चीरचोर लीला कलाधर छंद
टेड़गा भँऊ नचात, तीनलोक काँप जात,
तेन ग्वाल बाल संग, धेनु ला चरात हे।
मीतसंग रासरंग, खेलकूद में मतंग,
अंग-अंग कोटि काम, देखके लजात हे।
देख तो जगात माँग, देह में लगात आग,
ग्वालिना बयात मोहना मया लुटात हे।
देवता न पात पार, नेति-नेति में तिखार,
तेन राधिका के रंगरूप में रिझात हे।
जेन जीव के अधार, सर्वशक्ति ब्रह्मपार,
तेन गोपिका सताय, ओढ़ना चुरात हे।
श्याम ले मिले मलंग, हें सबो सखी मतंग,
देख भाग गोपनार, देवता सिहात हे।
ले चढ़े कदंब चीर, बीच धार में शरीर,
लाज में गड़े गड़े सखी मुँहू लुकात हे।
कृष्ण ला खवात कीर, हे पिया तिया शरीर,
लाज ला बचा हमार, आपसी के बात हे।
बेर बेर हाथ जोर, बस्त्र माँगथें किशोर,
देख के दशा बिचित्र बाँसुरी बजात हे।
टेड़ुवात हुँरियात, आगु आत पाछु जात,
श्याम देख रंग ढ़ंग मंद मुसकात हे।
बोल हाय! नंदलाल, के जरै किराय चाल,
कोन हे धिया पतो चिन्ह नहीं सतात हे।
आय हें नदी नहाय, मस्त हें सबो बयाय,
लाज कान बेचि खाय देख के जनात हे।
शोभामोहन श्रीवास्तव
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