Tuesday, 30 July 2024

बीना धरे हे हाथ मा,साजे मुकुट अउ माथ मा(सरस्वती वंदना)

बीना धरे हे हाथ मा,साजे मुकुट अउ माथ मा
(सरस्वती वंदना) 
हरिगीतिका छंद

2212 , 2212 , 2212 , 2212
लालालला लालालला,लालालला लालालला
1/
बीना धरे हे हाथ मा,साजे मुकुट अउ माथ मा ।
गनपति बिराजत छेंव कर,अउ माँझ लक्ष्मी साथ मा ।
हे हाथ मा पुस्तक धरे,बइठे कमल के फूल हे
करधन सजे पैजन बजे, मोती जड़े अउ झूल हे ।
2/
नथली फभे हे सोनहा, मुंँदरी सुघर अँगरी सजे
गर हार दुलरी तीलरी, चूरी सुघर कंगन बजे ।
अँधियार मनके टारथे,गुन ग्यान दियना बारथे।
संसार के दुख मेटके, मन कुंदरा ला झारथे।
3/
सुर ला सजा धुन ला बजा, संगीत सिरजावै उही।
भव पार बर पतवार अउ,जग नाच नचवावै उही।
मन नाद अनहत ला बजा,साधक सुजन ला तारथे ।
बस मध्यमा अउ वैखरी, दुख ताप संकट टारथे ।

शोभामोहन श्रीवास्तव 

जै सरसती दाई जै सरसत्त्ती।तैं दुर्गा तैं काली सत्ती (सरस्वती वंदना)

जै सरसती दाई जै सरसत्त्ती।
तैं दुर्गा तैं काली सत्ती (सरस्वती वंदना) 


जै सरसती दाई जै सरसत्त्ती।
तैं दुर्गा तैं काली सत्ती। ।
तोर लइका औं निचट गँवार।।
किरपा करके कर उद्धार।।

अखिल ज्ञान गुन के भंडारी।
सादा सारी सोन किनारी।।
पहिरे माला नथली झूल।
बइठे हवस कमल फूल।।

सातों सुर में बीनाबजैया।
डंडासरन तोर लागौं पैंया।।
भरे सभा में रखबे लाज।
मूड़ी उप्पर मोर बिराज।।

आखरबरम रचैया दाई।
सब जग करथे तोर बड़ाई।।
तोरे उपर मोर सब भार।
घेरीबेरी करौं जोहार।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
असाढ़ अंजोरी पाख पुन्नी विक्रम संवत २०८१
तद्नुसार २१/०७/२०२४

तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

राष्ट्र भक्ति रोला

तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

वह भारत का शत्रु, दंड का है अधिकारी।
राष्ट्रद्रोह में लिप्त, छुपे जो कर गद्दारी ।।
उस सबको पहचान, जेल के अंदर डालो।
तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

खंडित करके देश, यहीं जो डाले डेरा।
उठा रहे आवाज, न रिश्ता तेरा मेरा।।
बिगड़ रहे हालात, सुनो ऐ सत्ता वालों।
तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

कुचलो वो फन साँप, देश में जो फुफकारे।
करो न स्तुति गान, बनाकर उन्हें बेचारे।।
भारत में दामाद, बना उनको मत पालो।।
तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

सत्ता मद में भूल, गढ़े बेढ़गा नारा।
उनका किये विकास, जिन्होने थप्पड़ मारा।।
नाश खड़ा है द्वार, वोट के अरे दलालों।   
तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

भक्त खिलाते भक्ति, भाव से जिसको रोटी।
गौहत्यारे मार, उसी की खाते बोटी।।
भाईचारा भाँड़, जाय अब रार मचा लो।
तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

छ्द्मयुद्ध में रोज, वीरगति पाये सेना।
तुमको कुर्सी छोड़, नहीं कुछ लेना देना।।
हमसे लेकर वोट, हमें ही छलने वालों।।
तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

सब बातें बकवास, विकास बेकार तुम्हारा।
संकट में अस्तित्व, खड़ा है आज हमारा।।
विश्वविजय का दंभ, खोखला है मतवालों।
तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

न्यायमूर्ति अब न्याय, छोड़ बस गाल बजाते।
भ्रष्टाचारी और, दुष्ट पर प्रेम लुटाते।।
रौंदौ मत अस्तित्व, स्वयं के मोटी खालों।।
तृप्तिकरण व्यापार, बंद कर देश संभालो।।

शोभामोहन देख, देश की दुर्गति रोये।
सत्ताओं ने कदम, कदम पर काँटे बोये।।
निश्चित दिखता अंत, हिन्दुओं रक्त उबालो।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८१
अंधियारी पाख सावन तिथि - दशमी

(सरस्वती वंदना) झनक-झनक झन बीनाबजैया

(सरस्वती वंदना) झनक-झनक झन बीनाबजैया


कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।
सजा के संगीत सातों सुर में, गुँजार ले सबके मनलुभैया ।।
हे हाथ पुस्तक अउ अक्षमाला, मुड़ी खपाये मकुट रतन हे ।
सहस सुरुज कस उजास मुँहरन, बड़े बड़े मन गिरे चरन हे।।
सबो मँगैया अउ तैं देवैया, भगत के कारज तहीं बनैया।।

बजे ले बीना झरत हे अमरित, खनक भरे सुर नवा नवा ओ।
बरोय बुध ला बता के रद्दा, सुबाट में लेग दे भँवा ओ।।
नहीं गिनस दोस मनखे तन के, मोला अजम हे  अधमतरैया।।
कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।

समोख के सबला एकहत्थी, लुटात हस हँस के गुन खजाना।
रिखि-मुनि सुर-असुर सबो के, हे हाथ तोरे मति फिराना।।
सबो ले बढ़के पबित्र सुख ला, हकन के पाथे तोला भजैया।।
कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।

हे सादा लुगरा के ढीक सोनहा, जेकर किनारी झलल-मलल हे।
जबर गियानी अउ बिगियानी, तोरे तियारे करत टहल हे।।
तैं पापी मनखे के नाश करके, भगत के अंतस दीयाबरैया।।
कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।
तैं बुद्धि आरुग करेस जेकर, वो तो होगें नामी  भागमानी।
डंडासरन तोर हे शोभामोहन, जगतहेरौठा निचट अड़ानी।।
जगत समुन्द माँझधार बेड़ा, तैं हाथ धर अउ तरा तरैया।।

कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
सावन अंधियारी पाख दसमी तिथि
विक्रम संवत 2081।
शुभस्थान-महुदा 

Friday, 26 July 2024

जिसमें सुख दुख का झेल नहीं

 

 जिसमें सुख दुख का झेल नहीं

 

नयनों के पटल पर तो तुमसे, माना कि मेल नहीं। 

मन के मंदिर में भी न मिलो, इतने भी तो अनमेल नहीं।। 

जो हवा तुम्हें छूकर आती, वह मुझको भी तो छूती है

यह राख सा जीवन तेरे, संवेदन से बनी भभूती है

मैं स्मरण करूँ तुम आ जाओ, इतना उथला यह खेल नहीं।। 

कब प्रीत सुफलित हो पायी, इस हाड मास की काया में। 

तुम तो हो कहीं सुदुर शोभित, हम आनंदित है छाया में।। 

उस गाॅंव मिलों उस ठाॅंव मिलो, जिसमें सुख दुख का झेल नहीं। 

उस देश हमें ले चलो पिया, जिस देस सुखों की सौत नही।

क्षण क्षण ही जहाॅं महोत्सव है, लघुजीवन निष्चित मौत नहीं।।  

जब प्यास जगी तेरी प्यारे, तबसे भाता जग जेल नहीं

वो प्यार जिसे बाॅंटा तुमने, मीरा में राधा रानी में। 

वो तो पाकर पहचान गये, हम खोये हैं नादानी में।। 

है प्रीत दिवानी मस्तानी, रहती बन कहीं रखैल नहीं

जो लहर हमारे सीने को, मृदु कंपन से भर देती है। 

तुमको छूकर आयी लहरे, हिय आल्हादित कर देती है

साॅंसों की बंसी बन बजते, दो पल के तुम रंगरेल नहीं। 

माना कि मेरे सपनों का, कोई लौकिक आधार नहीं। 

क्या बैंरग ही लौटा दोगे, कहकर कि मुझसे प्यार नहीं।। 

भावों के कोमल भूतल हो, भवसागर के पथरैल नहीं

षुभ चन्द्रसूर्या षोभामोहन श्रीवास्तव

 

गीत भजन छंद (१)
हरिगीतिका छंद
2212 , 2212 , 2212 , 2212
लालालला लालालला,लालालला लालालला
1/
बीना धरे हे हाथ मा,साजे मुकुट अउ माथ मा ।
गनपति बिराजत छेंव कर,अउ माँझ लक्ष्मी साथ मा ।
हे हाथ मा पुस्तक धरे,बइठे कमल के फूल हे
करधन सजे पैजन बजे, मोती जड़े अउ झूल हे ।
2/
नथली फभे हे सोनहा, मुंँदरी सुघर अँगरी सजे
गर हार दुलरी तीलरी, चूरी सुघर कंगन बजे ।
अँधियार मनके टारथे,गुन ग्यान दियना बारथे।
संसार के दुख मेटके, मन कुंदरा ला झारथे।
3/
सुर ला सजा धुन ला बजा, संगीत सिरजावै उही।
भव पार बर पतवार अउ,जग नाच नचवावै उही।
मन नाद अनहत ला बजा,साधक सुजन ला तारथे ।
बस मध्यमा अउ वैखरी, दुख ताप संकट टारथे ।
[15/02, 13:18] : (चौपाई छंद)
बइठ कलेचुप गीत लिखत हँव
बइठ कलेचुप गीत लिखत हँव।
हारे दाम फलीत लिखत हँव ।।
मैं गरकट्टा के बस्ती मा ।
संविधान के रीत लिखत हँव।।
मनखे अतका बिदरंँग होगे ।
बाँटिन उँकर अनीत लिखत हँव ।।
बांँह पसार बलावत बेरा ।
बिपतियाय अतीत लिखत हँव ।।
मैं निहार पानी मा मुँहरन ।
होती के परतीत लिखत हँव ।।
बेरा के कलथी ला देखत ।
आँखी दिखे फबीत लिखत हँव ।।
[17/02, 17:05] : चौपाई छंद*
*कब आबे तैं बोल लहरिया*
बरसत बादर करिया-करिया।
जल बुँदियन छलकात गगरिया ।।
बरसत बादर.............................
1/
दूबी जामत ले बरसत हे ।
छान्ही परवा तरी धँसत हे ।।
खेत जोताय नइ इक हरिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया ।।
बरसत बादर ...............................
2/
सरी कोठ भर उपकत रेला ।
सोग लगत हे देखत तेला ।।
आँसू ढ़रकत फिजत अँचरिया।
कब आबे तै बोल लहरिया ।।
बरसत बादर ..........................
3/
गरजन घुमरन सुनके बादर ।
अंडा साँप फूटत भुँइया भर।।

