Monday, 9 June 2025

जीवन को एक खेल,मरण को उत्सव मान लिया। परिष्कृत रचना

जीवन को एक खेल,मरण को उत्सव मान लिया।
रहें अबूझे क्यों खुद से जब, जग को छान लिया ।।

मुझसे बड़ा शत्रु नहीं कोई

मुझसे बड़ा न मित्र कोई

मुझसे बड़ा नहीं ठग कोई

मुझसा नहीं विचित्र कोई

तजकर जगत विरोध स्वयं से, मैने ठान लिया।

जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव जान लिया ।।

निद्रालय में स्वत्व जगाने,

अपना अंतस झकझोड़ूँ।

वय फल के जैसै गिर जाने

मन नदिया धारा मोड़ूँ।।

आप चढ़ा प्रत्यंचा खुद पर, ही धनु तान लिया ।

जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव मान लिया ।।

मृदा महल देहरी लांघकर

अब स्वाग्रह के पार चली

जगत नियंता नाव सौंपकर

सागर बिन पतवार चली

जब कठपुतली नृत्य नेति, नायक पहचान लिया।

जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिया ।।

महा शांति का बीज है भीतर

बाहर क्यों माथा फोड़ी ।

गहरा भेद सरल सारे जग,

माया राम नहीं जोड़ी ।।

होश सदा के लिए चिरंतन, से अनुदान लिया ।

जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिया ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

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