कुटी उतरी किरण निराली
चिलमन से छन-छन कर आये
जो रहे नहीं वो बन कर आये
आॅंख संभाल कहाॅं पर पाये
कुटी उतरी जब किरण निराली
ना रमें महल की राहों चल
उतरे नभ से चूमें भूतल
हो विलय अनंत स्पर्ष अतल
अंधक में बरसी उजियाली
चेतन का कर चेहरा सुंदर
जडता में भी जीवन भरकर
अवचेतन की उंगली धरकर
सम्यक् संसार संभाली
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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