छलकत बहकत नदिया तरिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया ।।
बरसत बादर ................................
4/
नभ मा बगुला पाँत उड़ावत ।
अउ भुँइया के जीव जुड़ावत ।।
मोरे मन धनहा हे परिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया।।
बरसत बादर ..............................
5/
बइठ बरेंडी कँउवा बोलत ।
गियाँ गड़ी बन हाँसत ठोलत।।
रहन धराये हे सुखलरिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया ।।
बरसत बादर............................
6/
लउकत बिजुरी देख डरत हौं ।
तोर बिगन दिन रात मरत हौं ।।
बज्र असन हे कटत उमरिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया ।।
बरसत बादर .....................
[27/02, 14:34] : चौपाई
*
संत पधारे के सुन बोली । सास दँउड़त निकलिस खोली ।।
बेटा ला लगिहात बलाथे । संत गोड़ छू पाँव पराथे ।।
सुरुज मनाये मन मा ठानी । देवमती सन तन मन बानी।।
भिनसरहा ले नदिया धावैं । कनिहा भर पानी मा जावैं ।।
अरग देत दिनकर ला पूजैं । जब्बर करमलेख ले जूझैं ।।
असकुस होथे दिन चढ़ जाथे । राम भरोसा बेर पहाथें ।।
शास्त्र उपनिषद दाई बाँचे । सुन -सुन भीतर लइका नाचै।।
*
[27/02, 17:04] : चौपाई
*
संत पधारे के सुन बोली । सास दँउड़त निकलिस खोली ।।
बेटा ला लगिहात बलाथे । संत गोड़ छू पाँव पराथे ।।
सुरुज मनाये मन मा ठानी । देवमती सन तन मन बानी।।
भिनसरहा ले नदिया धावैं । कनिहा भर पानी मा जावैं ।।
अरग देत सूरुज ला पूजैं । जब्बर करमलेख ले जूझैं ।।
असकुस होथे दिन चढ़ जाथे । राम भरोसा बेर पहाथें ।।
शास्त्र उपनिषद दाई बाँचे । सुन -सुन भीतर लइका नाचै।।
*
[28/02, 16:21] : चौपाई छंद अभ्यास
महतारी पथरा बरसाथे । अउ लइका बंदूक चलाथे।।
जे हर घटिया सीखा पाथे । अपने कुल के नाव बुताथे ।।1।।
जे दूसर बर अस्त्र उठाथे । उहू शस्त्र ले मारे जाथे ।।
दाई सतगुन नहीं सिखाथे । तब लइका मरजाद भुलाथे।।2।।
कब रक्सा के सुसी बुताथे । कतको झन ला मार सुताथे ।
आज नहीं तो काल भंँजाही । काल दुवारी ओकर आही।।3।।
लड़त-लड़त अपनो मर जाही । बेरा देही उँकर गवाही ।।
बड़े बड़े झगरंत चले गै । होगे सबके अंत छले गै ।।4।।
मया दया के बिगन चिन्हारी । पाप कमावत जब्बर भारी ।
जेन निहत्था के गर काटै । दूसर खातिर दुख उवाटै ।।5।।
अइसन मनखे चिन्हव चिन्हावौ । सावचेत सबला करवावौ ।।

मानवता के दुश्मन जानौ । हितवा मितवा नोहय मानौ ।।6।।
[05/03, 22:29] : फेर बसंती दिन आगे हे (शंकर छंद अभ्यास)
1/
फेर बसंती दिन आगे हे, छाय हे अनुराग।
कोकिल कुहकुह करत बना मुँह,देख गंध पराग।।
माते अनंग बगरात रंग, कली लचके डार।
अउ अमराई के रुखराई,साज डरिन सिंगार ।।
2/
चमकत आँखी धरके पाँखी,उड़त जात अगास।
जब गौतरिहा पिय लहरिया, दिखत नैन
परास ।।
भाग ह खुलगे सपना झुलगे,झनकगे मन तार।।
झूमत गावत रंग उड़ावत, आय हवय तिहार।।
3/
मंद चढ़ाये असन जनाये, सृष्टि के व्यवहार।
जीयत जागत जइसे लागत,सब डहर संसार।।
रंग सुहावन संग सुहावन, पधारे हे कंत ।
जोग जगाये जोगी गाये, मया गीत बसंत ।।
[05/03, 23:43] : 1/
भीड़ भड़क्का धक्का मुक्का,अबड़ दे आनंद।
एक्का दुक्का छटके रहिके,होय सुख हर मंद।।
भीड़ करै जब भड़भड़-भड़भड़,होय हलचल हाट।
सइमो-सइमो गाँव गली घर, होय रद्दा बाट।।
2/
कतको दिन के भूले बिसरे,मेल मेला होय ।
सुरता करके जीव जुड़ावै,जब अकेला खोय।।
कुंभ नहाये कतको मनखे, जाय गंगा घाट।
जुरै करोड़ो मनखे सिगबिग,भरे नदिया पाट ।।
3/
जतके जादा भीड़भाड़ हो,मन ह हरियर होय।
मगन होय सब बड़ सुख लागै,फिकर नहीं बिटोय।।
फेर भीड़ हा भगदड़ होके, करै सत्यानाश।
होय देख तो मनुखबाहिर, दिखै रक्सा रास ।।
4/
भीड़ बिगन गड़हन के होके, मरे मारे जाय।
भोगै जब परिनाम ल पाछू, सोच के पछताय।।
भीड़ उमड़ बइहा पूरा कस, चलत मार मुसेट।
जेन बाट मा भीड़ चलत वो, सबो लेत चपेट।
[05/03, 23:50] : फेर बसंती दिन आगे हे (शंकर छंद अभ्यास)
1/
फेर बसंती दिन आगे हे, छाय हे अनुराग।
कोकिल कुहकुह करत बना मुँह,देख गंध पराग।।
सब मतंग हे गमक रंग हे, कली लचकत डार।
अउ अमराई के रुखराई,साज डरिन सिंगार ।।
2/
चमकत आँखी धरके पाँखी,उड़त जात अगास।
जब गौतरिहा पिया लहरिया, दिखत नैन
परास ।।
भाग ह खुलगे सपना झुलगे,झनकगे मन तार।।
झूमत गावत रंग उड़ावत, आय हवय तिहार।।
3/
मंद चढ़ाये असन जनाये, सृष्टि के व्यवहार।
जीयत जागत जइसे लागत,सब डहर संसार।।

