Friday, 26 July 2024


छत्तीसगढ़ी के पहिलैया वर्णिक छंद पांडुलिपि

 1/तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे
(कलाधर छंद)
2/इन्द्रिय भोग करावन न्यारे  (मत्तगयंद सवैया)
3/आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी (मत्तगयंद सवैया)
 4/मैं अड़ही कड़ही जग जानत (मत्तगयंद सवैया)
5/ पीयन ना ककरो अब मानी (मत्तगयंद सवैया)
6/लाज मरे बृषभानु दुलारी (मत्तगयंद सवैया)
7/राउर द्वार रहौं बन रंका (मत्तगयन्द सवैया)
8/ खाबे कमाबे सुआ बेटीअसीद (शार्दूल विक्रीड़ित छंद)





1/तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे
(कलाधर छंद)


लोभ हे मोह हे न शोक हे न काम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
ज्ञान के गुमान हे न हीनमान ध्यान हे।।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
रात प्रात मध्यकाल दिव्य नाम प्रान हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
भक्ति भावपूर्ण हहो भुलाय रूप चाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
प्रीत में पगाय हे अनाम हे अकाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
रोग हे न शोक हे न जेवनी न बाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
कोहे न द्रोह हे न छोह हे अकाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
गेह के न मेह के न देह के गुलाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे।।
रंग चंग संग लोभ हे न तामझाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
नाम रूप में बुड़े गुनान झीमझाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
नाव गाँव भेव हे न जेब में छदाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
ना जनास हे झड़ी झकोर जाड़ घाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
विश्व बियाप्त दुःख सुःख में लगे बिराम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
शांत चित्तवृत्ति हे जिहाँ रमे अराम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।


 2/इन्द्रिय भोग करावन न्यारे  (मत्तगयंद सवैया)


देह रचे अजगूत धरा गुन,इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।
दे मन चोर मड़ाय मँझार म,अंतस संपत लूटन सारे ।।
बुद्धि धराय गुनान भँजाकर,अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।
रूप निरंजन जोत बरै शुभ,ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

 
3/आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी (मत्तगयंद सवैया)


आकर कंकर आखर शंकर आखर मा अँगरा अउ आरी।
आखर मंतर आखर जन्तर आखर तन्तर आखर चारी ।
आगर मंगन आखर रंगन, आखर दंगन ले मुँह टारी ।
आखर पारस आखर सारस आखर मा रस हे बड़ भारी ।।

आखर उज्जर भावबेलुज्जर आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी ।
आखर मारन आखर तारन आखर जीत व जीव हतासी ।
हे मनभावन ताप नवावन, आखर उच्छल मंगल हाँसी ।
आखर शारद आखर नारद ज्ञानबिसारद भारत काशी।।

 4/मैं अड़ही कड़ही जग जानत (मत्तगयंद सवैया)

देह रचे अजगूत भरे गुन, इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।
हे मन चोर मड़ाय मँझार म, अंतस संपत लूटन सारे ।।
बुद्धि धराय गुनान भँजाकर, अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।
रूप निरंजन जोत बरै शुभ, ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

रात पहाय थिराय बिछावन, नींद सुते सपना सपनाथन ।
ठाठ परे रहिथे खटिया कर, चेतन रूप धरे बुल आथन ।
देह नहीं हम चेतन आवन, छोड़ तभें तन घेर उड़ाथन ।
काबर फेर सहे दुखदालिद, देहरमे दुखभाग लिखाथन।।

चेतन रूप बसे प्रभु भीतर, नैन हमार निहार न पाये।
छाय चराचर में प्रभु तौ फिर,कोन करा हस बोल लुकाये।।
खोजत बेर ढ़ले बर जावत, कोन बिधान बताव जनाये ।
मैं अड़ही कड़ही जग जानत, खोजत हौं बिन देह हिराये।

 
5/ पीयन ना ककरो अब मानी (मत्तगयंद सवैया)

जात गुवालिन के गुनिया हम ज्ञानगुनान ल का हम जानी।
गोरस दूहन माखन हेरन गोबर थापन जानन ज्ञानी ।
कारज मा दिन रात खँटावन हे घर के सगरो जिनगानी ।
नाम अधार धरेन जिये बर पीयन ना ककरो अब मानी ।।

का समझावन आय उधौ तँय कोन पठोयधिरोय बता तैं।
नून जरे म मिंजे अउ हाय इहाँ झन फोकट ज्ञान जता तैं।
ये बिरहा अगनी म भुँजावत अंतस ला झन बेध सता तैं ।
जानस तौ अतके ल बता बस सुंदरमोहन सोर पता तैं।

मूड़ मुड़ाय तियार खड़े हन का छुरिया हम ला डरवाही।
हाँसत थूँकत जात-सगा मन गोड़ बढ़े नइ छेकन पाही ।
उम्मर के दियना भर तेल ल साँस भला कइसे उरकाही।
कोन हमार बसे सुख गाँव हवै नजराय  दुखहाही ।

आय उधौ हर ज्ञानघमंड भरे जब फोकट ज्ञान बघारे ।
तत्व बतावन बोध करावन द्वैत अद्वैत विभेद उघारे ।
गोकुल गाँव म गोड़ मड़ावत ज्ञान घटा घपटे अँधियारे ।
ओमन ला समझावन आवत जे सुख लूटत ज्ञान बिसारे ।।

ब्रम्ह बिचार बतात बिल्होरत, बोलत ज्ञान जतात गुमानी ।
भौं नइ देवत हे रउताइन, जानत जावन बाट सयानी।।
प्रेम अनेम पराग झरावत, होवत उत्सव के दहकानी।
गोकुल गाँव जिये सुख लूटत, माँ जसुदा मइया मन बानी।

नाम नहीं जिभिया हम लानन जीव ह काकर मूँह अमाही।
कोन घड़ी दिखही पिय के मुँह देख

 6/लाज मरे बृषभानु दुलारी (मत्तगयंद सवैया)

बूलत जावत हे जमुना कत, मोहन हाथ धरे सुकुमारी ।
हें अँखियावत हाँसत साँवर, लाज मरे बृषभानु दुलारी।।
लाज भरे बड़का डग मारत, बाट मया तलवार दुधारी।।
बाजत हे चुरिया अउ कंगन, वो धुन लागत हे सुख भारी।।


7/राउर द्वार रहौं बन रंका (मत्तगयन्द सवैया)

भीतर सेज सुते रसिया अउ,पापिन झाल न पावँव पंखा ।
भूल पिया घर काज जिहावँव,आगर के उपजै मन शंका ।
मार डरै डर लाज जरै जग,राउर द्वार रहौं बन रंका ।
रेंगन चाहँव संग महूँ पर, हौं जस पाट नदी कर अंका ।

हाँ बिरथाजिनगी अब लागत, कोन मिटावय माथकलंका।
बाट बनावँत जावँव पी कत,बोरझरी अरझौं अरझंका ।
लोक तिनो अउ चौदह भूवन, बाजत हे रसिया कर डंका ।
राघव ले बिछड़े सिय लागत, प्रान बियाकुल कंचन लंका ।

