Sunday, 2 June 2024

शंभू सबो ले सरलकंठ कराल गरल।

शिव स्तुति (मनहरण घनाक्षरी छन्द) 


शंभू सबो ले सरल

कंठ कराल गरल।

धरे डमरू डमक डमक बजाय हो।

कनिहा कसे कृपाल,

बीरबघवा के छाल।

दुइज के चंदा मूड़ी ऊपर मढ़ाय हो।

परशु अउ पिनाक,

मरघट भूमि राख।

जटाजूट बिकराल बिकट बढ़ाय हो।

बिच्छी के कुंडल कान, 

पहिरे हे भगवान, 

तीसर नैन ले कामदेव ला जलाय हो। 

मूड़ बोहे गंगाधार, 

जेकर गति अपार, 

शंभु के सदन शांभवी सेवा बजाय हो। 

चढ़ाय ले बेलपान, 

देवै बड़े बरदान, 

दुख ताप रोगदोख भक्तन मिटाय हो। 

संत के संवारै काज, 

गिरि के उपर राज, 

असुर सुर सुजन सब माथ नाय हो।। 

भीतर में करै ध्यान, 

राम ला बसाय प्रान, 

बाहिर जगत ले छटके तिरियाय हो। 

वेद शास्त्र अउ पुरान, 

आगम निगम ज्ञान, 

डेरीबाँही बइठार गौरी ला बताय हो। 

गन व नंदी दुवार, 

खड़े बन रखवार, 

आनीबानी धुन में महेश ला रिझाय हो। 

नंदी करै बाँय बाँय, 

डोमी साँप फाँय फाँय, 

गन मन धाँय धाँय उधम मचाय हो।। 

शोभामोहन रिझाय, 

महदेवा गुन गाय, 

गूँथ गूँथ शब्दफूल माला पहिराय हो।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव 

सपनों के संग संग सजन भागती रही,

गजावली*


सपनों के संग संग सजन भागती रही,

तुम जागते रहे तो मैं भी जागती रही।


जब जब झुकायी सिर किसी मंदिर के द्वार पर,

लम्बी उमर तुम्हारे लिए माँगती रही।।


तेरी खुशी में अपनी खुशी जानके प्रियतम,

चेहरे में तेरे बार बार झाँकती रही।


सोलह सिंगार करके प्रतीक्षा में तुम्हारे,

खिड़की व द्वार बार बार झाँकती रही।


शोभामोहन

१०/०४/२०२२

मोती टाँके सरिख दमके, नीर काँदी गलीचा।

छन्दः मन्दाक्रान्ता


लालालाला ललल ललला, लालला लाल लाला।


मोती टाँके सरिख दमके, नीर काँदी गलीचा।

भौंरा आये रस चुलुक में, फूल फूले बगीचा।।

भेजे जम्मो कुसुमदल हें, गंध न्योता हँकारी।

भौंरा डारा झुलत मँडरा, पूछ बूता बिगारी।।


पासे बासे नजर गड़िया, कोइली हे बयाये।

गगन मग मा,

शोभै लोभै छबि मगज ला, खार में धान झूले।

गाये गाना लहर नदिया,

हम वो जमाना के बहू अन

हम वो जमाना के बहू अन

(तीन चार दशक पहिली के बहू मन ला समर्पित)


