Friday, 26 July 2024

गीत भजन छंद (१)
हरिगीतिका छंद
2212 , 2212 , 2212 , 2212
लालालला लालालला,लालालला लालालला
1/
बीना धरे हे हाथ मा,साजे मुकुट अउ माथ मा ।
गनपति बिराजत छेंव कर,अउ माँझ लक्ष्मी साथ मा ।
हे हाथ मा पुस्तक धरे,बइठे कमल के फूल हे
करधन सजे पैजन बजे, मोती जड़े अउ झूल हे ।
2/
नथली फभे हे सोनहा, मुंँदरी सुघर अँगरी सजे
गर हार दुलरी तीलरी, चूरी सुघर कंगन बजे ।
अँधियार मनके टारथे,गुन ग्यान दियना बारथे।
संसार के दुख मेटके, मन कुंदरा ला झारथे।
3/
सुर ला सजा धुन ला बजा, संगीत सिरजावै उही।
भव पार बर पतवार अउ,जग नाच नचवावै उही।
मन नाद अनहत ला बजा,साधक सुजन ला तारथे ।
बस मध्यमा अउ वैखरी, दुख ताप संकट टारथे ।
[15/02, 13:18] : (चौपाई छंद)
बइठ कलेचुप गीत लिखत हँव
बइठ कलेचुप गीत लिखत हँव।
हारे दाम फलीत लिखत हँव ।।
मैं गरकट्टा के बस्ती मा ।
संविधान के रीत लिखत हँव।।
मनखे अतका बिदरंँग होगे ।
बाँटिन उँकर अनीत लिखत हँव ।।
बांँह पसार बलावत बेरा ।
बिपतियाय अतीत लिखत हँव ।।
मैं निहार पानी मा मुँहरन ।
होती के परतीत लिखत हँव ।।
बेरा के कलथी ला देखत ।
आँखी दिखे फबीत लिखत हँव ।।
[17/02, 17:05] : चौपाई छंद*
*कब आबे तैं बोल लहरिया*
बरसत बादर करिया-करिया।
जल बुँदियन छलकात गगरिया ।।
बरसत बादर.............................
1/
दूबी जामत ले बरसत हे ।
छान्ही परवा तरी धँसत हे ।।
खेत जोताय नइ इक हरिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया ।।
बरसत बादर ...............................
2/
सरी कोठ भर उपकत रेला ।
सोग लगत हे देखत तेला ।।
आँसू ढ़रकत फिजत अँचरिया।
कब आबे तै बोल लहरिया ।।
बरसत बादर ..........................
3/
गरजन घुमरन सुनके बादर ।
अंडा साँप फूटत भुँइया भर।।

छलकत बहकत नदिया तरिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया ।।
बरसत बादर ................................
4/
नभ मा बगुला पाँत उड़ावत ।
अउ भुँइया के जीव जुड़ावत ।।
मोरे मन धनहा हे परिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया।।
बरसत बादर ..............................
5/
बइठ बरेंडी कँउवा बोलत ।
गियाँ गड़ी बन हाँसत ठोलत।।
रहन धराये हे सुखलरिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया ।।
बरसत बादर............................
6/
लउकत बिजुरी देख डरत हौं ।
तोर बिगन दिन रात मरत हौं ।।
बज्र असन हे कटत उमरिया ।
कब आबे तैं बोल लहरिया ।।
बरसत बादर .....................
