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फुलगे फुलगे काँसी फुलगे।
लहसे लहसे बाली झुलगे।।
लुगरा झमके धानी धरती।
बहके लहके बानी परती।।
बन पैडगरी बूटा बहके।
अँगना चिरई चूँ चूँ चहके।।
चिखला पटका पागी छटके।
तरिया बगुला चारा गटके।।
सँभरे झुमरे डोली धनहा।
पुलकै तन तौ कुलकै मन हा।।
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
चलो खुद को बिखरने दें
सिमट कर भी है क्या पाया, चलों खुद को बिखरने दें
हम अपनी उम्र के बदले,
कोई
चेहरा संवरने दें
लगी हाथों की हथकड़ियाॅं, लकीरों को निगलती हैं
मगर लड़कर ही रातों से,
किरण
उजली निकलती है
सुलगते आग से दिल की,
न
सांसों को जकड़ने दें
छुवन हाथों की मिट्टी को, कोई आकार देता हैं
यही मिट्टी तो मिटकर फिर, सभी को प्यार देेता है
सहारा दें सवांरें और,
लकीरें
खुद ही गढ़ने दें
कोई लड़ती हैं साॅंसों को, बस एक दिवार के पीछे
न जाने हार है कितना,
गले
के हार के पीछें
जरा कोषिष तो हो जाये,
अकेले
ही न मरने दें
नहीं है उम्र के मानंे, खुषी टुकड़ों में मिलती है
फकत सपनों के सूने घर में, दुक्खों से बहलती है
किसी नाजुक कली को अब,
न
शाखों पर बिखरने दें
जगाना है सताये और सारे, गम के मारों को
नई शूरूआत एक करने,
मनाना
है सहारों को
सभी उलझे हुए रिष्तों को, बातों से संवरने दें
है छूना वो सभी पहलू,
जो
अक्सर छूट जाते है
खजाने बंद दरवाजों से,
अक्सर
लूट जाते है
बचाकर अपनी खुद्दारी,
समझकर
जंग लड़ने दें
बहुत मासूम चेहरों पर,
बहुत
काले से साये है
जहाॅं अपने ही छलने के, इरादे ले के आये हैं
नहीं अब वक्त के हाथों, कोई चेहरा बिगड़ने दें
बहुत हैं रंग दुनियाॅ ंके, मगर है सादगी काबिज
किसी की बात हो सच्ची,
मगर
अपनी भी है वाजिब
गॅंवारा दिल को जो बात, बस वों बात करने दें
कभी दिमाग की गर्मी,
कभी
जज्बात की नर्मी
कभी बातों की बेबाकी,
कभी
चुप्पी की सरमरमी
नहीं दिमाग को अपने ही, हम दिल से झगड़ने दें
जी सारे दिल के टुकड़ों पर, नजर भी एक जैसी हो
जिसे अपना ही मन टोंके, कोई हरकत न एैसी हो
न क्यों बरसात का पानी, सभी फूलों पे पड़ने दें
किसी की जिंदगी पूरी,
किसी
की साॅंसे हुई आधा
हरा और लाल सब जग का,
किसी
का है फकत सादा
न जीवन से किसी के,
रंगों
को एैसे उधड़ने दें
कटी उॅंगली से उभरे दर्द, की षिद्दत बराबर है
मगर क्यों एक सिर बैठा, हुआ एक भटके दरदर है
नहीं क्यों प्यार का बादल, बराबर ही उमड़ने दें
किसे छोटा बनाती हैं ये, सबढ़ोयी हुई रीतें
रूलाते यादों के साये,
बिताये
से नहीं बीते
बहुत बीमार करती हैं,
यॅंू
रीतों को न सड़ने दें
सिमट कर भी है क्या पाया, चलों खुद को बिखरने दें
हम अपनी उम्र के बदले,कोई चेहरा निखरने
दें ।
षुभ चन्द्रसूर्या/ षोभामोहन
जिसमें सुख दुख का झेल नहीं
नयनों के तल पर तो तुमसे,हो सका अभी तक मेल नहीं
