कोन गाँव रहे बसे रतिहा तैं सुवना रे।
कोन गाँव करेस बसेर रे।
समुन्द जिहाज बइठे बिगन अधार सुवा।
उड़िया के जाबे कोन देश रे।
तैं का चारा चरथस, कहाँ कहाँ बिचरथस।
बोल तो का हे तोर नाव रे।।
कोन पठोये तोला, सुघर दे रंग चोला।
अजगुत तोर सुभाव रे।।
चटक मटक तोरे आँखी पाँखी सुवना रे।।
लाली गुलाली तोरे ओंठ रे।
कोने नाव जपथस, अउ जग खपथस।
आगी में मगन लहलोट रे।
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
Wednesday, 25 June 2025
हरियर सुगना रकत रंग ठोर रे।
हरियर सुगना रकत रंग ठोर रे।
लेग दे संदेसिया ला मइके में मोर रे।।
मइके के हलीभली खबर सुनाबे सुवा।
ददा भाई मेर मोर अरजी लगाबे सुवा।।
आई जावै देखे बर, बूताकाम छोड़ रे।।
हरियर सुगना रकत रंग ठोर रे।
लेग दे संदेसिया ला मइके में मोर रे।।
मोरे बूता करिबे तोला चारा चराहूँ सुवा।
जुग जुग जीबे खाबे, तोर गुन गाहूँ सुवा।
कभू नइ भूलाहूँ मैं तो गुनजस तोर रे।
हरियर सुवना रकत रंग ठोर रे।
लेग दे संदेसिया ला मइके में मोर रे।।
शोभामोहन
लेग दे संदेसिया ला मइके में मोर रे।।
मइके के हलीभली खबर सुनाबे सुवा।
ददा भाई मेर मोर अरजी लगाबे सुवा।।
आई जावै देखे बर, बूताकाम छोड़ रे।।
हरियर सुगना रकत रंग ठोर रे।
लेग दे संदेसिया ला मइके में मोर रे।।
मोरे बूता करिबे तोला चारा चराहूँ सुवा।
जुग जुग जीबे खाबे, तोर गुन गाहूँ सुवा।
कभू नइ भूलाहूँ मैं तो गुनजस तोर रे।
हरियर सुवना रकत रंग ठोर रे।
लेग दे संदेसिया ला मइके में मोर रे।।
शोभामोहन
मोर बदन कुम्हलात गो छत्तीसगढ़ी बिहावगीत
मोर बदन कुम्हलात गो छत्तीसगढ़ी बिहावगीत
डंगडंग ले मड़वा रचाये मोर राजा ददा।
डंगडंग ले मड़वा छवाये अमुवा के डरिया,
मोर बदन कुम्हलात गो।
कहिबे तौ बेटी शामियाना तनवाई देवौं।
सहि झन सुरुज के कोप ओ।
काबर तैंहर शामियाना तनवइबे तैं ददा मोरे।
कोरा में रख ले ना तोप गो।।
हरदी के रंग मोर अंग ला रंगत अउ,
मउर गड़त मोर माथ गो।
अँचरा देवत दाई छँइहा करन फेर।
अगन बरत तन मोर गो।
रंगबिरंगी करसा साजे हे सुवासिन।
दियना जलाये भर तेल ओ।
माँग भरागे हे रगरग ले मोर तो फुफू मोर सेंदुर सुधार ओ।
रचनाकार- शोभामोहन श्रीवास्तव
Tuesday, 24 June 2025
वैष्णवी के बिहतरा मड़वा शुभ छवावन लागै।
वैष्णवी के बिहतरा मड़वा शुभ छवावन लागै ।
वैष्णवी के बिहतरा मड़वा, शुभ छवावन लागै।
ननपन के सुरता
पिंउरीहरदिहालुगरिया, मनभावन लागै।।
हरियर मड़वा सजावत हे भैया राजा।
कमलपुरी सजत, बजत मंगल बाजा।।
अँगरी ला धरके सुवासिन, मंडप लानन लागै।
वैष्णवी के बिहतरामड़वा, बड़ सुहावन लागै।
फुफूदाई मन नेंगजोग करवाये ।
तेल हरदी चुपर हाँसै गोठियाये।।
नहडोरी नेंग होत अँगना,तिय नहवावन लागै।
वैष्णवी के बिहतरा मड़वा,बड़ सुहावन लागै।
चिकट-हरदाही दाई जल भरै नैना। राजदुलारी बेटी सजे फूलकैना।।
दुवारी बाजत बाजा गड़वा,जीव हरसावन लागै।
वैष्णवी के बिहतरा मड़वा,बड़ सुहावन लागै।
असीद दे बड़ेदाई मंगलगीत गावै ।
अटलसोहागसुख रानी बेटी पावै।
राजलछमी करै मोरे पुतरी, देव मनावन लागै।
वैष्णवी के बिहतरामड़वा,बड़ सुहावन लागै।
वैष्णवी के बिहतरामड़वा, बड़ सुहावत लागै।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
