कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।
सजा के संगीत सातों सुर में, गुँजार ले सबके मनलुभैया ।।
हे हाथ पुस्तक अउ अक्षमाला, मुड़ी खपाये मकुट रतन हे ।
सहस सुरुज कस उजास मुँहरन, बड़े बड़े मन गिरे चरन हे।।
सबो मँगैया अउ तैं देवैया, भगत के कारज तहीं बनैया।।
बजे ले बीना झरत हे अमरित, खनक भरे सुर नवा नवा ओ।
बरोय बुध ला बता के रद्दा, सुबाट में लेग दे भँवा ओ।।
नहीं गिनस दोस मनखे तन के, मोला अजम हे अधमतरैया।।
कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।
समोख के सबला एकहत्थी, लुटात हस हँस के गुन खजाना।
रिखि-मुनि सुर-असुर सबो के, हे हाथ तोरे मति फिराना।।
सबो ले बढ़के पबित्र सुख ला, हकन के पाथे तोला भजैया।।
समोख के सबला एकहत्थी, लुटात हस हँस के गुन खजाना।
रिखि-मुनि सुर-असुर सबो के, हे हाथ तोरे मति फिराना।।
सबो ले बढ़के पबित्र सुख ला, हकन के पाथे तोला भजैया।।
कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।
हे सादा लुगरा के ढीक सोनहा, जेकर किनारी झलल-मलल हे।
जबर गियानी अउ बिगियानी, तोरे तियारे करत टहल हे।।
तैं पापी मनखे के नाश करके, भगत के अंतस दीयाबरैया।।
कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।
तैं बुद्धि आरुग करेस जेकर, वो तो होगें नामी भागमानी।
डंडासरन तोर हे शोभामोहन, जगतहेरौठा निचट अड़ानी।।
जगत समुन्द माँझधार बेड़ा, तैं हाथ धर अउ तरा तरैया।।
हे सादा लुगरा के ढीक सोनहा, जेकर किनारी झलल-मलल हे।
जबर गियानी अउ बिगियानी, तोरे तियारे करत टहल हे।।
तैं पापी मनखे के नाश करके, भगत के अंतस दीयाबरैया।।
कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।
तैं बुद्धि आरुग करेस जेकर, वो तो होगें नामी भागमानी।
डंडासरन तोर हे शोभामोहन, जगतहेरौठा निचट अड़ानी।।
जगत समुन्द माँझधार बेड़ा, तैं हाथ धर अउ तरा तरैया।।
कमल बइटकी बिराज सुंदर, झनक-झनक झन बीनाबजैया ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
सावन अंधियारी पाख दसमी तिथि
विक्रम संवत 2081।
शुभस्थान-महुदा
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