हम वो जमाना के बहू अन।हम वो जमाना के बहू अन।।


मुड़ ढ़ाक के दुबकत रहन।

आँसू बोहा सुसकत रहन।।

सुख दुख सहत मुचकत रहन।

ककरो ले अउ कुछु नइ कहन।।

हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।।


परदेस जावै पति हमर।

हम रहन बइठे गाँव घर।।

राँधन पसावन सबो बर।।

तरसन सुने मइके खबर।।

हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।।


ससुरार में घुलमिल रहन।

जब्भे सहन तब्भे लहन।।

जुन्ना पहिन हाँसत रहन।

ननदी ला लुगरा नवा दन।।

हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।।


सुकुवा उवत बिहिना उठन।

छिटका छरा द्वारी छिंचन।

खोली अउ रंधनी लिपन।

काँचन चुरेना दनादन।

हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।।


छुही लीप छोहर पार दन।

माटी के घर ला सँवार दन।।

तुलसी मा पानी डार दन।।

चौंरा में दियना बार दन।।

हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।।


हलछट बछारत ब्रत करन।

चंदा सुरुज पँइया परन।।

सियान के सटका बनन

कनिहा टूटत बूता करन।

हम वो जमाना के बहू अन।।हम वो जमाना के बहू अन।।


देवर ननंद जोखा धरन।

जेठानी जेठ अदब करन।।

सास अउ ससुर ला बड़ डरन।

दाइज के सेती अउ मरन।।

हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।।


सबला जेंवा बढ़िया असन।

मिरचा निमक चटनी गुड़न।।

दू कँउर खाके जीव रखन।

सब सुतैं हम राहेर दरन।।

हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।।


धुंँगियात आगी ला धुँकन।

परिवार के सेती झुकन।

बेवहार बर नइ हम चूकन।

कोनो ला नइ हाँसन थूकन।।

हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।।


मैं मोर नइ बोलन हमन।

घर जग्य मा होवन हवन।।

मैदान छोड़न ना भगन।।

अइसे पिया के रंग रंगन।।

हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।।


कब्भू न मुँहजोरी करन।

हँउला धरन पानी भरन।।

पतिदेव के दाबन चरन।

पिया डेहरी जियन मरन।।

हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।।


आवत ससुर होवन खड़े।

रहि जान लाज सरम गड़े।।

छिप जान देखन जब बड़े।

जानन नहीं झगरे लड़े।।

हम वो जमाना के बहू अन। हम वो जमाना के बहू अन।।


पबरित रहत गंगा असन।

मइके अउ ससुरे बसन।।

गमकत रहन चंदन असन।

बन फूल घर रद्दा दसन।।

हम वो जमाना के बहू अन। 

हम वो जमाना के बहू अन।।


शोभामोहन

१०/०५/२०२२


बीना धरे हे हाथ मा,साजे मुकुट अउ माथ मा

हरिगीतिका छंद

2212 , 2212 , 2212 , 2212

लालालला लालालला,लालालला लालालला

1/

बीना धरे हे हाथ मा,साजे मुकुट अउ माथ मा ।

गनपति बिराजत छेंव कर,अउ माँझ लक्ष्मी साथ मा ।

हे हाथ मा पुस्तक धरे,बइठे कमल के फूल हे

करधन सजे पैजन बजे, मोती जड़े अउ झूल हे ।

2/

नथली फभे हे सोनहा, मुंँदरी सुघर अँगरी सजे

गर हार दुलरी तीलरी, चूरी सुघर कंगन बजे ।

अँधियार मनके टारथे,गुन ग्यान दियना बारथे।

संसार के दुख मेटके, मन कुंदरा ला झारथे।

3/

सुर ला सजा धुन ला बजा, संगीत सिरजावै उही।

भव पार बर पतवार अउ,जग नाच नचवावै उही।

मन नाद अनहत ला बजा,साधक सुजन ला तारथे ।

बस मध्यमा अउ वैखरी, दुख ताप संकट टारथे ।

हर एक भुवन तुम्हारा लगता

हर एक भुवन तुम्हारा लगता
पवन छुए या किरण छुए तन
हर एक छुवन तुम्हारा लगता।
जबसे लगन घुली साँसों में,
हर धुन रटन तुम्हारा लगता ।।
पवन छुए या
मेरे हठ ने पाँव पकड़कर,
रोक लिया तुमको जाने से ।
जीवन लगा सुलझने मेरा,
तुमको ऐसे उलझाने से ।।
शीष झुकाऊँ अब जिस चौखट,
हर एक भुवन तुम्हारा लगता ।।
पवन छुए या
मेरे बंजारे धड़कन को,
कैसा लगन लगाया तुमने,
हिय की लहरे तन तट आयी,
गीत कोई जब गाया तुमने,
मेरे बैरागी अंतस का,
सारा सृजन तुम्हारा लगता ।। 
पवन छुए या
जिन अनचीन्हे पदचापों की,
ध्वनियों पर ये कान लगे है ।
अनुभव ने समझाया हमको,
जगत पराया आप सगे हैं ।।
हे आकुल प्राणों के अतिथि,
ध्वनि शुभचरण तुम्हारा लगता ।। 
पवन छुए या
तेरी चौखट रोज जलेंगे,
सांध्यदीप बन गोधुलबेला,
बेचैनी की उमर घटा दो,
घबराता है प्राण अकेला।।
सुध ले लो तपसी भावों का,
अनहत जपन तुम्हारा लगता ।।
 पवन छुए या
पलकें झुककर मृदु भावों से,
अभिनंदन कर करके जाती ।
अंतस के कोमल भावों को,
धड़कन गुंजारित कर जाती ।।
अब तो रूकना झुकना चलना,
सब कुछ नमन तुम्हारा लगता।। 
पवन छुए या

शोभामोहन श्रीवास्तव
०९/०३/२०१६राजिम

पिया रंग रंग के लहरा लौं ।

/कलकुत कर-कर गुन गा लौं

(राग बंजारा ताल)

कलकुत कर-कर गुन गा लौं।

पिया रंग रंग के लहरा लौं ।

सोन रजत पथरा मन मोहै ।

झन दृग कागद कुटका जोहै।।

होती ल अपन बिसरा लौं । कलकुत.......

