Friday, 24 February 2023

विपश्यना वर्णिक छंद फुलगे फुलगे काँसी फुलगे

विपश्यना वर्णिक छंद
iis iis  ssi   i   s
फुलगे फुलगे काँसी फुलगे।
लहसे लहसे बाली झुलगे।।
लुगरा झमके धानी धरती।
बहके लहके बानी परती।।

बन पैडगरी बूटा बहके।
अँगना चिरई चूँ चूँ चहके।।
चिखला पटका पागी छटके।
 तरिया बगुला चारा गटके।।

सँभरे झुमरे डोली धनहा।
पुलकै तन तौ कुलकै मन हा।।
रगड़ा पकगे बूता करके।
सुरताथन या कोठी भर के।।

शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव 

Wednesday, 22 February 2023

"सरस्वती वंदना" त्रिभंगी छंद

"सरस्वती वंदना" त्रिभंगी छंद 

लल लललल लाला, लललल लाला, लललला लाला, ललल लला

(जय ब्रह्म पियारी)

जय ब्रह्म पियारी जग उजियारी वीणा धारी शारद माँ ।

तुम हंस सवारी पुस्तक धारी जग महतारी शारद माँ ।।

सब लोक बिहारी सब शुभकारी सहज उदारी शारद माँ ।

सुन अरज हमारी ग्यान अधारी हे जग न्यारी शारद माँ ।।1।।


जयकार लगाते सुर मुनि ध्याते सब सुख पाते शारद माँ ।

सब लोक मनाते दरशन पाते भाग जगाते शारद माँ ।।

दुख ताप मिटाते ग्यान गढ़ाते नेह लुटाते शारद माँ ।

जग मंगल गाते अलख जगाते अरु वर पाते शारद माँ ।।2।।


शोभामोहन श्रीवास्तव

अंग्रेजी शिक्षा ले उपजे विचित्र ज्ञानी(छन्द:शार्दूल-विक्रीडित)

अंग्रेजी शिक्षा के विचित्र ज्ञानी
(छन्द:शार्दूल-विक्रीडित)

लालाला लल लाल लाल ललला,  लालालला लालला

अंग्रेजी पढ़ ब्यर्थ गर्व भर के, थोथा धरे ज्ञान ला।
भारी कार दुमंजला घर ले, पाथें बड़ा मान ला।।
खेती बेंच पढ़ाय बाप अब तो, वोला भुलागे हवे।
गाथे दूसर के गुनान गुन ला,
माथा खियाथे नवे।। १।।

पैसा ले सब तोल मोल करथे,
देसी सुहावै नहीं।
भाखा गाँव गँवार सोझ कहिके,
बोलैं बतावैं नहीं।।
देसी बस्त्र बिचार यार सबले, नत्ता सबो टोर के।
मोबाईल धरे रोज खोज करथे, डाटा मितू जोर के।। २।।

भूले संस्कृति धर्म कर्म सब ला, सेवा करै आन के।
टेंटें बोलत गोठ मोठ झबरा, छाती बड़ा तान के।।
पूजा पाठ पुरान बेद बिसरे, रंगे नवा रंग हे।
भोगै भौतिक लाभ लोभ लपटे, रोगी बने अंग हे।।३।।

जाने योग प्रयोग चाव नइ हे, गोली दवा लेत हे।
पार्टी रात मनात नाच कुदके,
पाछू कती चेत हे।।
कोनो के नइ तो सुनै बचन ला,
पिज्जा सरे खात हे।
थूके हे रकसा पठोय पहिली,
तब्भो मजा आत हे।।४।।

नाथे हे कस के कसाय कपड़ा,
फंदा नरी डार के।
मोट्ठा जींस फटे चिराय जुनहा,
रेंगै डियो मार के।।
राखै सोच नवा गुनान बड़का, विज्ञान वाला बने।
दाई बाप हवैं अनाथघर मा,
आवै न देखे सुने।। ५।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
फागुन अंजोरीपाख दूज
२२/०२/२२

