सूक्त एक सव इक्यासी
अगस्त्य ऋषि । अष्विनी देवता । 1/3/ विराट् त्रिष्टुप् । 2/4/6/9/निचृत् त्रिष्टुप् । 5 त्रिष्टुप् छन्द । धैवत स्वर ।
कदुं प्रेष्ठाविषां रयीणामध्वर्यनता यदुन्निनाथो अपाम् ।
अयं वां यज्ञो अकृत प्रशस्ंित वसुधिती अवितारा जनानाम् ।।1।।
आ वामश्र्वासः शुचयः पयस्पा वातरंहसो दिव्यासो अत्याः ।
मनीजुवो वृषणो वहतपृष्ठा एह स्वराजो अश्र्विना बहन्तु ।।2।।
गुनिया ले गुन पाय, तभे सबो झन भाय, एैश्वर्य पावै व जब पढके पढाय हो ।
पढ पढा गमकत, पदारथ होम रत, जीव अउ जल सोधै जग सहराय हो ।
बिजुरी जिनिस जन, सुभाव करम गुन, जान पर उपदेशैे नीक जनवाय हो ।
मनखे हा जब तक, सृष्टि कर पदारथ, जानै नही ंसम्पूर सुख नहीं पाय हो ।
टीका-जब विद्वानों से विद्या ग्रहण किया जाता है तभी सब उनको प्रेम करते हैं शिक्षित मानव सबका प्यारा बनता है और वही एैश्वर्यवान होकर पढने-पढाने का कार्य करते हुए सुगंधित पदार्थो का हवन-होम करने में संलग्न रह जीवात्माओं और जलशोधन कार्य करते हैं संसार में एैसे गुणीजनों की सराहना होती हैं । बिजुरी और पदार्थ आदि कि गुण कर्म और स्वभाव को जानकर जो लोग दूसरों को भी उपदेश देकर संबंधित गुण प्रकट करते हैं, मनुष्य जब तक सृष्टि के पदार्थो के गुणों को नहीं जानता तब तक सम्पूर्ण सुख नहीं पा सकता है ।
आ वां रथोऽवनिर्न प्रवत्वान्त्सृप्रवन्धुरः सुविताय गम्याः ।
वृष्णः स्थातारा मनसो जवीयानहंपूर्वो यजतो धिष्ण्या यः ।।3।।
इहेह जाता समवावशीतामरेपसा तन्वा3 नामभिः स्वैः ।
जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरिर्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे ।।4।।
एैश्वर्य के बढवार, करे बर नर-नार, मन गति चलइया बिमान रचाय हो ।
जानौ उही नर हर, पावॅ सुख सरभर, थीरसुख लावै उही वेद हा बताय हो ।
हे मनुख बने जान, सृष्टि भूगरभ ज्ञान, जेन गुरू होवै एैशवर्य बड पाय हो ।
रखवार सबो कर, पदारथ बिद्याधर, पदारथ तर्क ले जान नाम कमाय हो ।
टीका-एैश्वर्यवृद्धि के लिए नर-नारी मन के समान तीव्रगति से चलने वाले विमान रचना करे वह समस्त सुखसिद्ध करनेहारा और स्थिर सुख लाने वाला होता है एैसा वेद एैसा बताता है । हे मनुष्यों तुम अच्छे सें जानों कि जो सृष्टि के भूगर्भविज्ञान के ज्ञान का जाननहारा गुरू अध्यापक परमएैश्वर्य प्राप्त करता है और वही सबका रक्षक बनकर पदार्थ विद्याधारक जो पदार्थाे के गुण कर्म और स्वभाव को तर्को के माध्यम से सिद्ध करता और जानता है वह अत्यन्त प्रसिद्ध होता है ।
प्र वां निचेरूः ककुहो वषाॅं अनु पिषग्ङरूपः सदनानि गम्याः । हरी अन्यस्य पीपयन्त वाजैर्मथ्ना रजांस्यश्र्विना वि घोषैः ।।5।।
प्र वां शरद्वान्वृषभो न निष्षाट् पूर्वीरिषश्र्चरति मध्व इष्णन् । एवैरन्यस्य पीपयन्त वाजैर्वेषन्तीरूध्र्वा नद्यो न आगुः ।।6।।
मनुसान बने जान, पवन सबो जहान, बस मा अपन रख करके चलाय हो ।
पवन व दिनकर, सबोलोक राखै धर, तस बिद्या धर्म धरौ सबो सुख पाय हो ।
आप्त गुरू उपदेसू, बिद्या पा बाॅंटै असेसू, शुद्ध आगी कस रहि तेज बगराय हो ।
अगस्त्य मंतर धर, यह ज्ञान पाये बर, गुन ज्ञान जानके सुजन सिरजाय हो ।
टीका-हे मनुष्यों तुम लोग भली प्रकार जानों कि यह वायु समस्त संसार को अपने वशीभूत करके रखता और चलायमान करता है वायु और सूर्यमंडल सभी लोकों को धारण आकर्षण करते हैं ठीक उसी प्रकार विद्या और धर्म को धारण करके तुम सभी लोग सुख प्राप्त करो । जो आप्तज्ञानी उपदेशक से विद्या प्राप्त करके दूसरों को निःशेष जितना ज्ञान जैसा पाया हो उसे उतना ही वैसा ही उससे कम ना उससे ज्या दा वे लोग अग्नि के समान शुद्ध व पवित्र तेजोमय होकर वर्तमान रहते हैं । ज्ञान प्राप्ति हेतु अगस्त्य ऋषि के मंत्र को धारण करंे और गुण ज्ञान जानकर अन्य को विद्वान बनाकर ज्ञान सृजन करंे ।
असर्जि वां स्थविरा वेधसा गीर्वाढे अश्र्विना त्रेधा क्षरन्ती ।
उपस्तुताववतं नाधमानं यामन्नयामञ्छृणुतं हवं में ।
उत स्या वां रूशतो वप्ससो गीस्त्रिबर्हिषि सदसि पिन्वते नृन् ।
वृषा वां मेघो वृषणा पीपाय गोर्न सेेंके मनुषो दशस्यन् ।।8।।
युवां पूषेवाश्र्विना पुरन्धिरग्निमुषां न जरते हविष्मान् ।
हुवे यद्वां वरिवस्या गृणानो विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ।।9।।
गोठ सुन गुनवान, कुबाट तजै सुजान, सुमारग धर चलै मन कर्म ठान हो ।
तज कर लंन्दफन्द, झूठ अउ फरफन्ंद, उही हर पावै बड मान सनमान हो ।
जब सत बोले जाय, मुॅंह नहीं मइलाय, झूठ लबारी बोलत मुॅंह मइलाय हो ।
जइसे भुॅंइया भर, अवसध दल नर, जल बरसाय अउ बादर बढाय, हो ।
तस जेन सभासद, उपदेसे जोग सत, सतबोलिया बढाय हितवा कहाय हो ।
जइसे कि दिनकर, सब जग पोठ कर, अगन अउ बिहान प्रकट कराय हो ।
तस सहरउ दानी, मनुख हर सुजानी, गुनिया के गुन ला ठउकहा बताय हो ।
अश्वि के उदाहरन, गुरू उपदेसू गुन, करे हे बखान ऋषि ज्ञान संचराय हो ।
टीका-जो विद्वानों के गुण और ज्ञान पगे उपदेशों को सुनकर कुमार्ग त्याग करके सज्जनता ग्रहण कर सुमार्ग में चलने का मन और कर्म से संकल्प लेता है छलछद्म और झूठ का त्याग करता वही बहुत मान सम्मान पाता है । हे मनुष्यों जब किसी मनुष्य के द्वारा सत्यवचन बोला जाता है तो उसके मुख का भाव किंचित मात्र भी नहीं परिवर्तित होता है किंतु जब कोई मनुष्य झूठ बोलता है तो उसका मुख मलिन हो जाता है । हे मनुष्यों जिस प्रकार भूमि के समस्त औषधियों को जल बरसाकर मेघ पालन पोषण करता और बढाता है वैेसे ही जो सभासद उपदेश देने योग्य को सत्यभाषी बनाता व बढाता है वह हितैषी कहलाता है, जिस प्रकार दिनकर समस्त जगत को पुष्ट कर अग्नि तथा प्रभात प्रकट करता है उसी प्रकार सराहनीय दानी विद्वानों के ज्ञानमय गुण भली प्रकार जानते व बताते हैं अश्वि के उदाहरण से गुरू और उपदेशकों के गुणों का वर्णन ऋषि ने इस मंत्र में ज्ञान संचरण हेतु किया है ।
अॅंजोरनाम-गुरू उपदेशक गुन बखान ।
सूक्त एक सव इक्यासी पूरगे ।
सूक्त एक सव बयासी
अगस्त्य ऋषि । अष्विनी देवता । 1/5/7 निचृज्जगती । 3 जगती । 4 विराट् जगती छंद । निषाद स्वर । 2 स्वराट् त्रिष्टुप् छंद । धैवत स्वर । 6/8 स्वराट् पंक्ति छंद । पंचम स्वर ।
अभूदिदं वयुनमो षु भूषता रथो वृषण्वान्मदता मनीषिणः ।
धियंजिन्वा धिष्ण्या विश्यलावसू दिवो नपाता सुकृते शुचिव्रता ।।1।।
इन्द्रतमा हि धिष्ण्या मरूत्तमा दस्त्रा दंसिष्ठा रथ्या रथीतमा ।
पूणर््ंा रथं वहेथे मध्व आचितं तेन दाश्र्वांसमुप याथो अश्र्विना ।।2।।
जेकर संगत कर, परजा पालन हर, शील ईश धरम न शिल्प पनकाय हो ।
उपदेसू गुरूवर, ओला झन माने कर, जेन हर अइसे गुन नइ बढाय हो ।
बिजुरी अगन जल, चलथे पवन बल, रथ चढ देशपार जा धन जीताय हो ।
उही हा परिपूरन, लानै सुख अउ धन, देश देश पार जेन झटपट जाय हो ।
टीका-हे मनुष्यों जिनकी संगति करके प्रजाजनों का पालन संवर्धन सुशीलतावर्धन ईश्वर तत्व से संबंधित ज्ञानवर्धक धर्मज्ञान और शिल्पविद्या का विकास नहीे होता है एैसे उपदेशकों और गुरूओं को श्रेष्ठ गुरू और उपदेशक मत जानों । हे मनुष्यो बिजुरी अग्नि जल और पवन के बल पर चलने वाले रथ यान विमानादि में चढकर जो भ्रमण द्रुतवेग से देश देशानतर का भ्रमण समर्थ होते हैं वे परिपूर्ण धन सुख लाते हैं ।
किमत्र दस्त्रा कृणुथः किमासाथे जनो यः कश्र्चिदहविर्महीयते ।
अति क्रमिष्टं जुरतं पणेरसुं ज्योतिर्विप्राय कृणुतं वचस्यवे ।।3।।
जम्भयतमभितो रायतः शुनो हतं मृधो विदथुस्तान्यश्र्विना ।
वाचंवाचं जरितू रत्निनीं कृतमुभा शंस नासत्यावतं मम।।4।।
युवमेतं चक्रथुः सिन्धुषु प्लवमात्मन्वन्तं पक्षिणं तौग्रîाय कम् ।
येन देवत्रा मनसा निरूहथुः सुपत्तनी पेतथुः क्षोदसो महः ।।5।।
जस आप्त गुनीजन, गुरू उपदेसू मन, सबोसुख चाहैं तस डउल लगाव हो ।
दुष्ट बैरी ल बाॅंधन, गुनी उपदेश जन, अॅंगीयाय समरथ हो सके सुभाव हो ।
उही जन रखवार, जे जन समुद्र खार, बडहर उॅंचहर रचि सकै नाव हो ।
बइठय आय जाय, उही सबो सुख पाय, पर सुखदेवा होवै अइसे भॅजाव हो ।
टीका-जिस प्रकार आप्तविद्वान गुरू और उपदेशक सर्वजन सुख इच्छा करते हैं उसी प्रकार सर्वसुख की कामना सभी करें । दुष्ट-बैरीजनों को जो बाॅंधना जानता है और विद्वानों के उपदेशों को अंगीकार करने का सामथ्र्य जिसमे होता है वही लोकरक्षक हो सकता हैं । जो मनुष्य समुद्र क्षेत्र में लंबी-चैंडी और ऊॅंची नावों रचना कर उसमे बैठकर आवागमन करते हैं वे स्वयं सुख प्राप्त कर दूसरों के प्रति भी सुखदायक होते हैं एैसा समझो ।
अवविद्धं तौग्रîमप्स्व1न्तरनारम्भणे तमसि प्रविद्धम् ।
चतस्त्रो नावो जटलस्य जुष्टा उदश्र्विभ्यामिषिताः पारयन्ति ।।6।।
कः स्विद्वृक्षो निष्ठितो मध्ये अर्णसो यं तौग्रयो नाधितः पय्र्यषस्वजत् ।
पर्णा मृगस्य पतरोरिवारभ उदश्र्विना ऊहथुः श्रोमताय कम् ।।7।।
डोगा मा बइइ जन, समुन्द जाये हो मन, बडे संग छोटे डोगा जोरहू बिचार हो ।
ए हो डोगा चढइया, रूख न खूॅंटा बॅंधइया, समुन्द के भीतर कुछु नही अधार हो ।
डोगाच हरै अधार, बल्ली जानौ खंभा सार, अइसे जस पखेरू उडय बल भार हो ।
तइसे बिमान जान, अउ डोगा रथ यान, यह ज्ञान जानके हो जाहू हुसियार हो ।