वैष्णवी के बिहतरा मड़वा, शुभ छवावन लागै।
ननपन के सुरता
पिंउरीहरदिहालुगरिया, मनभावन लागै।।
हरियर मड़वा सजावत हे भैया राजा।
कमलपुरी सजत, बजत मंगल बाजा।।
अँगरी ला धरके सुवासिन, मंडप लानन लागै।
वैष्णवी के बिहतरामड़वा, बड़ सुहावन लागै।
फुफूदाई मन नेंगजोग करवाये ।
तेल हरदी चुपर हाँसै गोठियाये।।
नहडोरी नेंग होत अँगना,तिय नहवावन लागै।
वैष्णवी के बिहतरा मड़वा,बड़ सुहावन लागै।
चिकट-हरदाही दाई जल भरै नैना। राजदुलारी बेटी सजे फूलकैना।।
दुवारी बाजत बाजा गड़वा,जीव हरसावन लागै।
वैष्णवी के बिहतरा मड़वा,बड़ सुहावन लागै।
असीद दे बड़ेदाई मंगलगीत गावै ।
अटलसोहागसुख रानी बेटी पावै।
राजलछमी करै मोरे पुतरी, देव मनावन लागै।
वैष्णवी के बिहतरामड़वा,बड़ सुहावन लागै।
वैष्णवी के बिहतरामड़वा, बड़ सुहावत लागै।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
24/06/2024
शुभस्थान-महुदा
मुकुन्द कौशल छत्तीसगढ़ी साहित्य शिल्पी
जन्म - 7 नवंबर 1947 दुर्ग (छ.ग.)
पिता - सोनी जेठालाल धोलकिया(गुजरात मूल)
माता- उजम बेन
छत्तीसगढ़ी कृतियाँ
हमर भुइयाँ हमर अगास, (छत्तीसगढ़ी)
भिनसार, सन् 1998
मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा- सन् 2012
घाम हमर सँगवारी सन 2017
बिन पनही के पाँव सन 2018
मया के मुंदरी,
केवरस, (छत्तीसगढ़ी उपन्यास)
हिन्दी कृतियाँ
सिर पर धूप-आंख में सपने
लालटेन जलने दो
शब्दक्रान्ति,
गीतों का चन्दनवन,
देश हमारा भारत,
चिराग गजलों के,
जमीं कपड़े बदलना चाहती है,
मुकुंद जी की 18 कृतियाँ प्रकाशित हैं। जिनमें चार छत्तीसगढ़ी गीत संग्रह, पाँच हिन्दी गीत संग्रह, छः छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल संग्रह, एक हिन्दी गजल संग्रह,एक गुजराती ग़ज़ल संग्रह एवं एक छत्तीसगढ़ी उपन्यास सम्मिलित हैं।
*********
मुकुन्द कौशल जी की रचनाओं को बी.ए.,एम.ए. एवं नवमी कक्षा के पाठ्यक्रमों में राज्य सरकार द्वारा सम्मिलित किया गया हैं।
**********
पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण में वे बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाये और राज्य निर्माण के बाद अपने साहित्य साधना में व्यस्त हो गये । मान सम्मान पद प्रतिष्ठा के लिए मुकुन्द कौशल जी ने कभी भी अपने नैतिक मूल्यों आदर्शों और स्वनिर्मित सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया सही अर्थों में वे सच्चे साहित्य साधक थे।
सम्मान
सृजन श्री अलंकरण, समाज़ गौरव सम्मान, साक्षरता सम्मान, अहिन्दी भाषी हिंदी सम्मान, लोककला सम्मान, मुश्फिक पुरस्कार, मुकीम भारती पुरस्कार, साहित्य गौरव, भारत गौरव, डॉ. नरेंद्र देव वर्मा सम्मान, अंबिका प्रसाद दिव्य अलंकरण, भुइयां सम्मान,परिधि सम्मान, कथाकार सम्मान सहित और लगभग 30 से भी अधिक सम्मान, अलंकरण एवं पुरस्कार प्राप्त हुए।
मुकुन्द कौशल जी की सारस्वत साधना की कुछ झलकियाँ उनके साहित्यिक वैभव को जानने के लिए पर्याप्त हैं।
**********
मोर भाखा संग दया मया के सुघ्घर हवय मिलाप रे
अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा कउनो संग झन नाप रे'.