रंग सुहावन संग सुहावन, पधारे हे कंत ।
जोग जगाये जोगी गाये, मया गीत बसंत ।।
[14/03, 16:15] : शंकर छंद (16/10)
छूटत मइया छूटत गइया, छूटत हवय गाँव ।
छूटत संगी अउ मनरंगी, कदम रुखवा छाँव।।
छूटत राधा परगे बाधा, रंगरेली रास ।
छूटत जमुना बनके पहुना, जात मथुरा हाँस ।।
[16/03, 11:18] : शंकर छंद अभ्यास
विषय हाहाकार
1/
एक करोना पारत रोना, काँपगे हे चीन ।
आज निकलगे हावय ओकर, भरे बोतल जीन।।
सड़क गली छाये सन्नाटा, ठप्प हे बैपार ।
बनन-बनन गिँजरइया मनखे, लहुटगे घरद्वार।।
2/
अंश जीव के निच्चट नानुक, करत हाहाकार।
सबो देश ला लपटत देखौ,मनुख मानत हार ।।
गाँव शहर मनखे विन सुन्ना, सबो हे गुम खाय।
घर घमंड के रीता होथे, बात सिरतो आय ।।
3/
जीव जंतु के हइता थमगे, अउ करुन गोहार।
ये प्रकृति आगू मा दिखथे,मनुख हर लाचार ।।
छोड़ माँस मसगिद्धा करथे,साग के आहार।
हाँथ मिलाये हवै भुलाये, होवत नमस्कार।।
4/
हें रुधाँय सब घर मा अपने, बचावत हे प्रान ।
सबके बुध हर परगे पातर, सटकगे अभिमान।।
पल मा परलय लाने सकथे, प्रभु हे बलवान।
तेकर सेती तज के छल-बल, नाम लौ भगवान।।
[16/03, 11:21] : शंकर छंद अभ्यास
1/
कोनो दिन तो कोनो छिन तो, सुने परही गोठ।
मोरो कलकुत पारे अउ हुँत,ए सजन मसमोठ।।
गीत रिझौना मैं नइ गावौं, थके हवँव बलात ।
काय मंँझनिया काय बिहनिया, साँझ का अउ रात।।
2/
बेरा काटौं गड्ढ़ा पाटौं, एक तोला जान ।
प्रान लुटावौं अउ सपड़ावौं, गुनौं लाभ न हान।।
मग मा काँटा सुख दुख बाँटा,देख नइ घबराँव।
मन हे बइहा रद्दा कइहा, अगम सुख के गाँव।।
3/
तोरे सुमरन तोरे घुमरन, धरे गुरुबर ग्यान ।
गावत साँसा धरके आसा, तोर मग भगवान।।
४/
छूटत अटकन छूटत भटकन, होत बाट अबाध।
परही आना सुनके गाना, मिलन के हे साध ।।
[20/03, 11:48] : शंकर छंद अभ्यास
1/
तोरे नत्ता तोरे सैना, जीव तोरे लाग ।
तोरे बाजा तोरे नाचा , गीत तोरे राग ।।
तोरे शासन तोरे आसन, दिये राशन तोर।
तोरे आखर मन के सागर, भाव भँवर हिलोर।।
तोरे माली पिंवरी लाली, रंग गंध पराग ।
माटी पानी सूरज दानी, अउ बगइचा बाग।।
देत गवाही आँही-बाँही, जिनिस तोर बनाय ।
मुश्किल भारी तभो चिन्हारी,रहिथँस तँय लुकाय ।।
[21/03, 18:45] : विष्णु पदछंद अभ्यास
मन बैरी भटके
झटकारे ले बिसयन कोती, किरनी कस चटके।
लपटे झपटे आनी-बानी,सँभर सँभर मटके।।
मन बैरी भटके ।।१।।
एक खेदारत दूसर धमकै,साध भँवा पटके ।
साध-सधौरा नार-लमेरा, ओरी धर लटके।।
मन बैरी भटके ।।२।।
सतफुलवा डुँहड़ावै जब तौ,धर डारी झटके ।
लाभ-हान के सबो गणित ला, राखे हे रट के।।
मन बैरी भटके।।३।।
बिख बुताय बेधाय बान हा,चिटको ना खटके।।
गिंजर बजरिया दृश्य लहरिया,आँखी जा अटके ।।
मन बैरी भटके ।।४।।
[23/03, 13:06] : विष्णुपद छंद
हरि सुमरन करना
*****************
जग अरझे बरजे हौं तैं झन,रोग बिसा धर ना ।
छोड़ सबो परपंचीपन ला,हरि सुमरन कर ना।।
हरि सुमिरन कर ना..................१/
घेरी-बेरी घानी-मूँदी,फोकट झन फिर ना।
कोनो अइसे कोनो वइसे,तोला का करना।।
हरि सुमिरन कर ना...............२/
ब्यापै नइ का अलहन धरके,पशु जइसे चरना ।
मृगतृष्णा बर निंदरत हावस,अंतस के झरना ।।
हरि सुमिरन कर ना ..............३/
काबर तैं मंजूर करे हस,बिसयन जग जरना ।
पाप पुन्न के जबर मोटरी,फिकर नहीं कर ना।।
हरि सुमिरन कर ना ...............४/
[28/03, 16:18] : विष्णुपद छंद अभ्यास
१/
काया माया नगरी डगरी, अरझाही भोला।
मोर-मोर कहि गाठँ बाँध झन, ये बस्ती टोला।।
२/
संतन नइ बाँचिन माया ले, का गुनही तोला ।
जुच्छा आना जाना जानत, भर डारे झोला।।
3/
कोन दिही सुख सबके भीतर, हे आगी गोला।
हुसियारी मा बात बिगड़ही, तज दे अब ओला।।
4/
बिरथा जग मा ओंड़ा झन दे, हो जा अनबोला ।
शोभामोहन अलख जगा ले, आवत ले डोला।।
[01/04, 21:02] : विष्णुपद छंद अभ्यास
१/
काया माया गरब बूड़के, शेर असन गरजे ।
मोर-मोर कहि धरे रपोटे, नइ माने बरजे।।
२/
पाप कमाई फल ल पोगरी, भोगे बर परही ।
पर के बाना मारे हावस, रचे पाप खरही।।
३/
करमदंड भुगते बर परही, चुप पीरा सहिके।
बोचक नइ पाबे दुख ले तै, ओ घेरा रहिके।।
४/
ग्यानी ला नइ बरै गुनै ते, का तोला गुनही ।
पाप करे हस फल देये बर, बात नहीं सुनही।।
५/
बिरथा जग मा ओंड़ा देके, प्रभु ला नइ सुमरे ।
घानी फाँदे बइला जइसे, बिन थिराय घुमरे ।।
६/
दोस लगाके अब कोनो ला ,काँही झन कहिबे।
मन के धार ल बहकाये बर, उदिम करत रहिबे।।
[09/04, 19:33] : *विष्णुपद छन्द*
1/
ज्ञान धरा विज्ञान बियावन,
वेद लिखाय रहे।
पशुपन उपरित मनुख करे बर,
शास्त्र बनाय रहे ।
2/
बेद बचन बड़ गूढ़ हवै गुन,
अउ अरथाय कहे ।
गढ़े उपनिषद सार वेद के,
पढ़ गुन पाय कहे ।।
3/
अकबकाय झन चकचकाय झन,
अउ समझाय कहे।
गीता मा सब सार डार के,
अउ दुहराय कहे ।।
4/
नानिक नाम धराये सुमिरे, जीभ पिरावत हे।
जौंरा भौरा बेरा कौंरा, जीव बन जावत हे ।।
**************
[09/04, 22:02] : विष्णुपद छंद अभ्यास
१/
काया माया गरब बूड़के, शेर असन गरजे ।
धरे मोर धन कहे रपोटे, नइ माने बरजे।।
२/
पाप कमाई फल ल पोगरी, भोगे बर परही ।
पर के बाना मारे हावस, रचे पाप खरही।।
३/
करमदंड भुगते बर परही, चुप पीरा सहिके।
बोचक नइ पावस रे हंसा, ओ घेरा रहिके।।
४/
ग्यानी ला नइ बरै गुनै ते, का तोला गुनही ।
पाप करम के फल देये बर, पोनी कस धुनही।।
५/
बिरथा जग मा ओंड़ा देके, प्रभु ला नइ सुमरे ।
घानी फाँदे बइला जइसे, बिन थिराय घुमरे ।।
६/
दोष लगाके अब कोनो ला ,काँही झन कहिबे।
मन के खार ल चतवारे बर, उदीम करत रहिबे।।
[10/04, 17:23] : छन्द -विष्णुपद
तोर चरन ले निकले गंगा,सबके पाप हरे ।
चरन धरइया के चंचलपन अउ सब बिपत टरे ।।1।।
तोर चरन के अनुरागी मन,छेंवें छेंव चलै।
तोर दया छँइहा मा रहिके,फूलै अउ फलै ।।2।।
तीन कदम मा तीन लोक ला,पल मा नाप डरे ।
राजा बलि के ताप नवा के,मन मा भक्ति भरे ।।3।।
तोर चरन सेवा कर लक्ष्मी,धनिक कुबेर करे ।
तोर चरन मा ध्यान लगइया,भव अथाह उबरे ।।4।।
[20/04, 14:18] : जयकारी छंद
रंग मंच कस रच संसार । ईश्वर बनगे गम्मतकार ।।
सिरजत हावय अपन उझार । पाठ सबो के कर तैयार ।।1।।
खुल्ला नभ बनाय पंडाल । भुँइया जम्मो मंच विशाल ।।
पाठ निभाये कला दिखाय । एकक करके जीव बलाय।।2।।
जोक्कड़ परी नजरिया नाम । गम्मत अनुहर रूप व काम।।
पाठ मंच मा जेकर आय । नाटक करके उही दिखाय।।3।।
दंतकंथली हे भरमार । सिगबिग-सिगबिग करत अपार ।।
दरसनिया तक मजा उड़ात । पीट थपोड़ी हाँसत गात ।।4।।
कोनो मया दया बरसात । कोनो अँगरा आगी खात।।
किटकिटात कोनो बगियात । ककरो हाँसी कहूँ उड़ात ।।5।।
कोनो झगरा करे उचात । मन ला मारे कहूँ झँवात।।
कोनो हर बंदूक चलात । कोनो मारत पथरा घात ।।6।।
कोनो हर ड़डा बरसात । मार निहत्था लोग सुतात ।।
कोनो बोलत आभा मार । कोनो थूकत हवय खखार।।7।।
कोनो सब दिन रहै रिसाय । कोनो सबके जीव जुड़ाय।।
सरलग नाटक कोन कराय । जाने बिन गै सबो बयाय।। 8।।
कोनो चलत धरम के बाट । पाप करत कोनो गर काट ।।
जे नाटक मा हे बइहाय । कोनो बैरी हितू बनाय।।9।।
रमगे अतका नाटक प्रान । झूठ लबारी ला सत मान ।।
कोन नचावत हावय नाच । जाने बिन टघलत हे आँच ।।10।।
[02/05, 11:19] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
बने शहरिया बदले भेस।।
महतारी कतकोन बलाय।
तभो न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
शहर डहर के रंगे रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिगन नेवता बिन परघाय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे मन मा तूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
बिपत म सुरता आइस छाँव।।
[02/05, 12:59] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
होय शहरिया बदले भेस।।

महतारी कतकोन बलाय।
फेर न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
रंगे शहर डहर के रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिन परघाये बिन नेवताय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे ओही धूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
सुरता आइस बिपत म छाँव।।
[02/05, 14:14] : गुरुबर मोर सुनौ गोहार(जयकारी छंद)
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।
ड़ोगा मोर लगा दौ पार ।।
रहिथौं तुँहर भरोसा भार।
कलकुत ड़डासरन तुँहार ।।
रद्दा मा हे अड़बड़ आड़ ।
देवै करम कहूँ झन छाँड़ ।।
रेंगत हावँव खारे -खार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
हौ उदार तुमन महराज।
हाथ तुहर अब हावै लाज।।
उतरे दहरा पार अपार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
ज्ञानमूर्ति हौ हे भगवान ।
मोला निचट अड़ानी जान।।
मोर उपर कर दौ उपकार ।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
फरसा ज्ञान तुहँर बड़ धार ।
काटौ मन घपटे अँधियार ।।
बिनती करथौं बारम्बार ।।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
[02/05, 16:22] : गुरुबर मोर सुनौ गोहार(जयकारी छंद)
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।
ड़ोगा मोर लगा दौ पार ।।
रहिथौं तुँहर भरोसा भार।
कलकुत ड़डासरन तुँहार ।।
रद्दा मा हे अड़बड़ आड़ ।
देवै करम कहूँ झन छाँड़ ।।
रेंगत हावँव खारे -खार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
हौ उदार बड़हर महराज।
हाथ तुहर अब हावै लाज।।
उतरे दहरा पार अपार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
ज्ञानमूर्ति हौ हे भगवान ।

मोला निचट अड़ानी जान।।
मोर उपर कर दौ उपकार ।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
फरसा ज्ञान तुहँर बड़ धार ।
काटौ मन घपटे अँधियार ।।
बिनती करथौं बारम्बार ।।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
[02/05, 20:17] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
होय शहरिया बदले भेस।।
महतारी कतकोन बलाय।
फेर न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
रंगे शहर डहर के रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिन परघाय बिन नेवताय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे ओही धूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
सुरता आइस बिपत म छाँव।।
[02/05, 20:30] : गुरुबर मोर सुनौ गोहार(जयकारी छंद)
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।
ड़ोंगा मोर लगा दौ पार ।।
रहिथौं तुँहर भरोसा भार।
कलकुत ड़ंडासरन तुँहार ।।
रद्दा मा हे अड़बड़ आड़ ।
देवै करम कहूँ झन छाँड़ ।।
रेंगत हावँव खारे -खार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
हौ उदार बड़हर महराज।
हाथ तुहर अब हावै लाज।।
उतरे दहरा पार अपार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
ज्ञानमूर्ति हौ हे भगवान ।
मोला निचट अड़ानी जान।।
मोर उपर कर दौ उपकार ।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
फरसा ज्ञान तुहँर बड़ धार ।
काटौ मन घपटे अँधियार ।।
बिनती करथौं बारम्बार ।।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
[04/05, 12:14] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
होय शहरिया बदले भेस।।
महतारी कतकोन बलाय।
फेर न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
रंगे शहर डहर के रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिगन बलाये अउ परघाय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे ओही धूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
सुरता आइस बिपत म छाँव।।
[04/05, 15:18] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
होय शहरिया बदले भेस।।
महतारी कतकोन बलाय।
फेर न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
रंगे शहर डहर के रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिन बलाय अउ बिन परघाय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे ओही धूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
सुरता आइस बिपत म छाँव।।
[04/05, 15:19] : जयकारी छंद
बड़ विचित्र लगथे संसार ।
ककरो बर तो नियम हजार।।
अउ कोनो हर बने विशेष ।
टोर नियम ला करथे ऐश ।।
एक नियम हे कहिथे लोग ।
बात नहीं हे माने जोग।।
एक भतीजा भाई वाद ।
दिखथे सबो जगह आबाद ।।
टारे बिन विशेष अधिकार ।
मन मा खटका होय सवार।।
काबर नइ हे नियम समान ।
भेद बता दौं हे गुनवान ।।
[05/05, 09:43] : बुढ़ौंतीपन (जयकारी छंद)
थकही जे दिन हाथ व गोड़ ।
बिरथा लगही सब गठजोड़ ।।
देंह झपाही अनगिन रोग ।
अउ कोनो नइ करही सोग ।।
छाती मा अँगरा कुढ़वाय ।
ओ दिन परही बड़ पछताय ।।
कोनो हर नइ सुनही बात।
रंग बदलहीं सग सगियात ।।
गुन गुन कटही दिन अउ रात ।
मोह मया के बदला घात ।।
आँखी घपट जही अँधियार ।
बइठे रहिबे मन ला मार ।।
डेरौठी के बन रखवार ।
हूँत कराबे बारम्बार ।।
कोनो हर नइ देही कान ।
तोर करेजा लगही बान ।।
खँगही जाँगर झुकही नैन।
बेमतलब हो जाही बैन ।।
दाँत टूट कोचरही माँस।
मुश्किल होही लेना साँस।।
छूट जही सँगवारी साथ ।
अउ कुछु नइ तो आही हाथ ।।
नइ भाही तोला संसार ।
अंग ओढ़ना लगही भार।।
मनखे चोला दुर्लभ जान ।
का करना तेला पहिचान ।।
सुमिरे धर ले पबरित नाम ।
दुख नइ ब्यापन देवै राम ।।
[05/05, 11:07] : आखर किल्ला भसकत जात (जयकारी छंद)
बोलत मूँड़ा दसो जनात ।
आखर किल्ला भसकत जात ।
तोर रूप मा मन मोहात।
बोले सकत नहीं मोकात ।।
चिटको नइ सुख साध सुहात ।
भोग-रोग बन नही सतात ।।
संसो फिकर न घुन्ना खात ।
तोर डहर मन बहकत जात।।
का बिहान अउ संझा रात ।
हाथ धरे जब पिया चलात ।।
का जियानही जुन्ना बात।
भँउरी छूटत मन हरसात ।।
[13/05, 15:01] : *रूपमाला छन्द (मदन छन्द)*
रूपमाला रूपमाला, रूपमाला रूप
लाललाला लाललाला, लाल लाला लाल
१/
ये जगत अइसे किसम के,हे रचे करतार ।
बोदरा खखरा दिखत अउ,हे लुकाये सार ।।
सार हावय देह आत्मा,फेर दिख नइ पाय ।
देह भिन्ना ला नसनहा,तो सबो पतियाय ।।
२/
प्रभु हरै सब लोक मुखिया,नइ दिखै जग खार।
अउ रचे ओकर प

