Friday, 29 November 2024

हरिभजनधड़कत यह देह हिया भर हे।वो हरि छबि उपर निछावर हे।।

हरिभजन

धड़कत यह देह हिया भर हे।
वो हरि छबि उपर निछावर हे।।
लिखथौं तौ बस स्तुति वोकर,
जेकर ब्रह्मांड चराचर हे।
रँग के संसार नसाँव नहीं।
फाँसी गर मोर कसाँव नहीं।।
सपना में उही जागत में उही,
चारी गुनगान बराबर हे।।
वोकर धुन छेड़ै सुर गुरतुर।
मनभाव बोहा तुरतुर तुरतुर।।
वोकर दहरा वोकर लहरा,
वो जिहाँ रखै समझौ घर हे।।

रद्दा में सोझ चलौ दनदन।
बस नाम सरूप लखौं छन-छन।।
जब छाँटत छोल गठान सबो,
तब कोन अपन हे अउ पर हे।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८१ अगहन 

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