*********
पथरा में पीरा झन बोंबे
ओमा पानी को रुकोही।।
********
बिहनाकुन सूरुज ह दिन के निसेनी ले
ले - ले के थेभा उतरथे
संझा के पिंवरी अँजोर ओगरि जाथे
चंदा के अमरित बरसथे
चंदैनी खवाथे दूधभात रे ।
का बताव संगी तोला गँवई के बात रे ॥
************
आंसू झन टपकावे, सुरता के अंचरा मा
तुलसी के चौंरा मा, एक दिया घर देबे।
मोर लहूट आवत ले, सगुना संग गा लेबे
रहिबे झन लांघन तै, नून भात खा लेबे।
बांधि बांधि रखिवे झन, आंखी के पूरा ला
आंसू के नंदिया मा, एक दिया धर देबे
गांव हंसे देख देख, अइसन तै रोवबे मन
कुधरी के भांठा मा, आंसू ला बोबे झन
झन पोसे रहिबे तै, सपना के पीरा ला
निंदिया के डेहरी मा, एक दिया धर देवे।
************
गाँव शहर मा किंजर किंजर के,
हाँका पारौ तब बनही
ठलहा बइठे मनखे मन ला,
काम तियारौ तब बनही
**********
तोर सुरता मने मन म साने रहेंव मै मनौती घलो तोर माने रहेंव
साध संवरे लगिस मन ह मउरे लगिस काल ह आज आंखी म तंउरे लगिस ।।
***********
सुवा ददरिया, राउत नाचा, करमा अउ पंडवानी।
गेंड़ी-डंडा, खड़ा चंदैनी नाचा आनी बानी ॥
********'
भीतर भीतर पझरै पीरा
आंखी सुक्खा नदिया हे।
*********
धरे कलारी कातिक रेंगिस,
धान ओसावत आगे अगहन ।
********
सूपा धरे बिहनिया आके,
किरनन ला छरियावत हे।
*********
तैं हिरदय के दीया बार,
मन हो जाही जगर मगर
कईसे बिसरै वो दिन बादर,
सुरता आथे रहि रहि के
*******
मन के डोली मा तोरे बर,
जागे हावै मया दया
**********
सूवा रे झन कहिबे पीरा,
कठुवा जाही उन्कर तन-मन
********
अल्लर परगे मन के बिरवा, हांसी तक अइलावत हे।
********
राहेर कस लचकत कनिहा, रेंगत हावस हिरनी कस,
देंह भला अइसन अलकरहा, लचक कहां ले पाये हे।।
*********
जब ले तैं हर मूड़ मींज के,
हांसत कूदत निकरे हस,
तबले बदरी खोपा छोरे,
केस अपन छरियाए हवै।।
*********
बने पलो के जे नेता मन, खेती करहीं वोट के, ललहुं पिंवरा नोट जागही उन्कर खेती खार मा ।।
******
ये कइसन सरकार हवै, का अइसन ला सरकार कथें
*****
हमरे बिजली बेच के हमला राखत हे अंधियार मा।।
******
साहेब बाबू, नेता जुरमिल, नाली पुलिया तक खा डारिन,
*******
गरूवा मन बर काहीं नइये, मनखे सब्बो चारा चरगे।।
******
बड़का नेता मन कहिथें, हम अंजोर घर-घर पहुँचाबों
*****
काए करन कुरसी मा बइठे, बाबू, साहेब मानत नइयें ।।
*******
साहब ला देंवता चघथे, त हूम दिये बिन नई उतरै,
हूम घलो के मांहगी चाही, पातर-पनियर चलै नहीं
*******
एक्कड़ डिसमिल के मतलब ला, बसुंधरा मन का समझै,
का जाने डेरा वाला मन, का रकबा खसरा होथे ।।
*********
गीता जैसा पावन ग्रन्थ उठाकर बोले
मगर हमेशा झूठी कसमें खाकर बोले
हमने अपनी बात तहत में कह दी लेकिन
जिसमें ज्यादा कौशल था सब गाकर बोले
*******
चारों मुड़ा ले खुद ला तैं रूंधे हावस,
तहीं बता अब कोन डहर ले मैं हर आवौं।।
******
मैं दंग - दंग ले बरहूं जे दिन,
ओ दिन तैं पतियाबे मोला ।।
********
तुम जिन्कर किरपा ले संगी,
सफल भये हौ जिनगी मा,
वो मन के सन्मान करौ,
अउ उंकर पांव पखारौ जी
**********
झन खेदौ येती ओती,
कोनो ला बिचकावौ झन,
चाहत का हौ, भटके गड्या,
कभू अपन घर जावै झन ?