 
8/ खाबे कमाबे सुआ बेटीअसीद (शार्दूल विक्रीड़ित छंद)


न्यौता पीतर देव डीह पुरखा, दे बाप फेरी करे ।
दाई संग मनात देव कुल के, छाया हँथेरी करे ।।
बेटी फूल सरीख आज अँगना, होये बिहाती खड़े ।

देवौ आव असीद देव दुल्हा, हे भाग जागे बड़े ।।

लानौ ओ सँवार माँझ मड़वा, फूफू सुवासी धरे ।
भौजी पीस लगाव तेल हरदी, दाई ह आँँछी करे ।
जम्मो नेग नता निभाव बढ़के, बोली सुवासी झरे ।
आये हे घर में बरात दुलरू, कैना बिहाये बरे ।।

जोड़ी-जाँवर हे फबे सुघर के, बाजा रुँजी हे बजे ।
चूरी अम्मर होय माँग दमकै, रानी दुलारी सजे ।।
सोहागीन सखी भरौ अँजुरिया, खावैं जुड़ावैं धिया ।
पाही आज असीद तेन फुरही, आवौ असीदौ ददा ।।

काँटा गोड़ गडै़ झने जुगल के, आवौ असीदौ बबा ।
दूधे खाय नहा अँचोंय बिलरी, आवौ असीदौ कका ।।
बाढ़ै वंश सदा रहै सुख सबो, आवौ असीदौ ममा ।
जोही हा फल फूलके  मगन हो, आवौ असीदौ मया ।।

जोंड़ा पाँव पखार नैन जल ले, आँसू ददा हा ढ़कै ।
दाई के गति ला बता शबद मा, कोनो नहीं तो सकै ।।
भाई रोत कहै सुजान बहिनी, भौजी कहै जा गड़ी ।
दाई के अउ नैन धार बरसै, ना तो थिरावै झड़ी ।।

माया गाँव बिराजमान रहिना, बेला लमा वंश के ।
जुग्गा नाम जगात भागधर हो, जोडी़ चरौ हंस के।।
ओली मा शुभ के भरे अँजुरिया, ड्योढ़ी अमाबे सुआ।
शोभामोहन देत हे बिदा बिटिया, खाबे कमाबे सुआ ।।




ऋतुराज-छन्द वसन्ततिलका

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लाला ललाल ललला, ललला ललाला

बेरा बसंत बग ले,
जग ला रँगागे।
बेला बिंयार बखरी,
भितिया छबागे।।
डारी चुटुक्क चुक ले,
डुहँरू धरागे ।
झूला झुले लठर के,
भँवरा बयागे।।

चुन्दरी उड़ात पुरवा, सुघरी लजागे।
सुन्ना अगास मन के,
सपना गँजा गे।।
छागे बसंत बइरी,
दुख ला बढ़ागे।।
गेहे बिदेस सँइया,
सजनी झँवागे।।

झाँकै झटाक झरखा,
नयना दसे हे।
जाके बिदेस बिसरा, 
रसिया बसे हे।
ठट्ठा करे सखि सबो,
नइ वो हँसे हे।


शोभामोहन श्रीवास्तव




भुजंगप्रयात छंद

ललाला ललाला ललाला ललाला 


तर्ज - तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही पूजा

तुम्ही देवता हो


१/

महादेव भोले महानंद दाता। 

परौं पाँव तोला जुहारौ बिधाता।।

सबो मंत्र सिद्धि दिलैया दयालू।

तहीं छाय सब्बो मुड़ा में कृपालू।

२/

सबो भार भोले तहीं हा सँभारे।

नहीं भक्त के पै न खूबी बिचारे। 

कहूँ तो नहीं तोर हे हारिहारा। 

इही पायके तै सबो ला पियारा।।

३/

नहीं पक्षपाती महादेव भोला।

तभे तो कहे हें सबो पूज्य तोला।। 

अगासी हवै रूप वा तोर चोला।

नपावै नहीं तोर काया न टोला।।

४/

तुहीं ला उपासौं तुही ला अराधौं।

रुलाये म रोवौं हँसाये म हाँसौ।

न जानै सुज्ञानी त मैं तो अड़ानी। 

तहीं ओम के मूल तैं ब्रम्हज्ञानी।। 

५/

नहीं राज शंभू तभो तै ह राजा। 

बसेरा पहाड़ी भुजंगा समाजा।।

सबो शब्द के पार भोले रहैया। 

सबो ज्ञान के पार तैं तो गुसैया। 

६/

सती के गुसैया जु कैलाश वासी। 

मुँदे नैन तै पारब्रह्म उपासी।। 

भभूती रमाये मुड़ी माल डारे। 

तहीं काल ला नित्य बूता तियारे।

७/

तहीं तो उदाली तहीं तो दयाला। 

तहीं ज्ञान के दिव्य भंडार वाला।

तही पार संसार सीमा रहैया। 

जटा बाँध के मूड़ गंगा बहैया।। 

८/

नवा माथ स्वामी परौं नाथ पैंया। 

सबो विश्व के एकहत्थी चलैया।।

करा के सहीं दग्ग ले शील तोरे। 

करै मोहनी दिव्य तोरे अँजोरे।।

९/

गहीरी सदाथीर मंतार भोला। 

हवै जग्ग ले दीपदीपात चोला। 

सबो जीव के माँझ में तैं बसैया।

सिया राम तोरेच में हे रमैया।।

१०/

सबो देवता गात हें तोर गाथा। 

जटा माँझ गंगा टँके चन्द्र माथा।

हवै साँप डोमी बने तोर माला।

तिहूलोकस्वामी कुभेसी निराला। 

११/

दुनो कान में ओरमें तोर बाला। 

चले तूलिकाभौंह आँखीबिसाला। 

हवै रूप में भाव जम्मो थिराये। 

महूँ गान गावौं जथा विश्व ध्यावै। 

१२/

तहीं देव के देव हाला पियैया। 

मँझारी धरे कंठ में तैं जियैया। 

निजी भोगभूले महादेव न्यारे।। 

सदा विश्व कल्याण तैं हा बिचारे। 

१३/

सबो ले बड़े दानदाता दयाला। 

हवै ओढ़ना तोर तो बाघछाला।। 

तही झार दे मोह जंजाल झाला। 

प्रभो तोर छोड़े कहौं दुःख काला। 

१४/

सबो के जनैया सबो के हनैया। 

परौं पाँव घोन्ड़े सँगे शक्ति मैया।। 

महाभेस वाला महारूप वाला। 

महादेव शंभू सबो ले निराला।। 

१४/

सती के पिया देख पापी डरावैं।

सदा भक्ति ले भक्त सेवा बजावै। 

सहस्त्रोन आदित्य के हे अँजोरी। 

रिझाये उमा बाँध के प्रीत डोरी।। 









१५/

मया के लुटैया मया में रमैया।

सदा भक्त के वक्ष माँझा समैया।

नहीं तोर तो मूल ला खोज पावै। 

सबो देवता 




सदाकाल ले जीव तोरे सहारे।





मनहरण घनाक्षरी) 


