Wednesday, 31 January 2024

छत्तीसगढ़ी ददरिया

१)
मूड़ बोह के मोटरी, मरघट कहूँ न जाय।
हाय हाय काबर सबो, करत समझ नइ आय।।
२)
साँस साँस में जोर ले, जोरन भारन नाम।
जग के का बिसवास हे, जग ले का हे काम।।
३)
बछरू दूध जुठारथे, कुसुम भ्रमर मतवार।
जूठा काठा सब इहाँ, आरुग बस भरतार।।
४)
पारबह्म हिरदे बसे, तब ले दूर जनाय।
मन के मइल धोवाय बिन, जीव छाँव नइ पाय।।
५)
मोला फरक परै नहीं, हाँसै थूँकै लोग।
मोर आस बस तोर ले, तैं तो करबे सोग।।

६)
लबरा मन के गाँव में, सतहा धक्का खाय।
हीनमान करके सबो, वोला नइ पतियाय।।

७)
काय करे बर आय अउ, काय करत हस काज।
गजब ठठाही लेगके, जिउ तोला जमराज।।
8)
जेती आँखी जात हे, वोती दिखथे राम।
अब तो मोला लगत हे,
चोला चारोधाम।
9)
साधू छाहित देवता, साधू के पर पाँव।
साधू नाव उतारही, राख हथेरी छाँव।।
10)
जप तप करबे देह कस, निर्मल उही अँजोर।
तेकर सेती जीव तैं, जप तप कर ले घोर।।
11)
भारत माँ के गोड़ में, अमरबेल लपटाय।
तन चूसै फूलै फरै, कोटिसकीरा हाय।।
12)
देश धरम बिसरा निचट, जपथे उल्टा मंत्र।
मुँहरन उनकर चिन्ह लौ,
अउ उखान दौ तंत्र।।
13)
कोंदी कोंदा झन बनौ,
अब पुरुषार्थ जगाव।
देश धरम बैरी चिन्हौ, धुर्रा नँगत छँड़ाव।।
14)

छत्तीसगढ़ी दोहा

१)
मूड़ बोह के मोटरी, मरघट कहूँ न जाय।
हाय हाय काबर सबो, करत समझ नइ आय।।
२)
साँस साँस में जोर ले, जोरन भारन नाम।
जग के का बिसवास हे, जग ले का हे काम।।
३)
बछरू दूध जुठारथे, कुसुम भ्रमर मतवार।
जूठा काठा सब इहाँ, आरुग बस भरतार।।
४)
पारबह्म हिरदे बसे, तब ले दूर जनाय।
मन के मइल धोवाय बिन, जीव छाँव नइ पाय।।
५)
मोला फरक परै नहीं, हाँसै थूँकै लोग।
मोर आस बस तोर ले, तैं तो करबे सोग।।

६)
लबरा मन के गाँव में, सतहा धक्का खाय।
हीनमान करके सबो, वोला नइ पतियाय।।

७)
काय करे बर आय अउ, काय करत हस काज।
गजब ठठाही लेगके, जिउ तोला जमराज।।
8)
जेती आँखी जात हे, वोती दिखथे राम।
अब तो मोला लगत हे,
चोला चारोधाम।
9)
साधू छाहित देवता, साधू के पर पाँव।
साधू नाव उतारही, राख हथेरी छाँव।।
10)
जप तप करबे देह कस, निर्मल उही अँजोर।
तेकर सेती जीव तैं, जप तप कर ले घोर।।
11)
भारत माँ के गोड़ में, अमरबेल लपटाय।
तन चूसै फूलै फरै, कोटिसकीरा हाय।।
12)
देश धरम बिसरा निचट, जपथे उल्टा मंत्र।
मुँहरन उनकर चिन्ह लौ,
अउ उखान दौ तंत्र।।
13)
कोंदी कोंदा झन बनौ,
अब पुरुषार्थ जगाव।
देश धरम बैरी चिन्हौ, धुर्रा नँगत छँड़ाव।।
14)

Thursday, 4 January 2024

दुलम बड़ मनुख जनम हर फेर।

दुलम बड़ मनुख जनम हर फेर।


दुलम बड़ मनुख जनम हर फेर।
थकही पौंरी खावत भौंरी, ये दुखगाँव बसेर।
रोबे धोबे खाबे सोबे, हो जाही बड़ बेर।
नत्ता सैना ऐना बैना, उटकट जगत गरेर।
तातारोसी अउ परदोसी, धंधा बड़ अंधेर।
दाई भाई बाप गोसाई, हाँकत जीव सरेर।
डोली ब्यारा टहल तियारा, कर तैं अब मन हेर।।
शोभामोहन हरि गुन गा ले, जाना हे हरि मेर।।

शोभामोहन श्रीवास्तव 

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...