***********
हम्मन भइगे पुरखा मन के,
जस ला चगलत बइठे हन,
हम सब जिन के जीभे चलथे,
जांगर उंगर चलै नहीं
********
डबकत आंसू ले कब्भू तो तैंहर, हाथ अंचो के देख, दुनिया खातिर होम करत तैं, अपनों हाथ जरो के देख।।
**********
बर पीपर अउ करगा कांदी, मानै चाहे झन मानै, दुरिहा दुरिहा तक बगरे हे मोर महक मैं जानत हौं ।।
****
आज नही ते काली करबे ।
तैं ये घर ला खाली करबे ।।
*****
ठुमुक ले चंदा सरग ले उतरिस चटक चँदैनी । नीचे ले ऊप्पर तक जइसे लागे हवय निसेनी॥
अगर बगरगे झिलमिल झिलमिल चकमक
बनिस अगास ।
अमरित कस बरसै अँजोर अउ, मन बरसिस
बिसवास ॥
***********
गजब सहे हन आज ले संगी,
अउ आगू नइ सहे सकन ।
*********
छत्तीसगढ़ बर जीबो भइया,
छत्तीसगढ़ बर मरबो हम।
**********
ये कइसन करलाई होगे
घाट म अड़बड काई होगे
काठा-पइली-सेर नंदा गै
नोहर आना -पाई होगे
*******
बाबू-नोनी लिखौ-पढ़ौ साक्षर हो जाव ।
पढ़-लिख के अपन-अपन मुड़ी ला ठठाव ॥
पढ़े - लिखे बने करे , माथा ला ठोंक ।
दू सौ मा दस्खत कर , दू कोरी झोंक ॥
*******
अतका बात घलो नइ समझस
कइसन गाड़ीवान हवस
उँकरे बइला सोज रेंगथे
जेकर हाथ तुतारी हे
*********
जे बनिहारिन बर बिहाव मा
बत्ती धर के चलत रथे
ओकर करिया जिनगानी मा
दीया बारौ तब बनही
********
'गज़ब पछीना गार गज़ल के खेत पलोए हे कौसल'
******
जे आरूग अंटियावै तेला, अंटियावन दे छोड़ बुजा ला।
बिन मतलब मेछरावै तेला, मेछरावन दे छोड़ बुजा ला।।
जागौ जागौ कहिके मैहर,काकर काकर करौं
पैलगी,
सुते राहा तनिया के मोला खिसियावन दे छोड़ बुजा ला।।
कहे सुने के मजा तभे हे जब सकेल के कहिबे कौशल,
बिन मतलब फरियावै तेला फरियावन दे छोड़ बुजा ला।।
*******
एक घांव उन तुहर पाँव ला परिन तहां ले जै भगवान
उचकउचक के पांच बछर ले छरिन तहां ले जै
भगवान।।
काए फिकर हे, का चिन्ता हे, जनता भलुन पियास मरै,
सबले आगू अपन बगौना, भरिन तहां ले जै भगवान
कांदी हर तो एक्के हावय, खूंटा सबके अलग अलग
एक छोड़ के दूसर खूंटा, धरिन तहां ले जै भगवान।।
छत्तीसगढ़ महतारी के प्रति अगाध प्रेमपूर्ण होकर उनका स्तवन करते हुए कहते हैं कि-
हाथ म अँइठी पाँव म पैरी , कनिहा म चरलड़िया करधन ॥
गरा म पहिरे सुर्रा पुतरी, सूतामाला पाँव म पैजन ॥
हाथ के अंगरी मन मा मुँदरी , बिछिया पाँव के
अँगरी मन मा ।
छत्तीस रंग के सुग्घर लुगरा , फबै जेकर कंचन कस तन मा ॥
महतारी के लुगरा के अँचरा सबझन ला खूब सुहावय ।
मोर छत्तीसगढ़ के धजा हवा मां , लहरे लहर
लहरावय ॥
अपन समे मा कतको रचना,
अच्छा लिखिन लिखइया मन,
कौशल असन घलो ए जुग मा
गीत अउ गज़ल लिखइया हे।।
प्रस्तुत झलकियाँ मुकुंद कौशल जी के गहन छत्तीसगढ़ी काव्य साधना, समर्पण और सेवाभाव का उत्कृष्ट नमूना है। छत्तीसगढ़ी कविता के क्षेत्र में मुकुंद कौशल के नाम के बिना छत्तीसगढ़ी साहित्य पर चर्चा परिचर्चा संभव नहीं है । काव्य के माध्यम से उन्होने विभिन्न ज्वलंत विषयों को अपने अनूठे काव्य कौशल और शिल्पों के अभिनव प्रयोग से छत्तीसगढ़ी साहित्य में एक नयी लकीर खीचकर आगामी पढ़ी के लिए एक अलग ही पगडंडी का सृजन किया है । मूलतः गुजराती पृष्ठभूमि से होने की बाद भी छत्तीसगढ़ी भाषा को आत्मसात कर उन्होंने समरसता और तादात्म्य स्थापित करके छत्तीसगढ़ का रतन बेटा होने का जीवंत प्रमाण दिया है । उनकी रचनाएँ साक्षात् छत्तीसगढ़ी ग्राम्य जीवनशैली की सुंदर मनोरम शब्द चित्रकारी है। छत्तीसगढ़ी के सरल सहज निमर्ल सुंदर अनगढ़ उपमाओं के आश्रय से उन्होंने छत्तीसगढ़ी साहित्य को नवीनतम और शालीन भाषाशैली दी है, जिसके कारण छत्तीसगढ़ी साहित्याकाश में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में सदैव के लिए अंकित हो गया है। छत्तीसगढ़िया ग्राम्य जीवन के सजीव चितेरे कवि की रचनाएँ पाठकों के हृदय को स्पर्श कर रससिद्धि करने में समर्थ हैं। कौशल जी की भाषा ठेठ छत्तीसगढ़िया जनमानस की प्रवृत्ति, प्रकृति, की सरल सहज अभिव्यक्ति है, छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा यदा कदा परिलक्षित होती हैं । छत्तीसगढ़िया संस्कृति की प्रतिष्ठा विश्वव्यापी है, जिसे मुकुन्द कौशल जी ने ससम्मान हृदयंगम करके जन-जन तक पहुँचाने का श्रमसाध्य कार्य किया है, उनके उपकारों के लिए छत्तीसगढ़िया जनमानस सदैव उनका ऋणी रहेगा । छत्तीसगढ़ी लोकसांस्कृतिक कार्यक्रम चँदैनी गोंदा में उनके छत्तीसगढ़ी गीतों को जनमानस ने बहुत आदरभाव से सुनकर और गाकर सम्मान दिया है। आकाशवाणी सें कौशल जी के गीत का वर्तमान में भी प्रसारित होते हैं । समय के वक्षस्थल पर कविकर्म दायित्व निर्वाह के साथ ही साथ छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्षेत्र में नवाचार का द्वार खोलकर छत्तीसगढ़ी भाषा को समृद्ध करने का मुकुन्द कौशल जी ने समय सापेक्ष सर्वोत्तम प्रयास किया है ।
छत्तीसगढ़ी साहित्य को संस्कारित और परिमार्जित करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के संस्कृति विभागानंतर्गत राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ द्वारा एक बिजहा नामक कार्यक्रम चलाया गया था, जिसका नेतृत्व मुकुन्द कौशल जी को प्रदान किया गया था। पूरे छत्तीसगढ़ के नवांकुर काव्यकारों के खोज और रचनाओं का पुनरावलोकन मार्गदर्शन का कार्य कौशल जी ने अपने अनूठे कौशल के साथ निर्वाह किया था। उक्त बिजहा कार्यक्रम के अन्तर्गत सौभाग्य से मुझे भी सहभागिता का अवसर मिला था। उक्त कार्यक्रम के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य में नवीनता का संचार हुआ ।
मुकुन्द कौशल जी छत्तीसगढ़ी शब्दों के पारखी और कुशल शब्द शिल्पी हैं। शब्द संयोंजन कुशलता, ध्वन्यात्मकता और प्रवाह उनकी विशिष्टता है ।
छत्तीसगढ़ी काव्योत्कर्ष के अग्रिम पंक्ति के कवि मुकुंद कौशल जी की काव्य उपासना की मृदुल गूँज छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक नभ और लोकसाहित्यनभ में अनंतकाल तक ध्वनित होती रहेंगी।
शोभामोहन श्रीवास्तव
Saturday, 21 June 2025
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः। स(ंस्कृत स्तुति)
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः।
त्रयो लोक चतुर्दश भुवनम्
योगिन् च तपस्विन् वचनम्
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
स्तुति श्लोकेषु पद्येषु ।
पुष्प-परागाणां कणेषु ।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
प्राज्ञनरस्य आप्तवाक्येषु ।
ऋषि-मुनिः सूत्रसूक्तेषु ।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
प्रकृतिविहङ्गमप्राङ्गणम्
वेदमन्त्रः मंगलाचरणम्
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
ज्ञान-कला-विद्यासुसेवनम् ।
जीवजगतस्य कलेवरम् ।।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
उदितसूर्यः धवलरश्मयः।
ईशोन्मुखाः चित्तवृत्तयः ।।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
प्रेम-दया-करुणा स्फुरणे ।
सत्यपन्थस्य वा वरणे।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
चिन्ताचिन्तनवनं सघनम् ।
आगमनिगमपुराणकथनम् ।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
अकलतत्त्वदर्शनक्षणमात्रे ।
दीन-दुखीनाम च दयापात्रे
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
शोकभयाकुलजगकुटीरं ।
पञ्चपदार्थरचितशरीरं ।।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
मृगतृष्णायाः यथा जीवनम्।
कालचक्रगतिपरिवर्तनम्
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
शोधअपूर्णं चित्तशिथिलम् ।
वन्दनं च नमनं करुणालयम्।।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
कणकणेषुपरमेश्वरव्याप्तः ।
सर्वसुलभः परन्तु अप्राप्तः।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
आसाढ़ कृष्ण पक्ष तिथि एकादशी, दिवस शनिवासरे विक्रम संवत २०८२ तद्नुसार २१/०६/२०२५
शुभ स्थान महुदा विकासखंड पाटन जिला दुर्ग।
छत्तीसगढ़ भारत
त्रयो लोक चतुर्दश भुवनम्
योगिन् च तपस्विन् वचनम्
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
स्तुति श्लोकेषु पद्येषु ।
