(चार नगण वर्णिक छंद)
चुरगुन निकलत न चरन।
तहल बिकल दिखत मरन।।
सरर सरर चलत पवन
अगन बरत घर अउ बन।।
जगत लगत अजब बरन।
पतझर हर धरत चरन।।
खुसरत सब मनुख भवन।।
अगन बरत घर अउ बन।।
अमरित जलथल बिघटन।
पिंयर पिंयर दिखत परन।।
लगिस जगत हर दहकन।।
अगन बरत घर अउ बन।।
सहत सहत अगन तपन ।
झरर झरर बहत नयन।।
भगत भजत सजन भजन।।
अगन बरत घर अउ बन।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
फागुन अंजोरीपाख दूज
२२/०२/२२
चुरगुन निकलत न चरन।
तहल बिकल दिखत मरन।।
सरर सरर चलत पवन
अगन बरत घर अउ बन।।
जगत लगत अजब बरन।
पतझर हर धरत चरन।।
खुसरत सब मनुख भवन।।
अगन बरत घर अउ बन।।
अमरित जलथल बिघटन।
पिंयर पिंयर दिखत परन।।
लगिस जगत हर दहकन।।
अगन बरत घर अउ बन।।
सहत सहत अगन तपन ।
झरर झरर बहत नयन।।
भगत भजत सजन भजन।।
अगन बरत घर अउ बन।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
फागुन अंजोरीपाख दूज
२२/०२/२२
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