तोला छूवे के मन होथे
ठाढ़ कुछु जब अलहन होथे ।
मोर एक मन दू मन होथे ।
नेम धरम ला तीर मड़ाके ,
तोला छूवे के मन होथे ।
अब का कोनो तीरथ जावँ,
पाप धोवँव का जाके गंगा ।
अमृत जहर दूनो के धारा,
भीतर हावय मन सतरंगा।।
काबा भर कबिया के तोला,
पूरा मन के गिंजरन होथे ।।
नेम धरम तीर मड़ाके,
तोला छूवे के मन होथे ।।
शोभामोहन
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