राम रट राम रट, राम बसे घट-घट,

संसो के चिरइया उड़ जाही भर-भर ले ।

बेरा बड़ा बलकर, ओकर जतन कर,

फर हर फरे झर जाही झर-झर ले ।

बेरा संग झन खेल, अउ दुख झन झेल,

अइलाही फूल जेन फूले चर-चर ले ।

पयडगरी सुघर, हरि भजन के धर,

दूरिहाय जगत के दुख सरभर ले ।



घनाक्षरी छंद 


परबतिया ला देखौ शंभू मेर चेंध चेंध,

जगसुख सेती सब पोथी सिरजाय हे।

सीता सत डटे रहि पति पत राखे बर,

जगसुख सेती सब पोथी सिरजाय हे।

रत्नारानी ला देखौ माया परे तुलसी ला,

राम मा रमाये मन लहर लगाय हे।

जब जब देखहू लहुट के रे मनखे हो,

पग पग तिरिया हा जग ला रेंगाय रे।।


शोभामोहन श्रीवास्तव

 

ईश सुमरनी घनाक्षरी 


हरि के बनाय देह,

हरि के जगत गेह।

हरि के जिनिस ला हरि ला चढ़ाय रे।

हरि जगसुख सोती,

हरिच के जीव जोती।

मृणमय चिनमय हरि सिरजाय रे।

हरि ले मिलन बर, 

भज सुमिरन कर।

हरिच के अंश जीव हरि में समाय रे। 

एको छिन गॅवा झन, 

मया गढ़ा मने मन। 

जग जनमे मनुख चोला जब पाय रे। 


शोभामोहन 

११/०४/२०२२




ईश सुमरनी घनाक्षरी 


तोर हाड़ा हपट के जोरे सब चीज बस, 

नाशवान तभो ले हवस बइहाय रे। 

गजब डउल कर फुनगी मा पहुँचेस, 

खसले के डर फेर जीव में समाय रे। 

रचेस सजन संग मिलन जुलन खेल, 

मिलन के संग फेर बिरहा लिखाय रे।

चटक मटक चरदिनिया जिनिस बर, 

ओंड़ा दिये हरि नाम हस बिसराये रे। 


शोभामोहन

जलहरण घनाक्षरी 


नाम हे अपार तोर चरित अपार तोर, 

रूप हे अपार तोर समझ न आय प्रभु। 

गुन हे अपार तोर करम अपार तोर, 

सरसती तक नहीं सकै गुन गाय प्रभु।

दरस अपार तोर परस अपार तोर, 

जेन ला छुवस बस उही ला जनाय प्रभु।

दया हे अपार तोर मया हे अपार तोर, 

मनखे ला अपन घरान में मिलाय प्रभु।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव


गुनान मनहरण घनाक्षरी 


दशरथ कस नहीं कभू प्रभु प्रीत करे,

कौशल्या असन नहीं संजम जगाय हो।।

कैकई कस कलंक लिये ना अपन मूड़,

सीता कस नहीं पति धरम निभाय हो। 

बंधवा भरत कस राजा नहीं बन सके

लखन असन नहीं सेवा मन लाय हो।

भजन करे ना कभू सजन मनाये बर, 

छुतहा चेत हा कइसे रामधन पाय हो।। 


शोभामोहन 

२३/०३/२०२२


भगत के मति अउ गति

(१)

अहम के भाव तजे, परमात्मा ला भजे,

सुख दुख मा उहीच, ला सुमिरथे सचेत ।

तज भेदभाव मन, जीव दया कर प्रन,

गरब गुमान हन, प्रभु ला परम नेत।

दुख में न रोय गाय, सुख बर ना ललाय,

एक ईश ला मनाय, जग जीवसुख देत।

करै कहूँ अनभल, करथे ओकरो भल,

हरि भज पल पल, बड़हर सुख लेत।

(२)

लाभ अउ हान घुँचे, हार जीत पार ऊँचे,

हरहिन्छा दान रुचे, वह सब सुख पाय।

छोड़ सबो कलकल, गोठ बात भलभल,

तज मन हलचल, तन जीते बर जाय ।

परमातमा मा टेके, तन मन राखै छेंके,

एती ओती नइ देखे, प्रभु मन मा बसाय।

कोनो हा उदिम करे, कुड़काय रीस भरे,

तभो अमरित झरे, अरि थक हार जाय।

(३)

कुड़काय ना कहूँ ला, बगियाय ना कहूँ ला,

झगराय ना कहूँ ला, रीस रोस रहै पार।

जगत जिनिस बर, ओला नइ धरै जर,

माटी लेख चोला घर, गुनय फकत सार।

देखके बढ़त पर, सुख पावै बड़हर,

इरखा डाह उबर, बिन डर बिन भार।

चार कोस दूर रीस, परै ना पाँच पचीस,

सुमरत एक ईश, बहय जगत धार।

(४)

गड़ै नइ आस फाँस, तन मन एक रास,

सब संग बोल हाँस, पबरित बेवहार।

चिन्ह के अपन दोस, सरलग रहै होस,

डहरसाजी न रोस, सब बेर शुभ धार।

कभू ना होवै बिहल, रहै एक ईश बल,

लीला जान हलचल, अटल दियना बार।

भोग मा नहीं भुलाय, आत्मा नहीं सुलाय,

आसरा नइ ढुलाय, राखै मन दूर टार।

(५)

भोग नाश देख डर, धरै नहीं रोये बर,

राखै मन टाँठ कर, परमेश के अधार।

पाये अउर अपाय, बर ना मन झपाय,

सुख साध दुरिहाय, चेत ला रखै उलार।

शुभ वा अशुभ फल, एक लागै तप बल,

चेत बुध निरमल, सम लागै बैरी यार।

अपमान अउ मान, जानै वो एक समान,

बात धर नान नान, टौरै ना धीरज पार।

(६)

सरद गरम सम, सुख दुख जान भ्रम,

चेत उटँग बिरम, घुँचे घुँचे मोर तोर।

चाहे कहूँ सहराय, चुगली करै सुनाय,

देह ना चटक पाय, ईश धुन मा सजोर ।

चरचा में दिन निश, सुमरत जगदीस,

दुनिया ले कोस बीस, दुरिहा रहै अँजोर।

पर के ना करै बात, बस प्रभु गुन गात,

अपन दिन पहात, मन नाम गुन बोर ।।

(७)

प्रभु बर मया जगा, भजन में जीव लगा,

सबो ला नजीक सगा, समझे अउ परिवार।

मन राखथे संतोष, देवे ना कहूँ ला दोष,

करथे सबो ला तोस, मोह नहीं घर द्वार।

बूध प्रभु  पद थीर, धरम ला धर धीर,

तीरथ किंजर फीर, सरधा ला बढ़वार।

भगत के गुन गन, गावत शोभामोहन,

करे बर ठंस मन, होये बर भव पार। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२०/११/२०२०

पाटन


जलहरण घनाक्षरी (वर्णिक छंद) 


बिन तारा बिन कूची, पोठ रोठ नान बूची,

मनखे ला माया छाँद राखै जग जेल प्रभु।

मड़ा सुख सुविधा ला, भोग रोग दुविधा ला,

बिलमाये राखै जीव रच यह खेल प्रभु।

सुख दुख ओरी पारी, भोगै सब जीवधारी,

कहूँ जगत मा नइ दिखै बिन झेल प्रभु।

गुरुवर के गियान, जेन हा देवै धियान,

जग रूँधना ला टोर करा देवै मेल प्रभु। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२२/११/२०२०

पाटन दुर्ग छ.ग.