[27/02, 14:34] : चौपाई
*
संत पधारे के सुन बोली । सास दँउड़त निकलिस खोली ।।
बेटा ला लगिहात बलाथे । संत गोड़ छू पाँव पराथे ।।
सुरुज मनाये मन मा ठानी । देवमती सन तन मन बानी।।
भिनसरहा ले नदिया धावैं । कनिहा भर पानी मा जावैं ।।
अरग देत दिनकर ला पूजैं । जब्बर करमलेख ले जूझैं ।।
असकुस होथे दिन चढ़ जाथे । राम भरोसा बेर पहाथें ।।
शास्त्र उपनिषद दाई बाँचे । सुन -सुन भीतर लइका नाचै।।
*
[27/02, 17:04] : चौपाई
*
संत पधारे के सुन बोली । सास दँउड़त निकलिस खोली ।।
बेटा ला लगिहात बलाथे । संत गोड़ छू पाँव पराथे ।।
सुरुज मनाये मन मा ठानी । देवमती सन तन मन बानी।।
भिनसरहा ले नदिया धावैं । कनिहा भर पानी मा जावैं ।।
अरग देत सूरुज ला पूजैं । जब्बर करमलेख ले जूझैं ।।
असकुस होथे दिन चढ़ जाथे । राम भरोसा बेर पहाथें ।।
शास्त्र उपनिषद दाई बाँचे । सुन -सुन भीतर लइका नाचै।।
*
[28/02, 16:21] : चौपाई छंद अभ्यास
महतारी पथरा बरसाथे । अउ लइका बंदूक चलाथे।।
जे हर घटिया सीखा पाथे । अपने कुल के नाव बुताथे ।।1।।
जे दूसर बर अस्त्र उठाथे । उहू शस्त्र ले मारे जाथे ।।
दाई सतगुन नहीं सिखाथे । तब लइका मरजाद भुलाथे।।2।।
कब रक्सा के सुसी बुताथे । कतको झन ला मार सुताथे ।
आज नहीं तो काल भंँजाही । काल दुवारी ओकर आही।।3।।
लड़त-लड़त अपनो मर जाही । बेरा देही उँकर गवाही ।।
बड़े बड़े झगरंत चले गै । होगे सबके अंत छले गै ।।4।।
मया दया के बिगन चिन्हारी । पाप कमावत जब्बर भारी ।
जेन निहत्था के गर काटै । दूसर खातिर दुख उवाटै ।।5।।
अइसन मनखे चिन्हव चिन्हावौ । सावचेत सबला करवावौ ।।

मानवता के दुश्मन जानौ । हितवा मितवा नोहय मानौ ।।6।।
[05/03, 22:29] : फेर बसंती दिन आगे हे (शंकर छंद अभ्यास)
1/
फेर बसंती दिन आगे हे, छाय हे अनुराग।
कोकिल कुहकुह करत बना मुँह,देख गंध पराग।।
माते अनंग बगरात रंग, कली लचके डार।
अउ अमराई के रुखराई,साज डरिन सिंगार ।।
2/
चमकत आँखी धरके पाँखी,उड़त जात अगास।
जब गौतरिहा पिय लहरिया, दिखत नैन
परास ।।
भाग ह खुलगे सपना झुलगे,झनकगे मन तार।।
झूमत गावत रंग उड़ावत, आय हवय तिहार।।
3/
मंद चढ़ाये असन जनाये, सृष्टि के व्यवहार।
जीयत जागत जइसे लागत,सब डहर संसार।।
रंग सुहावन संग सुहावन, पधारे हे कंत ।
जोग जगाये जोगी गाये, मया गीत बसंत ।।
[05/03, 23:43] : 1/
भीड़ भड़क्का धक्का मुक्का,अबड़ दे आनंद।
एक्का दुक्का छटके रहिके,होय सुख हर मंद।।
भीड़ करै जब भड़भड़-भड़भड़,होय हलचल हाट।
सइमो-सइमो गाँव गली घर, होय रद्दा बाट।।
2/
कतको दिन के भूले बिसरे,मेल मेला होय ।
सुरता करके जीव जुड़ावै,जब अकेला खोय।।
कुंभ नहाये कतको मनखे, जाय गंगा घाट।
जुरै करोड़ो मनखे सिगबिग,भरे नदिया पाट ।।
3/
जतके जादा भीड़भाड़ हो,मन ह हरियर होय।
मगन होय सब बड़ सुख लागै,फिकर नहीं बिटोय।।
फेर भीड़ हा भगदड़ होके, करै सत्यानाश।
होय देख तो मनुखबाहिर, दिखै रक्सा रास ।।
4/
