Sunday, 2 June 2024

शंभू सबो ले सरलकंठ कराल गरल।

शिव स्तुति (मनहरण घनाक्षरी छन्द) 


शंभू सबो ले सरल

कंठ कराल गरल।

धरे डमरू डमक डमक बजाय हो।

कनिहा कसे कृपाल,

बीरबघवा के छाल।

दुइज के चंदा मूड़ी ऊपर मढ़ाय हो।

परशु अउ पिनाक,

मरघट भूमि राख।

जटाजूट बिकराल बिकट बढ़ाय हो।

बिच्छी के कुंडल कान, 

पहिरे हे भगवान, 

तीसर नैन ले कामदेव ला जलाय हो। 

मूड़ बोहे गंगाधार, 

जेकर गति अपार, 

शंभु के सदन शांभवी सेवा बजाय हो। 

चढ़ाय ले बेलपान, 

देवै बड़े बरदान, 

दुख ताप रोगदोख भक्तन मिटाय हो। 

संत के संवारै काज, 

गिरि के उपर राज, 

असुर सुर सुजन सब माथ नाय हो।। 

भीतर में करै ध्यान, 

राम ला बसाय प्रान, 

बाहिर जगत ले छटके तिरियाय हो। 

वेद शास्त्र अउ पुरान, 

आगम निगम ज्ञान, 

डेरीबाँही बइठार गौरी ला बताय हो। 

गन व नंदी दुवार, 

खड़े बन रखवार, 

आनीबानी धुन में महेश ला रिझाय हो। 

नंदी करै बाँय बाँय, 

डोमी साँप फाँय फाँय, 

गन मन धाँय धाँय उधम मचाय हो।। 

शोभामोहन रिझाय, 

महदेवा गुन गाय, 

गूँथ गूँथ शब्दफूल माला पहिराय हो।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव 

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