कृपाण घनाक्षरी वर्णिक छंद 


परे खटिया उतान, होवत ले ठाढ़ भान,

उठत बघार शान, कहत हे चहा लान ।

बात धर नान नान, बोलत हे तान तान,

रीस रोस मन ठान, सिरतो ले अनजान।

दूसर के बात मान, लेगगे हे कँउवा कान,

पाछू जात सही जान, आवत हे धूर्रा छान।

बिन धरे गुन ज्ञान, चिन्हत ना लाभ हान,

होवत हे अपमान, धँसत करेजा बान। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२२/११/२०२०

पाटन दुर्ग छ.ग.


बलिदानी घनाक्षरी* 


*शूरबीर सबो बलिदानी ला नमन हे* 


बीर बाँहकर जेन सीमा में कटाये मूड़, 

अइसन बीर बलिदानी ला नमन हे। 

बैरी ला खेदार जेन देश के रखिन आन 

अइसन सबो स्वाभिमानी ला नमन हे।। 

अँचरा दाई बदला घेंच के करिन मोल, 

अइसन अटल जवानी ला नमन हे।

सोनहा आखर में लिखाये नाम जगमग

सुरता देवावत निशानी ला नमन हे।। 


करजा दाई के जेन छूटिन परान देके, 

अइसन बेटवा तो राम अउ लखन हे।।

सतलोक में उँकर होत होही अगवानी,

जेन महतारी बर वारे तन मन हे।।

देश के सेवा करैया लइका बियाये जेन, 

अइसन बाप महतारी ला नमन हे।। 

दाई के सेवा बर सोहाग जेन दान दिन, 

अइसन पिया के पियारी ला नमन हे।


गुरतुर सपना हा खारो होगे आसूँ गिर,

अइसन सजनी कुँवारी ला नमन हे।

झाँकत दुवारी ददा आही कहि घेरीबेरी,

फूल कस बिटिया दुलारी ला नमन हे।

लइकुसहा उमर आगी पानी बाप देत,

अइसन बेटा के लाचारी ला नमन हे।

बीरगति पाये वो जवान के तो गाँव गली, 

डेरौठी अँगना व दुवारी ला नमन हे।


शोभामोहन श्रीवास्तव 

०५/०५/२०२२


घनाक्षरी 


जग में जबर बैरी सबके हे कोन हर। 

कोन बन बरकस सबो ला नचात हे



छंद - पञ्च चामर छंद


"शिव ताण्डव स्तोत्र छत्तीसगढ़ी  


महेश बाँध के जटा, गिराय गंगधार तैं।

लपेट के नरी भुजंग के बिचित्र हार तैं।। १।।


डिमिड्ड डिमिड्ड डिमिड्ड डिमिड्ड डुगाडुगी बजाय तैं। 

विचित्र नाच कूद के तिलोक ला  कँपाय तैं।।२।।


जमो जमात मंत्रजाप एक शंभुनाथ हें।

बली अपार दैत देवता नवात माथ हें।।३।।


ललाट मांँझ नैन में समाय अग्नि ज्वाल हे। 

टँकाय दूज चन्द्रमा कपार में उजाल हे।।४।।


गुँजायमान डोंगरी उचार ओमजाप ले।

बिचित्रजीव संग हें निवृत्त पाप ताप ले।।५।।


उमेश दिब्य नाम ले पहाड़ पाप के जरै।

अधार के बिना तिलोक भार शंभु तैं धरै।।६।।


मया मताय मत्त मंडली परेत संग हे। 

बिचित्र केस भेस देस रूप रंग अंग हे।।७।। 


मणीअँजोर झिल्मिली झमक्क लक्क लक्क हे।

अँजोर तोर देख दैत देवता अबक्क हें।।८।।


बिचित्र बस्त्र अस्त्र शस्त्र हे बिचित्र लोक हे।

जिहाँ न लोभ मोह कोह छोह हे न शोक हे।।९।।


मसानघाट राख देह बैल गैल मेर हे। 

बहाँ नरी व गोड़ साँपडेड़ु के बसेर हे।।१०।।


भुजंग फेन ठाढ़ फोस्स फोस्स   फुफ्फकार हे। 

लुबुल्ल लुबुल्ल जीभ गाल बीख के भंडार हे ।।११।।


फणी मणीधरे अनेक वक्ष में सुहात हें। 

जुड़ाय बीखताप गंगनिर्झरी नहात हें।।१२।।


उमेश सृष्टि व्यष्टि ला कँपाय तैं डराय तैं।।

समेत फूलबान कामदेव ला जराय तैं।।१३।।


जटामकूट में टँकाय बूँदनीर सेत तैं। 

बिचित्र रूप संग अंग रंग ढंग चेत तैं।।१४।।


अनंत तैं अपार तैं उटंग तैं मलंग तैं। 

सदैव भक्तवृंद के कृपानिधान संग तैं।।१५।।


अछोर छोर खोज ब्रह्मदेव हार खाय हे। 

बिचार बिष्नु भोरहा प्रताप नाप गाय हे।।१६।।


जटाघटा बड़े बड़े नरेश ला नवाय हे। 

सिधोय साध सर्बदा दुवार जेन आय हे।।१७।।


अनंग दंभखंभ ला जराय तैं झँवाय तैं।।

पिये समुद्र बीख ला नरी रखे सजाय तैं।।१८।।


रिझे तुरंत तैं रमंत संत भक्तिभाव ले।

रमे रहे अनंत में डिगे नहीं सुभाव ले।।१९।।


महाबिरक्त तंत्र के कला भरे अपार तैं।

उमा उरोज के पबित्र चित्र चित्रकार तैं।।२०।। 


उठाय सृष्टिभार तैं भवानि के सिंगार तैं।

पुरान बेद शास्त्र के उजास के अधार तैं।।२१।।


रुद्राक्ष ले सजे धजे त्रिशूल धार हे पजे। 

बिलासभोग ला तजे हिमाद्रि मंडली सजे।।२२।।


मसानघाट के भभूत भस्म ला लगाय तैं। 

भरेस्ट कामदेव दिब्य नैन ले जलाय तैं।।२३।। 


विपक्ष दक्ष वक्ष के घमन्ड ला घटाय तैं।

भवाटवी भयंकरी समुद्र के करार तैं।।२४।।


पखार पाँव जान्हवी, समुद्र कोति जात हे।

पबित्र घाट बाट में, मया दया लुटात हे।।२५।।


मिटाय पाप ताप ला, उमेश ला मनात हौं।

असार मृत्युलोक में, उदार ला रिझात हौं।।२६।।


बँधाये पाप पुन्न
छत्तीसगढ़ी के पहिलैया वर्णिक छंद पांडुलिपि

 1/तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे
(कलाधर छंद)
2/इन्द्रिय भोग करावन न्यारे (मत्तगयंद सवैया)
3/आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी (मत्तगयंद सवैया)
 4/मैं अड़ही कड़ही जग जानत (मत्तगयंद सवैया)
5/ पीयन ना ककरो अब मानी (मत्तगयंद सवैया)
6/लाज मरे बृषभानु दुलारी (मत्तगयंद सवैया)
7/राउर द्वार रहौं बन रंका (मत्तगयन्द सवैया)
8/ खाबे कमाबे सुआ बेटीअसीद (शार्दूल विक्रीड़ित छंद)