छत्तीसगढ़ी के पहिलैया वर्णिक छंद पांडुलिपि

 1/तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे
(कलाधर छंद)
2/इन्द्रिय भोग करावन न्यारे  (मत्तगयंद सवैया)
3/आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी (मत्तगयंद सवैया)
 4/मैं अड़ही कड़ही जग जानत (मत्तगयंद सवैया)
5/ पीयन ना ककरो अब मानी (मत्तगयंद सवैया)
6/लाज मरे बृषभानु दुलारी (मत्तगयंद सवैया)
7/राउर द्वार रहौं बन रंका (मत्तगयन्द सवैया)
8/ खाबे कमाबे सुआ बेटीअसीद (शार्दूल विक्रीड़ित छंद)





1/तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे
(कलाधर छंद)


लोभ हे मोह हे न शोक हे न काम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
ज्ञान के गुमान हे न हीनमान ध्यान हे।।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
रात प्रात मध्यकाल दिव्य नाम प्रान हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
भक्ति भावपूर्ण हहो भुलाय रूप चाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
प्रीत में पगाय हे अनाम हे अकाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
रोग हे न शोक हे न जेवनी न बाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
कोहे न द्रोह हे न छोह हे अकाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
गेह के न मेह के न देह के गुलाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे।।
रंग चंग संग लोभ हे न तामझाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
नाम रूप में बुड़े गुनान झीमझाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
नाव गाँव भेव हे न जेब में छदाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
ना जनास हे झड़ी झकोर जाड़ घाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
विश्व बियाप्त दुःख सुःख में लगे बिराम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
शांत चित्तवृत्ति हे जिहाँ रमे अराम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।


 2/इन्द्रिय भोग करावन न्यारे  (मत्तगयंद सवैया)


देह रचे अजगूत धरा गुन,इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।
दे मन चोर मड़ाय मँझार म,अंतस संपत लूटन सारे ।।
बुद्धि धराय गुनान भँजाकर,अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।
रूप निरंजन जोत बरै शुभ,ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

 
3/आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी (मत्तगयंद सवैया)


आकर कंकर आखर शंकर आखर मा अँगरा अउ आरी।
आखर मंतर आखर जन्तर आखर तन्तर आखर चारी ।
आगर मंगन आखर रंगन, आखर दंगन ले मुँह टारी ।
आखर पारस आखर सारस आखर मा रस हे बड़ भारी ।।

आखर उज्जर भावबेलुज्जर आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी ।
आखर मारन आखर तारन आखर जीत व जीव हतासी ।
हे मनभावन ताप नवावन, आखर उच्छल मंगल हाँसी ।
आखर शारद आखर नारद ज्ञानबिसारद भारत काशी।।

 4/मैं अड़ही कड़ही जग जानत (मत्तगयंद सवैया)

देह रचे अजगूत भरे गुन, इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।
हे मन चोर मड़ाय मँझार म, अंतस संपत लूटन सारे ।।
बुद्धि धराय गुनान भँजाकर, अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।
रूप निरंजन जोत बरै शुभ, ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

रात पहाय थिराय बिछावन, नींद सुते सपना सपनाथन ।
ठाठ परे रहिथे खटिया कर, चेतन रूप धरे बुल आथन ।
देह नहीं हम चेतन आवन, छोड़ तभें तन घेर उड़ाथन ।
काबर फेर सहे दुखदालिद, देहरमे दुखभाग लिखाथन।।

चेतन रूप बसे प्रभु भीतर, नैन हमार निहार न पाये।
छाय चराचर में प्रभु तौ फिर,कोन करा हस बोल लुकाये।।
खोजत बेर ढ़ले बर जावत, कोन बिधान बताव जनाये ।
मैं अड़ही कड़ही जग जानत, खोजत हौं बिन देह हिराये।

 
5/ पीयन ना ककरो अब मानी (मत्तगयंद सवैया)

जात गुवालिन के गुनिया हम ज्ञानगुनान ल का हम जानी।
गोरस दूहन माखन हेरन गोबर थापन जानन ज्ञानी ।
कारज मा दिन रात खँटावन हे घर के सगरो जिनगानी ।
नाम अधार धरेन जिये बर पीयन ना ककरो अब मानी ।।

का समझावन आय उधौ तँय कोन पठोयधिरोय बता तैं।
नून जरे म मिंजे अउ हाय इहाँ झन फोकट ज्ञान जता तैं।
ये बिरहा अगनी म भुँजावत अंतस ला झन बेध सता तैं ।
जानस तौ अतके ल बता बस सुंदरमोहन सोर पता तैं।

मूड़ मुड़ाय तियार खड़े हन का छुरिया हम ला डरवाही।
हाँसत थूँकत जात-सगा मन गोड़ बढ़े नइ छेकन पाही ।
उम्मर के दियना भर तेल ल साँस भला कइसे उरकाही।
कोन हमार बसे सुख गाँव हवै नजराय  दुखहाही ।

आय उधौ हर ज्ञानघमंड भरे जब फोकट ज्ञान बघारे ।
तत्व बतावन बोध करावन द्वैत अद्वैत विभेद उघारे ।
गोकुल गाँव म गोड़ मड़ावत ज्ञान घटा घपटे अँधियारे ।
ओमन ला समझावन आवत जे सुख लूटत ज्ञान बिसारे ।।

ब्रम्ह बिचार बतात बिल्होरत, बोलत ज्ञान जतात गुमानी ।
भौं नइ देवत हे रउताइन, जानत जावन बाट सयानी।।
प्रेम अनेम पराग झरावत, होवत उत्सव के दहकानी।
गोकुल गाँव जिये सुख लूटत, माँ जसुदा मइया मन बानी।

नाम नहीं जिभिया हम लानन जीव ह काकर मूँह अमाही।
कोन घड़ी दिखही पिय के मुँह देख

 6/लाज मरे बृषभानु दुलारी (मत्तगयंद सवैया)

बूलत जावत हे जमुना कत, मोहन हाथ धरे सुकुमारी ।
हें अँखियावत हाँसत साँवर, लाज मरे बृषभानु दुलारी।।
लाज भरे बड़का डग मारत, बाट मया तलवार दुधारी।।
बाजत हे चुरिया अउ कंगन, वो धुन लागत हे सुख भारी।।


7/राउर द्वार रहौं बन रंका (मत्तगयन्द सवैया)

भीतर सेज सुते रसिया अउ,पापिन झाल न पावँव पंखा ।
भूल पिया घर काज जिहावँव,आगर के उपजै मन शंका ।
मार डरै डर लाज जरै जग,राउर द्वार रहौं बन रंका ।
रेंगन चाहँव संग महूँ पर, हौं जस पाट नदी कर अंका ।

हाँ बिरथाजिनगी अब लागत, कोन मिटावय माथकलंका।
बाट बनावँत जावँव पी कत,बोरझरी अरझौं अरझंका ।
लोक तिनो अउ चौदह भूवन, बाजत हे रसिया कर डंका ।
राघव ले बिछड़े सिय लागत, प्रान बियाकुल कंचन लंका ।

 
8/ खाबे कमाबे सुआ बेटीअसीद (शार्दूल विक्रीड़ित छंद)


न्यौता पीतर देव डीह पुरखा, दे बाप फेरी करे ।
दाई संग मनात देव कुल के, छाया हँथेरी करे ।।
बेटी फूल सरीख आज अँगना, होये बिहाती खड़े ।

देवौ आव असीद देव दुल्हा, हे भाग जागे बड़े ।।

लानौ ओ सँवार माँझ मड़वा, फूफू सुवासी धरे ।
भौजी पीस लगाव तेल हरदी, दाई ह आँँछी करे ।
जम्मो नेग नता निभाव बढ़के, बोली सुवासी झरे ।
आये हे घर में बरात दुलरू, कैना बिहाये बरे ।।

जोड़ी-जाँवर हे फबे सुघर के, बाजा रुँजी हे बजे ।
चूरी अम्मर होय माँग दमकै, रानी दुलारी सजे ।।
सोहागीन सखी भरौ अँजुरिया, खावैं जुड़ावैं धिया ।
पाही आज असीद तेन फुरही, आवौ असीदौ ददा ।।

काँटा गोड़ गडै़ झने जुगल के, आवौ असीदौ बबा ।
दूधे खाय नहा अँचोंय बिलरी, आवौ असीदौ कका ।।
बाढ़ै वंश सदा रहै सुख सबो, आवौ असीदौ ममा ।
जोही हा फल फूलके  मगन हो, आवौ असीदौ मया ।।

जोंड़ा पाँव पखार नैन जल ले, आँसू ददा हा ढ़कै ।
दाई के गति ला बता शबद मा, कोनो नहीं तो सकै ।।
भाई रोत कहै सुजान बहिनी, भौजी कहै जा गड़ी ।
दाई के अउ नैन धार बरसै, ना तो थिरावै झड़ी ।।

माया गाँव बिराजमान रहिना, बेला लमा वंश के ।
जुग्गा नाम जगात भागधर हो, जोडी़ चरौ हंस के।।
ओली मा शुभ के भरे अँजुरिया, ड्योढ़ी अमाबे सुआ।
शोभामोहन देत हे बिदा बिटिया, खाबे कमाबे सुआ ।।




ऋतुराज-छन्द वसन्ततिलका

ऽ   ऽ । ऽ ।   । ।   ऽ ।   । ऽ ।   ऽ ऽ
लाला ललाल ललला, ललला ललाला

बेरा बसंत बग ले,
जग ला रँगागे।
बेला बिंयार बखरी,
भितिया छबागे।।
डारी चुटुक्क चुक ले,
डुहँरू धरागे ।
झूला झुले लठर के,
भँवरा बयागे।।

चुन्दरी उड़ात पुरवा, सुघरी लजागे।
सुन्ना अगास मन के,
सपना गँजा गे।।
छागे बसंत बइरी,
दुख ला बढ़ागे।।
गेहे बिदेस सँइया,
सजनी झँवागे।।

झाँकै झटाक झरखा,
नयना दसे हे।
जाके बिदेस बिसरा, 
रसिया बसे हे।
ठट्ठा करे सखि सबो,
नइ वो हँसे हे।