जमो जिनिस मा रासा-बासा।

तोर भरोसा जीवधर साँसा।।

तन-मन अउ प्रान धँसा लौं । कलकुत....

सबो लोक तोरे पगरइती ।

चलै नइ अउ ककरो पइती।।

जग नार फाँस झटका लौं। कलकुत........



तोला छूवे के मन होथे

तोला छूवे के मन होथे

ठाढ़ कुछु जब अलहन होथे ।

मोर एक मन दू मन होथे ।

नेम धरम ला तीर मड़ाके ,

तोला छूवे के मन होथे ।

अब का कोनो तीरथ जावँ,

पाप धोवँव का जाके गंगा ।

अमृत जहर दूनो के धारा,

भीतर हावय मन सतरंगा।।

काबा भर कबिया के तोला,

पूरा मन के गिंजरन होथे ।।

नेम धरम तीर मड़ाके,

तोला छूवे के मन होथे ।।

शोभामोहन

सब शास्त्र उही ल सिधोवत हे ।

गीत भजन छंद(७)

९/सदग्रंथ गुन बखान सवैया

सब बेद बखान करै उँकरे,

सब शास्त्र उही ल सिधोवत हे ।

सद्ग्रन्थ उहीच अधार बना,

मनके करियापन धोवत हे ।

धर अंतस मा गुन गोठ सबो,

गँठियात उही चक होवत हे ।

अड़हा मनखे अनजान बने,

अँधियार परे अउ रोवत हे ।

शोभामोहन

चंदा कस तोर रास ओ दाई।

दाई


सुख हे सबो तोर पास ओ दाई।

तुलसी दीया उजास ओ दाई।।


तोर रहत ले घर घर लगथे,

तोर बिन जगत उदास ओ दाई।।


सब दुख सहिथस अउ चुप रहिथस

चंदा कस तोर रास ओ दाई।


बिन परतीत के ये दुनिया में,

तोर ले जीयत विसवास ओ दाई।


मया दया अमरित बरसाथस,

चिन्ह मोर भूख प्यास ओ दाई।


कुहुक सरद चउमास घरी में

तैं लगथस मधुमास ओ दाई।।


भार उठाथस मया लुटाथस

बनके भुँइया अगास ओ दाई।


मोर अवरदा बाढ़ै कहिके,

करथस तहीं उपास ओ दाई।


मैं बलिहारी तोर महतारी,

मैं तोर चरन के दास ओ दाई।


शोभामोहन श्रीवास्तव

४/०७/२०२२

दिन सोमवार

महुदा दुर्ग


तुलसी दीया उजास ओ दाई।

दाई


सब सुख हे तोर पास ओ दाई।

तुलसी दीया उजास ओ दाई।।


तोर रहत ले घर घर लगथे,

तोर बिन जगत उदास ओ दाई।।


मया दया अमरित बोहाथस,

चिन्ह मोर भूख प्यास ओ दाई।


बिन परतीत के ये दुनिया में,

जीयत तोरे ले विश्वास ओ दाई।


तैं जग न्यारी मोर महतारी,

मैं तोर चरन के दास ओ दाई।


शोभामोहन श्रीवास्तव

४/०७/२०२२

दिन सोमवार

महुदा दुर्ग

आखरपौंदर फूल दसै उहि में चलथे सब भावकुँवारी।

आखर महिमा) मत्तगयंद सवैया


आखरपौंदर फूल दसै उहि में चलथे सब भावकुँवारी।

भावअनंग सलंग-बलंग फलंग-फलंग उठाय सवारी।।

मस्त मलंग महानउतंग करै मन चंग बिया सुख सारी।

आखर के बल देवल सेवल केवल ये जगती फुलवारी।।

आखर मेलमिलाप अलाप बिलाप कलापक्रिया करतारी।

आखर नाथत भाव बलात् हलात चलात सुबाट सोझानी।

आखर में सरधा रखिके सिरजे सब वेद मुनि बिगियानी।।

आखरजाप जपे जपनीधर वो सुख भोग करै मनमानी।