टीका-नाव में बैठकर जब मनुष्य को समुद्र में जाने की इच्छा हो तो बडे नौका के साथ छोटी-छोटी नौकाओं को जोडकर जाने का विचार कर फिर जाना चाहिए । हे नावों में सवार होने वालों समुद्र में ना तो वृक्ष होते हैं ना ही कोई खूटा है जिसके आधार पर नाव को बाॅंधा जा सके इसलिए समुद्र में नाव ही आधार होता है और नाव में प्रयुक्त बल्लियाॅं ही खंभवत् कार्य करती है, जिस प्रकार पक्षी आकाश में निजबल के आधार पर उडता है वैसे ही विमान, यान, नाव और रथ आदि भी बिना किसी आधार के अंतरिक्ष और समुद्रादि में उडते और तैरते हैं ।
तद्वां नरा नासत्यावनु ष्याद्यद्वां मानास उचथमवोचन्।
अस्मादद्य सदसः सोम्यादा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ।।8।।
उचित हावय नर, निज प्रयोजन बर, चाहना रखके परहित करे जाय हो ।
अउर गुनीक मन, जेन दे उपदेसन, ओला बने मया लगा धरै गठियाय हो ।
सूक्त करत अॅंजोर, गुनिया के गुन फोर, ऐला सबो झन बने धर अंगियाय हो ।
अगस्त्य ऋषि मंतर, हरै सबो जाने बर, वेद जानै तेन हर सबो सुख पाय हो ।
टीेका-मनुष्यों के लिए यह उचित है कि वह निज प्रयोजन के लिए जैसी चाहना करता है वैसे ही परहित करने हेतु भी करे और विद्वानों के द्वारा जो उपदेश दिया जाता है उसे प्रेमपूर्वक अच्छे से गाॅंठ बाॅंधकर धारण करे, इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का विविध दृष्टान्तों से वर्णन किया है इसे सभी जैसा कहा गया है वैसा ही अंगीकार करें, अगस्त्य ऋषि का यह मंत्र सबके ज्ञानलाभ के लिए है वेद को जो जानता है वह समस्त उत्तम सुख प्राप्त करता है ।
अॅंजोरनाम- गुनिया के गुन के बखान ।
सूक्त एक सव बयासी पूरगे ।
सूक्त एक सव तिंरासी ।
अगस्त्य ऋषि । अष्विनी देवता । 1/4/6 त्रिष्टुप् ।
2/3 निचृत् त्रिष्टुप छंद । धैवत स्वर । 5 भूरिक् पंक्ति छन्द । पंचम स्वर ।
त्ंा युञ्जाथां मनसो यो जवीयान् त्रिवन्धुरो वृषणा यस्त्रिचक्रः ।
येनोपयाथः सुकृतो दुरोणं त्रिधातुना पतथो विर्न पर्णेः ।।1।।
सुवृद्रथो वत्र्तते यन्नभि क्षां यत्तिष्ठथः क्रतुमन्ता नु पृक्षे ।
वपुर्वपुष्या सचतामियं गीर्दिवो दुहित्रोषसा सचेथे ।।2।।
जेन चलै झटपट, पखेरू असन रथ, गगन चलन्ता सांगोपांग न बनाय हो ।
भला अइसन नर, कइसे पावै एैशवर्य, रथ यान बिगन न सुख हा जनाय हो ।
मनखे बइठ यान, झटपट आन-जान, भुॅंइया भर सुघर भॅंवरे सक पाय हो ।
रथ द्रुतबेग रच, प्रभाती बेरिया कस, चक हो अॅंजोर अस गुुनै सिरजाय हो ।
टीका-जो द्रुतवेग से पक्षी की भाॅंति अंतरिक्ष में चलने वाले सांगोपांग रथ सिद्ध नहीं करते है भला एैसे मनुष्य कैसे एैश्वर्य प्राप्त कर सकते हैं, उत्तम रथ-यान-विमान सिद्धि बिना किसी सुख की अनुभूति नहीं होती है । मनुष्य यान-विमान में बैठकर त्वरित गति से आवागमन भ्रमणादि भूमि भर में सुखपूर्वक करने में समर्थ होना चाहते हैं तो शीघ्रगामी रथ-यान और विमान बनाना चाहिए जो प्रभात की बेला के समान उज्जवल हो एैसा सोच समझकर चिंतन करते सृजन किया करे ।
आ तिष्ठतं सुवृतं यो रथो वामनु व्रतानि वत्र्तते हविष्मान् ।
येन नरा नासत्येषयध्यै वत्र्तिर्यार्थस्तनयाय त्मने च ।।3।।
लरिकन हित नर, सुख पनकाये बर, बने ठंस लमरी बिमान सिरजाय हो ।
संगोपांग पदारथ, झट चलइया रथ, खाये बर लेह चटपट बनवाय हो ।
सीरजम धरै लोग, धीरज ले खाय जोग, चाॅंटे अउ चूसे के जिनिस सकलाय हों ।
रथ चढै सबो धर, नभ भूमि समुन्दर, उत्तम व सावचेत होके आय जाय हो ।
टीका-मनुष्यों को अपने संतानों के सुखवर्धन हेतु अत्यन्त दृढ और लम्बे चैडे विमान का सृजन करना चाहिए और सांगोंपाग पदार्थो से द्रुतवेग से चलने वाले रथ में खाने पीने की सामग्री लेह और शीघ्र खाये जा सकने वाले चटपट सामग्री बनाना चाहिए और लागों को धैयपूर्वक भक्षण योग्य पदार्थो जैसे चाॅंटने चूसने चबाने आदि के पदार्थो का संग्रह करके रथ में चढते समय समस्त पदार्थो को लेकर अंतरिक्ष भूमि और समुद्र आदि में उत्तम रीति से सतर्कतापूर्वक आवागमन करना चाहिए ।
मा वां वृको मा वृकीरा दधर्षीन्मा परि वक्र्तमुत माति धक्तम् ।
अयं वां भागो निहित इयं गीर्दस्त्राविमे वां निधयो मधूनाम् ।।4।।
मनखे रहय घर, अउ चढै यान पर, अउ चाहे बन मा होवै बिराजमान हो ।
तब भोग करे बर, समपूर चीज धर, बउरन जोग धर जावय सामान हो ।
अस्त्र -शस्त्र सब धर, व बीर सैनिक नर, संग धर बसै नइ आय व्यवधान हो ।
न कोनो बिघन आय, न तो बाधा टिक पाय, अइसन जोंग के चलय मनुसान हो ।
टीका-मनुष्य जब घर पर निवासरत हो और यान विमान में विराजमान हो और वन प्रांन्तों में प्रतिष्ठित हो तो भोग के समस्त पदार्थो कों साथ लेकर जाना चाहिए, अस्त्र-शस्त्र और शूरवीर सैनिकवृंद को मनुष्य को अपने साथ रखकर कही भी निवास करे तो कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं होगा, न कोई विध्न बाधा उनके समक्ष टिक पायेगी एैसे समस्त चीजों का विचार विमर्श करके ही मनुष्य को चलना चाहिए ।
युवां गोतमः पुरूमीढो अत्रिर्दस्त्रा हवतेऽवस हविष्मान् ।
दिषं न दिष्टामृजूयेव यन्ता मे हवं नासत्योप यातम् ।।5।।
अतारिष्म तमसस्पारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्र्विनावधायि ।
एह यातं पथिभिर्देवयानौर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ।।6।।
जस डोंगा यान हर, सोझ बाट जाये बर, बाट मा बताये उही दिशा कोती जाय हो।
तस साध सीखे गुन, चेला मन गुनी सुन, आप्त गुनीेक लकठा जावै ज्ञान पाय हो ।
शिल्प सोधइया हर, डोगा रथ यान धर, भूमि नभ सागर आर पार ला कराय हो ।
उही गुनी कर बाठ, अगन जिनिस ठाठ, विमान व यान ले जाये जोग जनाय हो ।
टीका-जिस प्रकार नौकायान आदि सीधे मार्ग में जाने के लिए मार्ग में बताये गये दिशानिर्देशों का पालन करते हुए जिस दिशा में जाना हो उसी दिशा में जाते हैं उसी प्रकार सभी ज्ञानजिज्ञासू विद्यार्थियों को आप्त विद्वानों के निकट जाकर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । शिल्पविद्यावेत्ता रथ यान और विमानादि लेकर भूमि समुद्र और अंतरिक्ष को आर-पार करा सकते हैं वही विद्वानों के मार्ग अग्नि और पदार्थो से बने यान विमान को लाने ले जाने योग्य जाने जाते हैं ।
सूक्त एक सव चंवरासी ।
अगस्त्य ऋषि । अष्विनी देवता । 1 पंक्त् ि। भूरिक् पंक्ति । 5-6 निचृत् पंक्ति छंद । पंचम स्वर । 2/3 विराट् त्रिष्टुप् छन्द । धैवत स्वर ।
ता वामद्य तावपरं हुवेमोच्छन्त्यामुषसि वह्निरूक्थैः ।
नासत्या कुह चित्सन्तावय्र्यो दिवो नपाता सुदास्तराय ।।1।।
जस गुनी जन मन, भुॅंइया अउ गगन, ले सबो के ठउकहा करै उपकार हो ।
तस सबो झन हर, गुनिया ले गुन धर, पाके उपकार बनै बउरेै सॅंभार हो ।
अगस्त्य ऋषि मंतर, अश्विनी देवता कर, सुमिरन करके बतावत उघार हो ।
तेन ला शोभामोहन, पाछू चल दयानंद, बुध पुरतिन हे करत निरवार हो ।
टीका-जिस प्रकार विद्वान लोग भूमि और आकाश आदि तत्वों से सबके प्रति उपकार करते हैं वैसे ही सबको विद्वानों से विद्या व ज्ञान का उपकार प्राप्त करके उसका सम्यक् और संयमित व्यवहार करना चाहिए, अगस्त्य ऋषि ने इस मंत्र में अश्विनी देवता का स्मरण करके इस तथ्य हो सर्वहित हेतु उजागर किया है उसी सूक्त वाक्य को शोभामोहन महर्षि दयानंद सरस्वती के भाष्य के पीछे चलते हुए और अपने बुद्धि के सामथ्र्यानुसार अर्थाने का प्रयास कर रही है ।
अस्मे ऊ षु वृषणा मादयेथामुत्पणीॅंर्हतमूम्र्या मदन्ता ।
श्रुतं मे अच्छोक्तिभिर्मतीनामेष्टा नरा निचेतारा च कर्णेः ।।2।।
श्रिये पूषन्निषुकृतेव देवा नासत्या वहतुं सूय्र्यायाः ।
वच्यन्ते वां ककुहा अप्सु जाता युगा जूर्णेव वरूणस्य भूरेः ।।3।।
अस्मे सा वां माध्वी रातिरस्तु स्तोमं हिनोतं मान्यस्य कारोः ।
अनु यद्वां श्रवस्या सुदानू सुवीय्र्याय चर्षणयो मदन्ति ।।4।।
एष वां स्तोमो अश्र्विनावकारि मानेभिर्मघवाना सुवृक्ति ।
यातं वत्र्तिस्तनयाय त्मने चागस्त्ये नासत्या मदन्ता ।।5।।
उपदेशू गुरूबर, जन सीखा गुनधर, जोग मनखे ला चिन्ह बेद ला बताय हो ।
अउ देके बने ज्ञान, कर देवै बिदवान, तस उन गोठ आंनद जोग जनाय हो ।
जइसे बाण असन, प्रेरे सेना बैरी रन, जीतै तस झटपट करव उपाय हो ।
धन बने सिरजाय, बेरा बिसेस बॅंटाय, दिन बने काज तस रात न हो पाय हो ।
सीरजम गुनधर, धन्य हो चारो डहर, जेन आप्त श्रेष्ठी जन धरमी सुभाय हो ।
सज्जन नीति सुघर, गुनिया स्तुति कर, उही पराक्रम समरथ होई पाय हो ।
जेला गुनी सहराय, उही हा स्तुति आय, अउ उही हर परहितवा कहाय हो ।
जस पिलोर अपन, हेतु चाहै मन मन , उही धर्मबाठ जेमा धरमी हा जाय हो ।
टीका-जनशिक्षण हेतु जांे गुणधारी उपदेशकों और गुरूजनों के द्वारा सुपात्र जनों को वेद वचनों को बताया व सिखाया जाता है उत्तम ज्ञान देकर विद्वान गुरू उपदेशक गण विद्वान बनाते हैं और उनके वचनों से आनंद झरता हुआ अनुभव होता हे । जिस प्रकार बाण की प्रेरणा से सेना के सैनिकजन बैरीजनों को रणक्षेत्र में परास्त कर जीतते हैं वैसा ही उपाय शीघ्र करे जिससे कि उत्तम धन सृजन हो और विेशेष समय काल के विभागों में जिस प्रकार दिवस में कार्य बनता है उस प्रकार रात्रिकाल मे कार्यसिद्ध नहीं हो पाता है । उत्तम विद्वान चारो ओर धन्य-धन्य होते हैं । जो आप्त श्रेष्ठी और धार्मिक स्वभाव के हो सज्जनों की नीति की सुंदर स्तुति करते हैं वे ही पराक्रम समर्थ होते है। जिनकी विद्वान सराहना करें केवल वही स्तुति है और परोपकारी वही है जो जैसा अपने संतानों और अपने लिए चाहता है वैसा ही दूसरो के लिए भी शुद्ध हृदय से चाहता है वही सच्चा परोपकारी है, और धर्ममार्ग वही है जिसमे धर्मात्मा सज्जन जाते हैं ।
अतारिष्म तमसस्पारमस्य प्रति वां स्तोमो अश्र्विनावधायि ।
एह यातं पथिभिर्देवयानैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ।।6।।
उही विद्याधर हर, परम के पार नर, लेग सकत जे धरम के पथ जाय हो ।
अउर उहीच हर, जथारथ गोठ कर, सत उपदेश दे सिरतो अरथाय हो ।
यह सूक्त रिखीबर, गुरू उपदेसू नर, गुन के बखान कर हवय बताय हो ।
अगस्त्य ऋषि मंतर, जेन लेवै बने धर, वेद के मरम जान सबो सुख पाय हो ।
टीका-केवल सत्यविद्या अर्थात परमात्मा की विद्या का जाननहारा सतगुरू और उपदेशक है वही मनुष्यों को उस पार अर्थात परम पार पहुॅंचा सकता है जहाॅ सांसारिक ज्ञान नही पहुॅंचा सकता, यह कार्य केवल वही सद्गुरू और उपदेशक ही पार करने में सक्षम होता है जो धर्ममार्गगामी हो और वही यथार्थ जैसा है उसे वैसा ही बता सकता है और सत्य अर्थात परमात्मा और उससे संबंधित ज्ञान ही सत्यज्ञान है बाकी संसारिक ज्ञान अज्ञान है उस ज्ञान का कोई अर्थ नहीं है जो परमात्मा के मार्ग का पथिक बना दे केवल वही सत्यज्ञान है एैसे सत्यज्ञानी जन परमपिता के विषय में लेशमात्र भी बिना किसी त्रुटि के सत्यज्ञान से अवगत करा सकते हैं, इस सूक्त में ऋषिवर ने विद्वानों और उपदेशक गुणवर्णन करके बताया है अगस्त्य ऋषि के इस परम आत्म कल्याणकारी मंत्र को जो कोई धारण करे वह परमसत्य अर्थात परमात्मा का पार पा सकता है और अपने जीवन को सफल बना सकता है। वेद के सभी मंत्र परम कल्याणकारी है यह मंत्र तो परमलब्धि सिद्धिकारक है अतः यह समस्त सुखों में भी उत्तमसुख प्रकट करने वाला है ।
अॅंजोरनाम- गुरू अउ उपदेशू के गुन के बखान
सूक्त एक सव चंवरासी पूरगे ।
सूक्त एक सव पच्यासी ।
अगस्त्य ऋषि । द्यावापृथिव्यौ देवता । 1/6-8 । 10/11 त्रिष्टुप् । विराट् त्रिष्टुप् 3-5/9 निचृत् त्रिष्टुप् छन्द । धैवत स्वर ।
कतरा पूर्वा कतरापरायोः कथा जाते कवयः को वि वेद ।
विश्र्वं त्मना बिभृतो यद्ध नाम वि वत्र्तेते अहनी चक्रियेव ।।1।।
भूरिं द्वे अचरन्ती चरन्तं पद्वन्तं गर्भमपदी दधाते ।
नित्यं न सूनुं पित्रोरूपस्थे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ।।2।।
धावा पिरथी जगत, अग सेती पदारथ, अउ जे अधाराधेय संबंध जनाय हो ।
जेकर ले दिन रात, बर्तमान रहै नात, गुनिया तुमन जानौ बने फोरियाय हो ।
ठंस भू व दिनकर, जस जंगम स्थावर, चराचर जगत ला पोंसके बढाय हो ।
तस सगा ददा दाई, गुरूजन हो सहाई, लइका व चेला बिद्या सीखा ला धराय हो।
टीका-इस संसार में जो द्यावापृथ्वी आदि और प्रथम कारण और परकार्यकारण पदार्थ और जो आधाराधेय संबंध आदि है जिसके कारण दिन और रात्रि के समान निश्चित और सदैव वर्तमान संबंधन होता है हे विद्वानों तुम लोग उसी संबंध को उत्तम रीति से विश्लेषण करके भलीभाॅंति जानों । जिस प्रकार सूर्य और भूमि दृढतापूर्वक रहते हुए स्थावर, जंगम, चर और अचर जगत को अनेकानेक प्रकार से रखकर पालते हैं और बढाते हैं उसी प्रकार माता पिता अतिथि आचार्य आदि लोगों को संतानों और शिष्यों की भलीभाॅंति रक्षा करते हुए विद्या और उत्तम शिक्षा को धारण कराना चाहिए ।
अनेहो दात्रमदितेरनंर्व हुवे स्वर्वदवधं नमस्वत्।
तद्रोदसी जनयतं जरित्रे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ।।3।।
अतप्यमाने अवसावन्ती अनु ष्याम रोदसी देवपुत्रे ।
उभे देवानामुभयेभिरह्नां द्यावा रक्षतं पृथिवह नो अभ्वात् ।।4।।
जे भॅंुइया दिनकर, अउ पदारथ हर, प्रत्यक्ष दिखै अनादि अबिनासी जान हो ।
जइसे भुॅंइया हर, पदारथ स्थावर, जंगम के पालन-पोसन करे जाय हो ।
तस ददा अउ दाई, गुरू राउ हो सहाई, परजा रखय निज हथेरिया छाॅय हो ।
वेद के बचन धर, राउ ददा दाई हर, अउ गुरू मिल प्रजा सुख बसवाय हो ।
टीका-जो भूमि और सूर्य आदि पदार्थ प्रत्यक्ष रूप में संसार में दृश्यमान हैं वे सब अनादि और अविनाशी है एैसा सभी लोगों को जानना चाहिए । जिस प्रकार भूमि के पदार्थ स्थावर और जंगम आदि का भूमि पालन पोषण करती है उसी प्रकार माता पिता गुरू और राजा को भी सहायक बनकर अपने राज्य के प्रजा को अपने हथेली की छाया में अर्थात अपने संरक्षण में रखना चाहिए और वेद के वचन को धारण करके राजा माता पिता और गुरू को मिलकर प्रजाजनों को सुखपूर्वक निवास कराना चाहिए ।
संगच्छमाने युवती समन्ते स्वसारा जामी पित्रोरूपस्थे ।
अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ।।5।।
उर्वी सद्मनी बृहती ऋतेन हुवे देवानामवसा जनित्री ।
दधाते ये अमृतं सुप्रतीके द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ।।6।।
हे मनुख जान जस, बाॅंधके लंगोट कस, मया लंे जे लरिकन बिद्या सिद्धि पाय हो ।
उही कैना अउ बर, सुखी द्यावापृथ्वी हर, जगहित बर बर्तमान रहै छाय हो ।
जेन दाई ददा हर, सत उपदेश कर, सुरूज असन बिद्या गुन अॅंजोराय हो ।
सबो गुन समभृत, भुमि जस जल वृक्ष, तस बल बढइया राखे जोग आय हो ।
टीका-हे मनुष्यों तुम यह जानो कि जिस प्रकार ब्रम्हचर्य का पालन दृढसंकल्पपूर्वक जो लोग करते हैं और तरूणास्था में जो बालक बालिका लोग प्रेमपूर्वक विद्यासिद्धि करते हैं केवल वही वर और कन्या सुखी होते है, द्यावापृथ्वी आदि जिस प्रकार समस्त जगतहित हेतु संसार में वर्तमान और आच्छादित रहते हैं उसी प्रकार जो माता पिता अपने संतानों को सत्य उपदेश देकर सूर्य के समान विद्या और ज्ञानप्रकाशयुक्त कराते हैं वे सर्वगुण संम्भृत जिस प्रकार भूमि और जल वृक्ष आदि को बलवान बनाते हैं उसी प्रकार अपने संतानों को बलशाली बनाते व सबकी रक्षा के योग्य होते हैं ।
उर्वी पृथ्वी बहुले दूरेअन्ते अप बु्रवे नमसा यज्ञे अस्मिन् ।
दधाते ये सुभगें सुप्रतूत्र्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ।।7।।
भूमि लोक तीर जस, चंदालोक भूमि तस, रबि भूमि ले दुरिहा हे बिराजमान हो ।
अइसन सबो खार, अंधियार उजियार, सबो ठाॅंव लोक दू ठन हे वर्तमान हो ।
जइसे वो लोक बढे, सब हा उदीम करे, गॅंठिया के धर बने बेद के गियान हो ।
अगस्त्य ऋषि मंतर, जेन हर लेवेै धर, ज्ञान पाके धन्य होवै मनुख श्रीमान हो ।
टीका-जिस प्रकार भूलोक के निकट में चन्द्रलोक की भूमि है उसी प्रकार रविलोक की भूमि दूर में विराजमान है एैसा सभी क्षेत्रों में अर्थात सभी लोकों में अंधकार और प्रकाश के लोकद्वय वर्तमान हैं, जिस प्रकार उन लोको की वृद्धि हो एैसा प्रयत्न वेद वचन को गाॅंठबाॅंधकर रखते हुए सबको करना चाहिए, अगस्त्य ऋषि के इस मंत्र को जो धारण कर लेता है वह ज्ञान प्राप्त करके धन्य और श्रीमान हो सकता है ।
देवान्वा यच्चकृमा कच्चिदागः सखायं वा सदमिज्जास्पतिं वा ।
इयं धीर्भूया अवयानमेषां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ।।8।।
उभा शंसा नय्र्या मामविष्टामुभें मामूती अवसा सचेताम् ।
भूरि चिदय्र्यः सुदास्तरायेषा मदन्त इषयेम देवाः ।।9।।
जेन दाई ददा मन, अन जल के असन, लइका न पालै धरम ले गिर जाय हो ।
अउ महतारी बाप, सेवा न करय आप, ते लइका जग अधरमी कहलाय हो ।
जस रबि शशि कर, मिलन हो सुखकर, सबो जीव बरताय बनिया हो जाय हो ।
जिनिस व दान अन, मंगन करै प्रसन्न , तस सबो गुनिया हरख बगराय हो ।
टीका-जो माता पिता जिस प्रकार अन्न और जल समस्त जीवों का पोषण करता है वैसे ही अपने संतानों का पालन पोषण नहीं करते हैं वे अपने धर्म से पतित हांे जाते हैं और जो संतान अपने माता पिता की आप स्वयं सेवा नहीं करता है वह संतान अधर्मी कहलाते है । जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा के संयोग समस्त चराचर जगत के जीवों के लिए सुखकारक होता है उसी प्रकार वैश्य होकर अन्न धन द्रव्य पदार्थादि का दान करके भिखारियों को प्रसन्न करते हैं ठीक उसी प्रकार सभी विद्वानों को सबके प्रसन्नता के लिए प्रवृत्त होकर सर्वत्र हर्ष फैलाना चाहिए ।
ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः ।
पतामवद्याद्दुरितादभीके पिता माता च रक्षतामवोभिः ।।10।।
करइया उपदेश, सुनइया ला बिसेस, जस सर्वहित प्रिय बचन बताय हो ।
तस बउरन कहे, वइसने आप सहे, जस बाप महतारी पोसके बढाय हो ।
लइका घलोक तस, दाई बाप सेवै हॅंस, कर्तव्य अपन समझ के निभाय हो ।
बेद के बचन हर, जीनगी ला सुखकर, करे के बताय बाठ सबो झन जाय हो ।
टीका-उपदेशक लोग विशेष रूप से उपदेशों को सुनने व ग्रहण करने वाले श्रोताओं के प्रति जिस प्रकार सर्वहितकारी और प्रिय वचन बताते हैं उसी प्रकार का व्यवहार लोगो को आचरण में उतारने के लिए कहे जैसा कि आपको स्वयं आनंदित करता हो, जिस प्रकार माता पिता अपनी संतानों का पालन पोषण करते हैं और उन्हे बढाते हैं उसी प्रकार संतानों को भी अपने माता पिता की सेवा प्रसन्न वदन से करना चाहिए और अपने नैतिक कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए, वेद के वचन सबके जीवन को सुखकर बनाने के लिए हैं इसलिए सभी वेदोक्त मार्ग में सुखपूर्वक निवास करने के लिए जाया करें ।
