जै सरसती दाई जै सरसत्त्ती।
तैं दुर्गा तैं काली सत्ती (सरस्वती वंदना)
जै सरसती दाई जै सरसत्त्ती।
तैं दुर्गा तैं काली सत्ती। ।
तोर लइका औं निचट गँवार।।
किरपा करके कर उद्धार।।
अखिल ज्ञान गुन के भंडारी।
सादा सारी सोन किनारी।।
पहिरे माला नथली झूल।
बइठे हवस कमल फूल।।
सातों सुर में बीनाबजैया।
डंडासरन तोर लागौं पैंया।।
भरे सभा में रखबे लाज।
मूड़ी उप्पर मोर बिराज।।
आखरबरम रचैया दाई।
सब जग करथे तोर बड़ाई।।
तोरे उपर मोर सब भार।
घेरीबेरी करौं जोहार।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
असाढ़ अंजोरी पाख पुन्नी विक्रम संवत २०८१
तद्नुसार २१/०७/२०२४
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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