तरलनयन छंद कुहुकघरी

तरलनयन छंद कुहुकघरी

(चार नगण वर्णिक छंद)


चुरगुन निकलत न चरन।
तहल बिकल दिखत मरन।।
सरर सरर चलत पवन
अगन बरत घर अउ बन।।

जगत लगत अजब बरन।
पतझर हर धरत चरन।।
खुसरत सब मनुख भवन।।
अगन बरत घर अउ बन।।

अमरित जलथल बिघटन।
पिंयर पिंयर दिखत परन।।
लगिस जगत हर दहकन।।
अगन बरत घर अउ बन।।

सहत सहत अगन तपन ।
झरर झरर बहत नयन।।
भगत भजत सजन भजन।।
अगन बरत घर अउ बन।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
फागुन अंजोरीपाख दूज
२२/०२/२२

शंभु सुमरनी (भुजंगप्रयात वर्णिक छंद)

शंभु सुमरनी (भुजंगप्रयात वर्णिक छंद)

मनावौं सदा मैं गुसैया भवानी।।
चढ़ा बेलपाना रितो धार पानी।

जटाजूटवाला महादेव भोला।
सबो छोड़के तोर ले आस मोला।।
सबो देवता ले बड़े शंभुदानी।।
चढ़ा बेलपाना रितो धार पानी।
मनावौं सदा मैं गुसैया भवानी।।

सबो देवता गोड़ में तोर लोटै।।
धियाडोंगरीराज  के भाँग घोटै।
महाशक्तिसोती सुवारी सयानी।
मनावौं सदा मैं  गुसैया भवानी।।
चढ़ा बेलपाना रितो धार पानी।

खड़े द्वार सेवा करे तोर नंदी।
सबो भूत के नाथ तैं निर्द्वंदी।।
उमा ला बताये महाज्ञानज्ञानी।।
मनावौं सदा मैं गुसैया भवानी।।
चढ़ा बेलपाना रितो धार पानी।

पिये बीख प्याला प्रभू तैं निराला।
सजा माथ मा दूज के चन्द्रमा ला।
जटा बाँध गंगा धरेध्यान ध्यानी।
मनावौं सदा मैं गुसैया भवानी।।
चढ़ा बेलपाना रितो धार पानी।

नरी नागमाला मणी के उजाला।
मथौंड़ी मँझारी भरे नैन ज्वाला।।
प्रभू विश्व के अर्धनारी विज्ञानी।
मनावौं सदा मैं गुसैया भवानी।।
चढ़ा बेलपाना रितो धार पानी।

स्वयंभू महेशा त्रिपुण्डी बियोगी।
महातंत्र ज्ञानी सदा सिद्ध जोगी।।
मनावौं सदा मैं गुसैया भवानी।।
चढ़ा बेलपाना रितो धार पानी।

तहीं नीलकंठी भभूती रमैया।
महाघोर तांडौं करे तात्थैया।।
हवौं मैं कुजानी हवौं मैं अड़ानी।
मनावौं सदा मैं गुसैया भवानी।।
चढ़ा बेलपाना रितो धार पानी।

शोभामोहन श्रीवास्तव
फागुन अंजोरीपाख दूज
२२/०२/२२





Sunday, 12 February 2023

चलो खुद को बिखरने दें

 

चलो खुद को बिखरने दें

 

सिमट कर भी है क्या पाया, चलों खुद को बिखरने दें

हम अपनी उम्र के बदले, कोई चेहरा संवरने दें

 

लगी हाथों की हथकड़ियाॅं, लकीरों को निगलती हैं

मगर लड़कर ही रातों से, किरण उजली निकलती है

सुलगते आग से दिल की, न सांसों को जकड़ने दें

 

छुवन हाथों की मिट्टी को, कोई आकार देता हैं

यही मिट्टी तो मिटकर फिर, सभी को प्यार देेता है

सहारा दें सवांरें और, लकीरें खुद ही गढ़ने दें

 

