परे कइसन संग पाला हे*
जसुदा तोर बलकवा के सुन, बड़ उतलंगहा चाला हे।
फोर डरे हे दुहनी मरसा, टोरे बेड़ी ताला हे।
देख अपन लाला के करनी, टूटे कौस्तुभमाला हे।।
मूड़ाछाड़ परावत वोला, देखिस मोरे घरवाला हे।
नंदरानी हउहावत कहिथे, फेर चोराये काला हे। ।
दनन दनन घर भीतर आगेव,घर में पउढ़े लाला हे।।
पीछू परगे हौ लाला के, लाला भोलाभाला हे।।
पटपटहिन हौ तुम सब डउकी, तुँहरे बिगड़े चाला हे।।
कथरी ओढ़ा सुताये हावँव, ठुनठुनात जड़काला हे।
ओखी कर कर देखे आथौ, लाला मोर निराला हे।।
हुदर दिहौं तुम भागौ नहीं ते, रखे बानोधा भाला हे।
पतिया गँउटिन सिरतो कहिथन,जादू मंतर वाला हे।।
दूठन बनके बिलवा छलिया, करत जबर घोटाला हे।।
मिटकाये मुड़सुद्धा ओढ़े, सुनत बिरिज उजियाला हे।
कहत मने मन मुचकत उचकत, परे किसन संग पाला हे।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८०
कार्तिक - अँजोरी पाख, तिथि तेरस, बार सनिच्चर
खुमरी पहिर डरे, चराये गउ
उँदना फुँदना झूलत झलमल, मोती मणि लहरे।
पागा झाँगा मलमल झलमल, झक्क अँजोर भरे।
लोभलोभावत जीवजुड़ावत, मधुरस गोठ झरे।
आय सगाने नवा बिहाती, देखन साध मरे।
बेलबेल बेलबेल कर संगी चल, मधुबन कहि हुदरे।।
दाऊ भइया पहिर भँदइया , लकर धकर हबरे।
रेरी पारत गाय हँकारत, हरि उदबिरिज करे।।
जमुना जल ला निचट निहारत, डारी कदम धरे।
धरे बँसुरिया सुघर सँवरिया, रुनझुन ले सँभरे।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८०
कार्तिक - अँजोरी पाख, तिथि तेरस, बार सनिच्चर
बृषभानु राउर के अँगना खेलत राधा,
छुमछुम छनकत पैजनिया पाँव के।
पबरित घर द्वार पबरित बेवहार,
पबरित धुर्रामाटी राधारानी गाँव के।
पबरित अन-जल पबरित फूल फल,
सब ला हे आस राधा के अँचरा छाँव के।
बिरिज में गली गली फूल पान नार कली,
गोप ग्वाल लाल बाजे डंका राधा नाव के।।
१/
शुभ मुहरन साँवर बदन, गोसैंया श्री राम।
तोर छोड़ अब हे नहीं, अउ ककरो ले काम।।
२/
कान जुगल कुंडल जुगल, चरन जुगल महराज।
नयन जुगल अउ कर जुगल, हिरदे हमर बिराज।
३/
केसरटीका माथ में, गर भर रिगबिग हार।
सीतामाई प्रान धन, रामचन्द्र सरकार।।
४/
बिन सुमरनी बिन भाव के, कइसे दरसन पाँव।
पापी जीव बिहाल ला, सूझत न इ भगवान।।
५/
जइसे तरिया भर फुले, कमल सुगंध लुटाय।
भजन रमे जीउ आतमा, झटकुन दरसन पाय।
६/
धनुष धरे रघुबर हमर, अंतस माँझ बिराज।
तोर भार अब जीव हे, तहीं राख जीव लाज।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
१/
कोटि कोटि ब्रम्हाण्ड में, नइ जइसन आनंद।
रधिया के मुखमंडल कमल, हे अइसन मकरंद।।
२/
संतन भौरा नाम रस, पीयत नहीं अघाय।
बिन चटके जग में फिरै, परमधाम घर जाय।।
३/
काम कोह ला छोड़ झन, ओकर रद्दा मोड़।
रोग दोख कटही सहज, रख तो हरि मग गोड़।।
जीव जबर हरि सँग जुड़े, उपजै तभे बिराग।
शोभामोहन गुरुकृपा, तहूँ जगा ले भाग।।
४/
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