आखरहार बना पहिनावत भक्तहिया प्रभु ला मन बानी।।


का का भोगत नइ चोला।

का का भोगत नइ चोला।


घेरीबेरी देवत फेरा।

जनमन मरन बरोठा घेरा।।

कुलकत फुदकत दुबकत झुझकत,

उतरत जगदुखघर डोला। का का नइ भोगत चोला।।

नानुक नाम धरे नइ हरि के।

लाटा-फाँदा दसठन परि के।।

कहरत सिहरत दँदरत कँदरत,

जीवपरे दुखमुखि टोला।। का का नइ भोगत चोला।

एकछिन खो झन शोभामोहन।

सुखकलशा सुंदर मुड़ बोहन।।

सटकत लटकत चटकत मटकत,

कलजुग भोगत हे तोला।। का का नइ भोगत चोला।।

शोभामोहन

छत्तीसगढ़ी सावन पावस गीत



*कब आबे तैं बोल लहरिया* (राग मल्हार) 


बरसत बादर करिया-करिया।

जल बुँदियन छलकात गगरिया ।।

बरसत बादर....१/ 


दूबी जामत ले बरसत हे । 


छान्ही परवा तरी धँसत हे ।।

खेत जोताय नइ इक हरिया ।

कब आबे तैं बोल लहरिया ।

बरसत बादर ...२ 


2/

सरी कोठ भर उपकत रेला ।

सोग लगत हे देखत तेला ।।

आँसू ढ़रकत फिजत अँचरिया।

कब आबे तै बोल लहरिया ।। 


बरसत बादर ...३ 


गरजन घुमरन सुनके बादर ।

अंडा साँप फूटत भुँइया भर।।

छलकत बहकत नदिया तरिया ।

कब आबे तैं बोल लहरिया ।। 


बरसत बादर ...४/ 


नभ मा बगुला पाँत उड़ावत ।

अउ भुँइया के जीव जुड़ावत ।।

मोरे मन धनहा हे परिया।

कब आबे तैं बोल लहरिया।।

बरसत बादर. ..५/ 


बइठ बरेंडी कँउवा बोलत ।

गियाँ गड़ी मन हाँसत ठोलत।।

रहन धराये हे सुख लरिया।

कब आबे तैं बोल लहरिया ।।

बरसत बादर..६/ 


लउकत बिजुरी देख डरत हौं ।

तोर बिगन दिन रात मरत हौं ।।

बज्र असन हे कटत उमरिया ।

कब आबे तैं बोल लहरिया ।।

बरसत बादर..७/ 


जब अंतस पीरा नइ जाने।

रहिते छेल्ला काबर लाने।।

डार मोहनी भगा उढ़रिया ।

कब आबे तैं बोल लहरिया ।।

बरसत बादर ..८/ 


शोभामोहन 


१७/०२/२०


२/


●देखौ सावन के दिन आगे (राग मल्हार)● 


  


देखौ सावन के दिन आगे 


  


छरियावत हावय सबके मति।सुंदर फूलत फूल सबो कति।। 


मधु लूटे बर भ्रमर झपागे।देखौ सावन के दिन आगे।। 


इन्द्र बजावत दफड़ा माँदर।करिया करिया घपटे बादर।। 


लागत अँगना छान्ही छागे।देखौ सावन के दिन आगे।। 


देख मयूरा छतरा पाँखी।हवय दिखावत सुंदर झाँकी।। 


नृत्य करत लागत पगलागे।देखौ सावन के दिन आगे।। 


उमड़त गरजत घुमरत चमचम।बूँद गिरत हे छमछम छमछम।। 


लउकत बिजली प्रान कँपागे।देखौ सावन के दिन आगे।। 


बादर भुँइया छुवे परत हे।सत्ती जाये असन करत हे।। 


बूँद चूहत पाना फरियागे।देखौ सावन के दिन आगे।। 


छोटे नदिया पार उदेलत।चारो कोती पानी ठेलत।। 


धरनी सुखद सरग कस लागे।देखौ सावन के दिन आगे।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव 