पुष्प-परागाणां कणेषु ।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
प्राज्ञनरस्य आप्तवाक्येषु ।
ऋषि-मुनिः सूत्रसूक्तेषु ।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
प्रकृतिविहङ्गमप्राङ्गणम्
वेदमन्त्रः मंगलाचरणम्
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
ज्ञान-कला-विद्यासुसेवनम् ।
जीवजगतस्य कलेवरम् ।।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
उदितसूर्यः धवलरश्मयः।
ईशोन्मुखाः चित्तवृत्तयः ।।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
प्रेम-दया-करुणा स्फुरणे ।
सत्यपन्थस्य वा वरणे।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
चिन्ताचिन्तनवनं सघनम् ।
आगमनिगमपुराणकथनम् ।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
अकलतत्त्वदर्शनक्षणमात्रे ।
दीन-दुखीनाम च दयापात्रे
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
शोकभयाकुलजगकुटीरं ।
पञ्चपदार्थरचितशरीरं ।।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
मृगतृष्णायाः यथा जीवनम्।
कालचक्रगतिपरिवर्तनम्
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
शोधअपूर्णं चित्तशिथिलम् ।
वन्दनं च नमनं करुणालयम्।।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
कणकणेषुपरमेश्वरव्याप्तः ।
सर्वसुलभः परन्तु अप्राप्तः।
कुतः कुतः त्वाम् अन्वेष्य हरिः ।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
आसाढ़ कृष्ण पक्ष तिथि एकादशी, दिवस शनिवासरे विक्रम संवत २०८२ तद्नुसार २१/०६/२०२५
शुभ स्थान महुदा विकासखंड पाटन जिला दुर्ग।
छत्तीसगढ़ भारत
Friday, 20 June 2025
"योग " दोहा
"योग "
संस्कृत के "युज" धातु से, शब्द बना है योग l
भिन्न भाँति इस योग का, करते लोग प्रयोग ll
प्रथम आदियोगी हुए, महादेव सुखधाम l
जिनका लेते योग में, सब आदर से नाम ll
योग जनक ऋषि पतंजलि, हुए आधुनिक काल l
"योगसूत्र" जिसने रचा,धन्य गोणिका लाल ll
योग मिटाते रोग को, इसके कई प्रमाण l
सब सात्विक गुण युक्त हो, करें जगत कल्याण ll
मूल रूप से योग का, होता चार प्रकार l
कर्म व भक्ति ज्ञान तथा, राज योग सुखसारll
हठ लय तंत्र त्रिविध भी, हैं अतिरिक्त प्रकार l
तेज रूप बलवृद्धि हो, हिय में शुद्ध विचार ll
नित्य करें जो योग को, उन्हें न व्यापे रोग l
निर्विकार मन हो तथा, काया रहे निरोग ll
शोभा मोहन श्रीवास्तव
रायपुर, छत्तीसगढ़
20.06.2025
Thursday, 19 June 2025
माँ के सच्चे लाल जगो"
"माँ के सच्चे लाल जगो"
जागो जागो भारतवासी
पढ़ गीता संदेश जगो।
वेद शास्त्र उपनिषद आदि पढ़,
चलो बचाने देश जगो।।
अरे करोड़ हिन्दू में से,
माँ के सच्चे लाल जगो।
बलिदानों से ही भारत का,
होगा ऊँचा भाल जगो।।
सदियों में अवसर आया है,
चलो मिटाने रोग जगो ।
जगो बगल में छुरा छुपाये,
खड़े कसाई लोग जगो।।
सर्वनाश से पहले पसरे,
सन्नाटे को भाँप जगो।।
आतंकी के देख इरादे,
शत्रुनाश को आप जगो ।।
छल प्रपंच मद मत्सरता भर,
जागा है उन्माद जगो।
क्या मतलब जगने का यदि तुम,
बर्बादी के बाद जगो ।।
भांति-भांति के भेस बनाकर,
घूम रहे जल्लाद जगो।
काला साया देश न निगले,
बनकर तुम फौलाद जगो।।
मनोरोगियों के विनाश बिन,
नहीं बचेगा देश जगो।
बिना तुम्हारे सज्य हुए अब,
नहीं मिटेगा क्लेश जगो।।
ठौर ठिकाना एक यही है,
मन में भरकर रोष जगो ।
नहीं जगे तो नहीं बचोगे,
जागो सब बेहोश जगो ।।
गला कट रहा है चुन चुनकर,
अब तो होकर क्रुद्ध जगो।
बिना बिगुल आरंभ चुका,
यह अदृश्य सा युद्ध जगो।।
शत्रु तुम्हे डरपोक मानकर,
लगा चुका है घात जगो।
धर्म बचाने ऊँच नीच और,
भूल जात और पात जगो।।
मंडी में ना बिके नारियाँ
कटे ना बाल गोपाल जगो।
आस्तीन में छुपे साँप ये,
डस ना लें तत्काल जगो।।
शांत भिक्षुओं की प्रतिहिंसक,
देख पराक्रम वार जगो।
देश बनी है समरभूमि तब,
थूके ना संसार जगो ।
जगह जगह पर छुपे देश में,
गद्दारों के यार जगो ।
देश फूँकने वालों के संग,
दिल्ली की दरबार जगो।।
कालखंड ने थोप दिया है,
यदि अब तुमपर युद्ध जगो।
शुतुरमुर्ग बन सिर न छुपाओ,
विस्फोटक हो क्रुद्ध जगो।।