 

कोई लड़ती हैं साॅंसों को, बस एक दिवार के पीछे

न जाने हार है कितना, गले के हार के पीछें

जरा कोषिष तो हो जाये, अकेले ही न मरने दें

 

नहीं है उम्र के मानंे, खुषी टुकड़ों में मिलती है

फकत सपनों के सूने घर में, दुक्खों से बहलती है

किसी नाजुक कली को अब, न शाखों पर बिखरने दें

 

जगाना है सताये और सारे, गम के मारों को

नई शूरूआत एक करने, मनाना है सहारों को

सभी उलझे हुए रिष्तों को, बातों से संवरने दें

 

है छूना वो सभी पहलू, जो अक्सर छूट जाते है

खजाने बंद दरवाजों से, अक्सर लूट जाते है

बचाकर अपनी खुद्दारी, समझकर जंग लड़ने दें

 

बहुत मासूम चेहरों पर, बहुत काले से साये है

जहाॅं अपने ही छलने के, इरादे ले के आये हैं

नहीं अब वक्त के हाथों, कोई चेहरा बिगड़ने दें

 

बहुत हैं रंग दुनियाॅ ंके, मगर है सादगी काबिज

किसी की बात हो सच्ची, मगर अपनी भी है वाजिब

गॅंवारा दिल को जो बात, बस वों बात करने दें

 

कभी दिमाग की गर्मी, कभी जज्बात की नर्मी

कभी बातों की बेबाकी, कभी चुप्पी की सरमरमी

नहीं दिमाग को अपने ही, हम दिल से झगड़ने दें

 

जी सारे दिल के टुकड़ों पर, नजर भी एक जैसी हो

जिसे अपना ही मन टोंके, कोई हरकत न एैसी हो

न क्यों बरसात का पानी, सभी फूलों पे पड़ने दें

 

किसी की जिंदगी पूरी, किसी की साॅंसे हुई आधा

हरा और लाल सब जग का, किसी का है फकत सादा

न जीवन से किसी के, रंगों को एैसे उधड़ने दें

 

कटी उॅंगली से उभरे दर्द, की षिद्दत बराबर है

मगर क्यों एक सिर बैठा, हुआ एक भटके दरदर है

नहीं क्यों प्यार का बादल, बराबर ही उमड़ने दें

 

किसे छोटा बनाती हैं ये, सबढ़ोयी हुई रीतें

रूलाते यादों के साये, बिताये से नहीं बीते

बहुत बीमार करती हैं, यॅंू रीतों को न सड़ने दें

 

सिमट कर भी है क्या पाया, चलों खुद को बिखरने दें

हम अपनी उम्र के बदले,कोई चेहरा निखरने दें ।

 

षुभ चन्द्रसूर्या/ षोभामोहन

जिसमें सुख दुख का झेल नहीं

 

 जिसमें सुख दुख का झेल नहीं

 

नयनों के तल पर तो तुमसे,हो सका अभी तक मेल नहीं

मन के तल पर भी न सको, इतने भी तो अनमेल नहीं

 

जो हवा तुम्हें छूकर आये, वो मुझको भी तो छूती है

यह राख सा जीवन तेरे, संवेदन से बनी भभूति है

मैं कह भी दॅंू तुम मान भी लो, इतना उथला यह खेल नहीं

 

कब प्रीत सुफल हो पायी है , इस हाड मास की काया में

सच कहीं सुदुर में रहता है, जग आनंदित है छाया में

उस गाॅंव मिलों उस ठाॅंव मिलो, जिसमें सुख दुख का झेल नहीं

 

उस देस हमें ले चलो पिया, जिस देस सुखों की सौत न हो

क्षण क्षण ही जहाॅं महोत्सव हो, लघुजीवन निष्चित मौत न हो

अब तलब जगी तेरी प्यारी, तबसे भाता जग जेल नहीं

 