भीड़ बिगन गड़हन के होके, मरे मारे जाय।
भोगै जब परिनाम ल पाछू, सोच के पछताय।।
भीड़ उमड़ बइहा पूरा कस, चलत मार मुसेट।
जेन बाट मा भीड़ चलत वो, सबो लेत चपेट।
[05/03, 23:50] : फेर बसंती दिन आगे हे (शंकर छंद अभ्यास)
1/
फेर बसंती दिन आगे हे, छाय हे अनुराग।
कोकिल कुहकुह करत बना मुँह,देख गंध पराग।।
सब मतंग हे गमक रंग हे, कली लचकत डार।
अउ अमराई के रुखराई,साज डरिन सिंगार ।।
2/
चमकत आँखी धरके पाँखी,उड़त जात अगास।
जब गौतरिहा पिया लहरिया, दिखत नैन
परास ।।
भाग ह खुलगे सपना झुलगे,झनकगे मन तार।।
झूमत गावत रंग उड़ावत, आय हवय तिहार।।
3/
मंद चढ़ाये असन जनाये, सृष्टि के व्यवहार।
जीयत जागत जइसे लागत,सब डहर संसार।।

रंग सुहावन संग सुहावन, पधारे हे कंत ।
जोग जगाये जोगी गाये, मया गीत बसंत ।।
[14/03, 16:15] : शंकर छंद (16/10)
छूटत मइया छूटत गइया, छूटत हवय गाँव ।
छूटत संगी अउ मनरंगी, कदम रुखवा छाँव।।
छूटत राधा परगे बाधा, रंगरेली रास ।
छूटत जमुना बनके पहुना, जात मथुरा हाँस ।।
[16/03, 11:18] : शंकर छंद अभ्यास
विषय हाहाकार
1/
एक करोना पारत रोना, काँपगे हे चीन ।
आज निकलगे हावय ओकर, भरे बोतल जीन।।
सड़क गली छाये सन्नाटा, ठप्प हे बैपार ।
बनन-बनन गिँजरइया मनखे, लहुटगे घरद्वार।।
2/
अंश जीव के निच्चट नानुक, करत हाहाकार।
सबो देश ला लपटत देखौ,मनुख मानत हार ।।
गाँव शहर मनखे विन सुन्ना, सबो हे गुम खाय।
घर घमंड के रीता होथे, बात सिरतो आय ।।
3/
जीव जंतु के हइता थमगे, अउ करुन गोहार।
ये प्रकृति आगू मा दिखथे,मनुख हर लाचार ।।
छोड़ माँस मसगिद्धा करथे,साग के आहार।
हाँथ मिलाये हवै भुलाये, होवत नमस्कार।।
4/
हें रुधाँय सब घर मा अपने, बचावत हे प्रान ।
सबके बुध हर परगे पातर, सटकगे अभिमान।।
पल मा परलय लाने सकथे, प्रभु हे बलवान।
तेकर सेती तज के छल-बल, नाम लौ भगवान।।
[16/03, 11:21] : शंकर छंद अभ्यास
1/
कोनो दिन तो कोनो छिन तो, सुने परही गोठ।
मोरो कलकुत पारे अउ हुँत,ए सजन मसमोठ।।
गीत रिझौना मैं नइ गावौं, थके हवँव बलात ।
काय मंँझनिया काय बिहनिया, साँझ का अउ रात।।
2/
बेरा काटौं गड्ढ़ा पाटौं, एक तोला जान ।
प्रान लुटावौं अउ सपड़ावौं, गुनौं लाभ न हान।।
मग मा काँटा सुख दुख बाँटा,देख नइ घबराँव।
मन हे बइहा रद्दा कइहा, अगम सुख के गाँव।।
3/
तोरे सुमरन तोरे घुमरन, धरे गुरुबर ग्यान ।
गावत साँसा धरके आसा, तोर मग भगवान।।
४/
छूटत अटकन छूटत भटकन, होत बाट अबाध।
परही आना सुनके गाना, मिलन के हे साध ।।
[20/03, 11:48] : शंकर छंद अभ्यास
1/
तोरे नत्ता तोरे सैना, जीव तोरे लाग ।
तोरे बाजा तोरे नाचा , गीत तोरे राग ।।
तोरे शासन तोरे आसन, दिये राशन तोर।
तोरे आखर मन के सागर, भाव भँवर हिलोर।।
तोरे माली पिंवरी लाली, रंग गंध पराग ।
माटी पानी सूरज दानी, अउ बगइचा बाग।।
देत गवाही आँही-बाँही, जिनिस तोर बनाय ।
मुश्किल भारी तभो चिन्हारी,रहिथँस तँय लुकाय ।।
