Wednesday, 30 April 2025

बिरहा के दोहा

बेरा के कोहा, बिरहा के दोहा 

जइसे-तइसे रात ला, अलथी कलथी काट।
भिनसरहा ले आसरा, झाँकत सेंद कपाट।।

महल अटारी मा परे, उबुक-चुबुक जिउ होत।
कोसारेशम ओढ़ना, अँगरा देंह कुढ़ोत।।

छटपट-छटपट मा कटत, बिरहिन के दिनरात।
भोगत तउने  जानथे, लगही नानुक बात ।।

उसनिन्दा के बेर मा, सुकुवा लगिस जगान।
सास-ननदिया निरदयी, मारत बोलीबान।।

पानी आही मूँह मा, जब आबे तैं गाँव ।
तोर आत ले फेर मैं, कइसे जीव बचाँव।।

आँखी बाट निहार के, पथरावत हे मोर।
सँइया परदेशी  भये, बाँध मया के डोर ।।

बोलत बगियन कोइली , तन-मन भरत उमंग ।
पल-पल छिन-छिन रंगगे, पिया संग के रंग।।

साँसा साँसी परत हे, कोन करै पहिचान।
एक पिया परदेसिया, अउ दूसर भगवान।।

आभा मारत फूल हर, देख गति ला मोर।
तोर पिया परदेश रे, तैं झन मोला टोर।।

सुरता कर ममहात हे, महर महर मन मोर ।
जीव जुड़ावत सुध सबो, आँखी आँसू बोर।।

आज अगोरा पुर जही, होही मुँह अँजोर।
परछी अँगना होत हौं, झाँकत हावौं खोर ।।

घोर डरे हौं मेंहदी, रंँगा डरे हौं पाँव।
फूलबेलबूटा बना, ओकर लिख के नाव।।

रेशमधागा में कढ़े, लुगरा निकलिस लाल।
कतका दिन के बाद तो,बदलिस गिरहा चाल।।

बेनीगजरा डार के, खोचें हौं बनफूल।
फेर हेर संदूक ले, पहिर डरे हौं झूल।।

आरो लेवन सजन के, गोड़ ओरखत कान।
छटपटात मछरी असन, बिन पानी जिउ प्रान।।

निरदैया बेरा बिकट, तब ले चित्त उचान।
सुखबसंत साँवर संँगे, आही हे अनुमान।।

आज दरस के आस में, पानी फिरगे फेर ।
गली-गली भेंटत गियाँ , पूछत ले ले चेर।।

फूलसेज के का करौं, जब सँइया परदेश।
बड़ संसो उपजात हे, मन मा भाव भदेस।।

बेली कस पैजन गड़त, गड़त सोनहा चैन।।
गरगस लागत कंगना, रझरझ बरसत नैन।।

सबो आस तो टूटगे, बाँचिस एक्केआस ।
उहू आस के बासरा, लोचत बनके फाँस।।
 
हाथ ल ककनी चाबथे, गर ला कंठाहार।
गौंतरिहा सँइया बिगन, बिरथा सब सिंगार ।।

जम्मो बादर उरकगे, चकवी मरत पियास।
बिरहिन के बसवार में, जम्मो तिथि उदास।।

ठुड़गी रुख के फोंक में, घुघुवा हर नरियात।
पोटा काँपत देख तो, जीव पिया सोरियात।।

संग पिया के बीतगे, ओ पल जीयत जान।
बिरहिन के बसवार तो, लगथे मरी समान।।

बासत बन में कोइली, घुघुवा ठुड़गा झाड़।
बिरहिन छपकत नैन ला, सतरंग चुनरी आड़।।

जेवरजट्ठा लूगरा, झन लाहू सरकार।
आँखी तरसत दरस बर, बिरहिन करत गोहार।।

गहना गरगस लागथे, बोली नहीं सुहाय ।
बैरी जइसे बीतथे, बिरहा के दिन हाय।।

गहनागुरिया नइ मँगौं, ररहिन बन प्रिय पास।
मयाखजाना लूटहूँ, मैं एसो चउमास ।।

शोभामोहन

Sunday, 27 April 2025

बस लाइक कमेन्ट, करै वो उतरे दिल में।

मोबाइल महिमा

मोबाइल मा होत हे,आज जम्मो व्यवहार।
लाग-नता  मन छूटगे, अनचिन्हार लगवार।।

अनचिन्हार लगवार, आय हे नवा जमाना।
कोनो सग-सगियात,  संग नइ आना-जाना ।।

बस लाइक कमेन्ट, करै वो उतरे दिल में।
दिनभर ओंड़ा देय, हवैं सब मोबाइल में ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव

Tuesday, 22 April 2025

का दे सकहूँ तोला नाम

(भाववचन)
का दे सकहूँ तोला नाम

का दे सकहूँ तोला नाम। 
सबके अंतस तोरे धाम।।

मालिक जम्मो भूतलखार। 
जगतगौंटिया लंबरदार ।।

व्यापक अउ अनादि अपार। 
सबके उरथैया जगसार।।

सबोज्योति के परमअधार। 
अजगुत सिरजैया संसार।।

तैं रितोवैया गंगाधार।
सबो चराचर के सरकार।।

पानफूल लस-रस मकरंद। 
महामतौना मउहामंद।।

छांँदकाट गाये के छंद। 
बैरागी के मूठाबंद।। 

नदिया-नरवा चंचलपन। 
लहराबदन नृत्य  थिरकन।।

रंगधनुहा के सबोबरन,
व्यक्तशब्द ले मुक्तकथन।।

गोठ-बात बर जिभियाघाट। 
सरगअसन शुभ धरनीआँट।।

जगतमोहनी गमक उचाट।
तैं टोना-जादू के काट।।

रंगहानभ के कीर्तनगान। 
सँझाकिरण असन बरदान।।

आरुगमंतर ब्रम्हगियान।
डोंगरफूले फूल समान।।

जमो जीवदल रिगबिग जोत।
बोहावत जललहरी सोत।। 

बेदशास्त्र बाचा कहनोत। 
सरबाँवट बगरे सब कोत।।

पबरित जलझरना संगीत। 
मधुरस घोरत रतिहा गीत।। 

बरत चंदैनी बरसत सीत। 
गगनगंग अउ मनवामीत।।

सुकुवा भिनसरहा सुखरास।
कुसुमकलीदल रंग-सुवास।।

बिपतपरे जन जब्बरआस।जिये-खाय कलकुत उल्लास।।

निरजनबन पैडगरीबाट।
अलखनिरंजन ठट्ठाहाट।।

दहरापौंठा पट्ठर टाँठ।
जलथल झरना उद्गमघाट।।

कमलकुमुददल हाँसत ताल। 
नवापीक के झुमरत डाल।। 

बुढ़वापन डोंगा खेवाल।।
जोश जवानी जागेज्वाल।।

जामे डोंगररूख समान। 
गगन मगन बादर गतिमान।। 

पार छुवत लहरा उफान।
सुघर चंदालोक घरान।।

रैन नैन चुप गुपचुप बात। 
आखरमणि गूँथे के ताँत।।

रसगगरी बाँटत बरसात।
भाँवर गिंजरन - घुमरन सात।।

कुँवरभाव पट्टाये फूल। 
भिन्नाजग पगरहित अथूल।।

जनम-मरन तन करनी तूल। करमधरम धरसा फल-फूल।।

तातठाँव में जूड़ बयार।
पतझरसुम्मत सुघर बहार।।

तातकुधरी नीर फुहार।
माटीचोला जीवअधार।।

रझरझ बादर आँसूधार। 
लउकत लउका लक्क अपार।।

उठे गरेरा झंझर झार। 
पापपुन्न अउ बेरापार।।

बाती-दियना सूत-पंतग।
मया-दया सुनता शुभरंग।। 

मृगकस्तूरी रहिनीढंग। 
सबोलंग रहि सदाअनंग।। 

जमोजिनिस के होवन ढंग। 
चंदा के जइसे सितलंग।।
 
दिनकर असन बरत बंगबंग।
निच्चटआरुग सब्बो लंग।।

मलकत दहराडोंगी पाल।। 
बने-गिनहा गिरहाचाल।।

सबो जीव रखवार कमाल। 
बेरपुरे बर सँउहत काल।।

जतका बूता वतका नाम। 
कहूँ नाम लौं दाहिन-बाम।। 

सबोनाम हे तोरे नाम।
सबोधाम अउ तोरे धाम।।

पावनप्रभु रट मन नितनाम।।
करत-धरत जग बूता-काम।

रतिहा-बिहिना छँइहा घाम।
साँस साँस सुमिरत गुनगान।।

का दे सकहूँ तोला नाम।
सबके अंतस तोरे धाम।। 

शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.

