जिसमें सुख दुख का झेल नहीं
नयनों के तल पर तो तुमसे,हो सका अभी तक मेल नहीं
मन के तल पर भी न सको,
इतने
भी तो अनमेल नहीं
जो हवा तुम्हें छूकर आये, वो मुझको भी तो छूती है
यह राख सा जीवन तेरे,
संवेदन
से बनी भभूति है
मैं कह भी दॅंू तुम मान भी लो, इतना उथला यह खेल नहीं
कब प्रीत सुफल हो पायी है , इस हाड मास की काया में
सच कहीं सुदुर में रहता है, जग आनंदित है छाया में
उस गाॅंव मिलों उस ठाॅंव मिलो, जिसमें सुख दुख का झेल नहीं
उस देस हमें ले चलो पिया, जिस देस सुखों की सौत न हो
क्षण क्षण ही जहाॅं महोत्सव हो, लघुजीवन निष्चित मौत न हो
अब तलब जगी तेरी प्यारी, तबसे भाता जग जेल नहीं
वो प्यार जिसे बाॅंटा तुमने, मीरा में राधा रानी में
जो पाये वो पहचान गये,
जो
खोये वो नादानी में
है प्रीत दिवानी मस्तानी, रहती बन कहीं रखैल नहीं
जो लहर हमारे सीने को,
मृदु
कंपन से भर देती है
तुमको छूकर आयी लहरे,
मन
आल्हादित कर देती है
साॅंसों की बंसी बनाउॅं तुम्हे, दो पल के तुम रंगरैल नहीं
माना कि मेरे सपनों का, कोई लौकिक आधार नहीं
क्या बैंरग ही लौटा दोगे, कहकर कि मुझसे प्यार नहीं
भावों के कोमल भूतल हो, भवसागर के पथरैल नहीं
षुभ चन्द्रसूर्या षोभामोहन श्रीवास्तव
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