इस पार भवन उस
पार गमन
परितोश् मांॅंग मत आकुलता, आवेग टाल दिन बदलेंगे
जटिल न रहना तरल न बहना, विहल पीर उठ स्वयं चलेंगे
धार उधर इस पार खडी मैं, मेरे धिक जीवन धूलि धूलेंगें
उस उजास के सहसधार में, अंधकार के देंह गलेंगे
इस पार भवन उस पार गमन, सजल नयन जगपति सुमिरन
तिमिर कहाॅं तुम ही हो कम, इसीलिए नयना निरबंसी
आलोकनिधि व्यवहार विधि, कारे तट ही छेडे बंसी
बिसराये अलक्षित लक्ष्य तुम्ही, संचित धन प्रगटित प्रसून
कब छुपा अतल का गंध कहीं
मधुमय स्वीकार करो वंदन, मन भूमि मरू में उतर सघन
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