1/तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे
(कलाधर छंद)


लोभ हे मोह हे न शोक हे न काम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
ज्ञान के गुमान हे न हीनमान ध्यान हे।।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
रात प्रात मध्यकाल दिव्य नाम प्रान हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
भक्ति भावपूर्ण हहो भुलाय रूप चाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
प्रीत में पगाय हे अनाम हे अकाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
रोग हे न शोक हे न जेवनी न बाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
कोहे न द्रोह हे न छोह हे अकाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
गेह के न मेह के न देह के गुलाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे।।
रंग चंग संग लोभ हे न तामझाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
नाम रूप में बुड़े गुनान झीमझाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
नाव गाँव भेव हे न जेब में छदाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
ना जनास हे झड़ी झकोर जाड़ घाम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
विश्व बियाप्त दुःख सुःख में लगे बिराम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।
शांत चित्तवृत्ति हे जिहाँ रमे अराम हे।
तेन शुद्ध चेत में बिराजमान राम हे। ।


 2/इन्द्रिय भोग करावन न्यारे (मत्तगयंद सवैया)


देह रचे अजगूत धरा गुन,इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।
दे मन चोर मड़ाय मँझार म,अंतस संपत लूटन सारे ।।
बुद्धि धराय गुनान भँजाकर,अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।
रूप निरंजन जोत बरै शुभ,ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

 
3/आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी (मत्तगयंद सवैया)


आकर कंकर आखर शंकर आखर मा अँगरा अउ आरी।
आखर मंतर आखर जन्तर आखर तन्तर आखर चारी ।
आगर मंगन आखर रंगन, आखर दंगन ले मुँह टारी ।
आखर पारस आखर सारस आखर मा रस हे बड़ भारी ।।

आखर उज्जर भावबेलुज्जर आखर ब्रम्ह बसे अबिनासी ।
आखर मारन आखर तारन आखर जीत व जीव हतासी ।
हे मनभावन ताप नवावन, आखर उच्छल मंगल हाँसी ।
आखर शारद आखर नारद ज्ञानबिसारद भारत काशी।।

 4/मैं अड़ही कड़ही जग जानत (मत्तगयंद सवैया)

देह रचे अजगूत भरे गुन, इन्द्रिय भोग करावन न्यारे ।
हे मन चोर मड़ाय मँझार म, अंतस संपत लूटन सारे ।।
बुद्धि धराय गुनान भँजाकर, अंकुस ले हथनी ल हँकारे ।।
रूप निरंजन जोत बरै शुभ, ब्रम्ह सनातन तार अधारे ।

रात पहाय थिराय बिछावन, नींद सुते सपना सपनाथन ।
ठाठ परे रहिथे खटिया कर, चेतन रूप धरे बुल आथन ।
देह नहीं हम चेतन आवन, छोड़ तभें तन घेर उड़ाथन ।
काबर फेर सहे दुखदालिद, देहरमे दुखभाग लिखाथन।।

चेतन रूप बसे प्रभु भीतर, नैन हमार निहार न पाये।
छाय चराचर में प्रभु तौ फिर,कोन करा हस बोल लुकाये।।
खोजत बेर ढ़ले बर जावत, कोन बिधान बताव जनाये ।
मैं अड़ही कड़ही जग जानत, खोजत हौं बिन देह हिराये।

 
5/ पीयन ना ककरो अब मानी (मत्तगयंद सवैया)

जात गुवालिन के गुनिया हम ज्ञानगुनान ल का हम जानी।
गोरस दूहन माखन हेरन गोबर थापन जानन ज्ञानी ।
कारज मा दिन रात खँटावन हे घर के सगरो जिनगानी ।
नाम अधार धरेन जिये बर पीयन ना ककरो अब मानी ।।

का समझावन आय उधौ तँय कोन पठोयधिरोय बता तैं।
नून जरे म मिंजे अउ हाय इहाँ झन फोकट ज्ञान जता तैं।
ये बिरहा अगनी म भुँजावत अंतस ला झन बेध सता तैं ।
जानस तौ अतके ल बता बस सुंदरमोहन सोर पता तैं।

मूड़ मुड़ाय तियार खड़े हन का छुरिया हम ला डरवाही।
हाँसत थूँकत जात-सगा मन गोड़ बढ़े नइ छेकन पाही ।
उम्मर के दियना भर तेल ल साँस भला कइसे उरकाही।
कोन हमार बसे सुख गाँव हवै नजराय दुखहाही ।

आय उधौ हर ज्ञानघमंड भरे जब फोकट ज्ञान बघारे ।
तत्व बतावन बोध करावन द्वैत अद्वैत विभेद उघारे ।
गोकुल गाँव म गोड़ मड़ावत ज्ञान घटा घपटे अँधियारे ।
ओमन ला समझावन आवत जे सुख लूटत ज्ञान बिसारे ।।

ब्रम्ह बिचार बतात बिल्होरत, बोलत ज्ञान जतात गुमानी ।
भौं नइ देवत हे रउताइन, जानत जावन बाट सयानी।।
प्रेम अनेम पराग झरावत, होवत उत्सव के दहकानी।
गोकुल गाँव जिये सुख लूटत, माँ जसुदा मइया मन बानी।

नाम नहीं जिभिया हम लानन जीव ह काकर मूँह अमाही।
कोन घड़ी दिखही पिय के मुँह देख

 6/लाज मरे बृषभानु दुलारी (मत्तगयंद सवैया)

बूलत जावत हे जमुना कत, मोहन हाथ धरे सुकुमारी ।
हें अँखियावत हाँसत साँवर, लाज मरे बृषभानु दुलारी।।
लाज भरे बड़का डग मारत, बाट मया तलवार दुधारी।।
बाजत हे चुरिया अउ कंगन, वो धुन लागत हे सुख भारी।।


7/राउर द्वार रहौं बन रंका (मत्तगयन्द सवैया)

भीतर सेज सुते रसिया अउ,पापिन झाल न पावँव पंखा ।
भूल पिया घर काज जिहावँव,आगर के उपजै मन शंका ।
मार डरै डर लाज जरै जग,राउर द्वार रहौं बन रंका ।
रेंगन चाहँव संग महूँ पर, हौं जस पाट नदी कर अंका ।

हाँ बिरथाजिनगी अब लागत, कोन मिटावय माथकलंका।
बाट बनावँत जावँव पी कत,बोरझरी अरझौं अरझंका ।
लोक तिनो अउ चौदह भूवन, बाजत हे रसिया कर डंका ।
राघव ले बिछड़े सिय लागत, प्रान बियाकुल कंचन लंका ।