२२/०५/२०२१



सबो दिरिस तोरे जस गाये

सबो दिरिस तोरे जस गाये



हर मुहरन में तहीं लुकाये । 

सबो दिरिस तोरे जस गाये ।। 


भिनसरहा रक्तालाली मा ।

मंँझन छन बुलकत जाली मा ।।

झूलफुलहा के खुशियाली मा ।

आज परनदिन अउ काली मा ।।

तोर होय के ढंग जनाये ।

हर मुहरन में तहीं लुकाये1/ 

सबो दिरिस तोरे जस गाये ।। 



चंदा तारा जुड़वासा मा ।

चित अउ पट दूनो पासा मा।।

सुनता बिमता के बासा मा ।

अनचिन्हार रहिके साँसा मा।। 

निचट कलेचुप तँही समाये ।। 

हर मुहरन मा तहीं लुकाये।।..2/ 

सबो दिरिस तोरे जस गाये ।। 




गमकत भुँइया फूलवारी मा ।

बेरा के पहरादारी मा ।।

अटलसोहागी सिंगारी मा।

रेफ सोनहा उजियारी मा।।

सरभर सुघरइ तहीं बसाये। 

हर मुहरन मा तँही लुकाये ।।...3/

सबो दिरिस तोरे जस गाये ।। 





शोभामोहन श्रीवास्तव 


मन दू भाग बटात कलेचुप ।

३/कलेचुप 


कुटिल कुटिल मुस्कान कलेचुप ।

मया मिटाये मान कलेचुप । 


आलस भरे बिहान कलेचुप ।

सँझा किरन मलान कलेचुप । 


कुलकत धरती राग कलेचुप ।

बादर नेतत पाग कलेचुप । 


मिटका झन अब जाग कलेचुप।

जागत हावय भाग कलेचुप।। 


कलियन होत जवान कलेचुप ।

भौरा सन गोठियान कलेचुप ।। 


करत फूल रसदान कलेचुप ।

पुरवा बेधत बान कलेचुप ।। 


धरनी रंग रिझात कलेचुप।

बादर उड़े बलात कलेचुप ।। 


मन दू भाग बटात कलेचुप ।

चोला जग डेनियात कलेचुप ।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव 


कोन सदा रहिथे कन कन मा

/कोन सदा रहिथे कन कन मा 


ए जगती तल के कन-कन मा । 


पाना मन के हलन चलन मा ।। 


संझा नदिया के दरपन मा । 


केसर छींचत नभ के तन मा।। 


कोन सदा रहिथे कन कन मा...... 


बड़े बिहनिया ओस झरन मा । 


भुँइया चूमत सुरुज किरन मा ।। 


मन मा मधुरस मया घुरन मा । 


अँगना चाँदन चँउक पुरन मा ।। 


कोन सदा रहिथे कन-कन मा ...... 


सागर नदियाँ लहर-लहर मा । 


कोन बसे हे सबो डहर मा ।। 


चोला ठाठ रचे पिंजर मा । 


परिया धनहा जतर-कतर मा ।। 


कोन बसे सुख के संचरन मा। 


कोन सदा रहथे कन कन मा ।। 


बादर के भड़-भड़ गरजन मा । 


डारा-पाना के झुमरन मा ।। 


जीव जगत गोला घुमरन मा । 


संत गुनी मन के सुमरन मा ।। 


लुकछिप सपटे खुसर अगन मा । 


कोन सदा रहिथे कन कन मा । 


टाटा-टउवा चलन-फिरन मा। 


सुख-दुख लहरा उठन-गिरन मा।। 


पार बाँधथे घाट तिरन मा । 


मरन मोटावन अउ खिरन मा।। 


रहत लोहाटी अउ कंचन मा । 


कोन सदा रहिथे कन कन मा ।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

१४/०१/२०२० 

तोला टमड़न कोन बचन मा ?

/

तोला टमड़न कोन बचन मा ? 


