पज्ज्झटिका छंद
(मात्रिक १६ मात्रा के एक चरण)
सुघ्घर सुम्मत, आय बसंती।
लाने धरके, सुख अनगनती।।
तितलीदलबल, सुघ्घरपाँखी।
चँउधावत हे, जनजन आँखी।।
बेरपहाती, बादरलाली।
बरसातव हे, जग खुसहाली।।
बेला फूले, लहसे डारा।
भौंरा न्योता, पाके झारा।।
नभ भर रिगबिग, झलमल तारा।
फूल लदाये, नदी किनारा।।
चंदा चकमक, नभ के माथा।
सीत देत फूल, पतियन हाथा।।
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जलरंग दहरा तँउरत नहकै,
अइसन हे तँउरैया कोन।
तरिया जल में घुरे महाउर,
रंग मिले ओरखैया कोन।।
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शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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