 
8/ खाबे कमाबे सुआ बेटीअसीद (शार्दूल विक्रीड़ित छंद)


न्यौता पीतर देव डीह पुरखा, दे बाप फेरी करे ।
दाई संग मनात देव कुल के, छाया हँथेरी करे ।।
बेटी फूल सरीख आज अँगना, होये बिहाती खड़े ।

देवौ आव असीद देव दुल्हा, हे भाग जागे बड़े ।।

लानौ ओ सँवार माँझ मड़वा, फूफू सुवासी धरे ।
भौजी पीस लगाव तेल हरदी, दाई ह आँँछी करे ।
जम्मो नेग नता निभाव बढ़के, बोली सुवासी झरे ।
आये हे घर में बरात दुलरू, कैना बिहाये बरे ।।

जोड़ी-जाँवर हे फबे सुघर के, बाजा रुँजी हे बजे ।
चूरी अम्मर होय माँग दमकै, रानी दुलारी सजे ।।
सोहागीन सखी भरौ अँजुरिया, खावैं जुड़ावैं धिया ।
पाही आज असीद तेन फुरही, आवौ असीदौ ददा ।।

काँटा गोड़ गडै़ झने जुगल के, आवौ असीदौ बबा ।
दूधे खाय नहा अँचोंय बिलरी, आवौ असीदौ कका ।।
बाढ़ै वंश सदा रहै सुख सबो, आवौ असीदौ ममा ।
जोही हा फल फूलके मगन हो, आवौ असीदौ मया ।।

जोंड़ा पाँव पखार नैन जल ले, आँसू ददा हा ढ़कै ।
दाई के गति ला बता शबद मा, कोनो नहीं तो सकै ।।
भाई रोत कहै सुजान बहिनी, भौजी कहै जा गड़ी ।
दाई के अउ नैन धार बरसै, ना तो थिरावै झड़ी ।।

माया गाँव बिराजमान रहिना, बेला लमा वंश के ।
जुग्गा नाम जगात भागधर हो, जोडी़ चरौ हंस के।।
ओली मा शुभ के भरे अँजुरिया, ड्योढ़ी अमाबे सुआ।
शोभामोहन देत हे बिदा बिटिया, खाबे कमाबे सुआ ।।




ऋतुराज-छन्द वसन्ततिलका

ऽ ऽ । ऽ । । । ऽ । । ऽ । ऽ ऽ
लाला ललाल ललला, ललला ललाला
बेरा बसंत बग ले,
जग ला रँगागे।
बेला बिंयार बखरी,
भितिया छबागे।।
डारी चुटुक्क चुक ले,
डुहँरू धरागे ।
झूला झुले लठर के,
भँवरा बयागे।।
चुन्दरी उड़ात पुरवा, सुघरी लजागे।
सुन्ना अगास मन के,
सपना गँजा गे।।
छागे बसंत बइरी,
दुख ला बढ़ागे।।
गेहे बिदेस सँइया,
सजनी झँवागे।।
झाँकै झटाक झरखा,
नयना दसे हे।
जाके बिदेस बिसरा, 
रसिया बसे हे।
ठट्ठा करे सखि सबो,
नइ वो हँसे हे।


शोभामोहन श्रीवास्तव




भुजंगप्रयात छंद

ललाला ललाला ललाला ललाला 


तर्ज - तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही पूजा

तुम्ही देवता हो


१/

महादेव भोले महानंद दाता। 

परौं पाँव तोला जुहारौ बिधाता।।

सबो मंत्र सिद्धि दिलैया दयालू।

तहीं छाय सब्बो मुड़ा में कृपालू।

२/

सबो भार भोले तहीं हा सँभारे।

नहीं भक्त के पै न खूबी बिचारे। 

कहूँ तो नहीं तोर हे हारिहारा। 

इही पायके तै सबो ला पियारा।।

३/

नहीं पक्षपाती महादेव भोला।

तभे तो कहे हें सबो पूज्य तोला।। 

अगासी हवै रूप वा तोर चोला।

नपावै नहीं तोर काया न टोला।।

४/

तुहीं ला उपासौं तुही ला अराधौं।

रुलाये म रोवौं हँसाये म हाँसौ।

न जानै सुज्ञानी त मैं तो अड़ानी। 

तहीं ओम के मूल तैं ब्रम्हज्ञानी।। 

५/

नहीं राज शंभू तभो तै ह राजा। 

बसेरा पहाड़ी भुजंगा समाजा।।

सबो शब्द के पार भोले रहैया। 

सबो ज्ञान के पार तैं तो गुसैया। 

६/

सती के गुसैया जु कैलाश वासी। 

मुँदे नैन तै पारब्रह्म उपासी।। 

भभूती रमाये मुड़ी माल डारे। 

तहीं काल ला नित्य बूता तियारे।

७/

तहीं तो उदाली तहीं तो दयाला। 

तहीं ज्ञान के दिव्य भंडार वाला।

तही पार संसार सीमा रहैया। 

जटा बाँध के मूड़ गंगा बहैया।। 

८/

नवा माथ स्वामी परौं नाथ पैंया। 

सबो विश्व के एकहत्थी चलैया।।

करा के सहीं दग्ग ले शील तोरे। 

करै मोहनी दिव्य तोरे अँजोरे।।

९/

गहीरी सदाथीर मंतार भोला। 

हवै जग्ग ले दीपदीपात चोला। 

सबो जीव के माँझ में तैं बसैया।

सिया राम तोरेच में हे रमैया।।

१०/

सबो देवता गात हें तोर गाथा। 

जटा माँझ गंगा टँके चन्द्र माथा।

हवै साँप डोमी बने तोर माला।

तिहूलोकस्वामी कुभेसी निराला। 

११/

दुनो कान में ओरमें तोर बाला। 

चले तूलिकाभौंह आँखीबिसाला। 

हवै रूप में भाव जम्मो थिराये। 

महूँ गान गावौं जथा विश्व ध्यावै। 

१२/

तहीं देव के देव हाला पियैया। 

मँझारी धरे कंठ में तैं जियैया। 

निजी भोगभूले महादेव न्यारे।। 

सदा विश्व कल्याण तैं हा बिचारे। 

१३/

सबो ले बड़े दानदाता दयाला। 

हवै ओढ़ना तोर तो बाघछाला।। 

तही झार दे मोह जंजाल झाला। 

प्रभो तोर छोड़े कहौं दुःख काला। 

१४/

सबो के जनैया सबो के हनैया। 

परौं पाँव घोन्ड़े सँगे शक्ति मैया।। 

महाभेस वाला महारूप वाला। 

महादेव शंभू सबो ले निराला।। 

१४/

सती के पिया देख पापी डरावैं।

सदा भक्ति ले भक्त सेवा बजावै। 

सहस्त्रोन आदित्य के हे अँजोरी। 

रिझाये उमा बाँध के प्रीत डोरी।। 









१५/

मया के लुटैया मया में रमैया।

सदा भक्त के वक्ष माँझा समैया।

नहीं तोर तो मूल ला खोज पावै। 

सबो देवता 




सदाकाल ले जीव तोरे सहारे।





मनहरण घनाक्षरी) 