[21/03, 18:45] : विष्णु पदछंद अभ्यास
मन बैरी भटके
झटकारे ले बिसयन कोती, किरनी कस चटके।
लपटे झपटे आनी-बानी,सँभर सँभर मटके।।
मन बैरी भटके ।।१।।
एक खेदारत दूसर धमकै,साध भँवा पटके ।
साध-सधौरा नार-लमेरा, ओरी धर लटके।।
मन बैरी भटके ।।२।।
सतफुलवा डुँहड़ावै जब तौ,धर डारी झटके ।
लाभ-हान के सबो गणित ला, राखे हे रट के।।
मन बैरी भटके।।३।।
बिख बुताय बेधाय बान हा,चिटको ना खटके।।
गिंजर बजरिया दृश्य लहरिया,आँखी जा अटके ।।
मन बैरी भटके ।।४।।
[23/03, 13:06] : विष्णुपद छंद
हरि सुमरन करना
*****************
जग अरझे बरजे हौं तैं झन,रोग बिसा धर ना ।
छोड़ सबो परपंचीपन ला,हरि सुमरन कर ना।।
हरि सुमिरन कर ना..................१/
घेरी-बेरी घानी-मूँदी,फोकट झन फिर ना।
कोनो अइसे कोनो वइसे,तोला का करना।।
हरि सुमिरन कर ना...............२/
ब्यापै नइ का अलहन धरके,पशु जइसे चरना ।
मृगतृष्णा बर निंदरत हावस,अंतस के झरना ।।
हरि सुमिरन कर ना ..............३/
काबर तैं मंजूर करे हस,बिसयन जग जरना ।
पाप पुन्न के जबर मोटरी,फिकर नहीं कर ना।।
हरि सुमिरन कर ना ...............४/
[28/03, 16:18] : विष्णुपद छंद अभ्यास
१/
काया माया नगरी डगरी, अरझाही भोला।
मोर-मोर कहि गाठँ बाँध झन, ये बस्ती टोला।।
२/
संतन नइ बाँचिन माया ले, का गुनही तोला ।
जुच्छा आना जाना जानत, भर डारे झोला।।
3/
कोन दिही सुख सबके भीतर, हे आगी गोला।
हुसियारी मा बात बिगड़ही, तज दे अब ओला।।
4/
बिरथा जग मा ओंड़ा झन दे, हो जा अनबोला ।
शोभामोहन अलख जगा ले, आवत ले डोला।।
[01/04, 21:02] : विष्णुपद छंद अभ्यास
१/
काया माया गरब बूड़के, शेर असन गरजे ।
मोर-मोर कहि धरे रपोटे, नइ माने बरजे।।
२/
पाप कमाई फल ल पोगरी, भोगे बर परही ।
पर के बाना मारे हावस, रचे पाप खरही।।
३/
करमदंड भुगते बर परही, चुप पीरा सहिके।
बोचक नइ पाबे दुख ले तै, ओ घेरा रहिके।।
४/
ग्यानी ला नइ बरै गुनै ते, का तोला गुनही ।
पाप करे हस फल देये बर, बात नहीं सुनही।।
५/
बिरथा जग मा ओंड़ा देके, प्रभु ला नइ सुमरे ।
घानी फाँदे बइला जइसे, बिन थिराय घुमरे ।।
६/
दोस लगाके अब कोनो ला ,काँही झन कहिबे।
मन के धार ल बहकाये बर, उदिम करत रहिबे।।
[09/04, 19:33] : *विष्णुपद छन्द*
1/
ज्ञान धरा विज्ञान बियावन,
वेद लिखाय रहे।
पशुपन उपरित मनुख करे बर,
शास्त्र बनाय रहे ।
2/
बेद बचन बड़ गूढ़ हवै गुन,
अउ अरथाय कहे ।
गढ़े उपनिषद सार वेद के,
पढ़ गुन पाय कहे ।।
3/
अकबकाय झन चकचकाय झन,
अउ समझाय कहे।
गीता मा सब सार डार के,
अउ दुहराय कहे ।।
4/
नानिक नाम धराये सुमिरे, जीभ पिरावत हे।
जौंरा भौरा बेरा कौंरा, जीव बन जावत हे ।।
**************
[09/04, 22:02] : विष्णुपद छंद अभ्यास
१/
काया माया गरब बूड़के, शेर असन गरजे ।
धरे मोर धन कहे रपोटे, नइ माने बरजे।।
२/
पाप कमाई फल ल पोगरी, भोगे बर परही ।
पर के बाना मारे हावस, रचे पाप खरही।।
३/
करमदंड भुगते बर परही, चुप पीरा सहिके।
