Sunday, 2 June 2024

(आल्हा जागरण) आँख उठे तो आँख फोड़ दो, भुजा उठे दो भुजा उखाड़।।

जागरण आल्हा 


सोये हुए हिन्दुओं जागो, खतरे में है भारत देश। 

रंग बदलकर ढंग बदलकर, घूम रहे घर घर दरवेश।। 


कौरवदल ने घेर लिया है, तुमको ऐसा अब कई बार। 

निकल सकोगे नहीं भागकर, बचा सकोगे ना घर द्वार ।। 


जीना है तो लड़ना सीखो, अस्त्र शस्त्र से होकर लेश। 

तभी राक्षसीवृत्ति मिटेगी, तभी मिटेगा प्रस्तुत क्लेश।। 


हर ढ़ाचे में हर खाँचे में, लगा रखे हैं बम बारूद। 

फटने को तैयार हमेशा, और बेअकल सारे खुद।। 


गली गली में शहर शहर में, मड़राते हैं वहशी लोग। 

रेकी करके घात लगाते, और लिप्त हो तुम सुखभोग।। 


चाकू छूरा धार करें वो, गला रेतने मन में ठान। 

तुम हो बेहोशी में लेकिन, भले बुरे से हो अनजान।। 


मूक बधिर सरकार प्रशासन, सुने नहीं क्रन्दन चित्कार। 

ऐसा है षड़यंत्र चल रहा, हर कोई दिखता लाचार।। 


विकट मोड़ पर देश खड़ा है, विकट परिस्थितियों में प्रान। 

तुम रोजी रोटी में खोये, रुई ठूँसकर अपने कान।। 


चक्रव्यूह में दिल्ली उलझी, तुम उलझे अपने जंजाल। 

पग पग पर उन्मादी बैठे, घात लगाये बनकर काल।। 


एक ईशारा होते पल में, काटेंगे हत्यारे लोग। 

मारे जायेंगे एक एक कर, घर के सारे प्यारे लोग।। 


कौन कहाँ से वार करेगा, उनका खाका है तैयार। 

तुम भागोगे प्राण बचाने, जिधर उधर भी होगा वार।। 


सारे दुश्मन शस्त्रनिपुण हैं, तुम हो दब्बू और डरपोक। 

बहन बेटियों को दुर्गति से, कैसे तुम पाओगे रोक।। 


करुणा दया नहीं हैं उनमे, चाहोगे यदि पाना भीख। 

शस्त्र बिना नहीं शांति आयेगी, गाँठ बाँध रख लो यह सीख। 


प्रजा अखंडित पापी दंडित, तब होगा भारत निर्माण।

धर्मयुद्ध का शंखनाद सुन, रणभू विज्ञ करो प्रस्थान।। 


जात पात में बँटे रहोगे, कुछ भी ना आयेगा हाथ। 

छोड़ लड़ाई ऊँच नीच की, एक दूजे का पकड़ो हाथ।। 


देश जलाने अंग गलाने, है प्रचंड जब फैला कोढ़। 

शुतुरमुर्ग बन शीष छुपाकर, मत सोओ तुम कंबल ओढ़।। 


कितनी श्रद्धा कितनी साक्षी, और करोगे तुम बलिदान। 

पानी सिर तक पहुँच गया है, अब तो खोजो सटिक निदान।। 


रोग मिटे ना बिना औषधि, हाथ तुम्हारे है उपचार। 

आँख उठे तो आँख फोड़ दो, भुजा उठे दो भुजा उखाड़।। 


शोभामोहन श्रीवास्तव

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