राम रट राम रट, राम बसे घट-घट,

संसो के चिरइया उड़ जाही भर-भर ले ।

बेरा बड़ा बलकर, ओकर जतन कर,

फर हर फरे झर जाही झर-झर ले ।

बेरा संग झन खेल, अउ दुख झन झेल,

अइलाही फूल जेन फूले चर-चर ले ।

पयडगरी सुघर, हरि भजन के धर,

दूरिहाय जगत के दुख सरभर ले ।


घनाक्षरी छंद 


परबतिया ला देखौ शंभू मेर चेंध चेंध,

जगसुख सेती सब पोथी सिरजाय हे।

सीता सत डटे रहि पति पत राखे बर,

जगसुख सेती सब पोथी सिरजाय हे।

रत्नारानी ला देखौ माया परे तुलसी ला,

राम मा रमाये मन लहर लगाय हे।

जब जब देखहू लहुट के रे मनखे हो,

पग पग तिरिया हा जग ला रेंगाय रे।।


शोभामोहन श्रीवास्तव

 

ईश सुमरनी घनाक्षरी 


हरि के बनाय देह,

हरि के जगत गेह।

हरि के जिनिस ला हरि ला चढ़ाय रे।

हरि जगसुख सोती,

हरिच के जीव जोती।

मृणमय चिनमय हरि सिरजाय रे।

हरि ले मिलन बर, 

भज सुमिरन कर।

हरिच के अंश जीव हरि में समाय रे। 

एको छिन गॅवा झन, 

मया गढ़ा मने मन। 

जग जनमे मनुख चोला जब पाय रे। 


शोभामोहन 

११/०४/२०२२




ईश सुमरनी घनाक्षरी 


तोर हाड़ा हपट के जोरे सब चीज बस, 

नाशवान तभो ले हवस बइहाय रे। 

गजब डउल कर फुनगी मा पहुँचेस, 

खसले के डर फेर जीव में समाय रे। 

रचेस सजन संग मिलन जुलन खेल, 

मिलन के संग फेर बिरहा लिखाय रे।

चटक मटक चरदिनिया जिनिस बर, 

ओंड़ा दिये हरि नाम हस बिसराये रे। 


शोभामोहन

जलहरण घनाक्षरी 


नाम हे अपार तोर चरित अपार तोर, 

रूप हे अपार तोर समझ न आय प्रभु। 

गुन हे अपार तोर करम अपार तोर, 

सरसती तक नहीं सकै गुन गाय प्रभु।

दरस अपार तोर परस अपार तोर, 

जेन ला छुवस बस उही ला जनाय प्रभु।

दया हे अपार तोर मया हे अपार तोर, 

मनखे ला अपन घरान में मिलाय प्रभु।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव


गुनान मनहरण घनाक्षरी 


दशरथ कस नहीं कभू प्रभु प्रीत करे,

कौशल्या असन नहीं संजम जगाय हो।।

कैकई कस कलंक लिये ना अपन मूड़,

सीता कस नहीं पति धरम निभाय हो। 

बंधवा भरत कस राजा नहीं बन सके

लखन असन नहीं सेवा मन लाय हो।

भजन करे ना कभू सजन मनाये बर, 

छुतहा चेत हा कइसे रामधन पाय हो।। 


शोभामोहन 

२३/०३/२०२२


भगत के मति अउ गति

(१)

अहम के भाव तजे, परमात्मा ला भजे,

सुख दुख मा उहीच, ला सुमिरथे सचेत ।

तज भेदभाव मन, जीव दया कर प्रन,

गरब गुमान हन, प्रभु ला परम नेत।

दुख में न रोय गाय, सुख बर ना ललाय,

एक ईश ला मनाय, जग जीवसुख देत।

करै कहूँ अनभल, करथे ओकरो भल,

हरि भज पल पल, बड़हर सुख लेत।

(२)

लाभ अउ हान घुँचे, हार जीत पार ऊँचे,

हरहिन्छा दान रुचे, वह सब सुख पाय।

छोड़ सबो कलकल, गोठ बात भलभल,

तज मन हलचल, तन जीते बर जाय ।

परमातमा मा टेके, तन मन राखै छेंके,

एती ओती नइ देखे, प्रभु मन मा बसाय।

कोनो हा उदिम करे, कुड़काय रीस भरे,

तभो अमरित झरे, अरि थक हार जाय।

(३)

कुड़काय ना कहूँ ला, बगियाय ना कहूँ ला,

झगराय ना कहूँ ला, रीस रोस रहै पार।

जगत जिनिस बर, ओला नइ धरै जर,

माटी लेख चोला घर, गुनय फकत सार।

देखके बढ़त पर, सुख पावै बड़हर,

इरखा डाह उबर, बिन डर बिन भार।

चार कोस दूर रीस, परै ना पाँच पचीस,

सुमरत एक ईश, बहय जगत धार।

(४)

गड़ै नइ आस फाँस, तन मन एक रास,

सब संग बोल हाँस, पबरित बेवहार।

चिन्ह के अपन दोस, सरलग रहै होस,

डहरसाजी न रोस, सब बेर शुभ धार।

कभू ना होवै बिहल, रहै एक ईश बल,

लीला जान हलचल, अटल दियना बार।

भोग मा नहीं भुलाय, आत्मा नहीं सुलाय,

आसरा नइ ढुलाय, राखै मन दूर टार।

(५)

भोग नाश देख डर, धरै नहीं रोये बर,

राखै मन टाँठ कर, परमेश के अधार।

पाये अउर अपाय, बर ना मन झपाय,

सुख साध दुरिहाय, चेत ला रखै उलार।

शुभ वा अशुभ फल, एक लागै तप बल,

चेत बुध निरमल, सम लागै बैरी यार।

अपमान अउ मान, जानै वो एक समान,

बात धर नान नान, टौरै ना धीरज पार।

(६)

सरद गरम सम, सुख दुख जान भ्रम,

चेत उटँग बिरम, घुँचे घुँचे मोर तोर।

चाहे कहूँ सहराय, चुगली करै सुनाय,

देह ना चटक पाय, ईश धुन मा सजोर ।

चरचा में दिन निश, सुमरत जगदीस,

दुनिया ले कोस बीस, दुरिहा रहै अँजोर।

पर के ना करै बात, बस प्रभु गुन गात,

अपन दिन पहात, मन नाम गुन बोर ।।

(७)

प्रभु बर मया जगा, भजन में जीव लगा,

सबो ला नजीक सगा, समझे अउ परिवार।

मन राखथे संतोष, देवे ना कहूँ ला दोष,

करथे सबो ला तोस, मोह नहीं घर द्वार।

बूध प्रभु पद थीर, धरम ला धर धीर,

तीरथ किंजर फीर, सरधा ला बढ़वार।

भगत के गुन गन, गावत शोभामोहन,

करे बर ठंस मन, होये बर भव पार। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२०/११/२०२०

पाटन


जलहरण घनाक्षरी (वर्णिक छंद) 


बिन तारा बिन कूची, पोठ रोठ नान बूची,

मनखे ला माया छाँद राखै जग जेल प्रभु।

मड़ा सुख सुविधा ला, भोग रोग दुविधा ला,

बिलमाये राखै जीव रच यह खेल प्रभु।

सुख दुख ओरी पारी, भोगै सब जीवधारी,

कहूँ जगत मा नइ दिखै बिन झेल प्रभु।

गुरुवर के गियान, जेन हा देवै धियान,

जग रूँधना ला टोर करा देवै मेल प्रभु। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२२/११/२०२०

पाटन दुर्ग छ.ग.