इदं द्यावापृथिवी सत्यमस्तु पितर्मातर्यदिहोपब्रुवे वाम् ।
भूतं देवानामवमे अवोभिर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ।।11।।
दाई अउ ददा हर, लइका सिखोये बर, अस उपदेश करैे धरम बताय हो ।
धरम जुरे करम, सेवन निरभरम, नइ करे जोग करम ला अरथाय हो ।
लइका हा ददा दाई, पोसइया हो गोसाई, तेला कहे सत के डहर मे चलाय हो ।
जेने कहे तेने बाट, कर बने मन टाॅंठ, उल्टा न चलना अइसे समझाय हो ।
टीका-माता पिता अपनी संतानों को शिक्षा देने के लिए एैसा उपदेश कर धर्मसम्मत् मार्ग का ही सेवन बिना किसी संशय के करें और नही करने योग्य कर्मो को भी स्पष्ट करें, बालक माता पिता और पोषक आदि के प्रति सन्मार्ग में आचरण हेतु प्रेरित करने के लिए विनती किया करें और वे बतायें कि उनको कैसा आचरण करना चाहिए और कैसा आचरण नहीं करना चाहिए और विपरीत मार्ग में न जायें।
अॅंजोरनाम-द्यावापृथ्वी के दृष्टान्त ले बियाय जोग अउ बियइया के करम बखान ।
सूक्त एक सव पंच्यासी पूरगे ।
सूक्त एक सव छिंयासी
अगस्त्य ऋषि । विष्वेदेवा देवता । 1/8/9 त्रिष्टुप् । 2/4 निचृत् त्रिष्टुप् । 11 भूरिक् त्रिष्टुप् छंद । धैवत स्वर । 3/5/7भूरिक् पंक्ति छंद । 6 पंक्ति । 10 स्वराट् पंक्ति छंद । पंचम स्वर ।
आ न इळाभिर्विदथे सुशस्ति विश्र्वानरः सविता देव एतु ।
अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्र्वं जगदभिपित्वे मनीषा ।।1।।
जस पक्षपात तज प्रभु सबके नियाव, सबो बर समभाव पिरित करय हो ।
तस होय गुनी जन, अउ युवा नर मन, अपने असन जुबती बने वरय हो ।
सुघर बिहाव कर, सुखी रहै नारी-नर, बिज्ञ चेला गुन देके हरस भरय हो ।
वेद के वचन धर, रैगय सबो डहर, वेद के वचन प्रभु वचन हरय हो ।
टीका-जैसे पक्षपातरहित परमात्मा सबके प्रति सत्यन्याय का आश्रय लेते हैं और सबको समान भाव से प्रेम करतें हैं उसी प्रकार विद्वानों को भी समदर्शी सत्यन्यायकर्ता और सर्वप्रियता गुणयुक्त होना चाहिए, जिस प्रकार युवावस्था को प्राप्त पुरूष अपने ही समान गुण कर्म और स्वभावयुक्त स्त्री का वरण करके सुन्दर स्वयंवर रीति से विवाह करके नर-नारी सुखी रहते हैं विद्वानों को भी अपने शिष्यों को ज्ञान विज्ञान और उत्तम शिक्षा आदि से शिक्षित करके हर्षित से परिपूर्ण होना चाहिए, वेद के वचन को धारण कर जीवन मार्ग में चलना श्रेयस्कर है क्योंकि वेदवचन साक्षात् परमपुरूष परमात्मा के वचन हैं ।
आ नो विश्र्व आस्क्रा गमन्तु देवा मित्रा अर्यमा वरूणंः सजोषाः ।
भुवन्यथा नो विष्वे वृधासः करन्त्सुषाहा विथुरं न शवः ।।2।।
प्रेष्ठं वो अतिथिं गृणीषेऽग्ंिन शस्तिभिस्तुर्वणिः सजोषाः ।
असद्यथा नो वरूणः सुकीत्र्तिरिषश्र्च पर्षदरिगूत्र्तः सूरिः ।।3।।
जेने बाठ बुधियार, रेंगें शुभगुन धार ,उहीच बाट मा सबो मनखे हा जाय हो ।
आप्तगुनी शास्त्रजानू, परदुख निजमानू, परसुख निज तस सबो ला जनाय हो।
जे गृहस्थ सीरजम, गुनी सतकार रम, अउ पहुना के सेवा करन सुहाय हो ।
व्यवहार में धरम, उजोगी रत करम, यथार्थ विज्ञान धर श्रीमान कहाय हो ।
टीका-जिस शुभ मार्ग कों विद्वान धारण करते हैं उसी मार्ग को सबको धारण करके चलना चाहिए, आप्तज्ञानी विद्वान शास्त्रज्ञ आदि जो दूसरों के सुख दुख का ध्यान रखते हैं परदुखकातर और दूसरों का सुख निजसुख समान अनुभव करते है उसी प्रकार सबको अनुभव करना चाहिए । जो गृहस्थ आश्रम में रहते हुए उत्तम विद्वानों का सत्कार करने में तल्लीन रहते हैं और जिन्हे अतिथि सत्कार अत्यन्त सुहावना लगता है, जिनके व्यवहार में धर्म सन्निहित होता है और जो सदैव परिश्रम और उद्योगरत् रहते हैं वे यथार्थ विज्ञान को प्राप्त करके श्रीमान कहलाते हैं।
उप व एषे नमसा जिगीषोषासानक्ता सुदुघेव धेनुः ।
समाने अहन्विमिमानो अंर्क विषुरूपे पससि सस्मिन्नूधन् ।।4।।
उत नोऽहिर्बूध्न्यो3 मयस्कः शिुशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धुः ।
येन नपातमपां जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति ।।5।।
उत न ई त्वष्टा गन्त्वच्छा स्मत्सूरिभिरभिपित्वे सजोषाः ।
आ वृत्रहेन्द्रश्र्चर्षणिप्रास्तुविष्टमो नरां न इह गम्याः ।।6।।
दिन-रात के समान, सदा रहै वर्तमान, बिद्या व अबिद्या सबके जाननहार हो।
उही गउवा असन, परउपकारी बन, दूध माॅंझ घीव कस उही भूतसार हो ।
बादर न होवै जौन, दाई कस पोसै कोन, रबि पवन बिन मेघ सके कोन धार हो ।
जे सुरूज के समान, बिद्या के अॅंजोर दान, निज सम सुखी बली करथे संसार हो ।
टीका-जो दिवस और रात्रि के समान सदैव वर्तमान रहते हैं और विद्या तथा अविद्या के ठीक ठीक जानने वाले ज्ञानी जन होते हैं वे गौ के समान परोपकारी होते हैं जिस प्रकार गाय के दूध के मध्य घृत सार होता है वैसे ही एैसे प्राज्ञपुरूष भूतसमुदाय में सारभूत अर्थात समस्त भूतों में सारभूत होते हैं । यदि बादल नहीं हो तो माता के समान कोन समस्त संसार का पालन पोषण करें, यदि सूर्य आॅैर वायु नहीं हों तो कौन मातृवत बादलों को धारण करे अर्थात कोई भी नहीं । जो सूर्य के समान विद्या और ज्ञानदान से सबके आत्मा को प्रकाशित करते हैं और अपने ही समान बलवान और सुखी संसार के सबको आत्मवत् करनेहारा होते हैं ।
उत न ई मतयोऽश्वयोगाः शिशुं न गावस्तरूणं रिहन्ति ।
तमीं गिरो जनयो न पत्नीः सुरभिष्टमं नरां नसन्त ।।7।।
जस घोडचग्घा हर, एक ठाॅंव ले दूसर, ठाॅंव झटपट जाके करै व्यवहार हो ।
अउ जस गउ हर, जावै बछरून कर, पतिबरता तिया अपन भरतार हो ।
तइसन गुनी जन, सीरजम बिद्या धन, गुनिया के गोठबात के पा सके पार हो ।
अगस्त्य ऋषि कथन, विश्वदेवा सुमिरन, सूक्त ला बतावत मनुख सुखसार हो ।
टीका-जिस प्रकार अश्वारोही व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर तीव्र गति से गमन करके कार्य व्यवहार करता है जिस प्रकार गाय अपने बछडे के पास जाती हैं और जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री अपने पति को प्राप्त करती हैं उसी प्रकार विद्वान लोग उत्तम विद्या रूपी धन को विद्वानों की वाणी उनकेे संवादों चर्चाओं परिचर्चाओं के शब्दाशयों का सहीं भावार्थ समझ पाने में सफल होते हैं, अगस्त्य ऋषि ने इस कथन में विश्वदेवता का स्मरण करके इस सूक्त को मनुष्यों को समस्त सुखों के सार सुख को सारसंक्षेप में बताया है ।
उत न ई मरूतो वृद्धसेनाः स्मद्रोदसी समनसः सदन्तु ।
पृषदश्र्वासोऽवनयो रथा रिशादसो मित्रयुजो न देवाः ।।8।।
प्र नु यदेषां महिना चिकित्रे प्र युञ्जन्ते प्रयुजस्ते सुवृक्ति ।
अध सदेषां सुदिने न शरूविश्र्वनेरिणं प्रुषायन्त सेनाः ।।9।।
जेकर हो सेना बीर, झगरन्ता रनधीर, एकमत हो मति बडे-बडे बिमान हो।
अस रथ यान तीर, भूमि कस क्षमाशील, सबोमीती चलवन्ता प्रसन्न सुजान हो ।
पूर्नबिज्ञ गुनधर, ज्ञान बगराय बर, राउर लगा महिमा अउ पाये मान हो ।
क्रिया जानकार धीर, कुलीनहा सूरबीर, सेना पोठ कर उही जय पावै लान हो ।
टीका-जिनकी सेना शूरवीर और सेनापति सहित सैनिकों की मति एक समान हो, जिनके पास बडे-बडे यान विमान रथादि हों और जो पृथ्वी के समान क्षमाशील और मित्रप्रिय विद्वान आचरण वाले सदैव प्रसन्न रहते हैं । सम्पूर्ण विद्याओं से शोभित गुणागार को ज्ञान प्रचार प्रसार हेतु जो राजा लगाये उसकी महिमा और मान-सम्मान वृद्धि हो क्रियाओं के जानकार धीर गंभीर कुलीन और शूरवीर सेना के सैनिकों को पुष्ट बलिष्ट करने वाले राजा सदैव विजयश्री को प्राप्त करते हैं ।
प्रो अश्र्विनाववसे कृणुध्वं प्र पूषणं स्वतवसो हि सन्ति ।
अद्वे षो विष्णुर्वात ऋभुक्षा अच्छा सुम्नाय ववृतीय देवान् ।।10।।
इयं सा वो अस्मे दीधितिर्यजत्रा अपिप्राणी च सदनी च भूयाः ।
नि या देवेषु यतते वसूयुर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ।।11।।
जेला नहीं रागद्वेष, अंतस बली बिसेस, तन बली होय अस धरमी सुजान हो ।
विद्या के प्रचार बर, उही ला लगाय कर, जेकर ले सुख बढ पावै मनमान हो ।
सुख देथे बिद्या हर, बिन बिद्या पाये नर, दलिद्दर दसा मा रहिथे बर्तमान हो ।
अगस्त्य ऋषि हा सुन, गुनी के बताय गुन, ए सूक्त मा जनसुख रखके धियान हो ।
टीका-जिनके अंतरात्मा में किसी के प्रति राग द्वेष भावना से रहित हो जिनकी आत्मा विशेष रूप से बलवान और देह पुष्ट हो एैसे धार्मिक विद्वानों को विद्या प्रचार में लगाना चाहिए जिससे अत्यधिक सुखवर्धन हो सके । विद्या सबके लिए सदैव सुखदायक है जो मनुष्य विद्याहीन हो उसकी दरिद्रता किसी भी काल में समाप्त नहीं होती है, अगस्त्य ऋषि ने इस सूक्त में विद्वानों के गुण जनसुख को ध्यान में रखते हुए बताया है ।
अॅंजोरनाम-गुनिया के गुन बखान ।
सूक्त एक सव छिंयासी पूरगे ।
सूक्त एक सव सत्यासी
अगस्त्य ऋषि। औषधी देवता । 1 उष्णिक् । 6/7 भूरिगुष्णिक् छंद । ऋषभ स्वर । 2/8 निचृद् गायत्री । 4 विराट् गायत्री । 9/10 । गायत्री छंद । षड्ज स्वर । 3/5 निचृदनुष्टुप् छंद । 11 स्वराड्नुष्टुप् छंद । गांधार स्वर ।
पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम् । यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत् ।।1।।
बड अन्न सिद्ध कर, गुन जान अउ धर, जथाजोग चीज जोग बिंजन बनाय हो।
बढिया संघेरे आय, व बने सपेट खाय, उही जन बेद हर धरमी बताय हो ।
तन व अंतस बल, बढा के हावै सबल, पुरसारथ ले लछमी ला पनकाय हो ।
अगस्त्य ऋषि मंतर, औषध देवता बर, सुमिरे हे तेला दयानंद अरथाय हो ।
टीका-बहुत से अन्न को सिद्ध करके जो उनके गुणों को जानता और यथायोग्य पदार्थो का संयोग करके व्यंजनादि बनाकर उत्तम ढंग से मिलान विधि जानकर अच्छे से स्वादपूर्वक खाये वेद में उसे धार्मिक बताया गया है और एैसे आहारी ही अपने आत्मा और शरीर को सबल बनाकर पुरूषार्थ के माध्यम से लक्ष्मी उन्नति करते हैं, अगस्त्य ऋषि ने इस मंत्र में औषधि देवता का स्मरण करते हुए सिद्ध किया है जिसे महर्षि दयानंद सरस्वती ने कृपापूर्वक व्याख्या करके सरलीकृत किया है ।
स्वादो पिता मधो पितो वयं त्वा ववृमहे । अस्माकमविता भव ।।2।।
मनखे मधुर रस, डारै जानै बने कस, स्वादिष्ट अन्न जेवन सुघर बनाय हो ।
आयुर्वेद कर रीत, बने लगाके पिरीत, सबदिन सुघर बनाय अउ खाय हो ।
रोग हरै जेन हर, अउ बढावै उमर, अइसन जेवन करय व्यवहार हो ।
अगस्त्य वचन धर, खावै-पीयेै नारी-नर, सुखमय हो सकै सगरो परिवार हो ।
टीका-मनुष्य को मधुर रस आदि का योग करके भली भाॅंति प्रयोगविधि जानकर स्वादिष्ट अन्नादि सिद्धि विधि जानकर उत्तम भोजन बनायंे और आयुर्वेद की रीति को प्रीतिपूर्वक अंगीकार करते हुए सदेैव बनाकर भोजन करें, जो रोगहर आयुर्बलवर्धक पदार्थ हैं सदैव एैसा भोजन व्यवहार करें अगस्त्य ऋषि के इस वचन को धारण करके जांे नर-नारी आहार व्यवहार करें वे सपरिवार सदैव सुख पावें ।
उप नः पितवा चर शिवः शिवाभिरूतिभिः । मयोभूरद्विषेण्यः सखा सुशेवो अद्वयाः ।।3।।
तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः । दिवि बाताईव श्रिताः ।।4।।
पदारथ अउ अन, व्यापत ईश अपन, निरोग करत बनकर रखवार हो ।
रखवारी काज कर, मीतभाव जीव बर, रखत पोंसत जगमीत संगवार हो ।
ये जगत ईश कर, व्यवस्था मा निरभर, लोकलोकान्तर भूमि जल व बयार हो ।
अनुकूल इही तत्व, रस पदारथ सत्व, सबो फेर सबो ठाॅंव मिलै न संसार हो ।
टीका-पदार्थ और अन्न परमात्मा आप स्वयं व्याप्त रहते हुए सभी जीवों को निरोग रखते हुए सबके रक्षकरूप में सदैव वर्तमान रहते हैं इन रक्षारूप क्रियाओं में सभी जीवों के प्रति मित्रवत भावना रखते हुए उनका पालन-पोषण जगतमित्र व सखा की भांति बर्ताव करते है। यह जगत परमात्मा की व्यवस्था पर निर्भर है और लोक-लोकान्तर में जो भूमि जल वायु आदि तत्व हैं इन्ही तत्वों के अनुकूल पदार्थों के रस सत्वादि होते हैं, किंतु इस संसार में सभी पदार्थ सभी स्थानों में नहीं पाये जाते हैं ।
तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ट ते पितो । प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवाईवेरते ।।5।।
त्वे पितो महानां देवानां मनो हितम् । अकारि चारू केतुना तवाहिमवसावधीत् ।।6।।
यददो पितो अजग्न्विवस्व पर्वतानाम् । अत्रा चिन्नो मधो पितोऽरं भक्षाण गम्याः ।।7।।
व्यापत पदार्थ सब, परमातमा सुलभ, अन्न व जिनिस सबो जीव ला देवाय हो ।
जिनिस रचे ओकर, निज गुन अनुहर, कोनो मा सेवाद कोनो बिस्वाद जनाय हो ।
ओला जानौ सबो झन, नहीं खाये जाये अन्न, तब मन ककरो आनंद नही पाय हो।
मन हावै अन्नमय, तेन सेती गुन भय, अन्न के बियइया मेघ निमित्त बनाय हो ।
अन्न बने सिद्ध कर, राॅंध कूट खाये बर, अइसन रिखि हर हे सुन बताय हो ।
सबो पदारथ पर, व्यापै परमेशवर, जेवत खानी सुमर जेन सिरजाय हो ।
जे सेती जे प्रभुवर, कृपा अन्न चीज कर, उत्ती मूडा देशकाल अनुहर छाय हो ।
बस उही ईशवर, मनखे सुमर कर, सबो जिनिस ला खावै अउ सुख लाय हो ।
टीका-जितने पदार्थ इस संसार में व्याप्त हैं उन सबमे परमात्मा सर्वत्र व्याप्त व सुलभ हैं, और परमात्मा के द्वारा सृजित सभी पदार्थो के गुण धर्म रंग गंध स्वभाव आदि अपने-अपने गुणों के अनुसार होतेे हैं किसी पदार्थ में स्वाद होता है कोई पदार्थ स्वादुतर होता है अर्थात उसमे कोई स्वाद नहीं होता है, समस्त पदार्थो के गुणों को मनुष्यों को जानना चाहिए । यदि अन्न भोजन न किया जाये तो मनुष्य मन शान्ति नहीं होता है क्योंकि मन अन्नमय है अन्न ग्रहण करने पर ही मन संतुष्ट होता हे इस कारण से एैसा गुण है एैसा जानना चाहिए अन्न उत्पन्न करने वाले परमात्मा ने मेघ को निमित्त कारण बनाया है अन्न को भली भाॅंति पकाकर सिद्ध करके खायें एैसा मंत्र रचयिता ऋषि ने बताया है समस्त पदार्थो में व्याप्त और सिरजनहारा परमात्मा को भोजन करते समय अवश्य स्मरण करना चहिए, जिस परमात्मा ने कृपा करके अन्न और समस्त पदार्थो को प्रदान किया है पूर्वदिशा और देशकाल के अनुसार सर्वत्र वर्तमान और व्याप्त है बस एकमात्र उसी ईश्वर को मनुष्य को स्मरण करना चाहिए और समस्त पदार्थो को ग्रहण करके सुखलब्ध होना चाहिए।
यदपामोष्सधीनां परिंशमारिशामहे । वतापे पीब इद्भव।।8।।
अन्न जल घीव कर, संस्कार ले सुघर, सहरउ सिद्ध अन्न बिंजन बनाय हो ।
लायची मरीच डार, अउ दूध घीव धार, पदारथ सुघर बनावत मिलाय हो ।
वो जेवन खाये कर, पोठ तन मन बर, युक्ताहार तन-मन बल सिरजाय हो ।
रस व्याप्त ईशवर, कर गुन जान धर, तभे परिपूरन सुख बने जनाय हो ।
टीका-अन्न जल घृतादि पदार्थो से संुदर संस्कारित सिद्धान्न से भोजन और व्यंजनादि बनाकर उन व्यंजनों में इलायची कालीमिर्च घृत और दूध आदि पदार्थो को मिलाकर सुंदर विधिविधान पूर्वक बनायें, एैसे सिद्धान्न को ग्रहण करके अपने शरीर और आत्मा को पुष्ट करें क्योंकि एैसा युक्ताहार देहात्मबल सृजन करता है, समस्त रसों में परमात्मा व्याप्त हैं उनके गुणों को भलीभाॅंति जानें तभी परिपूर्ण सुख अनुभव हो सकता है ।
यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे । वातापे पीव इद्भव। ।9।।
करम्भ औषधे भव पीवो वृक्क उदारथिः । वातापे पीव इद्भव ।।10।।
जस मनुसान अन्न, पदारथ उन उन, रॅंधनी काज अनुकूल जे संस्कार हो ।
तइसे राॅंधय जस, रस ला उचित तस, संस्कार ले सिधोय करै व्यवहार हो ।
जइसे संयमी नर, शुभ करम ला धर, तन व अंतसबल करै बढवार हो ।
तइसे संयम धर, सबो पदारथ कर, बउरन मनखे हा करय बिचार हो ।
टीका-जिस प्रकार मनुष्य अन्नादि पदार्थो को उन-उन पदार्थो के पाकक्रिया के अनुकूल संस्कारित कर सिद्ध करते हैं, जिस प्रकार उन पदार्थो को पकाया जाता है वैसे ही रसों को भी उचित विधि से संस्कारित करके सिद्ध कर व्यवहार में लाना चाहिए । जिस प्रकार संयमी पुरूष शुभकर्म धारण करके देहात्मबलवर्धन करते हैं वैसे संयमपूर्वक पदार्थो का मनुष्य को विचारकर प्रयोग करना चाहिए ।
तं त्वा वयं वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम । देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम् ।।11।।
जस गउ काॅंदी बन, खाके दे दूध रतन, तस अन पदारथ के निकालौ सार हो ।
जेन निज संगवारी, खवा पिया बड भारी, अन्न व जिनिस ले करही सतकार हो ।
अउर परसपर, आंनद एक दूसर, देये साध करै सदा रहि ईश भार हो ।
सबो ओला सहराय, उही सब सुख पाय, जेन हर बेद के चलही अनुहार हो ।
टीका-जिस प्रकार गौ तृण और घाॅंस आदि खाकर दुग्धरत्न प्रदान करती है वैसे ही मनुष्यों को अन्नादि पदार्थो के सारतत्व को निकालना चाहिए, जो अपने मित्रों को खिला-पिला परस्पर एक दूसरे को आनंदित करने की इच्छा करते हुए सदैव परमात्मा के आश्रित जीवनयापन करते हैं उनकी सब सराहना करते हैं वही समस्त उत्तम सुखों के अधिकारी होते हैं जो वेदोक्त मार्ग के अनुसार आचरण करते हुए जीवनयापन करते हैं ।
अंजोरनाम -अन्न के गुन के बखान ।
सूक्त एक सव सत्यासी पूरगे ।
सूक्त एक सव अठ्यासी
अगस्त्य ऋषि । आप्रियो देवता । 1/3/5-7/10 निचृद्गायत्री । 2 /4/8/9/11 गायत्री छंद । षड्ज स्वर ।
समिद्धो अद्य राजसि देवो देवैः सहस्त्रजित् । दूतो हव्या कविर्वह ।।1।।
तनूनपादृतं यते मध्वा यज्ञः समज्यते । दधत्सहस्त्रिणीरिषः ।।2।।
आगी कस जेन दुष्ट, जन ला देवय कष्ट, सज्जन संगत धर बैरी जीत जाय हो।
गुनी संग बर्तमान, रहि होवै गुनवान, पाये जोग सबो पदारथ राज पाय हो ।
जउन करम चल, अतुलित धनबल, बाढै तस अनुठान सदा उरथाय हो ।
अगस्त्य ऋषि मंतर, आप्रियो देवता बर, निचृद्गायत्री छंद मा हे सिरजाय हो ।
टीका-जो अग्नि के समान अपने तेजी से दुष्टों को कष्ट देते हैं और सज्जनों की सहायता अंगीकार कर शत्रुओं को जीतते तथा विज्ञजनों के साथ वर्तमान रहकर सम्पूर्ण उत्तम विद्या ज्ञान प्राप्त कर विद्वान होते हैं वे ही प्राप्तियोग्य समस्त पदार्थो को प्राप्त करते हैं । जिस आचरण से अतुल धनधान्य वृद्धि होती है वैसा अनुष्ठान सतत् आरंभ करें, अगस्त्य ऋषि का यह मंत्र आप्रियो देवता के लिए है जिसका निचृद्गायत्री छंद में सृजन किया गया है ।
आजुव्हानो न ईड्यो देवाॅं आ वक्षि यज्ञियान् । अग्ने सहस्त्रसा असि ।।3।।
प्राचीनं बर्हिरोजसा सहस्न्ंावीरमस्तृणन् । यत्रादित्या विराजथ ।।4।।
