चलौ चलौ जाबो गड़ी शिव के बिहाव देखे,
जिनगानी सुफल बनाय ओ।
शोभामोहन भोले बाबा के बखाने गुन,
हिरदे हरख बढ़ि जाय ओ।।
शोभामोहन
अगहन अँधियारी अकादसी
विक्रम संवत २०८०
आज जोरँगगे थामनखंभा,
ये अद्धर जिनगानी के।
सँझा रिगबिग दियना बरगे,
डेहरी अउ घर द्वार में।
घमघम ले अँधियारी छाये,
फेर अंतस के खार में।।
सुरुज दिनभर जगमगाथे,देह तीरथधाम ला।
रातभर चंदा चंदैनी,करथे तोरे काम ला।।
फेर बड़ोरा आही लेगे,
मनोजशेखर छन्द (वृत्तचन्द्रिका२८)
जरौ जरौ जरौ जरौ जगौ क्रमेण चेद्यदा
तदा भुजङ्गनायको मनोजशेखरं जगौ ।
लला लला लला लला लला लला लला लला
बढ़े चलो बढ़े चलो सनातनी बढ़े चलो
छन्दमा मुक्तक
छन्द - विभावरी-( ज र ज र= ।s। s।s ।s। s।s )
लला लला लला, लला लला लला
पहाड छन् सफा हिमाल छन् सफा
अनेक निर्झरी र ताल छन् सफा
शरद् बनाउँदो अपूर्व रम्यता
सपुष्प तालका मृणाल छन् सफा ।***
ये डहर कुछु नइ बचे हे
देख आके रे हइत्तारा
मरनी के रोआराही के, पीटत ढिंढोरा जिनगानी
कानभरे सब कथा कंथली, रउँदत हे निरदोख मया
बिगन गुने मुँह लेत गया।
छत्तीसगढ़ी शिल्प बिंब
शोभामोहन
तोपे ढ़ाके तन हे तब ले, आँखी गड़थे तब का करबे ।
ओकर अब्बड़ सरल हिसाब।
कृपाण घनाक्षरी
ललललल लललल, लललल ललललल
लललल लललल लललललाल
मालिन बाँटत फूलपान अउ,
गँउटिन बाँटत हें अनदान।
गुनिया बाँटत हे बिदियाधन,
पंडित बाँचत कथा पुरान।।
भारत भुँइया पबरित भुँइया,
सबके सुघ्घर बूता काम।
पंथीभेद के झगरा नइ हे,
सबके हिरदे बसथे राम।।
शोभामोहन
नत्ता के झुलना में धीरे-धीरे झुलबे,
झुलना बँधाये बिन डोर गड़ी।
सुरता पैडगरी में धीरे धीरे चलबे,
हपटे नहीं गोड़े तोर गड़ी।।
जग अड़गसनी में फाँसी ओरमें जीव,
नइ हे भलाई इहाँ तोर गड़ी।
दसे फूल पौंदर खुँद खुँद नहकत,
पथरा कस जग कठोर गड़ी।।
दँगर दंँगर रेंगत बटचल्ला।
पैडगरी के छाती रँउदत,
दँगर दंँगर रेंगत बटचल्ला।
सतहा के खटिया उसलाये,
सत ला देवत गारीगल्ला।।
झूठ नाम में मन बहलावत,
झूठ लबारी के धर पल्ला।
झूठ सुहावत लोभ लुहावत,
झूठ रपोटत अंटी गल्ला।
झूठ धरम के रद्दा धरके,
झूठ सिखोवत लल्ली लल्ला।
माड़ी में बुध आगी में कूद,
बेचे हें मूड़ ऊपर तल्ला।।
धरम बेचैया धरम बिसइया,
अंधरी अंधरा नल्ली नल्ला।।
शोभामोहन
बदले सबके बानी हे
सब ला आनाकानी हे।।
ममहाती अँचरा के सुगंध ले,
सृष्टि डेहरी गमकत हे।
झुमरत हे डारी संग भौरा, फूल देखके ठमकत हे।।
चालबसंती में सब संयम, भितिया भारा भसकत हे।
काँदी के पौंदर के आगू, मखमल छाती धसकत हे।।
रचत मेंहदी ककरो हथेरी,
ककरो कनिहा लचकत हे।
निछमल चंदा के अँजोर हर,
हरदी तेल लगावत दिनकर, चिकट खड़े सब रुखवा ला।
अँधियारी के पहुना बनगे जोर जुलुम
चटक-मटक लुगरा भिरे कछोरा ।
निछमल अंजोर छू पोरपोर
रसवन्तिन पुरवइया ठमकत सृष्टि के अँगना।
सहन कर रहन सीखे
तोर नाम के मुड़सरिया में, मुड़ टेकाये हौं जगहार।
मुड़पिरवा होगे जगनत्ता, असलम लराजरा लगवार।।
रन्नभन्न परे घर के हो जही सिंगार।
जब आही गौंतरिहा सजन हर हमार।।
आँखी पचरी ठेलाय आँसू के धार।
मोहाही बोहाही कर भेट अउ जोहार।।
धीरलगहा शुभ सगुन जनाही निरधार।
आँखी निच्चट जोहत फरिका ला उघार।
धरे दिन अगोरा के लागत हे पहार।।
जरे जीव कहत जरै अइसन रोजगार।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
धीरलगहा सरदघरी के खुलत कपाट।ो
गँवइहा फूल अउ फर तो सबो ला सुहाथे। ।
सरपिन राजबाट दनदन दन पातर पैड़गरी लीलत है।
मस झुरझुर झुरझुर पझरत हे ।
डंगचगहा सपना तैं मुड़भरसा गिर जाबे।
डोंगर ला सुघ्घई अपन।
बाँही खोल बलात समुन्दर।
पल्ला दँउड़त नदिया रानी।
अँधियार गुदेलत हे।
उजियार गुदेलत हे।।
अनुराग हुदेनत हे।
सुखपाग हुदेनत हे।।
रेंगत अनगिन गोड़ किरन।
गोड़
किरन के गोड़ अनगिन हे।
माटी बोलथे जय जय
अतल के लय सुहावना हे।
पतझर हर बसंती संदेश भेजे हे।
हाँसत बिहान
मैं अमरैया बन जाहूँ।
आँखी गड़िया कतका पढ़बे,
ये जिनगी के कहिनी ला।
बड़े बड़े आँखी बरसावत आँसू आज ब्याकुल होके।
आस सलँगगे
बिस्वास सलँगगे।
उजास सलँगगे।
त्रास सलँगगे।
झक्कझकास सलँगगे
तलफत तोर हिरनिया जोगी।
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