बोचक नइ पावस रे हंसा, ओ घेरा रहिके।।
४/
ग्यानी ला नइ बरै गुनै ते, का तोला गुनही ।
पाप करम के फल देये बर, पोनी कस धुनही।।
५/
बिरथा जग मा ओंड़ा देके, प्रभु ला नइ सुमरे ।
घानी फाँदे बइला जइसे, बिन थिराय घुमरे ।।
६/
दोष लगाके अब कोनो ला ,काँही झन कहिबे।
मन के खार ल चतवारे बर, उदीम करत रहिबे।।
[10/04, 17:23] : छन्द -विष्णुपद
तोर चरन ले निकले गंगा,सबके पाप हरे ।
चरन धरइया के चंचलपन अउ सब बिपत टरे ।।1।।
तोर चरन के अनुरागी मन,छेंवें छेंव चलै।
तोर दया छँइहा मा रहिके,फूलै अउ फलै ।।2।।
तीन कदम मा तीन लोक ला,पल मा नाप डरे ।
राजा बलि के ताप नवा के,मन मा भक्ति भरे ।।3।।
तोर चरन सेवा कर लक्ष्मी,धनिक कुबेर करे ।
तोर चरन मा ध्यान लगइया,भव अथाह उबरे ।।4।।
[20/04, 14:18] : जयकारी छंद
रंग मंच कस रच संसार । ईश्वर बनगे गम्मतकार ।।
सिरजत हावय अपन उझार । पाठ सबो के कर तैयार ।।1।।
खुल्ला नभ बनाय पंडाल । भुँइया जम्मो मंच विशाल ।।
पाठ निभाये कला दिखाय । एकक करके जीव बलाय।।2।।
जोक्कड़ परी नजरिया नाम । गम्मत अनुहर रूप व काम।।
पाठ मंच मा जेकर आय । नाटक करके उही दिखाय।।3।।
दंतकंथली हे भरमार । सिगबिग-सिगबिग करत अपार ।।
दरसनिया तक मजा उड़ात । पीट थपोड़ी हाँसत गात ।।4।।
कोनो मया दया बरसात । कोनो अँगरा आगी खात।।
किटकिटात कोनो बगियात । ककरो हाँसी कहूँ उड़ात ।।5।।
कोनो झगरा करे उचात । मन ला मारे कहूँ झँवात।।
कोनो हर बंदूक चलात । कोनो मारत पथरा घात ।।6।।
कोनो हर ड़डा बरसात । मार निहत्था लोग सुतात ।।
कोनो बोलत आभा मार । कोनो थूकत हवय खखार।।7।।
कोनो सब दिन रहै रिसाय । कोनो सबके जीव जुड़ाय।।
सरलग नाटक कोन कराय । जाने बिन गै सबो बयाय।। 8।।
कोनो चलत धरम के बाट । पाप करत कोनो गर काट ।।
जे नाटक मा हे बइहाय । कोनो बैरी हितू बनाय।।9।।
रमगे अतका नाटक प्रान । झूठ लबारी ला सत मान ।।
कोन नचावत हावय नाच । जाने बिन टघलत हे आँच ।।10।।
[02/05, 11:19] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
बने शहरिया बदले भेस।।
महतारी कतकोन बलाय।
तभो न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
शहर डहर के रंगे रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिगन नेवता बिन परघाय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे मन मा तूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
बिपत म सुरता आइस छाँव।।
[02/05, 12:59] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
होय शहरिया बदले भेस।।

महतारी कतकोन बलाय।
फेर न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
रंगे शहर डहर के रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिन परघाये बिन नेवताय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे ओही धूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
सुरता आइस बिपत म छाँव।।
