गमक धमक मैं फूल गँवइ के
पिँयर पिँयर शुभहरदी छिटके,
पाती असन बटाहूँ।
सौ सौ सुरुज उवत रस सोंखे,
गगरी असन अँटाहूँ।।
बाँही खोल बलात समुन्दर,
नदिया असन बोहाहूँ।
थकौं बिराजौं नहीं बाट मा,
घर डीह-डोंगर जाहूँ।।
भीड़ गुदेलत बाट बेंझावत।
महूँ जबर धकियाहूँ।
तिरिन असन मैं पवन संग धर,
बादर डहर उड़ाहूँ।
गमक धमक मैं फूल गँवइ के,
भुँइया भर बगराहूँ।।
भाग मेर ओधे न रहौं मैं,
करम ल धरम बनाहूँ।
खरसोना बिस्वास बिसरगे,
कइसे जग पतियाहूँ।
शोभामोहन
१४/१०/२०२२
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