चलो खुद को बिखरने दें
सिमट कर भी है क्या पाया, चलों खुद को बिखरने दें
हम अपनी उम्र के बदले,
कोई
चेहरा संवरने दें
लगी हाथों की हथकड़ियाॅं, लकीरों को निगलती हैं
मगर लड़कर ही रातों से,
किरण
उजली निकलती है
सुलगते आग से दिल की,
न
सांसों को जकड़ने दें
छुवन हाथों की मिट्टी को, कोई आकार देता हैं
यही मिट्टी तो मिटकर फिर, सभी को प्यार देेता है
सहारा दें सवांरें और,
लकीरें
खुद ही गढ़ने दें
कोई लड़ती हैं साॅंसों को, बस एक दिवार के पीछे
न जाने हार है कितना,
गले
के हार के पीछें
जरा कोषिष तो हो जाये,
अकेले
ही न मरने दें
नहीं है उम्र के मानंे, खुषी टुकड़ों में मिलती है
फकत सपनों के सूने घर में, दुक्खों से बहलती है
किसी नाजुक कली को अब,
न
शाखों पर बिखरने दें
जगाना है सताये और सारे, गम के मारों को
नई शूरूआत एक करने,
मनाना
है सहारों को
सभी उलझे हुए रिष्तों को, बातों से संवरने दें
है छूना वो सभी पहलू,
जो
अक्सर छूट जाते है
खजाने बंद दरवाजों से,
अक्सर
लूट जाते है
बचाकर अपनी खुद्दारी,
समझकर
जंग लड़ने दें
बहुत मासूम चेहरों पर,
बहुत
काले से साये है
जहाॅं अपने ही छलने के, इरादे ले के आये हैं
नहीं अब वक्त के हाथों, कोई चेहरा बिगड़ने दें
बहुत हैं रंग दुनियाॅ ंके, मगर है सादगी काबिज
किसी की बात हो सच्ची,
मगर
अपनी भी है वाजिब
गॅंवारा दिल को जो बात, बस वों बात करने दें
कभी दिमाग की गर्मी,
कभी
जज्बात की नर्मी
कभी बातों की बेबाकी,
कभी
चुप्पी की सरमरमी
नहीं दिमाग को अपने ही, हम दिल से झगड़ने दें
जी सारे दिल के टुकड़ों पर, नजर भी एक जैसी हो
जिसे अपना ही मन टोंके, कोई हरकत न एैसी हो
न क्यों बरसात का पानी, सभी फूलों पे पड़ने दें
किसी की जिंदगी पूरी,
किसी
की साॅंसे हुई आधा
हरा और लाल सब जग का,
किसी
का है फकत सादा
न जीवन से किसी के,
रंगों
को एैसे उधड़ने दें
कटी उॅंगली से उभरे दर्द, की षिद्दत बराबर है
मगर क्यों एक सिर बैठा, हुआ एक भटके दरदर है
नहीं क्यों प्यार का बादल, बराबर ही उमड़ने दें
किसे छोटा बनाती हैं ये, सबढ़ोयी हुई रीतें
रूलाते यादों के साये,
बिताये
से नहीं बीते
बहुत बीमार करती हैं,
यॅंू
रीतों को न सड़ने दें
सिमट कर भी है क्या पाया, चलों खुद को बिखरने दें
हम अपनी उम्र के बदले,कोई चेहरा निखरने
दें ।
षुभ चन्द्रसूर्या/ षोभामोहन
No comments:
Post a Comment