कैंडल मार्च निकालो मत अब,
लहराने हथियार जगो।
दुष्टों को यमपुर पहुँचाने,
करने निज उद्धार जगो।।
खुल्लमखुल्ला अब ललकारो,
शौर्य दिखाने श्रेष्ठ जगो ।
गलाकाट संस्कृति से लड़ने,
सुस्त न रहो सचेष्ट जगो ।।
जिनको डर लगता भारत में,
उन सबको ललकार जगो ।
बालीवुड के सर्वनाश को,
अब होकर तैयार जगो।।
लाश भरी रेलें आयी थी,
खुद पर कर धिक्कार जगो।
अब्बू चच्चा देश बाँटकर,
बन बैठे सरदार जगो।।
जात पात में तुम्हे बाँटकर,
बहुत बनी सरकार जगो।
जय श्रीराम लगा जयकारा,
अब करने प्रतिकार जगो।
नहीं जगे तो मिट जाओगे,
मृत्यु खड़ा हर द्वार जगो ।।
शोभामोहन काम जगाना
पढ़कर तुम इतिहास जगो ।
भारत माता का तुम पर से,
टूटे मत विश्वास जगो ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
जागो जागो भारतवासी
पढ़ गीता संदेश जगो।
वेद शास्त्र उपनिषद आदि पढ़,
चलो बचाने देश जगो।।
अरे करोड़ हिन्दू में से,
माँ के सच्चे लाल जगो।
बलिदानों से ही भारत का,
होगा ऊँचा भाल जगो।।
सदियों में अवसर आया है,
चलो मिटाने रोग जगो ।
जगो बगल में छुरा छुपाये,
खड़े कसाई लोग जगो।।
सर्वनाश से पहले पसरे,
सन्नाटे को भाँप जगो।।
आतंकी के देख इरादे,
शत्रुनाश को आप जगो ।।
छल प्रपंच मद मत्सरता भर,
जागा है उन्माद जगो।
क्या मतलब जगने का यदि तुम,
बर्बादी के बाद जगो ।।
भांति-भांति के भेस बनाकर,
घूम रहे जल्लाद जगो।
काला साया देश न निगले,
बनकर तुम फौलाद जगो।।
मनोरोगियों के विनाश बिन,
नहीं बचेगा देश जगो।
बिना तुम्हारे सज्य हुए अब,
नहीं मिटेगा क्लेश जगो।।
ठौर ठिकाना एक यही है,
मन में भरकर रोष जगो ।
नहीं जगे तो नहीं बचोगे,
जागो सब बेहोश जगो ।।
गला कट रहा है चुन चुनकर,
अब तो होकर क्रुद्ध जगो।
बिना बिगुल आरंभ चुका,
यह अदृश्य सा युद्ध जगो।।
शत्रु तुम्हे डरपोक मानकर,
लगा चुका है घात जगो।
धर्म बचाने ऊँच नीच और,
भूल जात और पात जगो।।
मंडी में ना बिके नारियाँ
कटे ना बाल गोपाल जगो।
आस्तीन में छुपे साँप ये,
डस ना लें तत्काल जगो।।
शांत भिक्षुओं की प्रतिहिंसक,
देख पराक्रम वार जगो।
देश बनी है समरभूमि तब,
थूके ना संसार जगो ।
जगह जगह पर छुपे देश में,
गद्दारों के यार जगो ।
देश फूँकने वालों के संग,
दिल्ली की दरबार जगो।।
कालखंड ने थोप दिया है,
यदि अब तुमपर युद्ध जगो।
शुतुरमुर्ग बन सिर न छुपाओ,
विस्फोटक हो क्रुद्ध जगो।।
कैंडल मार्च निकालो मत अब,
लहराने हथियार जगो।
दुष्टों को यमपुर पहुँचाने,
करने निज उद्धार जगो।।
खुल्लमखुल्ला अब ललकारो,
शौर्य दिखाने श्रेष्ठ जगो ।
गलाकाट संस्कृति से लड़ने,
सुस्त न रहो सचेष्ट जगो ।।
जिनको डर लगता भारत में,
उन सबको ललकार जगो ।
बालीवुड के सर्वनाश को,
अब होकर तैयार जगो।।
लाश भरी रेलें आयी थी,
खुद पर कर धिक्कार जगो।
अब्बू चच्चा देश बाँटकर,
बन बैठे सरदार जगो।।
जात पात में तुम्हे बाँटकर,
बहुत बनी सरकार जगो।
जय श्रीराम लगा जयकारा,
अब करने प्रतिकार जगो।
नहीं जगे तो मिट जाओगे,
मृत्यु खड़ा हर द्वार जगो ।।
शोभामोहन काम जगाना
पढ़कर तुम इतिहास जगो ।
भारत माता का तुम पर से,
टूटे मत विश्वास जगो ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
Monday, 9 June 2025
जीवन को एक खेल,मरण को उत्सव मान लिया। परिष्कृत रचना
जीवन को एक खेल,मरण को उत्सव मान लिया।
रहें अबूझे क्यों खुद से जब, जग को छान लिया ।।
मुझसे बड़ा शत्रु नहीं कोई
मुझसे बड़ा न मित्र कोई
मुझसे बड़ा नहीं ठग कोई
मुझसा नहीं विचित्र कोई
तजकर जगत विरोध स्वयं से, मैने ठान लिया।
जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव जान लिया ।।
निद्रालय में स्वत्व जगाने,
अपना अंतस झकझोड़ूँ।
वय फल के जैसै गिर जाने
मन नदिया धारा मोड़ूँ।।
आप चढ़ा प्रत्यंचा खुद पर, ही धनु तान लिया ।
जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव मान लिया ।।
मृदा महल देहरी लांघकर
अब स्वाग्रह के पार चली
जगत नियंता नाव सौंपकर
सागर बिन पतवार चली
जब कठपुतली नृत्य नेति, नायक पहचान लिया।
जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिया ।।
