Tuesday, 8 July 2025

लावणी छन्द 16-14 मात्रा (आनंदरस झरना पझरत हे)

लावणी छन्द 16-14 मात्रा 

आनंदरस झरना पझरत हे,

जीव पिये नइ पावत हे।
उसर-पुसर के आगू आवत,
अउ पाछू घुँच जावत हे ।।
खंभा जइसे जड़मति चोला,
तब तो गति गनावत हे।
सतगुन निर्मल जल झलके बिन,
तमगुन धार बोहावत हे ।।
अनगिन भरमभूत मन खावत,
जग अंधियार झपावत हे ।
सबदिन बिसय वासना जेवत,
दुर्गुण तज नइ पावत हे ।
सुन्ना में भगवान उपकतिस,
भीड़भड़क्का धावत हे ।।
प्रकृति प्रवृत्ति बाँधत छाँदत,
नइ उछिन्द हो पावत हे ।।

शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
08/07/2025
महुदा 

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