गुन करम सुभाव जान के बने असन, बउरैे अगन बड कारज सिधोय हो ।
तस सेवा कर पाये आप्त गुनिया हा सब, शुभगुन धरा काज सिधोये बढोय हो ।
जेन सनातन सेती रबि लोकलोकान्तर, उज्जर हमन उहाॅं होन सबो कोय हो ।
अगस्त्य ऋषि बचन, गुनत शोभामोहन, अडहा ले कारज करात ठाढ होय हो ।
टीका-जैसे अग्नि के गुण कर्म और स्वभाव को भलीभाॅंति जानकर प्रयोग करने पर अग्नि बडे-बडे कार्यो में सिद्धिदायक होता है वैसे ही सेवा करके प्राप्त किये हुए आप्तज्ञानी प्राज्ञजन समस्त शुभगुण से कार्यसिद्ध कर मनुष्य को अग्रसर करते हैं । जिस सनातन कारण से सूर्य और लोक-लोकान्तर आदि प्रकाशित होते हैं और वहाॅं हम भी प्रकाशित भी होते हैं, अर्थात जिसने दैदीप्यमान लोक-लोकान्तरों को प्रकाशित किया है उन्होने ही वहीं से हमको और तुमको भी प्रकाशित किया है, अगस्त्य ऋषि के गूढ ज्ञानयुक्त सूक्त के वचनों को अज्ञानी शोभामोहन चिंतन कर रही है जो दैव कृपा से ही संभव हैे मानो ऋषि मुनि और परमात्मा साक्षात् खडे होकर यह कार्य एक मुर्खाणी से सम्पन्न करवा रहे हैं ।
विराट् सम्राड्विभ्वीः प्रभ्वीर्बव्हीश्र्च भूयसीश्र्च याः । दुरो घृतान्यक्षरन् ।।5।।
सुरूक्मे हि सुपेशसाधि श्रिया विराजतः उषासावेह सीदताम् ।।6।।
ये जगत बड तत्व, रज तम अउ सत्व, गुन वाले सूक्ष्म मात्रा सदा बर्तमान हो ।
ओकर ले भूमि तक, जिनिस गुन परख, सिध कर काज पदारथ गुन जान हो ।
जेन सृष्टि बिद्या-सीखा, काज ज्ञान शुभनीका, सोध कर पाये होहै कारण गियान हो ।
उही सूरूज चन्दर, कस परहित बर, रमें रहे परहित सुख संॅवरान हो ।
टीका-हे मनुष्यों इस संसार में जो रजोगुण तमोगुण और सतोगुण वाले सूक्ष्ममात्रा मे सदैव नित्यरूप में सदैव वर्तमान रहते हैं उससे लेकर भूमि तक के पदार्थो के गुणों को परख कर शोध सिद्ध कर समस्त पदार्थो के गुणज्ञात करें । जो इस सृष्टि में विद्या और उत्तम शिक्षा प्राप्त करके सिद्ध कर कार्यज्ञानपूर्वक कारणज्ञान को प्राप्त होते हैं वे ही इस संसार में सूर्य और चन्द्रमा के समान सर्वहितकर होते व सदैव परोपकाररत रहते हुए परहित परसुख सॅंवारकर सज्य काज में संलग्न रहते हैं ।
प्रथमा हि सुवाचसा होतारा दैव्या कवी । यज्ञं नो यक्षतामिमम् ।7।।
भारतीळे सरस्वति या वः सर्वा उपब्रुवे । त नश्र्चोदयत श्रिये ।।8।।
ये जग मा जेन हर, हित करथे जेकर, उपकारै तेन हावै जोग सतकार हो ।
जे सहरउ सुंदर, बने लक्षन जेकर, देखे सूने सीरजम गुन के भंडार हो ।
मयारू शास्त्रबिज्ञान, रमइया कैना जान, हाथ धरके अइसे जेन भरतार हो ।
पतिदेवा उही हर, धरम धन सुघर, सबो पदारथ के करथे बढवार हो ।
टीका-इस जगत में जो जिसके प्रति उपकार करता है उसके प्रति उपकृत व्यक्ति को सदैव सत्कार करना चाहिए, जो अत्यन्त सराहनीय सुदंर उत्तम लक्षणयुक्त और भलीभाॅंति परिचित उत्तम गुण भंडार और शास्त्रविज्ञान आदि में प्रेमपूर्वक रमणी कन्या का पाणिग्रहण कर उसका पति बनता है उसके पतिदेव के धर्म, धन तथा भौतिक संसाधनों और पदार्थ वृद्वि होती है ।
त्वष्टा रूपाणि हि प्रभुः पषून्विश्र्वान्त्समानजे । तेषां नः स्फातिमा यज ।।9।।
जस जगदीश हर, इन्द्रीपार बिचित्तर, अति सूक्ष्म कारन ले रचे संसार हो ।
अजगुत दिनकर, अउर रचे चन्दर, भुॅंइया अवसध दल बिबिध प्रकार हो ।
अउ मनखे के तन, अवयव ला सघन, पदारथ रचना के सक ले अपार हो ।
सृष्टि के गुन सुभाव, करम के क्रम भाव, जानौ व्यवहार सिद्धि रचै करतार हो।
टीका-जैसे जगताधार परमात्मा ने इन्द्रियों से परे अति विचित्र सूक्ष्म कारणों से इस अति विचित्र संसार की रचना की है इस विचित्र संसार में चित्र-विचित्र पदार्थ सूर्य चन्द्रमा पृथ्वी और विविध औषधि समूहो की रचना की है, अतिविचित्र मानव शरीर और उसके भीतर अत्यन्त सघन अवयवों की रचना अपने अपार रचनासामथ्र्य से की है, सृष्टि के गुण कर्म और स्वभाव के क्रमों और उनके स्थितिभाव को जान कर व्यवहार सिद्धि हेतु वैसी रचनाॅंए कर्ताओं को जीवन व्यवहारों को सुगम बनाने वाली सि़द्धि पाना चाहिए।
उप त्मन्या वनस्पते पाथो देवेभ्यः सृज । अग्निर्हव्यानि सिष्वदत् ।।10।।
पुरोगा अग्निर्देवानां गायत्रेण समज्यते । स्वाहाकृतीषु रोचते ।।11।।
जे राखे बर अरन, अवसध काॅंदी बन, बढवारै तेने करै पर उपकार हो ।
जदि अगन प्रधान, जन दिव्य जिनिसान, जोग कर कहॅंू करैे सिद्धि व्यवहार हो ।
तौ एैश्वर्य सुख पाय, माननीय कहवाय, अइसन समझय सबो नर-नार हो ।
अगन दृष्टांत धर, राजा गुरू नारी-नर, उपदेसू जनगुन करे उजियार हो ।
टीका-जो वनों की रक्षा करने के लिए औषधियों और घाॅंस-फूॅंस आदि को बढाते हैं वे परम उपकारी होते है ।ं यदि मनुष्य अग्नि प्रधान दिव्य पदार्थो के उपयोग हंेतु व्यवहारसिद्धि करने संयोग करता है तो एैश्वर्ययुक्त होकर सम्माननीय होता हैं एैसा सभी नर-नारियों को समझना चाहिए, अग्नि के दृष्टान्त को धारण करके इस सूक्त में राज गुरू और उपदेशक नर-नारियों के गुणों को प्रकाशित किया गया है ।
अंजोरनाम -आगी के उठेंवा ले राजा गुरू उपदेशक नर नारी के गुन बखान ।
सूक्त एक सव अठ्यासी पूरगे ।
सूक्त एक सव नवासी
अगस्त्य ऋषि । अग्नि देवता । 1/4/8 निचृत् त्रिष्टुप छंद । धैवत स्वर । 2 भूरिक् पंक्ति छंद । 3/5/6 स्वराट् पंक्ति छंद । 7 पंक्ति छंद । पंचम स्वर ।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्र्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्य1स्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ।।1।।
बाट धरेै मनुसान, धर्म अउ बिगियान, अधरम तजे जगदीश ला मनाय हो ।
चले सुमारग भले, अधरम घुॅंच चले, दुख अधरम बाट मिलगेच जाय हो ।
जस गुनी नर हर, मया करै ईश बर, तस सीरजम मया सबोच सधाय हो ।
अगस्त्य ऋषि मंतर, दया मर सबो बर, मनखे के चले बाट रेंगन बताय हो ।
टीका-मनुष्य को धर्म और विज्ञानमार्ग प्राप्ति हेतु अधर्ममार्ग त्याग करने परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए, सुंदर वेदोक्तमार्ग में चलते हुए अधर्ममार्ग से हटकर चलें क्योंकि अधर्ममार्ग में अनेकानेक दुख है एैसा जानकर अधर्ममार्ग से विलग विचरण करे और जैसे विद्वान परमात्मा से प्रेमानुरागभाव से संबंधित रहते हैं वैसे ही उत्तम कोटि के परमात्मानुराग के लिए सबको इच्छा करनी चाहिए, अगस्त्य ऋषि ने इस मंत्र में सबके प्रति दया और करूणा भाव रखते हुए मनुष्यों के परमहित हेतु तुरीयावस्था में लब्धसिद्धज्ञान को मनुष्यों के चलने के लिए मार्गदर्शिका निर्मित करने हेतु यह सूक्ज रचना की है ।
अग्ने त्वं पारया नव्यो उस्मान्त्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्र्वा ।
पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शं योः ।।2।।
अग्ने त्वमस्मद्युयोध्यमीवा अनग्नित्रा अभ्यमन्त कृष्टीः ।
पुनरस्मभ्यं सुविताय देव क्षां विष्वेभिरमृतेभिर्यजत्र ।।3।।
प्रभु पुनमय लोग, दुष्ट ले अलग सोग, करके भूमि असन राखथे पोसन हो।
तस गुनी जन हर, नीक सीखा दे सुघर, बिलग रखय सुकरमी सबो जन हो ।
जस ईश वेद कर, अबिदिया रोग हर, मनुख ला अलग करे हे बिद्यमान हो ।
तस बने बइद मन, रोग निबराय जन, अमर औसध दे एैश्वर्य पनकान हो ।
टीका-जैसे परमात्मा पुण्यात्मा को दुष्टों विलग करके कृपापूर्वक अपने संरक्षण में रखते हैं जैसे धरती समस्त जीवों का पालन-पोषण करती है वैसे ही पुण्यात्माओं का पालन-पोषण करते हैं, वैसे ही विद्वानों को उत्तम शिक्षाओं से सुशिक्षित हो उत्तमकर्मी सन्मार्गी को दुष्टजनों से विलग रखें । जैसे परमात्मा ने वेदरचना करके अविद्या रोगहरण किया है और विद्वान करके मनुष्यों को अविद्या से विलग विद्यमान रखा है वैसे ही वैद्य को मनुष्यों के रोगनिवारण कर अमृततुल्य औषधि सेवन से स्वस्थ रखकर एैश्वर्यवर्धन करना चाहिए ।
पाहि नो अग्ने पायुभिरजस्त्रैरूते प्रिये सदन आ शुशुक्कान् । मा ते भयं जरितारं यविष्ठ नूनं विदन्मापरं सहस्वः ।।4।।
मा नो अग्नेऽव सृजो अघायाविष्यवे रिपवे दुच्छुनायै । मा दत्वते दशते मादते नो मा रीषते सहसावन्परा दाः ।।5।।
उही सहरउ जन, जेन राखै प्रानी प्रन, निरंतर सबो जीव बनै रखवार हो ।
अउ कहॅंू बर भय, निरबलता वलय, कभू नहीं कभू नहीं करै उजियार हो ।
उपदेसू गुरूबर, राउर ले जन हर, करय केलौली दुष्ट संगत उबार हो ।
दुष्ट ले न होय भेंट, धर्मबाटी अउ श्रेष्ठ, मनखे ले सतसंग कराहू हमार हो ।
टीका-केवल वही सराहनीय है जो सभी जीवों की सतत् रक्षा करते तथा किसी के प्रति भय और निर्बलता प्रकाशन नहीं करते किसी को असहाय समझकर उसको भयभीत नहीं करते न ही निःशक्त जनों पर स्वयं का वर्चस्व आरोपित कर प्रकाशित नहीं करते है । उपदेशक गुरू और राजा से मनुष्य पार्थना करे कि उनका दुष्टों संगति से उद्धार करें और दुष्ट कभी सम्मुख नहीं हो तथा धार्मिक और श्रेष्ठीजनों का सदैव सतसंग और सानिध्य हमसे अवश्य करातें रहें ।
वि घ त्वावाॅं ऋतजात यंसद्गृणानो अग्ने तन्वे3 वरूथम् । विष्वाद्रिरिक्षोरूत वा निनित्सोरभिह्नतामसि हि देव विष्पट् ।।6।।
त्वं ताॅं अग्न उभयान्वि विद्वान् वेषि प्रपित्वे मनुषो यजत्र । अभिपित्वे मनेव शास्यो भूर्मर्मृजेन्य उशिग्भिनाक्रः ।।7।।