महा शांति का बीज है भीतर
बाहर क्यों माथा फोड़ी ।
गहरा भेद सरल सारे जग,
माया राम नहीं जोड़ी ।।
होश सदा के लिए चिरंतन, से अनुदान लिया ।
जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिया ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रहें अबूझे क्यों खुद से जब, जग को छान लिया ।।
मुझसे बड़ा शत्रु नहीं कोई
मुझसे बड़ा न मित्र कोई
मुझसे बड़ा नहीं ठग कोई
मुझसा नहीं विचित्र कोई
तजकर जगत विरोध स्वयं से, मैने ठान लिया।
जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव जान लिया ।।
निद्रालय में स्वत्व जगाने,
अपना अंतस झकझोड़ूँ।
वय फल के जैसै गिर जाने
मन नदिया धारा मोड़ूँ।।
आप चढ़ा प्रत्यंचा खुद पर, ही धनु तान लिया ।
जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव मान लिया ।।
मृदा महल देहरी लांघकर
अब स्वाग्रह के पार चली
जगत नियंता नाव सौंपकर
सागर बिन पतवार चली
जब कठपुतली नृत्य नेति, नायक पहचान लिया।
जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिया ।।
महा शांति का बीज है भीतर
बाहर क्यों माथा फोड़ी ।
गहरा भेद सरल सारे जग,
माया राम नहीं जोड़ी ।।
होश सदा के लिए चिरंतन, से अनुदान लिया ।
जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिया ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
Sunday, 8 June 2025
भुजङ्गविजृम्भित छन्द (पिंगल)
भुजङ्गविजृम्भित छन्द (पिंगल)
उत्ती मूड़ा लाली छाये, चमचम चमचम चमके, दिनकर संग में।
जागे चारा खोजे भागे, दरबर चुरगुन पँड़की,
उपबन लंग में ।।
कोठा ढीले भैया गैया, दँउड़त दँउड़त खरिखा,
गदबिद जाय हो ।
बेरा होगे जागे के रे, चल अब उठ उठ मनखे,
करमजागौ जा जगाय हो ।।
उत्ती मूड़ा लाली छाये, चमचम चमचम चमके, दिनकर संग में।
जागे चारा खोजे भागे, दरबर चुरगुन पँड़की,
उपबन लंग में ।।
कोठा ढीले भैया गैया, दँउड़त दँउड़त खरिखा,
गदबिद जाय हो ।
बेरा होगे जागे के रे, चल अब उठ उठ मनखे,
करमजागौ जा जगाय हो ।।
गौरी गौरा गीत
गौरी गौरा गीत
जागौ जागौ गौरी गौरा, जगमग जगमग रात हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, रिगबिग करसा हाथ हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, आज देवारी के रात हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा,गली चलत तुँहरे बात हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा,माथ में मकुट खपाव हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, कंकनमउर बँधाव हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, पानीगरहन कराव हो।।
जागौ जागौ गौरी गौरा,जागत जागत गाँव हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा,दरसन के तुँहरे आस हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा,जनमजनम के प्यास हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, लइका तुँहर जुरियात हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, गाँव गोहर लगात हो।
शोभामोहन श्रीवास्तव
जागौ जागौ गौरी गौरा, जगमग जगमग रात हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, रिगबिग करसा हाथ हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, आज देवारी के रात हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा,गली चलत तुँहरे बात हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा,माथ में मकुट खपाव हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, कंकनमउर बँधाव हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, पानीगरहन कराव हो।।
जागौ जागौ गौरी गौरा,जागत जागत गाँव हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा,दरसन के तुँहरे आस हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा,जनमजनम के प्यास हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, लइका तुँहर जुरियात हो।
जागौ जागौ गौरी गौरा, गाँव गोहर लगात हो।
शोभामोहन श्रीवास्तव
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