Friday, 26 July 2024

जिसमें सुख दुख का झेल नहीं

 

 जिसमें सुख दुख का झेल नहीं

 

नयनों के पटल पर तो तुमसे, माना कि मेल नहीं। 

मन के मंदिर में भी न मिलो, इतने भी तो अनमेल नहीं।। 

जो हवा तुम्हें छूकर आती, वह मुझको भी तो छूती है

यह राख सा जीवन तेरे, संवेदन से बनी भभूती है

मैं स्मरण करूँ तुम आ जाओ, इतना उथला यह खेल नहीं।। 

कब प्रीत सुफलित हो पायी, इस हाड मास की काया में। 

तुम तो हो कहीं सुदुर शोभित, हम आनंदित है छाया में।। 

उस गाॅंव मिलों उस ठाॅंव मिलो, जिसमें सुख दुख का झेल नहीं। 

उस देश हमें ले चलो पिया, जिस देस सुखों की सौत नही।

क्षण क्षण ही जहाॅं महोत्सव है, लघुजीवन निष्चित मौत नहीं।।  

जब प्यास जगी तेरी प्यारे, तबसे भाता जग जेल नहीं

वो प्यार जिसे बाॅंटा तुमने, मीरा में राधा रानी में। 

वो तो पाकर पहचान गये, हम खोये हैं नादानी में।। 

है प्रीत दिवानी मस्तानी, रहती बन कहीं रखैल नहीं

जो लहर हमारे सीने को, मृदु कंपन से भर देती है। 

तुमको छूकर आयी लहरे, हिय आल्हादित कर देती है

साॅंसों की बंसी बन बजते, दो पल के तुम रंगरेल नहीं। 

माना कि मेरे सपनों का, कोई लौकिक आधार नहीं। 

क्या बैंरग ही लौटा दोगे, कहकर कि मुझसे प्यार नहीं।। 

भावों के कोमल भूतल हो, भवसागर के पथरैल नहीं

षुभ चन्द्रसूर्या षोभामोहन श्रीवास्तव

 

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