वो प्यार जिसे बाॅंटा तुमने, मीरा में राधा रानी में

जो पाये वो पहचान गये, जो खोये वो नादानी में

है प्रीत दिवानी मस्तानी, रहती बन कहीं रखैल नहीं

 

जो लहर हमारे सीने को, मृदु कंपन से भर देती है

तुमको छूकर आयी लहरे, मन आल्हादित कर देती है

साॅंसों की बंसी बनाउॅं तुम्हे, दो पल के तुम रंगरैल नहीं

 

माना कि मेरे सपनों का, कोई लौकिक आधार नहीं

क्या बैंरग ही लौटा दोगे, कहकर कि मुझसे प्यार नहीं

भावों के कोमल भूतल हो, भवसागर के पथरैल नहीं

षुभ चन्द्रसूर्या षोभामोहन श्रीवास्तव

 

मेरा दीवानापन देखो

 

मेरा दीवानापन देखो

 

गीतों की जो फसल उगायी थी, सबको नमकीन कर दिया

मीठे तानों वाली वीणा का, सब सुर गमगीन कर दिया

किस उम्मीद की उम्र बढ़ी है, इन नयनों के दरपन देखो ।

मेरा दिवानापन देखो

 

आॅंखों को विष्वास नहीं था, बिना नींद आये सपनों पर

प्रष्नचिन्ह ही प्रष्नचिन्ह हैं, मोह टिका है जिन अपनों पर

विष्वासों की खंडित गरिमामेरा मौन समर्पण देखों।

 मेरा दीवानापन देखो

 

बातों की बन्दूकें दनदन, अपना अपना फिक्र घोलती

समय हुआ अनुदार और तब, जब सिर चढ़ तेरा जिक्र बोलती

मेरी प्यास धरा जैसी है, और बादल से अनबन देखो ।

मेरा दीवानापन देखो

 

षुभ चन्द्रसूर्या षोभामोहन

मधुमासों के चिन्ह न होंगे

 

मधुमासों के चिन्ह न होंगे

 

मधुमासों के चिन्ह न होंगे, कलियों ने समझाया था

रंगों की रंगरलियों में पर, मन मेरा  बौराया था

सारा जग दोषी लगता था, केवल अपना आप सहीं

अनजाने रंगांे का मौसम, अनायास जब आया था

होश मिले नहीं हाट

 

होष मिले नहीं हाट

 

हाॅं री होष मिले नहीं हाट

हाॅं री होष मिले नहीं हाट

बेहोषी की बहुत दुकाने, भय तिरकर बनती मुस्काने

तन करें कांकर काठ,

हाॅं री होष मिले नहीं हाट

होष नहीं उसे होष नहीं हैं, जागा वह खामोष नहीं है,

चलत बता रहा  बाट

हाॅं री होष मिले नहीं हाट,

जोगी खोजे मन बीच जाके, तन का ढ़ेला खांख बनाके

कर मन जगत उचाट

हाॅं री होष मिले नहीं हाट

 

षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

कुटी उतरी किरण निराली

 

कुटी उतरी किरण निराली

 

चिलमन से छन-छन कर आये

जो रहे नहीं वो बन कर आये

आॅंख संभाल कहाॅं पर पाये

कुटी उतरी जब किरण निराली

 

ना रमें महल की राहों चल

उतरे नभ से चूमें भूतल

हो विलय अनंत स्पर्ष अतल

अंधक में बरसी उजियाली

 

चेतन का कर चेहरा सुंदर

जडता में भी जीवन भरकर

अवचेतन की उंगली धरकर

सम्यक् संसार संभाली


षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

दिन है जिसका रात उसी का

 

दिन है जिसका रात उसी का

 

दिन है जिसका रात उसी का,आया सब मेंहमान उसी का

साॅंसों की संपदा उसी की, जीने का सामान उसी का

 

षिल्प है जिसका षैली उसी की, कृति में आया प्राण उसी का

षून्य पृश्ठ हाषिया उसी का , षब्दों का अरमान उसी का

 

