दाई
सुख हे सबो तोर पास ओ दाई।
तुलसी दीया उजास ओ दाई।।
तोर रहत ले घर घर लगथे,
तोर बिन जगत उदास ओ दाई।।
सब दुख सहिथस अउ चुप रहिथस
चंदा कस तोर रास ओ दाई।
बिन परतीत के ये दुनिया में,
तोर ले जीयत विसवास ओ दाई।
मया दया अमरित बरसाथस,
चिन्ह मोर भूख प्यास ओ दाई।
कुहुक सरद चउमास घरी में
तैं लगथस मधुमास ओ दाई।।
भार उठाथस मया लुटाथस
बनके भुँइया अगास ओ दाई।
मोर अवरदा बाढ़ै कहिके,
करथस तहीं उपास ओ दाई।
मैं बलिहारी तोर महतारी,
मैं तोर चरन के दास ओ दाई।
शोभामोहन श्रीवास्तव
४/०७/२०२२
दिन सोमवार
महुदा दुर्ग
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