[02/05, 14:14] : गुरुबर मोर सुनौ गोहार(जयकारी छंद)
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।
ड़ोगा मोर लगा दौ पार ।।
रहिथौं तुँहर भरोसा भार।
कलकुत ड़डासरन तुँहार ।।
रद्दा मा हे अड़बड़ आड़ ।
देवै करम कहूँ झन छाँड़ ।।
रेंगत हावँव खारे -खार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
हौ उदार तुमन महराज।
हाथ तुहर अब हावै लाज।।
उतरे दहरा पार अपार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
ज्ञानमूर्ति हौ हे भगवान ।
मोला निचट अड़ानी जान।।
मोर उपर कर दौ उपकार ।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
फरसा ज्ञान तुहँर बड़ धार ।
काटौ मन घपटे अँधियार ।।
बिनती करथौं बारम्बार ।।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
[02/05, 16:22] : गुरुबर मोर सुनौ गोहार(जयकारी छंद)
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।
ड़ोगा मोर लगा दौ पार ।।
रहिथौं तुँहर भरोसा भार।
कलकुत ड़डासरन तुँहार ।।
रद्दा मा हे अड़बड़ आड़ ।
देवै करम कहूँ झन छाँड़ ।।
रेंगत हावँव खारे -खार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
हौ उदार बड़हर महराज।
हाथ तुहर अब हावै लाज।।
उतरे दहरा पार अपार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
ज्ञानमूर्ति हौ हे भगवान ।

मोला निचट अड़ानी जान।।
मोर उपर कर दौ उपकार ।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
फरसा ज्ञान तुहँर बड़ धार ।
काटौ मन घपटे अँधियार ।।
बिनती करथौं बारम्बार ।।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
[02/05, 20:17] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
होय शहरिया बदले भेस।।
महतारी कतकोन बलाय।
फेर न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
रंगे शहर डहर के रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिन परघाय बिन नेवताय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे ओही धूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
सुरता आइस बिपत म छाँव।।
[02/05, 20:30] : गुरुबर मोर सुनौ गोहार(जयकारी छंद)
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।
ड़ोंगा मोर लगा दौ पार ।।
रहिथौं तुँहर भरोसा भार।
कलकुत ड़ंडासरन तुँहार ।।
रद्दा मा हे अड़बड़ आड़ ।
देवै करम कहूँ झन छाँड़ ।।
रेंगत हावँव खारे -खार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
हौ उदार बड़हर महराज।
हाथ तुहर अब हावै लाज।।
उतरे दहरा पार अपार ।
गुरुबर मोर सुनौ गोहार ।।
ज्ञानमूर्ति हौ हे भगवान ।
मोला निचट अड़ानी जान।।
मोर उपर कर दौ उपकार ।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
फरसा ज्ञान तुहँर बड़ धार ।
काटौ मन घपटे अँधियार ।।
बिनती करथौं बारम्बार ।।
गुरबर मोर सुनौ गोहार ।।
[04/05, 12:14] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