शोभामोहन श्रीवास्तव




भुजंगप्रयात छंद

ललाला ललाला ललाला ललाला 


तर्ज - तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही पूजा

तुम्ही देवता हो


१/

महादेव भोले महानंद दाता। 

परौं पाँव तोला जुहारौ बिधाता।।

सबो मंत्र सिद्धि दिलैया दयालू।

तहीं छाय सब्बो मुड़ा में कृपालू।

२/

सबो भार भोले तहीं हा सँभारे।

नहीं भक्त के पै न खूबी बिचारे। 

कहूँ तो नहीं तोर हे हारिहारा। 

इही पायके तै सबो ला पियारा।।

३/

नहीं पक्षपाती महादेव भोला।

तभे तो कहे हें सबो पूज्य तोला।। 

अगासी हवै रूप वा तोर चोला।

नपावै नहीं तोर काया न टोला।।

४/

तुहीं ला उपासौं तुही ला अराधौं।

रुलाये म रोवौं हँसाये म हाँसौ।

न जानै सुज्ञानी त मैं तो अड़ानी। 

तहीं ओम के मूल तैं ब्रम्हज्ञानी।। 

५/

नहीं राज शंभू तभो तै ह राजा। 

बसेरा पहाड़ी भुजंगा समाजा।।

सबो शब्द के पार भोले रहैया। 

सबो ज्ञान के पार तैं तो गुसैया। 

६/

सती के गुसैया जु कैलाश वासी। 

मुँदे नैन तै पारब्रह्म उपासी।। 

भभूती रमाये मुड़ी माल डारे। 

तहीं काल ला नित्य बूता तियारे।

७/

तहीं तो उदाली तहीं तो दयाला। 

तहीं ज्ञान के दिव्य भंडार वाला।

तही पार संसार सीमा रहैया। 

जटा बाँध के मूड़ गंगा बहैया।। 

८/

नवा माथ स्वामी परौं नाथ पैंया। 

सबो विश्व के एकहत्थी चलैया।।

करा के सहीं दग्ग ले शील तोरे। 

करै मोहनी दिव्य तोरे अँजोरे।।

९/

गहीरी सदाथीर मंतार भोला। 

हवै जग्ग ले दीपदीपात चोला। 

सबो जीव के माँझ में तैं बसैया।

सिया राम तोरेच में हे रमैया।।

१०/

सबो देवता गात हें तोर गाथा। 

जटा माँझ गंगा टँके चन्द्र माथा।

हवै साँप डोमी बने तोर माला।

तिहूलोकस्वामी कुभेसी निराला। 

११/

दुनो कान में ओरमें तोर बाला। 

चले तूलिकाभौंह आँखीबिसाला। 

हवै रूप में भाव जम्मो थिराये। 

महूँ गान गावौं जथा विश्व ध्यावै। 

१२/

तहीं देव के देव हाला पियैया। 

मँझारी धरे कंठ में तैं जियैया। 

निजी भोगभूले महादेव न्यारे।। 

सदा विश्व कल्याण तैं हा बिचारे। 

१३/

सबो ले बड़े दानदाता दयाला। 

हवै ओढ़ना तोर तो बाघछाला।। 

तही झार दे मोह जंजाल झाला। 

प्रभो तोर छोड़े कहौं दुःख काला। 

१४/

सबो के जनैया सबो के हनैया। 

परौं पाँव घोन्ड़े सँगे शक्ति मैया।। 

महाभेस वाला महारूप वाला। 

महादेव शंभू सबो ले निराला।। 

१४/

सती के पिया देख पापी डरावैं।

सदा भक्ति ले भक्त सेवा बजावै। 

सहस्त्रोन आदित्य के हे अँजोरी। 

रिझाये उमा बाँध के प्रीत डोरी।। 









१५/

मया के लुटैया मया में रमैया।

सदा भक्त के वक्ष माँझा समैया।

नहीं तोर तो मूल ला खोज पावै। 

सबो देवता 




सदाकाल ले जीव तोरे सहारे।





मनहरण घनाक्षरी) 


राम रट राम रट, राम बसे घट-घट,

संसो के चिरइया उड़ जाही भर-भर ले ।

बेरा बड़ा बलकर, ओकर जतन कर,

फर हर फरे झर जाही झर-झर ले ।

बेरा संग झन खेल, अउ दुख झन झेल,

अइलाही फूल जेन फूले चर-चर ले ।

पयडगरी सुघर, हरि भजन के धर,

दूरिहाय जगत के दुख सरभर ले ।



घनाक्षरी छंद 


परबतिया ला देखौ शंभू मेर चेंध चेंध,

जगसुख सेती सब पोथी सिरजाय हे।

सीता सत डटे रहि पति पत राखे बर,

जगसुख सेती सब पोथी सिरजाय हे।

रत्नारानी ला देखौ माया परे तुलसी ला,

राम मा रमाये मन लहर लगाय हे।

जब जब देखहू लहुट के रे मनखे हो,

पग पग तिरिया हा जग ला रेंगाय रे।।


शोभामोहन श्रीवास्तव

 

ईश सुमरनी घनाक्षरी 


हरि के बनाय देह,

हरि के जगत गेह।

हरि के जिनिस ला हरि ला चढ़ाय रे।

हरि जगसुख सोती,

हरिच के जीव जोती।

मृणमय चिनमय हरि सिरजाय रे।

हरि ले मिलन बर, 

भज सुमिरन कर।

हरिच के अंश जीव हरि में समाय रे। 

एको छिन गॅवा झन, 

मया गढ़ा मने मन। 

जग जनमे मनुख चोला जब पाय रे। 


शोभामोहन 

११/०४/२०२२




ईश सुमरनी घनाक्षरी 


तोर हाड़ा हपट के जोरे सब चीज बस, 

नाशवान तभो ले हवस बइहाय रे। 

गजब डउल कर फुनगी मा पहुँचेस, 

खसले के डर फेर जीव में समाय रे। 

रचेस सजन संग मिलन जुलन खेल, 

मिलन के संग फेर बिरहा लिखाय रे।

चटक मटक चरदिनिया जिनिस बर, 

ओंड़ा दिये हरि नाम हस बिसराये रे। 


शोभामोहन

जलहरण घनाक्षरी 


नाम हे अपार तोर चरित अपार तोर, 

रूप हे अपार तोर समझ न आय प्रभु। 

गुन हे अपार तोर करम अपार तोर, 

सरसती तक नहीं सकै गुन गाय प्रभु।

दरस अपार तोर परस अपार तोर, 

जेन ला छुवस बस उही ला जनाय प्रभु।

दया हे अपार तोर मया हे अपार तोर, 

मनखे ला अपन घरान में मिलाय प्रभु।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव


गुनान मनहरण घनाक्षरी 


दशरथ कस नहीं कभू प्रभु प्रीत करे,

कौशल्या असन नहीं संजम जगाय हो।।

कैकई कस कलंक लिये ना अपन मूड़,

सीता कस नहीं पति धरम निभाय हो। 

बंधवा भरत कस राजा नहीं बन सके

लखन असन नहीं सेवा मन लाय हो।

भजन करे ना कभू सजन मनाये बर, 

छुतहा चेत हा कइसे रामधन पाय हो।। 


शोभामोहन 

२३/०३/२०२२


भगत के मति अउ गति

(१)

अहम के भाव तजे, परमात्मा ला भजे,

सुख दुख मा उहीच, ला सुमिरथे सचेत ।

तज भेदभाव मन, जीव दया कर प्रन,

गरब गुमान हन, प्रभु ला परम नेत।

दुख में न रोय गाय, सुख बर ना ललाय,

एक ईश ला मनाय, जग जीवसुख देत।

करै कहूँ अनभल, करथे ओकरो भल,

हरि भज पल पल, बड़हर सुख लेत।

(२)

लाभ अउ हान घुँचे, हार जीत पार ऊँचे,

हरहिन्छा दान रुचे, वह सब सुख पाय।

छोड़ सबो कलकल, गोठ बात भलभल,

तज मन हलचल, तन जीते बर जाय ।

परमातमा मा टेके, तन मन राखै छेंके,

एती ओती नइ देखे, प्रभु मन मा बसाय।

कोनो हा उदिम करे, कुड़काय रीस भरे,

तभो अमरित झरे, अरि थक हार जाय।

(३)

कुड़काय ना कहूँ ला, बगियाय ना कहूँ ला,

झगराय ना कहूँ ला, रीस रोस रहै पार।

जगत जिनिस बर, ओला नइ धरै जर,

माटी लेख चोला घर, गुनय फकत सार।

देखके बढ़त पर, सुख पावै बड़हर,

इरखा डाह उबर, बिन डर बिन भार।

चार कोस दूर रीस, परै ना पाँच पचीस,

सुमरत एक ईश, बहय जगत धार।

(४)

गड़ै नइ आस फाँस, तन मन एक रास,

सब संग बोल हाँस, पबरित बेवहार।

चिन्ह के अपन दोस, सरलग रहै होस,

डहरसाजी न रोस, सब बेर शुभ धार।

कभू ना होवै बिहल, रहै एक ईश बल,

लीला जान हलचल, अटल दियना बार।

भोग मा नहीं भुलाय, आत्मा नहीं सुलाय,

आसरा नइ ढुलाय, राखै मन दूर टार।

(५)

भोग नाश देख डर, धरै नहीं रोये बर,

राखै मन टाँठ कर, परमेश के अधार।

पाये अउर अपाय, बर ना मन झपाय,

सुख साध दुरिहाय, चेत ला रखै उलार।

शुभ वा अशुभ फल, एक लागै तप बल,

चेत बुध निरमल, सम लागै बैरी यार।

अपमान अउ मान, जानै वो एक समान,

बात धर नान नान, टौरै ना धीरज पार।

(६)

सरद गरम सम, सुख दुख जान भ्रम,

चेत उटँग बिरम, घुँचे घुँचे मोर तोर।

चाहे कहूँ सहराय, चुगली करै सुनाय,

देह ना चटक पाय, ईश धुन मा सजोर ।

चरचा में दिन निश, सुमरत जगदीस,

दुनिया ले कोस बीस, दुरिहा रहै अँजोर।

पर के ना करै बात, बस प्रभु गुन गात,

अपन दिन पहात, मन नाम गुन बोर ।।

(७)

प्रभु बर मया जगा, भजन में जीव लगा,

सबो ला नजीक सगा, समझे अउ परिवार।

मन राखथे संतोष, देवे ना कहूँ ला दोष,

करथे सबो ला तोस, मोह नहीं घर द्वार।

बूध प्रभु  पद थीर, धरम ला धर धीर,

तीरथ किंजर फीर, सरधा ला बढ़वार।

भगत के गुन गन, गावत शोभामोहन,

करे बर ठंस मन, होये बर भव पार। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२०/११/२०२०

पाटन


जलहरण घनाक्षरी (वर्णिक छंद) 


बिन तारा बिन कूची, पोठ रोठ नान बूची,

मनखे ला माया छाँद राखै जग जेल प्रभु।

मड़ा सुख सुविधा ला, भोग रोग दुविधा ला,

बिलमाये राखै जीव रच यह खेल प्रभु।

सुख दुख ओरी पारी, भोगै सब जीवधारी,

कहूँ जगत मा नइ दिखै बिन झेल प्रभु।

गुरुवर के गियान, जेन हा देवै धियान,

जग रूँधना ला टोर करा देवै मेल प्रभु। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२२/११/२०२०

पाटन दुर्ग छ.ग.