तीनलोक चउदहो भुवन मा 


जोगी साधू तापस तन मा। 


गुरुपन माँझा अउ लघुपन मा 


गोठ बात विग्यान बचन मा । 


झगरा झाँसा के अरझन मा । 


जिभिया के फरकन थिरकन मा । 


प्रकृति भर बगरे जड़पन मा । 


सब चेतन के हलन चलन मा । 


रीस दुख अड़कन भड़कन मा । 


बुधियारा के चालचलन मा । 


अड़हा के व्यवहार बरन मा । 


मया दया अउ दुख तड़पन मा । 


राग रोग रग रग बगरन मा ।। 


अमरित धरसा गोड़ धरन मा । 


तोर मोरपन के मिंझरन मा । 


हान लाभ जय बिजय चरन मा । 


इन्द्रिय तन्तु बिषय छुअन मा । 


कारन कारज जगत भुवन मा । 


कटकटात चिंतन के वन मा । 


आगम निगम पुरान रटन मा । 


रसरसहा जर ताप बिघन मा । 


विजय वाध्य थिरकन नरतन मा । 


दुर्घट तर्क बितर्क करन मा । 


अकल तत्व छिन भर दरसन मा 


रस रंझाझर बुड़े भवन मा । 


शोक बियाकुल जग कुटियन मा । 


कस्तूरी धरके भटकन मा। 


बेरा के रटफट चटकन मा । 


परम पुरुख तँय जब कन-कन मा। 


तोला टमड़न कोन बचन मा । 


शोभामोहन श्रीवास्तव

१४/०२/२० 

सुरतापाती बाँचत बेरा।

६/बेरा 


सुरतापाती बाँचत बेरा।

आँखी-आँखी नाचत बेरा।। 


पाँव पैलगी कोन करै अब? 

धोबी-पटका काँचत बेरा।। 


आँखी धरे अगोरा सुतके,

सपना मा सुख जाँचत बेरा। 


रंगमंच के कलाकार ला,

गड्ढा खनके खाँचत बेरा।। 


शोभामोहन 

(आल्हा जागरण) आँख उठे तो आँख फोड़ दो, भुजा उठे दो भुजा उखाड़।।

जागरण आल्हा 


सोये हुए हिन्दुओं जागो, खतरे में है भारत देश। 

रंग बदलकर ढंग बदलकर, घूम रहे घर घर दरवेश।। 


कौरवदल ने घेर लिया है, तुमको ऐसा अब कई बार। 

निकल सकोगे नहीं भागकर, बचा सकोगे ना घर द्वार ।। 


जीना है तो लड़ना सीखो, अस्त्र शस्त्र से होकर लेश। 

तभी राक्षसीवृत्ति मिटेगी, तभी मिटेगा प्रस्तुत क्लेश।। 


हर ढ़ाचे में हर खाँचे में, लगा रखे हैं बम बारूद। 

फटने को तैयार हमेशा, और बेअकल सारे खुद।। 


गली गली में शहर शहर में, मड़राते हैं वहशी लोग। 

रेकी करके घात लगाते, और लिप्त हो तुम सुखभोग।। 


चाकू छूरा धार करें वो, गला रेतने मन में ठान। 

तुम हो बेहोशी में लेकिन, भले बुरे से हो अनजान।। 


मूक बधिर सरकार प्रशासन, सुने नहीं क्रन्दन चित्कार। 

ऐसा है षड़यंत्र चल रहा, हर कोई दिखता लाचार।। 


विकट मोड़ पर देश खड़ा है, विकट परिस्थितियों में प्रान। 

तुम रोजी रोटी में खोये, रुई ठूँसकर अपने कान।। 


चक्रव्यूह में दिल्ली उलझी, तुम उलझे अपने जंजाल। 

पग पग पर उन्मादी बैठे, घात लगाये बनकर काल।। 


एक ईशारा होते पल में, काटेंगे हत्यारे लोग। 

मारे जायेंगे एक एक कर, घर के सारे प्यारे लोग।। 


कौन कहाँ से वार करेगा, उनका खाका है तैयार। 

तुम भागोगे प्राण बचाने, जिधर उधर भी होगा वार।। 


सारे दुश्मन शस्त्रनिपुण हैं, तुम हो दब्बू और डरपोक। 

बहन बेटियों को दुर्गति से, कैसे तुम पाओगे रोक।। 


करुणा दया नहीं हैं उनमे, चाहोगे यदि पाना भीख। 

शस्त्र बिना नहीं शांति आयेगी, गाँठ बाँध रख लो यह सीख। 


प्रजा अखंडित पापी दंडित, तब होगा भारत निर्माण।

धर्मयुद्ध का शंखनाद सुन, रणभू विज्ञ करो प्रस्थान।। 


जात पात में बँटे रहोगे, कुछ भी ना आयेगा हाथ। 

छोड़ लड़ाई ऊँच नीच की, एक दूजे का पकड़ो हाथ।। 


देश जलाने अंग गलाने, है प्रचंड जब फैला कोढ़। 

शुतुरमुर्ग बन शीष छुपाकर, मत सोओ तुम कंबल ओढ़।। 


कितनी श्रद्धा कितनी साक्षी, और करोगे तुम बलिदान। 

पानी सिर तक पहुँच गया है, अब तो खोजो सटिक निदान।। 


रोग मिटे ना बिना औषधि, हाथ तुम्हारे है उपचार। 

आँख उठे तो आँख फोड़ दो, भुजा उठे दो भुजा उखाड़।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...