मन के तल पर भी न सको,
इतने
भी तो अनमेल नहीं
जो हवा तुम्हें छूकर आये, वो मुझको भी तो छूती है
यह राख सा जीवन तेरे,
संवेदन
से बनी भभूति है
मैं कह भी दॅंू तुम मान भी लो, इतना उथला यह खेल नहीं
कब प्रीत सुफल हो पायी है , इस हाड मास की काया में
सच कहीं सुदुर में रहता है, जग आनंदित है छाया में
उस गाॅंव मिलों उस ठाॅंव मिलो, जिसमें सुख दुख का झेल नहीं
उस देस हमें ले चलो पिया, जिस देस सुखों की सौत न हो
क्षण क्षण ही जहाॅं महोत्सव हो, लघुजीवन निष्चित मौत न हो
अब तलब जगी तेरी प्यारी, तबसे भाता जग जेल नहीं
वो प्यार जिसे बाॅंटा तुमने, मीरा में राधा रानी में
जो पाये वो पहचान गये,
जो
खोये वो नादानी में
है प्रीत दिवानी मस्तानी, रहती बन कहीं रखैल नहीं
जो लहर हमारे सीने को,
मृदु
कंपन से भर देती है
तुमको छूकर आयी लहरे,
मन
आल्हादित कर देती है
साॅंसों की बंसी बनाउॅं तुम्हे, दो पल के तुम रंगरैल नहीं
माना कि मेरे सपनों का, कोई लौकिक आधार नहीं
क्या बैंरग ही लौटा दोगे, कहकर कि मुझसे प्यार नहीं
भावों के कोमल भूतल हो, भवसागर के पथरैल नहीं
षुभ चन्द्रसूर्या षोभामोहन श्रीवास्तव
मेरा दीवानापन देखो
गीतों की जो फसल उगायी थी, सबको नमकीन कर दिया
मीठे तानों वाली वीणा का, सब सुर गमगीन कर दिया
किस उम्मीद की उम्र बढ़ी है, इन नयनों के दरपन देखो ।
मेरा दिवानापन देखो
आॅंखों को विष्वास नहीं था, बिना नींद आये सपनों पर
प्रष्नचिन्ह ही प्रष्नचिन्ह हैं, मोह टिका है जिन अपनों पर
विष्वासों की खंडित गरिमामेरा मौन समर्पण देखों।
मेरा दीवानापन देखो
बातों की बन्दूकें दनदन, अपना अपना फिक्र घोलती
समय हुआ अनुदार और तब,
जब
सिर चढ़ तेरा जिक्र बोलती
मेरी प्यास धरा जैसी है, और बादल से अनबन देखो ।
मेरा दीवानापन देखो
षुभ चन्द्रसूर्या षोभामोहन
मधुमासों के चिन्ह न होंगे
मधुमासों के चिन्ह न होंगे, कलियों ने समझाया था
रंगों की रंगरलियों में पर, मन मेरा बौराया था
सारा जग दोषी लगता था,
केवल
अपना आप सहीं
अनजाने रंगांे का मौसम, अनायास जब आया था
होष मिले नहीं हाट
हाॅं री होष मिले नहीं हाट
हाॅं री होष मिले नहीं हाट
बेहोषी की बहुत दुकाने, भय तिरकर बनती मुस्काने
तन करें कांकर काठ,
हाॅं री होष मिले नहीं हाट
होष नहीं उसे होष नहीं हैं, जागा वह खामोष नहीं है,
चलत बता रहा बाट
हाॅं री होष मिले नहीं हाट,
जोगी खोजे मन बीच जाके, तन का ढ़ेला खांख बनाके
कर मन जगत उचाट
हाॅं री होष मिले नहीं हाट
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
कुटी उतरी किरण निराली
चिलमन से छन-छन कर आये
जो रहे नहीं वो बन कर आये
आॅंख संभाल कहाॅं पर पाये
कुटी उतरी जब किरण निराली
ना रमें महल की राहों चल
उतरे नभ से चूमें भूतल
हो विलय अनंत स्पर्ष अतल
अंधक में बरसी उजियाली
चेतन का कर चेहरा सुंदर
जडता में भी जीवन भरकर
