बिजली चमकिस चिकमिक चिकमिक,
छितका कुरिया बग ले बरगे।
छितका छबि देख छनछन ले,
गरबिन महल अँइठुल जरगे ।
का राजमहल का रंगमहल,
का छितका जोतलहर बर हे ।
परमातम के बेवहार कला,
समझन बुध नइ नारी नर हे ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
Friday, 29 November 2024
हरिभजनधड़कत यह देह हिया भर हे।वो हरि छबि उपर निछावर हे।।
हरिभजन
धड़कत यह देह हिया भर हे।
वो हरि छबि उपर निछावर हे।।
लिखथौं तौ बस स्तुति वोकर,
जेकर ब्रह्मांड चराचर हे।
रँग के संसार नसाँव नहीं।
फाँसी गर मोर कसाँव नहीं।।
सपना में उही जागत में उही,
चारी गुनगान बराबर हे।।
वोकर धुन छेड़ै सुर गुरतुर।
मनभाव बोहा तुरतुर तुरतुर।।
वोकर दहरा वोकर लहरा,
वो जिहाँ रखै समझौ घर हे।।
रद्दा में सोझ चलौ दनदन।
बस नाम सरूप लखौं छन-छन।।
जब छाँटत छोल गठान सबो,
तब कोन अपन हे अउ पर हे।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८१ अगहन
धड़कत यह देह हिया भर हे।
वो हरि छबि उपर निछावर हे।।
लिखथौं तौ बस स्तुति वोकर,
जेकर ब्रह्मांड चराचर हे।
रँग के संसार नसाँव नहीं।
फाँसी गर मोर कसाँव नहीं।।
सपना में उही जागत में उही,
चारी गुनगान बराबर हे।।
वोकर धुन छेड़ै सुर गुरतुर।
मनभाव बोहा तुरतुर तुरतुर।।
वोकर दहरा वोकर लहरा,
वो जिहाँ रखै समझौ घर हे।।
रद्दा में सोझ चलौ दनदन।
बस नाम सरूप लखौं छन-छन।।
जब छाँटत छोल गठान सबो,
तब कोन अपन हे अउ पर हे।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८१ अगहन
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