तहीं पसर के नभ बन जाथस
तहीं सिकुड़ के कन।
मयाजग्य के अगनकुंड में,
अउ बन जथस हवन ।।
साध सकौं नइ सकों भगवन ,
रहिथौं करत भजन।
तहीं मोर सब नता गोता अउ,
हिरदे बसे सजन ।
एक तोर ले लगा आसरा,
तोरे धरौं चरन ।
सबो शब्द लठरत झुमरत हे,
तभो करौं बरनन ।
छाती तोरे मड़ाय धुकधुकी,
करत तोर सुमरन।
अँगरी धर अँगिया ले अब तैं,
बंद करा घुमरन।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन