Friday, 24 February 2023

विपश्यना वर्णिक छंद फुलगे फुलगे काँसी फुलगे

विपश्यना वर्णिक छंद
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फुलगे फुलगे काँसी फुलगे।
लहसे लहसे बाली झुलगे।।
लुगरा झमके धानी धरती।
बहके लहके बानी परती।।

बन पैडगरी बूटा बहके।
अँगना चिरई चूँ चूँ चहके।।
चिखला पटका पागी छटके।
 तरिया बगुला चारा गटके।।

सँभरे झुमरे डोली धनहा।
पुलकै तन तौ कुलकै मन हा।।
रगड़ा पकगे बूता करके।
सुरताथन या कोठी भर के।।

शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव 

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