कृपाण घनाक्षरी वर्णिक छंद 


परे खटिया उतान, होवत ले ठाढ़ भान,

उठत बघार शान, कहत हे चहा लान ।

बात धर नान नान, बोलत हे तान तान,

रीस रोस मन ठान, सिरतो ले अनजान।

दूसर के बात मान, लेगगे हे कँउवा कान,

पाछू जात सही जान, आवत हे धूर्रा छान।

बिन धरे गुन ज्ञान, चिन्हत ना लाभ हान,

होवत हे अपमान, धँसत करेजा बान। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२२/११/२०२०

पाटन दुर्ग छ.ग.


बलिदानी घनाक्षरी* 


*शूरबीर सबो बलिदानी ला नमन हे* 


बीर बाँहकर जेन सीमा में कटाये मूड़, 

अइसन बीर बलिदानी ला नमन हे। 

बैरी ला खेदार जेन देश के रखिन आन 

अइसन सबो स्वाभिमानी ला नमन हे।। 

अँचरा दाई बदला घेंच के करिन मोल, 

अइसन अटल जवानी ला नमन हे।

सोनहा आखर में लिखाये नाम जगमग

सुरता देवावत निशानी ला नमन हे।। 


करजा दाई के जेन छूटिन परान देके, 

अइसन बेटवा तो राम अउ लखन हे।।

सतलोक में उँकर होत होही अगवानी,

जेन महतारी बर वारे तन मन हे।।

देश के सेवा करैया लइका बियाये जेन, 

अइसन बाप महतारी ला नमन हे।। 

दाई के सेवा बर सोहाग जेन दान दिन, 

अइसन पिया के पियारी ला नमन हे।


गुरतुर सपना हा खारो होगे आसूँ गिर,

अइसन सजनी कुँवारी ला नमन हे।

झाँकत दुवारी ददा आही कहि घेरीबेरी,

फूल कस बिटिया दुलारी ला नमन हे।

लइकुसहा उमर आगी पानी बाप देत,

अइसन बेटा के लाचारी ला नमन हे।

बीरगति पाये वो जवान के तो गाँव गली, 

डेरौठी अँगना व दुवारी ला नमन हे।


शोभामोहन श्रीवास्तव 

०५/०५/२०२२


घनाक्षरी 


जग में जबर बैरी सबके हे कोन हर। 

कोन बन बरकस सबो ला नचात हे



छंद - पञ्च चामर छंद


"शिव ताण्डव स्तोत्र छत्तीसगढ़ी  


महेश बाँध के जटा, गिराय गंगधार तैं।

लपेट के नरी भुजंग के बिचित्र हार तैं।। १।।


डिमिड्ड डिमिड्ड डिमिड्ड डिमिड्ड डुगाडुगी बजाय तैं। 

विचित्र नाच कूद के तिलोक ला  कँपाय तैं।।२।।


जमो जमात मंत्रजाप एक शंभुनाथ हें।

बली अपार दैत देवता नवात माथ हें।।३।।


ललाट मांँझ नैन में समाय अग्नि ज्वाल हे। 

टँकाय दूज चन्द्रमा कपार में उजाल हे।।४।।


गुँजायमान डोंगरी उचार ओमजाप ले।

बिचित्रजीव संग हें निवृत्त पाप ताप ले।।५।।


उमेश दिब्य नाम ले पहाड़ पाप के जरै।

अधार के बिना तिलोक भार शंभु तैं धरै।।६।।


मया मताय मत्त मंडली परेत संग हे। 

बिचित्र केस भेस देस रूप रंग अंग हे।।७।। 


मणीअँजोर झिल्मिली झमक्क लक्क लक्क हे।

अँजोर तोर देख दैत देवता अबक्क हें।।८।।


बिचित्र बस्त्र अस्त्र शस्त्र हे बिचित्र लोक हे।

जिहाँ न लोभ मोह कोह छोह हे न शोक हे।।९।।


मसानघाट राख देह बैल गैल मेर हे। 

बहाँ नरी व गोड़ साँपडेड़ु के बसेर हे।।१०।।


भुजंग फेन ठाढ़ फोस्स फोस्स   फुफ्फकार हे। 

लुबुल्ल लुबुल्ल जीभ गाल बीख के भंडार हे ।।११।।


फणी मणीधरे अनेक वक्ष में सुहात हें। 

जुड़ाय बीखताप गंगनिर्झरी नहात हें।।१२।।


उमेश सृष्टि व्यष्टि ला कँपाय तैं डराय तैं।।

समेत फूलबान कामदेव ला जराय तैं।।१३।।


जटामकूट में टँकाय बूँदनीर सेत तैं। 

बिचित्र रूप संग अंग रंग ढंग चेत तैं।।१४।।


अनंत तैं अपार तैं उटंग तैं मलंग तैं। 

सदैव भक्तवृंद के कृपानिधान संग तैं।।१५।।


अछोर छोर खोज ब्रह्मदेव हार खाय हे। 

बिचार बिष्नु भोरहा प्रताप नाप गाय हे।।१६।।


जटाघटा बड़े बड़े नरेश ला नवाय हे। 

सिधोय साध सर्बदा दुवार जेन आय हे।।१७।।


अनंग दंभखंभ ला जराय तैं झँवाय तैं।।

पिये समुद्र बीख ला नरी रखे सजाय तैं।।१८।।


रिझे तुरंत तैं रमंत संत भक्तिभाव ले।

रमे रहे अनंत में डिगे नहीं सुभाव ले।।१९।।


महाबिरक्त तंत्र के कला भरे अपार तैं।

उमा उरोज के पबित्र चित्र चित्रकार तैं।।२०।। 


उठाय सृष्टिभार तैं भवानि के सिंगार तैं।

पुरान बेद शास्त्र के उजास के अधार तैं।।२१।।


रुद्राक्ष ले सजे धजे त्रिशूल धार हे पजे। 

बिलासभोग ला तजे हिमाद्रि मंडली सजे।।२२।।


मसानघाट के भभूत भस्म ला लगाय तैं। 

भरेस्ट कामदेव दिब्य नैन ले जलाय तैं।।२३।। 


विपक्ष दक्ष वक्ष के घमन्ड ला घटाय तैं।

भवाटवी भयंकरी समुद्र के करार तैं।।२४।।


पखार पाँव जान्हवी, समुद्र कोति जात हे।

पबित्र घाट बाट में, मया दया लुटात हे।।२५।।


मिटाय पाप ताप ला, उमेश ला मनात हौं।

असार मृत्युलोक में, उदार ला रिझात हौं।।२६।।


बँधाये पाप पुन्न
छत्तीसगढ़ी के पहिलैया वर्णिक छंद पांडुलिपि

 1/तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे
(कलाधर छंद)
2/इन्द्रिय भोग करावन न्यारे (मत्तगयंद सवैया)
3/आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी (मत्तगयंद सवैया)
 4/मैं अड़ही कड़ही जग जानत (मत्तगयंद सवैया)
5/ पीयन ना ककरो अब मानी (मत्तगयंद सवैया)
6/लाज मरे बृषभानु दुलारी (मत्तगयंद सवैया)
7/राउर द्वार रहौं बन रंका (मत्तगयन्द सवैया)
8/ खाबे कमाबे सुआ बेटीअसीद (शार्दूल विक्रीड़ित छंद)





1/तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे
(कलाधर छंद)


लोभ हे मोह हे न शोक हे न काम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
ज्ञान के गुमान हे न हीनमान ध्यान हे।।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
रात प्रात मध्यकाल दिव्य नाम प्रान हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
भक्ति भावपूर्ण हहो भुलाय रूप चाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
प्रीत में पगाय हे अनाम हे अकाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
रोग हे न शोक हे न जेवनी न बाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
कोहे न द्रोह हे न छोह हे अकाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
गेह के न मेह के न देह के गुलाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे।।
रंग चंग संग लोभ हे न तामझाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
नाम रूप में बुड़े गुनान झीमझाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
नाव गाँव भेव हे न जेब में छदाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
ना जनास हे झड़ी झकोर जाड़ घाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
विश्व बियाप्त दुःख सुःख में लगे बिराम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
शांत चित्तवृत्ति हे जिहाँ रमे अराम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।


 2/इन्द्रिय भोग करावन न्यारे (मत्तगयंद सवैया)


देह रचे अजगूत धरा गुन,इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।
दे मन चोर मड़ाय मँझार म,अंतस संपत लूटन सारे ।।
बुद्धि धराय गुनान भँजाकर,अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।
रूप निरंजन जोत बरै शुभ,ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

 
3/आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी (मत्तगयंद सवैया)


आकर कंकर आखर शंकर आखर मा अँगरा अउ आरी।
आखर मंतर आखर जन्तर आखर तन्तर आखर चारी ।
आगर मंगन आखर रंगन, आखर दंगन ले मुँह टारी ।
आखर पारस आखर सारस आखर मा रस हे बड़ भारी ।।

आखर उज्जर भावबेलुज्जर आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी ।
आखर मारन आखर तारन आखर जीत व जीव हतासी ।
हे मनभावन ताप नवावन, आखर उच्छल मंगल हाँसी ।
आखर शारद आखर नारद ज्ञानबिसारद भारत काशी।।

 4/मैं अड़ही कड़ही जग जानत (मत्तगयंद सवैया)

देह रचे अजगूत भरे गुन, इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।
हे मन चोर मड़ाय मँझार म, अंतस संपत लूटन सारे ।।
बुद्धि धराय गुनान भँजाकर, अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।
रूप निरंजन जोत बरै शुभ, ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

रात पहाय थिराय बिछावन, नींद सुते सपना सपनाथन ।
ठाठ परे रहिथे खटिया कर, चेतन रूप धरे बुल आथन ।
देह नहीं हम चेतन आवन, छोड़ तभें तन घेर उड़ाथन ।
काबर फेर सहे दुखदालिद, देहरमे दुखभाग लिखाथन।।

चेतन रूप बसे प्रभु भीतर, नैन हमार निहार न पाये।
छाय चराचर में प्रभु तौ फिर,कोन करा हस बोल लुकाये।।
खोजत बेर ढ़ले बर जावत, कोन बिधान बताव जनाये ।
मैं अड़ही कड़ही जग जानत, खोजत हौं बिन देह हिराये।

 
5/ पीयन ना ककरो अब मानी (मत्तगयंद सवैया)

जात गुवालिन के गुनिया हम ज्ञानगुनान ल का हम जानी।
गोरस दूहन माखन हेरन गोबर थापन जानन ज्ञानी ।
कारज मा दिन रात खँटावन हे घर के सगरो जिनगानी ।
नाम अधार धरेन जिये बर पीयन ना ककरो अब मानी ।।

का समझावन आय उधौ तँय कोन पठोयधिरोय बता तैं।
नून जरे म मिंजे अउ हाय इहाँ झन फोकट ज्ञान जता तैं।
ये बिरहा अगनी म भुँजावत अंतस ला झन बेध सता तैं ।
जानस तौ अतके ल बता बस सुंदरमोहन सोर पता तैं।

मूड़ मुड़ाय तियार खड़े हन का छुरिया हम ला डरवाही।
हाँसत थूँकत जात-सगा मन गोड़ बढ़े नइ छेकन पाही ।
उम्मर के दियना भर तेल ल साँस भला कइसे उरकाही।
कोन हमार बसे सुख गाँव हवै नजराय दुखहाही ।

आय उधौ हर ज्ञानघमंड भरे जब फोकट ज्ञान बघारे ।
तत्व बतावन बोध करावन द्वैत अद्वैत विभेद उघारे ।
गोकुल गाँव म गोड़ मड़ावत ज्ञान घटा घपटे अँधियारे ।
ओमन ला समझावन आवत जे सुख लूटत ज्ञान बिसारे ।।