अवचेतन की उंगली धरकर
सम्यक् संसार संभाली
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
दिन है जिसका रात उसी का
दिन है जिसका रात उसी का,आया सब मेंहमान उसी का
साॅंसों की संपदा उसी की, जीने का सामान उसी का
षिल्प है जिसका षैली उसी की, कृति में आया प्राण उसी का
षून्य पृश्ठ हाषिया उसी का , षब्दों का अरमान उसी का
हाथ है जिसका काम उसी का, गति-मति और लयतान उसी का
मेंरा मेंरापन भी उसी का, मान षान अभिमान उसी का
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
ढॅूंढू बिखरी रंगरैली में
तेरी बानगी मुझमें है मगर एक अजब अपरिचित षैली में
मैं फिरूॅ नेह चूकी नगरी ढूॅंढू बिखरी रंगरैली में
परिचय क्या बिरहीन का पथ से हर गली गयी गोधूल रथ से
तन पर यह मालिकपन मन का अखिॅंयन रख बैठी थैली में
मंज गयी मूर्खता अनधोयी कितना गायी कितना रोयी
आखिर उजास बूझूॅ कैसे
रख हिया तलैया मली में
मेरे होने की बू
मेरे हर काम से होकर मेरे
होने की बू आये
छुपाना मैं जिसे चाहॅूं, वही बस हूबहू आये
मेरी खामी मुझे दिखती नही , दुनिया दिखाती है
नहीं मै कुछ भी खुद बनती हॅंू जो दुनिया बनाती है
रहॅंू हद से सभी बाहर के, चीजों के लिए पागल
कभी इसके लिए पागल,
कभी
उसके लिए पागल
ये पागलपन नहीं जाता भले ही जान जाती है
नहीं मै कुछ भी खुद बनती हॅंू जो दुनिया बनाती है
लिखा मैने उन्हीं गीतों को, ही मैं गा नहीं पायी
समझ में आयी कुछ बातें, मगर समझा नहीं पायी
मेरे औकात से कोषिष हमेषा हार जाती है
नहीं मैं कुछ भी खुद बनती हॅंू जो दुनिया बनाती है
इस पार भवन उस
पार गमन
परितोश् मांॅंग मत आकुलता, आवेग टाल दिन बदलेंगे
जटिल न रहना तरल न बहना, विहल पीर उठ स्वयं चलेंगे
धार उधर इस पार खडी मैं, मेरे धिक जीवन धूलि धूलेंगें
उस उजास के सहसधार में, अंधकार के देंह गलेंगे
इस पार भवन उस पार गमन, सजल नयन जगपति सुमिरन
तिमिर कहाॅं तुम ही हो कम, इसीलिए नयना निरबंसी
आलोकनिधि व्यवहार विधि, कारे तट ही छेडे बंसी
बिसराये अलक्षित लक्ष्य तुम्ही, संचित धन प्रगटित प्रसून
कब छुपा अतल का गंध कहीं
मधुमय स्वीकार करो वंदन, मन भूमि मरू में उतर सघन
प्राणों से पुलक उलीच रहा
अंतर का उजास निरद्वंदी, प्राणों से पुलक उलीच रहा
षुभ मुहुर्त है और सुयोग भी, घाट न घर सुधरे हैं सुघर
तुच्छ लग रही आज सिरफिरी, निरा वासना लिप्त उमर
साध नहीं रख पंथसाधना,
भीतर
कोई भींच रहा है
कुछ छोडा पर सप्रयास नहीं, भीतर फिर सब स्वयमेंव घटा
अनमन मन मरता चला गया,
जो
बाॅंट रहा था वो भी हटा
साॅंसों के घाट हुए सुचि तब, मेरा वह मेरे बीच रहा
पंथों में तुम्हे टटोल रहे, वो तुम्हें प्रतीकों में पाते
खुद गलकर ढूॅंढे हैं लेकिन, कुछ बीजों ने तुमसे नाते
संकेत मिला है अनगढ को, मालिक मकान अब खींच रहा
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...