ढॅूंढू बिखरी रंगरैली में
तेरी बानगी मुझमें है मगर एक अजब अपरिचित षैली में
मैं फिरूॅ नेह चूकी नगरी ढूॅंढू बिखरी रंगरैली में
परिचय क्या बिरहीन का पथ से हर गली गयी गोधूल रथ से
तन पर यह मालिकपन मन का अखिॅंयन रख बैठी थैली में
मंज गयी मूर्खता अनधोयी कितना गायी कितना रोयी
आखिर उजास बूझूॅ कैसे
रख हिया तलैया मली में
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