जीवन को एक खेल,मरण को उत्सव मान लिया।
रहें अबूझे क्यों खुद से जब, जग को छान लिया ।।
मुझसे बड़ा शत्रु नहीं कोई
मुझसे बड़ा न मित्र कोई
मुझसे बड़ा नहीं ठग कोई
मुझसा नहीं विचित्र कोई
तजकर जगत विरोध स्वयं से, मैने ठान लिया।
जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव जान लिया ।।
निद्रालय में स्वत्व जगाने,
अपना अंतस झकझोड़ूँ।
वय फल के जैसै गिर जाने
मन नदिया धारा मोड़ूँ।।
आप चढ़ा प्रत्यंचा खुद पर, ही धनु तान लिया ।
जीवन को एक खेल मरण को,उत्सव मान लिया ।।
मृदा महल देहरी लांघकर
अब स्वाग्रह के पार चली
जगत नियंता नाव सौंपकर
सागर बिन पतवार चली
जब कठपुतली नृत्य नेति, नायक पहचान लिया।
जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिया ।।
महा शांति का बीज है भीतर
बाहर क्यों माथा फोड़ी ।
गहरा भेद सरल सारे जग,
माया राम नहीं जोड़ी ।।
होश सदा के लिए चिरंतन, से अनुदान लिया ।
जीवन को एक खेल मरण को उत्सव मान लिया ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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