जेन गुन दोस जानू, जन वह सत्यवानू, सबो हिंसक चेरिहा कुटिल ले अलग हो।
ओकरे हो कलियान, जेन जन बिदवान, जतका हो क्रूर हिंसक सबल जग हो ।
उनला अपन बल, चारो कोती मींज चल, बल हर कस टोर करौ सबो मग हो ।
सतकामना सधाय, जन मन हरसाय, सीखा दानी आरूग हो रहै जगमग हो ।
टीका-जो गुण और दोष आदि के भलीभाॅंति जाननहारा सत्याचारी हो वे सभी हिंसक निंदक और कुटिल कोटि के मनुष्यों से सदैव अलग-थलग रहते तथा उनका सदैव कल्याण होता हे । विद्वानो जितने भी इस संसार में कूर हिंसक बलशाली हो उन्हें अपने बलाघात से चारो ओर से नष्ट कर सभी मार्गो में उनका अंहकार और शक्तिनाश करों और साथ ही जो सत्य के इच्छुक हों उनको हर्षित करते वे शिक्षा देकर स्वयं शुद्ध होकर दैदीप्यमान होते हैं ।
अवोचाम निवचनान्यस्मिन्मानस्य सूनुः सहसाने अग्नौ । वयं सहस्त्राषिभिः सनेम विद्यद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ।।8।।
जस आप्त शंात मन, उपदेसिया सुजन, सुनइया बर सत पदारथ ज्ञान हो ।
देवै बने सुखकर, गुनिया के संगधर, तस उपदेश दे सुनल ला बिरान हो ।
बिदिया ला पनकाय, अउ सबो सुख पाय, वेदवचन बाॅंध के रखिहौ गठान हो ।
परमेश बिदवान, सीखा व देवइया ज्ञान, गुन के बखान हावै सूक्त भर जान हो ।
टीका-जिस प्रकार आप्त ज्ञानी शंातचित्त वाले उपदेशक सज्जन श्रोताओं हेतु सत्यपदार्थ अर्थात परमात्मा का सुखकारी ज्ञान देते हैं विद्वान संगति कर और शिक्षा को शिरोधार्य कर जो इन उपदेशों पाते हैं वैसे ही सुने हुए आप्त वचनों और ज्ञानवाणी को दूसरों को बताकर विद्यावर्धन कर समस्त सुखों को प्राप्त करने के लिए वेदवचन को गाॅंठबाॅंधकर रखना चाहिए, परमात्मा विद्वान तथा शिक्षाप्रदायकों के ज्ञान-गुण का इस पूरे सूक्त में वर्णन किया गया है एैसा जानना चाहिए ।
अंजोरनाम
सूक्त एक सव नवासी पूरगे ।
सूक्त एक सौ नब्बे ।
अगस्त्य ऋषि । बृहस्पिति देवता । 1-3 निचृत् त्रिष्टुप् छंद । 4/8 त्रिष्टुप छंद । 5-7 स्वराट पंक्ति छंद । धैवत स्वर ।
अनवार्णं वृषभं मन्द्रजिव्हं बृहस्पितिं वर्द्धया नव्यमर्कैः । गाथान्यः सुरूचो यस्य देवा आषृण्वन्ति नवमानस्य मत्र्ताः ।।1।।
सहरउ जेन नर, धर्मी गुनि बिज्ञबर, पहुना सन्यासी गुन सुन भर पाय हो ।
दूर हो तभो बलाय, अन दे मया लगाय, धन बस्त्र पदारथ देवै पर पाॅय हो ।
बने सतकार कर, व ओकर संग धर, बिद्या बढवारै देह अंतस बढाय हो ।
नियवहा सबो झन, संजोगय सुख सन, तन अंतस उॅंचहा करे सुख आय हो ।
टीका-गृहस्थ मनुष्यों को जो सराहनीय धार्मिक विद्वान अतिथि और सन्यासी आदि अभ्यागतों आदि सज्जनों की दूर से भी यदि प्रशंसा सुने हों तो उन्हें प्रेमपूर्वक बुलाकर अन्न-धन-वस्त्र और पदार्थ आदि सम्मानपूर्वक देकर प्रणाम करना चाहिए और उनका यथोचित सत्कार करने के पश्चात् उन प्राज्ञपुरूषों की संगति करके सत्य विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करके अपने आत्मा और देह का उत्थान करना चाहिए और न्यायपूर्वक सबको उनके साथ सुखद संयोग कराके देहात्मा को उच्चता की ओर ले जाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि विज्ञजनों के आप्तवचनों को अंगीकार करने से सुख विकास होता है ।
तमृत्विया उप वाचः सचन्ते सर्गो न यो देवयतामसर्जि । बृहस्पतिः स हञ्जो वरांसि विभ्वा भवत्समृते मातरिश्र्वा ।।2।।
जस जल तरी जाय, गढहरा मा समाय, तस जेला बिद्या सीखा पाये के लगन हो।
वो हर तज गुमान, नीहरे सीखय ज्ञान, बिद्याशय उचित कहइया सुजन हो ।
जस ईश सबो कोती, बिबिध बरन होती, जथाजोग जगत सिरजे हे अपन हो ।
तस सेवा गुनिजन, करे जंे मनुख मन, बने काज उॅंकर सिद्ध नाना बरन हो ।
टीका-जिस प्रकार जल नीचे की ओर प्रवाहित होता है और गहरे स्थान पर जाकर शांत हो जात है और वैसे ही जिसे विद्या सीखने की लगन हो उन्हे अपने अहंकार का सर्वथा त्याग करके विनम्रतापूर्वक शांतचित्त से ज्ञानग्रहण करना चाहिए और विद्या में निहित आशय को उचित प्रकार से समझकर उस प्राप्त ज्ञान की उचित व्याख्याता सज्जन बनना चाहिए । जिस प्रकार ईश्वर सर्वत्र व्याप्त हैं और विविध प्रकार के जगतिक अस्तित्व का यथायोग्य सृजन आप स्वयं प्रकट कियें हैं उसी प्रकार विद्वान सेवक मनुष्य के नाना कार्य भली प्रकार सिद्ध होते हैं।
उपस्तुतिं नमस उद्यतिञ्च ष्लोकं यंसत्सवितेव प्र बाहू । अस्य क्रत्वाहन्यो3 यो अस्ति मृगो न भीमो अरक्षसस्तुविष्मान् ।।3।।
अस्य श्लोको दिवीयते पृथिव्यामत्यो न यसंद्यक्षभृद्विचेताः । मृगाणां न हेतयो यन्ति चेमा बृहस्पितेरहिमायाॅं अभि द्यून् ।।4।।
हे नर नारी जेहर, चक जस दिनकर, बिद्या कीर्ति उद्यम अउर प्रज्ञाबल हो ।
वो सतबोलिया लोग, सदा सत्कारे जोग, जेकर गुन करम होवै निरमल हो ।
दिव्य बिद्या प्रज्ञाशील, गुनिया सेवा सुशील, करै वो मेघ डंगडमाल दिन पल हो ।
रहिथे बरतमान, अडहा जे मनुसान, सुरूज असन हरै बिद्या सबो मल हो ।
टीका- हे नर-नारियों जो सूर्य के समान दैदीप्यमान विद्या कीर्ति उद्यम और प्रज्ञाबल से परिपूर्ण है ऐसे विद्वानों की जो सेवा करते हैं वे सत्यवादी सदैव सत्कार योग्य है । जिनके गुण और कर्म निर्मल हैं जो दिव्यविद्यायुक्त प्रज्ञाशील विद्वानों सेवक सुशील हैं वे मेघमंडल के डंगडमाल दिन के पलो और क्षणों की भाॅंति वर्तमान रहते हैं और जो अविद्वान व्यक्ति भी हों तो सूर्य जिस प्रकार समस्त जड-चेतन को प्रकाशित करता है उसी प्रकार उन अविद्यायुक्त व्यक्तियों को भी ज्ञानप्रकाश से विद्यमान मलमार्जन करके उनके अन्तःकरण को ज्ञानप्रकाश से प्रकाशित और पवित्र कर सकते हैं ।
ये त्वा देवोस्त्रिकं मन्यमानाः पापा भद्रमुपजीवन्ति पज्राः । न द्दृढये3 अनु ददासि वामं बृहस्पते चयस इत्पियारूम् ।।5।।
जेन बिज्ञजन मन, लकठा के मुरखन, गरबी पापी जन ला देथे उपदेश हो ।
अउर बना धरमी, सतपथ के करमी, ओकर तो कलियान होवय बिसेस हो ।
करके बिज्ञानवान, करै जन कलियान, उही सतकार पावै जावै जेन देश हो।
गावत शोभामोहन, अगस्त्य ऋषि बचन, दयानंद अरथाय तेने ला अॅंटेस हो ।
टीका-जो विद्वान अपने निकटतम मुर्ख-मुर्खाणी, अहंकारी और पापियों को उपदेश देकर धर्ममार्गगामी बनाते और सत्यपथ कर्मी बनाते हैं उन विद्वानों का विशेष रूप से सदैव कल्याण होता है, जो मूर्खो को विज्ञानवान करे और अज्ञानता अंधकार में दीन-दशा में स्थित का उत्थान कल्याण करते वे जिस स्थान जिस देश विशेष में जाते हैं उनका विशेष रूप से सभी सत्कार करते हैं शोभामोहन अगस्त्य ऋषि का सूक्त जिसे महर्षि दयानंद सरस्वती ने सरलीकृत किया उसी को पुनः स्मरण कर करके गा रही है ।
सुप्रैतुः सूयवसो न पन्था दुर्नियन्तुः परिप्रीतो न मित्रः । अनर्वार्णो अभि ये चक्षते नोऽपीवृता रपोर्णुवन्तो अस्थुः ।।6।।
जेन मनखे साधन, धर के उपसाधन, उत्तम बाट हो अबिदिया अंधियार हो ।
बिद्या अउ धरम दे, इन्द्री जीते करम दे, भोगहा ला चोला जीते करय तियार हो ।
चेला जन मीत बन, देवै सीखा ज्ञानधन, नीक सीख देके भरै ज्ञान उजियार हो ।
ए जगत उही मन, उपदेसू गुरूजन, कहवाय अपन करम के अधार हो ।
टीका-जो मनुष्य साधन-उपसाधनयुक्त उत्तममार्ग पर चलते हुए आविद्या अंधकार में स्थित को विद्या धर्म धारण कराये और भोगासक्त को इन्द्रीयविजेता बनने हेतु सज्य कर मित्रवत् बनकर शिष्यों को ज्ञानरूपी धन संपदा सम्पन्न करके उत्तम शिक्षा और ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करते हैं इस संसार में वे अपने कर्मो के आधार पर उपदेशक और गुरू कहलाने योग्य है ।
सं यं स्तुभोऽवनयो न यन्ति समुद्रं न स्त्रवतो रोधचक्राः । स विद्वाॅं उभयञ्चष्टे अन्र्तर्बृहस्पतिस्तर आपश्र्च गृध्रः ।।7।।
एवा महस्तुविजातस्तुविष्मान् बृहस्पतिर्वृषभो धायि देवः । स नः स्तुतो वीरद्धातु गोमद्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ।।8।।
भुॅंइया अधार जस, भाॅंवर देवै सरूज, अउ जस नदिया समुन्द मे समाय हो।
तस सतजन मन, सीरजम गुनियन, सबो बिद्या देके नीक धरम धराय हो ।
भीतर बाहिर सुद्ध, करै बने हीरासुद्ध, गुनिया बने बिचार शास्त्र सार पाय हो ।
चेला शास्त्र सम्पन्न, देह व अंतस जन, बल बढवार करा बिज्ञानी बनाय हो ं।
टीका-जैसे सबका आधार धरती सूर्य का परिभ्रमण करती है व जैसे नदिया समुद्र में जाकर समा जाती है वेैसे ही सज्जनो को श्रेष्ठ विद्वान समस्त विद्याओ देकर धर्म धारण कराते और मनुष्य के बाह्य और आंतरिक व्यवहारों का पवित्रीकरण कर आत्मा और देह के समस्त विकारों को दूर करके पूर्ण रूपेण शुद्धिकरण करते हैं। विद्वानों को चाहिए कि वे शास्त्रों का बारम्बार अध्ययन करके उसमें से सार-सार तत्व जो प्राप्त हों उस लब्धशास्त्रज्ञान से शिष्यों को सम्पन्न करें और उनके देहात्मबल को बढाकर उन्हें विज्ञानी बनायें ।
अॅंजोरनाम -गुनिया गुन करम सुभाव के बखान ।
सूक्त एक सौ नब्बे पूरगे ।
सूक्त एक सव इनक्यानबे ।
अगस्त्य ऋषि । अबोषधिसूर्य देवता । 1 उष्णिक् । 2भुरिगुष्णिक् । 3/7 स्वराडुष्णिक् । 13 विराडुष्णिक् छंद । ऋषभ स्वर ।4/9/14/ विराड्नुष्टुप् । 5/8/15 निचृदनुष्टुप् । 6 अनुष्टुप् । 10/11 निचृत् ब्राह्मयनुष्टुप् । 12 विराड्ब्राह्मयनुष्टुप् । 16 भुरिगनुष्टुप् छंद । गांधार स्वर ।।