ब्रम्ह बिचार बतात बिल्होरत, बोलत ज्ञान जतात गुमानी ।
भौं नइ देवत हे रउताइन, जानत जावन बाट सयानी।।
प्रेम अनेम पराग झरावत, होवत उत्सव के दहकानी।
गोकुल गाँव जिये सुख लूटत, माँ जसुदा मइया मन बानी।

नाम नहीं जिभिया हम लानन जीव ह काकर मूँह अमाही।
कोन घड़ी दिखही पिय के मुँह देख

 6/लाज मरे बृषभानु दुलारी (मत्तगयंद सवैया)

बूलत जावत हे जमुना कत, मोहन हाथ धरे सुकुमारी ।
हें अँखियावत हाँसत साँवर, लाज मरे बृषभानु दुलारी।।
लाज भरे बड़का डग मारत, बाट मया तलवार दुधारी।।
बाजत हे चुरिया अउ कंगन, वो धुन लागत हे सुख भारी।।


7/राउर द्वार रहौं बन रंका (मत्तगयन्द सवैया)

भीतर सेज सुते रसिया अउ,पापिन झाल न पावँव पंखा ।
भूल पिया घर काज जिहावँव,आगर के उपजै मन शंका ।
मार डरै डर लाज जरै जग,राउर द्वार रहौं बन रंका ।
रेंगन चाहँव संग महूँ पर, हौं जस पाट नदी कर अंका ।

हाँ बिरथाजिनगी अब लागत, कोन मिटावय माथकलंका।
बाट बनावँत जावँव पी कत,बोरझरी अरझौं अरझंका ।
लोक तिनो अउ चौदह भूवन, बाजत हे रसिया कर डंका ।
राघव ले बिछड़े सिय लागत, प्रान बियाकुल कंचन लंका ।

 
8/ खाबे कमाबे सुआ बेटीअसीद (शार्दूल विक्रीड़ित छंद)


न्यौता पीतर देव डीह पुरखा, दे बाप फेरी करे ।
दाई संग मनात देव कुल के, छाया हँथेरी करे ।।
बेटी फूल सरीख आज अँगना, होये बिहाती खड़े ।

देवौ आव असीद देव दुल्हा, हे भाग जागे बड़े ।।

लानौ ओ सँवार माँझ मड़वा, फूफू सुवासी धरे ।
भौजी पीस लगाव तेल हरदी, दाई ह आँँछी करे ।
जम्मो नेग नता निभाव बढ़के, बोली सुवासी झरे ।
आये हे घर में बरात दुलरू, कैना बिहाये बरे ।।

जोड़ी-जाँवर हे फबे सुघर के, बाजा रुँजी हे बजे ।
चूरी अम्मर होय माँग दमकै, रानी दुलारी सजे ।।
सोहागीन सखी भरौ अँजुरिया, खावैं जुड़ावैं धिया ।
पाही आज असीद तेन फुरही, आवौ असीदौ ददा ।।

काँटा गोड़ गडै़ झने जुगल के, आवौ असीदौ बबा ।
दूधे खाय नहा अँचोंय बिलरी, आवौ असीदौ कका ।।
बाढ़ै वंश सदा रहै सुख सबो, आवौ असीदौ ममा ।
जोही हा फल फूलके मगन हो, आवौ असीदौ मया ।।

जोंड़ा पाँव पखार नैन जल ले, आँसू ददा हा ढ़कै ।
दाई के गति ला बता शबद मा, कोनो नहीं तो सकै ।।
भाई रोत कहै सुजान बहिनी, भौजी कहै जा गड़ी ।
दाई के अउ नैन धार बरसै, ना तो थिरावै झड़ी ।।

माया गाँव बिराजमान रहिना, बेला लमा वंश के ।
जुग्गा नाम जगात भागधर हो, जोडी़ चरौ हंस के।।
ओली मा शुभ के भरे अँजुरिया, ड्योढ़ी अमाबे सुआ।
शोभामोहन देत हे बिदा बिटिया, खाबे कमाबे सुआ ।।




ऋतुराज-छन्द वसन्ततिलका

ऽ ऽ । ऽ । । । ऽ । । ऽ । ऽ ऽ
लाला ललाल ललला, ललला ललाला
बेरा बसंत बग ले,
जग ला रँगागे।
बेला बिंयार बखरी,
भितिया छबागे।।
डारी चुटुक्क चुक ले,
डुहँरू धरागे ।
झूला झुले लठर के,
भँवरा बयागे।।
चुन्दरी उड़ात पुरवा, सुघरी लजागे।
सुन्ना अगास मन के,
सपना गँजा गे।।
छागे बसंत बइरी,
दुख ला बढ़ागे।।
गेहे बिदेस सँइया,
सजनी झँवागे।।
झाँकै झटाक झरखा,
नयना दसे हे।
जाके बिदेस बिसरा, 
रसिया बसे हे।
ठट्ठा करे सखि सबो,
नइ वो हँसे हे।


शोभामोहन श्रीवास्तव




भुजंगप्रयात छंद

ललाला ललाला ललाला ललाला 


तर्ज - तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही पूजा

तुम्ही देवता हो


१/

महादेव भोले महानंद दाता। 

परौं पाँव तोला जुहारौ बिधाता।।

सबो मंत्र सिद्धि दिलैया दयालू।

तहीं छाय सब्बो मुड़ा में कृपालू।

२/

सबो भार भोले तहीं हा सँभारे।

नहीं भक्त के पै न खूबी बिचारे। 

कहूँ तो नहीं तोर हे हारिहारा। 

इही पायके तै सबो ला पियारा।।

३/

नहीं पक्षपाती महादेव भोला।

तभे तो कहे हें सबो पूज्य तोला।। 

अगासी हवै रूप वा तोर चोला।

नपावै नहीं तोर काया न टोला।।

४/

तुहीं ला उपासौं तुही ला अराधौं।

रुलाये म रोवौं हँसाये म हाँसौ।

न जानै सुज्ञानी त मैं तो अड़ानी। 

तहीं ओम के मूल तैं ब्रम्हज्ञानी।। 

५/

नहीं राज शंभू तभो तै ह राजा। 

बसेरा पहाड़ी भुजंगा समाजा।।

सबो शब्द के पार भोले रहैया। 

सबो ज्ञान के पार तैं तो गुसैया। 

६/

सती के गुसैया जु कैलाश वासी। 

मुँदे नैन तै पारब्रह्म उपासी।। 

भभूती रमाये मुड़ी माल डारे। 

तहीं काल ला नित्य बूता तियारे।

७/

तहीं तो उदाली तहीं तो दयाला। 

तहीं ज्ञान के दिव्य भंडार वाला।

तही पार संसार सीमा रहैया। 

जटा बाँध के मूड़ गंगा बहैया।। 

८/

नवा माथ स्वामी परौं नाथ पैंया। 

सबो विश्व के एकहत्थी चलैया।।

करा के सहीं दग्ग ले शील तोरे। 

करै मोहनी दिव्य तोरे अँजोरे।।

९/

गहीरी सदाथीर मंतार भोला। 

हवै जग्ग ले दीपदीपात चोला। 

सबो जीव के माँझ में तैं बसैया।

सिया राम तोरेच में हे रमैया।।

१०/

सबो देवता गात हें तोर गाथा। 

जटा माँझ गंगा टँके चन्द्र माथा।

हवै साँप डोमी बने तोर माला।

तिहूलोकस्वामी कुभेसी निराला। 

११/

दुनो कान में ओरमें तोर बाला। 

चले तूलिकाभौंह आँखीबिसाला। 

हवै रूप में भाव जम्मो थिराये। 

महूँ गान गावौं जथा विश्व ध्यावै। 

१२/

तहीं देव के देव हाला पियैया। 

मँझारी धरे कंठ में तैं जियैया। 

निजी भोगभूले महादेव न्यारे।। 

सदा विश्व कल्याण तैं हा बिचारे। 

१३/

सबो ले बड़े दानदाता दयाला। 

हवै ओढ़ना तोर तो बाघछाला।। 

तही झार दे मोह जंजाल झाला। 

प्रभो तोर छोड़े कहौं दुःख काला। 

१४/

सबो के जनैया सबो के हनैया। 

परौं पाँव घोन्ड़े सँगे शक्ति मैया।। 

महाभेस वाला महारूप वाला। 

महादेव शंभू सबो ले निराला।। 

१४/

सती के पिया देख पापी डरावैं।

सदा भक्ति ले भक्त सेवा बजावै। 

सहस्त्रोन आदित्य के हे अँजोरी। 

रिझाये उमा बाँध के प्रीत डोरी।। 









१५/

मया के लुटैया मया में रमैया।

सदा भक्त के वक्ष माँझा समैया।

नहीं तोर तो मूल ला खोज पावै। 

सबो देवता 




सदाकाल ले जीव तोरे सहारे।





मनहरण घनाक्षरी) 


राम रट राम रट, राम बसे घट-घट,

संसो के चिरइया उड़ जाही भर-भर ले ।

बेरा बड़ा बलकर, ओकर जतन कर,

फर हर फरे झर जाही झर-झर ले ।

बेरा संग झन खेल, अउ दुख झन झेल,

अइलाही फूल जेन फूले चर-चर ले ।

पयडगरी सुघर, हरि भजन के धर,

दूरिहाय जगत के दुख सरभर ले ।


घनाक्षरी छंद 


परबतिया ला देखौ शंभू मेर चेंध चेंध,

जगसुख सेती सब पोथी सिरजाय हे।

सीता सत डटे रहि पति पत राखे बर,

जगसुख सेती सब पोथी सिरजाय हे।

रत्नारानी ला देखौ माया परे तुलसी ला,

राम मा रमाये मन लहर लगाय हे।

जब जब देखहू लहुट के रे मनखे हो,

पग पग तिरिया हा जग ला रेंगाय रे।।


शोभामोहन श्रीवास्तव

 

ईश सुमरनी घनाक्षरी 


हरि के बनाय देह,

हरि के जगत गेह।

हरि के जिनिस ला हरि ला चढ़ाय रे।

हरि जगसुख सोती,

हरिच के जीव जोती।

मृणमय चिनमय हरि सिरजाय रे।

हरि ले मिलन बर, 

भज सुमिरन कर।

हरिच के अंश जीव हरि में समाय रे। 

एको छिन गॅवा झन, 

मया गढ़ा मने मन। 

जग जनमे मनुख चोला जब पाय रे। 


शोभामोहन 

११/०४/२०२२




ईश सुमरनी घनाक्षरी 


तोर हाड़ा हपट के जोरे सब चीज बस, 

नाशवान तभो ले हवस बइहाय रे। 

गजब डउल कर फुनगी मा पहुँचेस, 

खसले के डर फेर जीव में समाय रे। 

रचेस सजन संग मिलन जुलन खेल, 

मिलन के संग फेर बिरहा लिखाय रे।

चटक मटक चरदिनिया जिनिस बर, 

ओंड़ा दिये हरि नाम हस बिसराये रे। 


शोभामोहन

जलहरण घनाक्षरी 


नाम हे अपार तोर चरित अपार तोर, 

रूप हे अपार तोर समझ न आय प्रभु। 

गुन हे अपार तोर करम अपार तोर, 

सरसती तक नहीं सकै गुन गाय प्रभु।

दरस अपार तोर परस अपार तोर, 

जेन ला छुवस बस उही ला जनाय प्रभु।

दया हे अपार तोर मया हे अपार तोर, 

मनखे ला अपन घरान में मिलाय प्रभु।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव


गुनान मनहरण घनाक्षरी 


दशरथ कस नहीं कभू प्रभु प्रीत करे,

कौशल्या असन नहीं संजम जगाय हो।।

कैकई कस कलंक लिये ना अपन मूड़,

सीता कस नहीं पति धरम निभाय हो। 

बंधवा भरत कस राजा नहीं बन सके

लखन असन नहीं सेवा मन लाय हो।

भजन करे ना कभू सजन मनाये बर, 

छुतहा चेत हा कइसे रामधन पाय हो।। 


शोभामोहन 

२३/०३/२०२२


भगत के मति अउ गति

(१)

अहम के भाव तजे, परमात्मा ला भजे,

सुख दुख मा उहीच, ला सुमिरथे सचेत ।

तज भेदभाव मन, जीव दया कर प्रन,

गरब गुमान हन, प्रभु ला परम नेत।

दुख में न रोय गाय, सुख बर ना ललाय,

एक ईश ला मनाय, जग जीवसुख देत।

करै कहूँ अनभल, करथे ओकरो भल,

हरि भज पल पल, बड़हर सुख लेत।

(२)

लाभ अउ हान घुँचे, हार जीत पार ऊँचे,

हरहिन्छा दान रुचे, वह सब सुख पाय।

छोड़ सबो कलकल, गोठ बात भलभल,

तज मन हलचल, तन जीते बर जाय ।

परमातमा मा टेके, तन मन राखै छेंके,

एती ओती नइ देखे, प्रभु मन मा बसाय।

कोनो हा उदिम करे, कुड़काय रीस भरे,

तभो अमरित झरे, अरि थक हार जाय।

(३)

कुड़काय ना कहूँ ला, बगियाय ना कहूँ ला,

झगराय ना कहूँ ला, रीस रोस रहै पार।

जगत जिनिस बर, ओला नइ धरै जर,

माटी लेख चोला घर, गुनय फकत सार।

देखके बढ़त पर, सुख पावै बड़हर,

इरखा डाह उबर, बिन डर बिन भार।

चार कोस दूर रीस, परै ना पाँच पचीस,

सुमरत एक ईश, बहय जगत धार।

(४)

गड़ै नइ आस फाँस, तन मन एक रास,

सब संग बोल हाँस, पबरित बेवहार।

चिन्ह के अपन दोस, सरलग रहै होस,

डहरसाजी न रोस, सब बेर शुभ धार।

कभू ना होवै बिहल, रहै एक ईश बल,

लीला जान हलचल, अटल दियना बार।

भोग मा नहीं भुलाय, आत्मा नहीं सुलाय,

आसरा नइ ढुलाय, राखै मन दूर टार।

(५)

भोग नाश देख डर, धरै नहीं रोये बर,

राखै मन टाँठ कर, परमेश के अधार।

पाये अउर अपाय, बर ना मन झपाय,

सुख साध दुरिहाय, चेत ला रखै उलार।

शुभ वा अशुभ फल, एक लागै तप बल,

चेत बुध निरमल, सम लागै बैरी यार।

अपमान अउ मान, जानै वो एक समान,

बात धर नान नान, टौरै ना धीरज पार।

(६)

सरद गरम सम, सुख दुख जान भ्रम,

चेत उटँग बिरम, घुँचे घुँचे मोर तोर।

चाहे कहूँ सहराय, चुगली करै सुनाय,

देह ना चटक पाय, ईश धुन मा सजोर ।

चरचा में दिन निश, सुमरत जगदीस,

दुनिया ले कोस बीस, दुरिहा रहै अँजोर।

पर के ना करै बात, बस प्रभु गुन गात,

अपन दिन पहात, मन नाम गुन बोर ।।

(७)

प्रभु बर मया जगा, भजन में जीव लगा,

सबो ला नजीक सगा, समझे अउ परिवार।

मन राखथे संतोष, देवे ना कहूँ ला दोष,

करथे सबो ला तोस, मोह नहीं घर द्वार।

बूध प्रभु पद थीर, धरम ला धर धीर,

तीरथ किंजर फीर, सरधा ला बढ़वार।

भगत के गुन गन, गावत शोभामोहन,

करे बर ठंस मन, होये बर भव पार। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२०/११/२०२०

पाटन


जलहरण घनाक्षरी (वर्णिक छंद) 


बिन तारा बिन कूची, पोठ रोठ नान बूची,

मनखे ला माया छाँद राखै जग जेल प्रभु।

मड़ा सुख सुविधा ला, भोग रोग दुविधा ला,

बिलमाये राखै जीव रच यह खेल प्रभु।

सुख दुख ओरी पारी, भोगै सब जीवधारी,

कहूँ जगत मा नइ दिखै बिन झेल प्रभु।

गुरुवर के गियान, जेन हा देवै धियान,

जग रूँधना ला टोर करा देवै मेल प्रभु। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२२/११/२०२०

पाटन दुर्ग छ.ग.


कृपाण घनाक्षरी वर्णिक छंद 


परे खटिया उतान, होवत ले ठाढ़ भान,

उठत बघार शान, कहत हे चहा लान ।

बात धर नान नान, बोलत हे तान तान,

रीस रोस मन ठान, सिरतो ले अनजान।

दूसर के बात मान, लेगगे हे कँउवा कान,

पाछू जात सही जान, आवत हे धूर्रा छान।

बिन धरे गुन ज्ञान, चिन्हत ना लाभ हान,

होवत हे अपमान, धँसत करेजा बान। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२२/११/२०२०

पाटन दुर्ग छ.ग.


बलिदानी घनाक्षरी* 


*शूरबीर सबो बलिदानी ला नमन हे* 


बीर बाँहकर जेन सीमा में कटाये मूड़, 

अइसन बीर बलिदानी ला नमन हे। 

बैरी ला खेदार जेन देश के रखिन आन 

अइसन सबो स्वाभिमानी ला नमन हे।। 

अँचरा दाई बदला घेंच के करिन मोल, 

अइसन अटल जवानी ला नमन हे।

सोनहा आखर में लिखाये नाम जगमग

सुरता देवावत निशानी ला नमन हे।। 


करजा दाई के जेन छूटिन परान देके, 

अइसन बेटवा तो राम अउ लखन हे।।

सतलोक में उँकर होत होही अगवानी,

जेन महतारी बर वारे तन मन हे।।

देश के सेवा करैया लइका बियाये जेन, 

अइसन बाप महतारी ला नमन हे।। 

दाई के सेवा बर सोहाग जेन दान दिन, 

अइसन पिया के पियारी ला नमन हे।


गुरतुर सपना हा खारो होगे आसूँ गिर,

अइसन सजनी कुँवारी ला नमन हे।

झाँकत दुवारी ददा आही कहि घेरीबेरी,

फूल कस बिटिया दुलारी ला नमन हे।

लइकुसहा उमर आगी पानी बाप देत,

अइसन बेटा के लाचारी ला नमन हे।

बीरगति पाये वो जवान के तो गाँव गली, 

डेरौठी अँगना व दुवारी ला नमन हे।


शोभामोहन श्रीवास्तव 

०५/०५/२०२२


घनाक्षरी 


जग में जबर बैरी सबके हे कोन हर। 

कोन बन बरकस सबो ला नचात हे



छंद - पञ्च चामर छंद


"शिव ताण्डव स्तोत्र छत्तीसगढ़ी  


महेश बाँध के जटा, गिराय गंगधार तैं।

लपेट के नरी भुजंग के बिचित्र हार तैं।। १।।


डिमिड्ड डिमिड्ड डिमिड्ड डिमिड्ड डुगाडुगी बजाय तैं। 

विचित्र नाच कूद के तिलोक ला कँपाय तैं।।२।।


जमो जमात मंत्रजाप एक शंभुनाथ हें।

बली अपार दैत देवता नवात माथ हें।।३।।


ललाट मांँझ नैन में समाय अग्नि ज्वाल हे। 

टँकाय दूज चन्द्रमा कपार में उजाल हे।।४।।


गुँजायमान डोंगरी उचार ओमजाप ले।

बिचित्रजीव संग हें निवृत्त पाप ताप ले।।५।।


उमेश दिब्य नाम ले पहाड़ पाप के जरै।

अधार के बिना तिलोक भार शंभु तैं धरै।।६।।


मया मताय मत्त मंडली परेत संग हे। 

बिचित्र केस भेस देस रूप रंग अंग हे।।७।। 


मणीअँजोर झिल्मिली झमक्क लक्क लक्क हे।

अँजोर तोर देख दैत देवता अबक्क हें।।८।।


बिचित्र बस्त्र अस्त्र शस्त्र हे बिचित्र लोक हे।

जिहाँ न लोभ मोह कोह छोह हे न शोक हे।।९।।


मसानघाट राख देह बैल गैल मेर हे। 

बहाँ नरी व गोड़ साँपडेड़ु के बसेर हे।।१०।।


भुजंग फेन ठाढ़ फोस्स फोस्स फुफ्फकार हे। 

लुबुल्ल लुबुल्ल जीभ गाल बीख के भंडार हे ।।११।।


फणी मणीधरे अनेक वक्ष में सुहात हें। 

जुड़ाय बीखताप गंगनिर्झरी नहात हें।।१२।।


उमेश सृष्टि व्यष्टि ला कँपाय तैं डराय तैं।।

समेत फूलबान कामदेव ला जराय तैं।।१३।।


जटामकूट में टँकाय बूँदनीर सेत तैं। 

बिचित्र रूप संग अंग रंग ढंग चेत तैं।।१४।।


अनंत तैं अपार तैं उटंग तैं मलंग तैं। 

सदैव भक्तवृंद के कृपानिधान संग तैं।।१५।।


अछोर छोर खोज ब्रह्मदेव हार खाय हे। 

बिचार बिष्नु भोरहा प्रताप नाप गाय हे।।१६।।


जटाघटा बड़े बड़े नरेश ला नवाय हे। 

सिधोय साध सर्बदा दुवार जेन आय हे।।१७।।


अनंग दंभखंभ ला जराय तैं झँवाय तैं।।

पिये समुद्र बीख ला नरी रखे सजाय तैं।।१८।।


रिझे तुरंत तैं रमंत संत भक्तिभाव ले।

रमे रहे अनंत में डिगे नहीं सुभाव ले।।१९।।


महाबिरक्त तंत्र के कला भरे अपार तैं।

उमा उरोज के पबित्र चित्र चित्रकार तैं।।२०।। 


उठाय सृष्टिभार तैं भवानि के सिंगार तैं।

पुरान बेद शास्त्र के उजास के अधार तैं।।२१।।


रुद्राक्ष ले सजे धजे त्रिशूल धार हे पजे। 

बिलासभोग ला तजे हिमाद्रि मंडली सजे।।२२।।


मसानघाट के भभूत भस्म ला लगाय तैं। 

भरेस्ट कामदेव दिब्य नैन ले जलाय तैं।।२३।। 


विपक्ष दक्ष वक्ष के घमन्ड ला घटाय तैं।

भवाटवी भयंकरी समुद्र के करार तैं।।२४।।


पखार पाँव जान्हवी, समुद्र कोति जात हे।

पबित्र घाट बाट में, मया दया लुटात हे।।२५।।


मिटाय पाप ताप ला, उमेश ला मनात हौं।

असार मृत्युलोक में, उदार ला रिझात हौं।।२६।।


बँधाये पाप पुन्न

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...