●पाँच जिनिस के अनगिन खेल●

●पाँच जिनिस के अनगिन खेल●

पाँच जिनिस के अनगिन खेल।
जेन करावत बिरहा मेल।।

अनचिन्ह हावय गाँव सियार।
अनमिट सब मा फेर चिन्हार।।

अपन टकर के आगू हार।
जीव करत जगतिक बेवहार।।

मन के अँगना लाख बहार।
होत तभो कचरा भरमार।।

ईश मिलै अउ आप गँवाय।
खुरचत शुभदिन बादर लाय।।

शोभामोहन हे निरधार।
धर ले हाथ जबर करतार।।

शोभामोहन 
०८/०२/२०२१

हम वो जमाना के बहू अन(तीन चार दशक पहिली के बहू मन ला समर्पित)

हम वो जमाना के बहू अन
(तीन चार दशक पहिली के बहू मन ला समर्पित) 

हम वो जमाना के बहू अन।हम वो जमाना के बहू अन।। 

मुड़ ढ़ाक के दुबकत रहन। 
आँसू बोहा सुसकत रहन।। 
सुख दुख सहत मुचकत रहन।
ककरो ले अउ कुछु नइ कहन।। 
हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।। 

परदेस जावै पति हमर। 
हम रहन बइठे गाँव घर।। 
राँधन पसावन सबो बर।। 
तरसन सुने मइके खबर।। 
हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।। 

ससुरार में घुलमिल रहन। 
जब्भे सहन तब्भे लहन।। 
जुन्ना पहिन हाँसत रहन।
ननदी ला लुगरा नवा दन।। 
हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।। 

सुकुवा उवत बिहिना उठन। 
छिटका छरा द्वारी छिंचन।
खोली अउ रंधनी लिपन।
काँचन चुरेना दनादन।
हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।। 

छुही लीप छोहर पार दन।
माटी के घर ला सँवार दन।। 
तुलसी मा पानी डार दन।। 
चौंरा में दियना बार दन।। 
हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।। 

हलछट बछारत ब्रत करन। 
चंदा सुरुज पँइया परन।।
सियान के सटका बनन
कनिहा टूटत बूता करन।
हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।। 

देवर ननंद जोखा धरन। 
जेठानी जेठ अदब करन।। 
सास अउ ससुर ला बड़ डरन।
दाइज के सेती अउ मरन।। 
हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।। 

सबला जेंवा बढ़िया असन।
मिरचा निमक चटनी गुड़न।। 
दू कँउर खाके जीव रखन।
सब सुतैं हम राहेर दरन।। 
हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।।

धुंँगियात आगी ला धुँकन। 
परिवार के सेती झुकन। 
बेवहार बर नइ हम चूकन। 
कोनो ला नइ हाँसन थूकन।। 
हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।। 

मैं मोर नइ बोलन हमन। 
घर जग्य मा होवन हवन।। 
मैदान छोड़न ना भगन।। 
अइसे पिया के रंग रंगन।। 
हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।। 

कब्भू न मुँहजोरी करन। 
हँउला धरन पानी भरन।। 
पतिदेव के दाबन चरन। 
पिया डेहरी जियन मरन।। 
हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।। 

आवत ससुर होवन खड़े। 
रहि जान लाज सरम गड़े।। 
छिप जान देखन जब बड़े।
जानन नहीं झगरे लड़े।। 
हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।।

पबरित रहत गंगा असन।
मइके अउ ससुरे बसन।।
गमकत रहन चंदन असन।
बन फूल घर रद्दा दसन।।
हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।।

शोभामोहन 
१०/०५/२०२२

गीत पझरथे ये का कम हे

गीत पझरथे ये का कम हे 

ठकठक ले सुक्खाय चुआ ले, गीत पझरथे ये का कम हे। 
कबिता के डोला परछन बर, कलम सँभरथे ये का कम हे।। 

छान्ही ले बुलकत गर्दा संग, किरन उतरथे ये का कम हे। 
आखर के फुलवारी क्यारी, मनसुख भरथे ये का कम हे।। 

सरभर चिखला छबड़े हंसा, मोती चरथे ये का कम हे।।
बिगन टकर पैडगरी रद्दा, पाँव पकरथे ये का कम हे।। 

मोह-द्रोह के बइहापूरा, छूवत निकलथे ये कम हे। 
नदिया लहसे डार झमाझम, पंखा झलथे ये का कम हे।।

खड़े अगोरा सुन्ना डिलवा, आसूँ ढलथे ये का कम हे। 
पथराये कठुवाये हिरदे, चिटिक टघलथे ये का कम हे। 

मतलाये बिस्सर तरिया में, कमल छछलथे ये का कम हे।। 
रमजायें पाँखी के सुवना, फेर संभलथे ये का कम हे। 

शोभामोहन

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...