होय शहरिया बदले भेस।।
महतारी कतकोन बलाय।
फेर न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
रंगे शहर डहर के रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिगन बलाये अउ परघाय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे ओही धूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
सुरता आइस बिपत म छाँव।।
[04/05, 15:18] : जयकारी छंद 15/15
घर ला तजे गये परदेश ।
होय शहरिया बदले भेस।।
महतारी कतकोन बलाय।
फेर न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
रंगे शहर डहर के रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिन बलाय अउ बिन परघाय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे ओही धूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
सुरता आइस बिपत म छाँव।।
[04/05, 15:19] : जयकारी छंद
बड़ विचित्र लगथे संसार ।
ककरो बर तो नियम हजार।।
अउ कोनो हर बने विशेष ।
टोर नियम ला करथे ऐश ।।
एक नियम हे कहिथे लोग ।
बात नहीं हे माने जोग।।
एक भतीजा भाई वाद ।
दिखथे सबो जगह आबाद ।।
टारे बिन विशेष अधिकार ।
मन मा खटका होय सवार।।
काबर नइ हे नियम समान ।
भेद बता दौं हे गुनवान ।।
[05/05, 09:43] : बुढ़ौंतीपन (जयकारी छंद)
थकही जे दिन हाथ व गोड़ ।
बिरथा लगही सब गठजोड़ ।।
देंह झपाही अनगिन रोग ।
अउ कोनो नइ करही सोग ।।
छाती मा अँगरा कुढ़वाय ।
ओ दिन परही बड़ पछताय ।।
कोनो हर नइ सुनही बात।
रंग बदलहीं सग सगियात ।।
गुन गुन कटही दिन अउ रात ।
मोह मया के बदला घात ।।
आँखी घपट जही अँधियार ।
बइठे रहिबे मन ला मार ।।
डेरौठी के बन रखवार ।
हूँत कराबे बारम्बार ।।
कोनो हर नइ देही कान ।
तोर करेजा लगही बान ।।
खँगही जाँगर झुकही नैन।
बेमतलब हो जाही बैन ।।
दाँत टूट कोचरही माँस।
मुश्किल होही लेना साँस।।
छूट जही सँगवारी साथ ।
अउ कुछु नइ तो आही हाथ ।।
नइ भाही तोला संसार ।
अंग ओढ़ना लगही भार।।
मनखे चोला दुर्लभ जान ।
का करना तेला पहिचान ।।
सुमिरे धर ले पबरित नाम ।
दुख नइ ब्यापन देवै राम ।।
[05/05, 11:07] : आखर किल्ला भसकत जात (जयकारी छंद)
बोलत मूँड़ा दसो जनात ।
आखर किल्ला भसकत जात ।
तोर रूप मा मन मोहात।
बोले सकत नहीं मोकात ।।
चिटको नइ सुख साध सुहात ।
भोग-रोग बन नही सतात ।।
संसो फिकर न घुन्ना खात ।
तोर डहर मन बहकत जात।।
का बिहान अउ संझा रात ।
हाथ धरे जब पिया चलात ।।
का जियानही जुन्ना बात।
भँउरी छूटत मन हरसात ।।
[13/05, 15:01] : *रूपमाला छन्द (मदन छन्द)*
रूपमाला रूपमाला, रूपमाला रूप
लाललाला लाललाला, लाल लाला लाल
१/
ये जगत अइसे किसम के,हे रचे करतार ।
बोदरा खखरा दिखत अउ,हे लुकाये सार ।।
सार हावय देह आत्मा,फेर दिख नइ पाय ।
देह भिन्ना ला नसनहा,तो सबो पतियाय ।।
२/
प्रभु हरै सब लोक मुखिया,नइ दिखै जग खार।
अउ रचे ओकर प

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