कृपाण घनाक्षरी वर्णिक छंद 


परे खटिया उतान, होवत ले ठाढ़ भान,

उठत बघार शान, कहत हे चहा लान ।

बात धर नान नान, बोलत हे तान तान,

रीस रोस मन ठान, सिरतो ले अनजान।

दूसर के बात मान, लेगगे हे कँउवा कान,

पाछू जात सही जान, आवत हे धूर्रा छान।

बिन धरे गुन ज्ञान, चिन्हत ना लाभ हान,

होवत हे अपमान, धँसत करेजा बान। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

२२/११/२०२०

पाटन दुर्ग छ.ग.


बलिदानी घनाक्षरी* 


*शूरबीर सबो बलिदानी ला नमन हे* 


बीर बाँहकर जेन सीमा में कटाये मूड़, 

अइसन बीर बलिदानी ला नमन हे। 

बैरी ला खेदार जेन देश के रखिन आन 

अइसन सबो स्वाभिमानी ला नमन हे।। 

अँचरा दाई बदला घेंच के करिन मोल, 

अइसन अटल जवानी ला नमन हे।

सोनहा आखर में लिखाये नाम जगमग

सुरता देवावत निशानी ला नमन हे।। 


करजा दाई के जेन छूटिन परान देके, 

अइसन बेटवा तो राम अउ लखन हे।।

सतलोक में उँकर होत होही अगवानी,

जेन महतारी बर वारे तन मन हे।।

देश के सेवा करैया लइका बियाये जेन, 

अइसन बाप महतारी ला नमन हे।। 

दाई के सेवा बर सोहाग जेन दान दिन, 

अइसन पिया के पियारी ला नमन हे।


गुरतुर सपना हा खारो होगे आसूँ गिर,

अइसन सजनी कुँवारी ला नमन हे।

झाँकत दुवारी ददा आही कहि घेरीबेरी,

फूल कस बिटिया दुलारी ला नमन हे।

लइकुसहा उमर आगी पानी बाप देत,

अइसन बेटा के लाचारी ला नमन हे।

बीरगति पाये वो जवान के तो गाँव गली, 

डेरौठी अँगना व दुवारी ला नमन हे।


शोभामोहन श्रीवास्तव 

०५/०५/२०२२


घनाक्षरी 


जग में जबर बैरी सबके हे कोन हर। 

कोन बन बरकस सबो ला नचात हे



छंद - पञ्च चामर छंद


"शिव ताण्डव स्तोत्र छत्तीसगढ़ी  


महेश बाँध के जटा, गिराय गंगधार तैं।

लपेट के नरी भुजंग के बिचित्र हार तैं।। १।।


डिमिड्ड डिमिड्ड डिमिड्ड डिमिड्ड डुगाडुगी बजाय तैं। 

विचित्र नाच कूद के तिलोक ला कँपाय तैं।।२।।


जमो जमात मंत्रजाप एक शंभुनाथ हें।

बली अपार दैत देवता नवात माथ हें।।३।।


ललाट मांँझ नैन में समाय अग्नि ज्वाल हे। 

टँकाय दूज चन्द्रमा कपार में उजाल हे।।४।।


गुँजायमान डोंगरी उचार ओमजाप ले।

बिचित्रजीव संग हें निवृत्त पाप ताप ले।।५।।


उमेश दिब्य नाम ले पहाड़ पाप के जरै।

अधार के बिना तिलोक भार शंभु तैं धरै।।६।।


मया मताय मत्त मंडली परेत संग हे। 

बिचित्र केस भेस देस रूप रंग अंग हे।।७।। 


मणीअँजोर झिल्मिली झमक्क लक्क लक्क हे।

अँजोर तोर देख दैत देवता अबक्क हें।।८।।


बिचित्र बस्त्र अस्त्र शस्त्र हे बिचित्र लोक हे।

जिहाँ न लोभ मोह कोह छोह हे न शोक हे।।९।।


मसानघाट राख देह बैल गैल मेर हे। 

बहाँ नरी व गोड़ साँपडेड़ु के बसेर हे।।१०।।


भुजंग फेन ठाढ़ फोस्स फोस्स फुफ्फकार हे। 

लुबुल्ल लुबुल्ल जीभ गाल बीख के भंडार हे ।।११।।


फणी मणीधरे अनेक वक्ष में सुहात हें। 

जुड़ाय बीखताप गंगनिर्झरी नहात हें।।१२।।


उमेश सृष्टि व्यष्टि ला कँपाय तैं डराय तैं।।

समेत फूलबान कामदेव ला जराय तैं।।१३।।


जटामकूट में टँकाय बूँदनीर सेत तैं। 

बिचित्र रूप संग अंग रंग ढंग चेत तैं।।१४।।


अनंत तैं अपार तैं उटंग तैं मलंग तैं। 

सदैव भक्तवृंद के कृपानिधान संग तैं।।१५।।


अछोर छोर खोज ब्रह्मदेव हार खाय हे। 

बिचार बिष्नु भोरहा प्रताप नाप गाय हे।।१६।।


जटाघटा बड़े बड़े नरेश ला नवाय हे। 

सिधोय साध सर्बदा दुवार जेन आय हे।।१७।।


अनंग दंभखंभ ला जराय तैं झँवाय तैं।।

पिये समुद्र बीख ला नरी रखे सजाय तैं।।१८।।


रिझे तुरंत तैं रमंत संत भक्तिभाव ले।

रमे रहे अनंत में डिगे नहीं सुभाव ले।।१९।।


महाबिरक्त तंत्र के कला भरे अपार तैं।

उमा उरोज के पबित्र चित्र चित्रकार तैं।।२०।। 


उठाय सृष्टिभार तैं भवानि के सिंगार तैं।

पुरान बेद शास्त्र के उजास के अधार तैं।।२१।।


रुद्राक्ष ले सजे धजे त्रिशूल धार हे पजे। 

बिलासभोग ला तजे हिमाद्रि मंडली सजे।।२२।।


मसानघाट के भभूत भस्म ला लगाय तैं। 

भरेस्ट कामदेव दिब्य नैन ले जलाय तैं।।२३।। 


विपक्ष दक्ष वक्ष के घमन्ड ला घटाय तैं।

भवाटवी भयंकरी समुद्र के करार तैं।।२४।।


पखार पाँव जान्हवी, समुद्र कोति जात हे।

पबित्र घाट बाट में, मया दया लुटात हे।।२५।।


मिटाय पाप ताप ला, उमेश ला मनात हौं।

असार मृत्युलोक में, उदार ला रिझात हौं।।२६।।


बँधाये पाप पुन्न

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