अड.्क्तो न कङ्क्तोऽथो सतीनकङ्कतः । द्वाविति प्लुषी इति न्य1दृष्टा अलिप्सत ।।1।।
अदृष्टान्हन्त्यायत्यथो हन्ति परायती । अथो अबघ्नती हन्त्यथो पिनष्टि पिंषती ।।2।।
जइसे चंचल जन, उपदेशू गुरूजन, उपदेश पाके तुलमुली नइ जाय हो ।
तस अति नान-नान, बिखहर क्षुद्रप्रान, डांश मत्कुण निबारे ले अउ आय हो ।
जेन आय व न आय, बिखहर निबराय, अगपछ अवसध देकर भगाय हो ।
उही नर बिखहर, बिख ले बचै सुघर, अउ बिख चढे पाछू पीरा नही पाय हो ।
टीका-जिस प्रकार चंचल प्रकृति के मनुष्य उपदेशकों और गुरूजनों से उपदेश पाने के उपरान्त भी अपनी चंचलता त्याग नहीं कर पाते हैं उसी प्रकार अतिसूक्ष्म आकार के विषैले सूक्ष्म जीव जन्तु डांश और मत्कुण आदि बारम्बार निवारण करने पर भी बार-बार गिरते और उत्पन्न होते है । जो आये हुए और नहीं आये हुए विषधर जीवों से बचने के लिए पहले और बाद में औषधियों का सेवन करते हैं वे उन विषधारियों के विषनिवृत्त करने मंें सक्षम होते हैं केवल एैसे औषधियों के विषय में जानकार और सेवनहारा ही विषैले जीवों के विष से सुंदर रीति से औषधि सेवन के माध्यम से बच पाते हैं व बिष प्रभाव छोडने के पश्चात् पीडा आदि से पीडित नहीं होते हैं ।
शरासः कुशरासो दर्भासः सैर्या उत । मञ्जा अदृष्टा वैरिणाः सर्वे साकं न्यलिप्सत् ।।3।।
नि गावो गोष्ठे असदन्नि मृगासो अविक्षत । नि केतवो जनानां न्य1दृष्टा अलिप्सत ।।4।।
तिरिन नाना बरन, ठाॅंव लोभ छिपटन, तिरिन सुगंध बर जीव नान-नान हो ।
रहै तॅंह बिखहर, जीव हर छिपकर, अवसर पाके पीरा देवै प्रानी प्रान हो ।
जइसे नाना बरन, जीव निजसुख तन, सुखद संजोग करे करै प्रस्थान हो ।
तस बिखहर हर, सर्वत्र बगर कर, ठउर समाये नीगैं जाके इसथान हो ।
टीका-जैसे नाना प्रकार के तृणों के स्थान और घाॅंस-पात के सुगंध लेने हेतु छोटे-छोटे विषैले सूक्ष्मजीव जाकर चिपक जाते हैं और वहाॅं वे विषधारी जीव पर्णो में छिपकर निवास करते तथा अवसर मिलते ही मनुष्यों व अन्य प्राणियों के प्राणों पर अपना विष छोडकर पीडा पहुॅंचाते हैं । जैसे नाना प्रकार के जीव जन्तु अपने-अपने दैहिक सुखसंयोग हेतु किसी स्थान में प्रस्थान कर प्रवेश करते हैं वैसे ही विषधारी जीव सर्वत्र फैलकर जहाॅं-तहाॅं प्रवेश योग्य स्थानों में प्रवेश करते हैं ।
एत उ त्ये प्रत्यदृश्रन्प्रदोषं तस्कराइव । अदृष्टा विश्वदृष्टाः प्रतिबुद्धा अभूतन ।।5।।
द्यार्वः पिता पृथिवी माता सोमो भ्रातादितिः स्वसा । अदृष्टा विश्वदृष्टा स्तिष्ठतेलयता सु कम् ।।6।।
ये अंस्या ये अङ्गîाः सूचिका ये प्रङ्कताः । अदृष्टाः किं चनेह वः सर्वे साकं नि जस्यत ।।7।।
चोर डाकू होवै जिन्ह, चिन्हार व अनचिन्ह, तस नाना बरन नामी अउ लुकाय हो ।
जीवे होथे बिखहर, जाने वोला नारी-नर, जिनगी के बाट अलहन टरकाय हो ।
जेन जीव बिखहर, ते बिख मिटाय बर, शंाति के उपाय अवसध निबराय हो ।
उत्तम जतन कर, देहात्म दुख उबर, बिख दुरिहाके पुरूसारथ बढाय हो ।
टीका-जैसे कुछ चोर उचक्के लुटेरे-डाकू-बटपार आदि परिचित होते हैं और कुछ के विषय में ज्ञात नहीं होता है कि अमुक चोर बटपार है अर्थात कुछ से परिचित होते हैं किंतु कुछ से परिचित नहीं होते हैं वैसे ही कुछ विषधारी प्रसिद्ध होते हैं और कुछ अप्रसिद्ध होते हैं जिसके विषय में जानकारी नहीं होती हैं उन सभी विषधारी जीवों को सबको जानना चाहिए ताकि जीवन में आने वाले विषम स्थितियों को दूर किया जा सके । जो जीव विषधारी होते हैं उनके विषशमन के उपायों और औषधियों से विषनिवारण करना चाहिए । उत्तम यत्न करके मनुष्य को अपने देह व आत्मा के दुख निवारण हेतु विषशमन करना चाहिए ताकि पुरूषार्थ को बढाया जा सके ।
उत्पुरस्तात्सूर्यं एति विष्वदृष्टो अदृष्टहा । अदृष्टान्त्सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यः ।।8।।
उदपप्तदसौ सूर्यः पुरू विष्वानि जूर्वन् । आदित्यः पर्वतेभ्यो विष्वदृष्टो अदृष्टहा ।।9।।
जस दिनकर हर, अंधक निबार कर, रगरग ले बने अॅंजोरिया बियाय हो ।
तइसे बइद हर, बिखहर बिख हर, अवसध ले बिख समूल निबराय हो ।
जइसे सविता हर, अपन अॅंजोर कर, सबो पदारथ ल परस करि पाय हो ।
तइसे बिख हरन, बइद विष पवन, पदारथ हर जीव सुख मा चलाय हो ।
टीका-जिस प्रकार सूर्य अंधकार निवारण करके दैदीप्यमान प्रकाश उत्पन्न करता है वैसे ही वैद्य विषधारी जीवों के विष का शमन औषधियों से कर समूल विषनिवारण करते हैं । जैसे सविता प्रकाश फैलाकर सभी पदार्थो को स्पर्श कर प्राप्त होता है वैसे ही विष निवारण कर वैद्यजन विषाक्त वायु आदि पदार्थ हरण कर प्राणियों को सुखपूर्वक जीवनयापन कराते हैं ।
सूर्ये विषमा सजामि दृति सुरावतो गृहे ।
सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार ।।10।।
इयत्तिका शकुन्तिका सका जघास ते विषम् ।
सो चिन्नु न मराति नो वयं मारामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार ।।11।।
जेन हावै रोगहर, अॅंजोरिया दिनकर, करके संजोग बइद बिख सके टार हो ।
बडहर बिखनासी, दे बइद सुखरासि, अउ मधुरता सिद्ध करय संभार हो ।
सूरूज कारज हर, बिध्वंस न करै नर, बिखहारी अवरदा करै बढवार हो ।
पंछी जे बिख हरय, तेला मनखे धरय, पोसवा बनावय होवय हितकार हो ।
टीका-जो सूर्य का प्रकाश रोग शमनकारी है उस सूर्य प्रकाश के संयोग से वैद्य विषशमन कर सकते हैं बडे-बडे विषनाशक औषधियों से वैद्यजन विषशमन करके सुखप्रदायक हो मधुरता सिद्धि करके संभालने वाले होते हैं जैसे सूर्य का कार्य विध्वंस नहीं बल्कि कल्याणकारी होता है वैसे ही विषनाशक वैद्य और औषधिसमूह भी सूर्य समान कल्याणकारी होते हैं वे प्राणियों का विषहरण करके वृद्धि व आयुवर्धक होते हैं । जो पक्षी विषशमन में सक्षम होते हैं मनुष्य को उन पक्षियों को पकडकर उनका पालन-पोषण करना चाहिए क्योकि ये पक्षी अत्यन्त हितकारी और विषहारी होते हैं ।
त्रिः सप्त विष्पुलिंगका विषस्य पुष्पमक्षन् ।
ताश्र्चिन्नु मरन्ति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधु त्वा मधुला चकार ।।12।।
नवानां नवतीनां विषस्य रोपुषीणाम् ।
सर्वासामग्रभं नामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार ।।13।।
जस जोख बिख हारी, तइसे हे पंखाधारी, एक्कइस नान्हे बिख खावय चिरइया ।
तेन हरै बिख जान, औसध सेवन ज्ञान, हावै तेन बिख जुरे रोग के नसइया ।
अवरदा पावै बड, निन्यानबे बिखहर, नाम गुन करम सुभाव के जनइया ।
बिख रूॅंधे जान जाव, बिखरोग ला हटाव, अवसध बिखरूधे सेवन करइया।
टीका- जिस प्रकार जोंक विषहारी है उसी प्रकार पंखधारी इक्कीस प्रकार के छोटी-छोटी चिडियों की प्रजाति है वो सभी विषभक्षी होती है ये विषहारी पक्षियों और विषहारी औषधियों के सेवन व ज्ञान हो वह विषसंबंधी रोगनाशक होता है और वे बडे दीर्घजीवी होते हैं । मनुष्यों तुम्हे यह जानना चाहिए कि ये जो निन्यानबे प्रकार के नाम गुण कर्म और स्वभाव वाला विषरोधी औषधि हैं उनका सेवन करके विषरोधक बन कर रोगों को दूर हटाओं ।
त्रि सप्त मयूर्यः सप्त स्वसारो अग्रुवः । तास्ते विषं वि जभ्रिर उदकं कुम्भिनीरिव ।।14।।
कोरी व एक आगर, हावय मयूर हर, वोला मनखे हो कभू झन देहू मार हो ।ं
रख बने सबदिन, अइसन गुन चिन्ह, पाल पोंसके बने करहू बढवार हो ।
जेन नदी जल हर, थीर वो हा रोग घर, वह जल सेवौ झन करव बिचार हो।
किरन हा दिनकर, व छुवै पवन हर, उही जल रोग हरै निर्मल धार हो ।
टीका’- इक्कीस प्रकार के मयूरों को मनुष्य कभी भी नहीं मारे बल्कि सदैव उनके गुणों को ध्यान में रखते हुए और उनकी गुणवत्ता को पहचानते हुए सदैव उनका पालन-पोषण संवर्धन किया करें, जिस नदी का जल स्थिर हो वह रोगों का घर होता है एैसे जल का दोष विचार कर इनका सेवन नहीं करना चाहिए बल्कि सदैव जिस जल को सूर्य किरणे और वायु स्पर्श करती हों एैसे निर्मल धारा प्रवाहमान जलसेवन करें क्योंकि एैसा पवित्रजल के पाने से समस्त रोगनाश होता हैं ।ं
इयत्तकः कुषुम्भकस्तकं भिनद्म्यश्मना । ततो विषं प्र वावृते पराचीरनु संवतः ।।15।।
कुषुम्भकस्तदब्रवीद्गिरेः प्रवत्र्तमानकः । वृष्चिकस्यारसं विषमरसं वृश्र्चिक ते विषम् ।।16 ।।
बिख हरे जेन नर, रतन बउर कर, बिख ले उबारै व रोग बिख बियाय हो ।
ओला बने ढंग मार, भूत परेत अजार, बैरी अउ रोग ले उहीच जीत पाय हो।
बीच्छी अउ नानमुन, जीव बीख हरे सुन, पहाडी नेवरा खोज लानय बचाय हो ।
जइसे मा रोग हरे, बिख रोग ले उबरे, रोग राई टरे समरथ होई जाय हो ।
टीका-जो मनुष्य रत्नों का उपयोग करके विष के प्रभाव को नष्ट करतंे है और विष से उत्पन्न रोगों का उचित निवारण करते है वे भूत प्रेत संबंधी रोगों और बैरीजनों तथा रोगादि को जीतने में समर्थ होते हैं । बीछी आदि छोटे-छोटे जीवों के विषहरण करने वाले पहाडी नेवले का संरक्षण करना चाहिए जिससे रोग हरें और जीव विषजनित रोगों से उबर सके और विष संबंधित रोग निवारण करने में समर्थ हो सके ।
अंजोरनाम -बिख हरइया जीव, बिख हरइया अवसध, अउ बइद के गुन के बखान ।
सूक्त एक सौ बियानबे पूरगे ।
ऋृग्वेद पहिली मंडल पूरगे ।
सतचित आनंद घन भगवान परम पिता परमात्मा के दया के छंईहा में पहिली मंडल जग्य पूरगे ।