/कोन सदा रहिथे कन कन मा
ए जगती तल के कन-कन मा ।
पाना मन के हलन चलन मा ।।
संझा नदिया के दरपन मा ।
केसर छींचत नभ के तन मा।।
कोन सदा रहिथे कन कन मा......
बड़े बिहनिया ओस झरन मा ।
भुँइया चूमत सुरुज किरन मा ।।
मन मा मधुरस मया घुरन मा ।
अँगना चाँदन चँउक पुरन मा ।।
कोन सदा रहिथे कन-कन मा ......
सागर नदियाँ लहर-लहर मा ।
कोन बसे हे सबो डहर मा ।।
चोला ठाठ रचे पिंजर मा ।
परिया धनहा जतर-कतर मा ।।
कोन बसे सुख के संचरन मा।
कोन सदा रहथे कन कन मा ।।
बादर के भड़-भड़ गरजन मा ।
डारा-पाना के झुमरन मा ।।
जीव जगत गोला घुमरन मा ।
संत गुनी मन के सुमरन मा ।।
लुकछिप सपटे खुसर अगन मा ।
कोन सदा रहिथे कन कन मा ।
टाटा-टउवा चलन-फिरन मा।
सुख-दुख लहरा उठन-गिरन मा।।
पार बाँधथे घाट तिरन मा ।
मरन मोटावन अउ खिरन मा।।
रहत लोहाटी अउ कंचन मा ।
कोन सदा रहिथे कन कन मा ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
१४/०१/२०२०
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