हाथ है जिसका काम उसी का, गति-मति और लयतान उसी का

मेंरा मेंरापन भी उसी का, मान षान अभिमान उसी का

 

षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

ढॅूंढू बिखरी रंगरैली में

 

ढॅूंढू बिखरी रंगरैली में

 

तेरी बानगी मुझमें है मगर एक अजब अपरिचित षैली में

मैं फिरूॅ नेह चूकी नगरी ढूॅंढू बिखरी रंगरैली में

 

परिचय क्या बिरहीन का पथ से हर गली गयी गोधूल रथ से

तन पर यह मालिकपन मन का अखिॅंयन रख बैठी थैली में

 

मंज गयी मूर्खता अनधोयी कितना गायी कितना रोयी

आखिर उजास बूझूॅ कैसे 

रख हिया तलैया मली में

 

मेरे हर काम से होकर मेरे होने की बू आये

 

मेरे होने की बू

 

मेरे हर काम से होकर  मेरे होने की बू आये

छुपाना मैं जिसे चाहॅूं, वही बस हूबहू आये

 

मेरी खामी मुझे दिखती नही , दुनिया दिखाती है

नहीं मै कुछ भी खुद बनती हॅंू जो दुनिया बनाती है

 

रहॅंू हद से सभी बाहर के, चीजों के लिए पागल

कभी इसके लिए पागल, कभी उसके लिए पागल

 

ये पागलपन नहीं जाता भले ही जान जाती है

नहीं मै कुछ भी खुद बनती हॅंू जो दुनिया बनाती है

 

लिखा मैने उन्हीं गीतों को, ही मैं गा नहीं पायी

समझ में आयी कुछ बातें, मगर समझा नहीं पायी

 

मेरे औकात से कोषिष हमेषा हार जाती है

नहीं मैं कुछ भी खुद बनती हॅंू जो दुनिया बनाती है

 

इस पार भवन उस पार गमन

 

 

इस पार भवन  उस पार गमन

 

परितोश् मांॅंग मत आकुलता, आवेग टाल दिन बदलेंगे

जटिल न रहना तरल न बहना, विहल पीर उठ स्वयं चलेंगे

धार उधर इस पार खडी मैं, मेरे धिक जीवन धूलि धूलेंगें

उस उजास के सहसधार में, अंधकार के देंह गलेंगे

 

इस पार भवन उस पार गमन, सजल नयन जगपति सुमिरन

 

तिमिर कहाॅं तुम ही हो कम, इसीलिए नयना निरबंसी

आलोकनिधि व्यवहार विधि, कारे तट ही छेडे बंसी

बिसराये अलक्षित लक्ष्य तुम्ही, संचित धन प्रगटित प्रसून

कब छुपा अतल का गंध कहीं

 

मधुमय स्वीकार करो वंदन, मन भूमि मरू में उतर सघन

प्राणों से पुलक उलीच रहा

 

प्राणों से पुलक उलीच रहा

 

अंतर का उजास निरद्वंदी, प्राणों से पुलक उलीच रहा

 

षुभ मुहुर्त है और सुयोग भी, घाट न घर सुधरे हैं सुघर

तुच्छ लग रही आज सिरफिरी, निरा वासना लिप्त उमर

साध नहीं रख पंथसाधना, भीतर कोई भींच रहा है

 

कुछ छोडा पर सप्रयास नहीं, भीतर फिर सब स्वयमेंव घटा

अनमन मन मरता चला गया, जो बाॅंट रहा था वो भी हटा

साॅंसों के घाट हुए सुचि तब, मेरा वह मेरे बीच रहा

 

पंथों में तुम्हे टटोल रहे, वो तुम्हें प्रतीकों में पाते

खुद गलकर ढूॅंढे हैं लेकिन, कुछ बीजों ने तुमसे नाते

संकेत मिला है अनगढ को, मालिक मकान अब खींच रहा

 

षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...