जन्म - 7 नवंबर 1947 दुर्ग (छ.ग.)
पिता - सोनी जेठालाल धोलकिया(गुजरात मूल)
माता- उजम बेन
छत्तीसगढ़ी कृतियाँ
हमर भुइयाँ हमर अगास, (छत्तीसगढ़ी)
भिनसार, सन् 1998
मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा- सन् 2012
घाम हमर सँगवारी सन 2017
बिन पनही के पाँव सन 2018
मया के मुंदरी,
केवरस, (छत्तीसगढ़ी उपन्यास)
हिन्दी कृतियाँ
सिर पर धूप-आंख में सपने
लालटेन जलने दो
शब्दक्रान्ति,
गीतों का चन्दनवन,
देश हमारा भारत,
चिराग गजलों के,
जमीं कपड़े बदलना चाहती है,
मुकुंद जी की 18 कृतियाँ प्रकाशित हैं। जिनमें चार छत्तीसगढ़ी गीत संग्रह, पाँच हिन्दी गीत संग्रह, छः छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल संग्रह, एक हिन्दी गजल संग्रह,एक गुजराती ग़ज़ल संग्रह एवं एक छत्तीसगढ़ी उपन्यास सम्मिलित हैं।
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मुकुन्द कौशल जी की रचनाओं को बी.ए.,एम.ए. एवं नवमी कक्षा के पाठ्यक्रमों में राज्य सरकार द्वारा सम्मिलित किया गया हैं।
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पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण में वे बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाये और राज्य निर्माण के बाद अपने साहित्य साधना में व्यस्त हो गये । मान सम्मान पद प्रतिष्ठा के लिए मुकुन्द कौशल जी ने कभी भी अपने नैतिक मूल्यों आदर्शों और स्वनिर्मित सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया सही अर्थों में वे सच्चे साहित्य साधक थे।
सम्मान
सृजन श्री अलंकरण, समाज़ गौरव सम्मान, साक्षरता सम्मान, अहिन्दी भाषी हिंदी सम्मान, लोककला सम्मान, मुश्फिक पुरस्कार, मुकीम भारती पुरस्कार, साहित्य गौरव, भारत गौरव, डॉ. नरेंद्र देव वर्मा सम्मान, अंबिका प्रसाद दिव्य अलंकरण, भुइयां सम्मान,परिधि सम्मान, कथाकार सम्मान सहित और लगभग 30 से भी अधिक सम्मान, अलंकरण एवं पुरस्कार प्राप्त हुए।
मुकुन्द कौशल जी की सारस्वत साधना की कुछ झलकियाँ उनके साहित्यिक वैभव को जानने के लिए पर्याप्त हैं।
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मोर भाखा संग दया मया के सुघ्घर हवय मिलाप रे
अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा कउनो संग झन नाप रे'.
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पथरा में पीरा झन बोंबे
ओमा पानी को रुकोही।।
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बिहनाकुन सूरुज ह दिन के निसेनी ले
ले - ले के थेभा उतरथे
संझा के पिंवरी अँजोर ओगरि जाथे
चंदा के अमरित बरसथे
चंदैनी खवाथे दूधभात रे ।
का बताव संगी तोला गँवई के बात रे ॥
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आंसू झन टपकावे, सुरता के अंचरा मा
तुलसी के चौंरा मा, एक दिया घर देबे।
मोर लहूट आवत ले, सगुना संग गा लेबे
रहिबे झन लांघन तै, नून भात खा लेबे।
बांधि बांधि रखिवे झन, आंखी के पूरा ला
आंसू के नंदिया मा, एक दिया धर देबे
गांव हंसे देख देख, अइसन तै रोवबे मन
कुधरी के भांठा मा, आंसू ला बोबे झन
झन पोसे रहिबे तै, सपना के पीरा ला
निंदिया के डेहरी मा, एक दिया धर देवे।
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गाँव शहर मा किंजर किंजर के,
हाँका पारौ तब बनही
ठलहा बइठे मनखे मन ला,
काम तियारौ तब बनही
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तोर सुरता मने मन म साने रहेंव मै मनौती घलो तोर माने रहेंव
साध संवरे लगिस मन ह मउरे लगिस काल ह आज आंखी म तंउरे लगिस ।।
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सुवा ददरिया, राउत नाचा, करमा अउ पंडवानी।
गेंड़ी-डंडा, खड़ा चंदैनी नाचा आनी बानी ॥
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भीतर भीतर पझरै पीरा
आंखी सुक्खा नदिया हे।
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धरे कलारी कातिक रेंगिस,
धान ओसावत आगे अगहन ।
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सूपा धरे बिहनिया आके,
किरनन ला छरियावत हे।
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तैं हिरदय के दीया बार,
मन हो जाही जगर मगर
कईसे बिसरै वो दिन बादर,
सुरता आथे रहि रहि के
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मन के डोली मा तोरे बर,
जागे हावै मया दया
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सूवा रे झन कहिबे पीरा,
कठुवा जाही उन्कर तन-मन
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अल्लर परगे मन के बिरवा, हांसी तक अइलावत हे।
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राहेर कस लचकत कनिहा, रेंगत हावस हिरनी कस,
देंह भला अइसन अलकरहा, लचक कहां ले पाये हे।।
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जब ले तैं हर मूड़ मींज के,
हांसत कूदत निकरे हस,
तबले बदरी खोपा छोरे,
केस अपन छरियाए हवै।।
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बने पलो के जे नेता मन, खेती करहीं वोट के, ललहुं पिंवरा नोट जागही उन्कर खेती खार मा ।।
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ये कइसन सरकार हवै, का अइसन ला सरकार कथें
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हमरे बिजली बेच के हमला राखत हे अंधियार मा।।
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साहेब बाबू, नेता जुरमिल, नाली पुलिया तक खा डारिन,
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गरूवा मन बर काहीं नइये, मनखे सब्बो चारा चरगे।।
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बड़का नेता मन कहिथें, हम अंजोर घर-घर पहुँचाबों
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काए करन कुरसी मा बइठे, बाबू, साहेब मानत नइयें ।।
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साहब ला देंवता चघथे, त हूम दिये बिन नई उतरै,
हूम घलो के मांहगी चाही, पातर-पनियर चलै नहीं
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एक्कड़ डिसमिल के मतलब ला, बसुंधरा मन का समझै,
का जाने डेरा वाला मन, का रकबा खसरा होथे ।।
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गीता जैसा पावन ग्रन्थ उठाकर बोले
मगर हमेशा झूठी कसमें खाकर बोले
हमने अपनी बात तहत में कह दी लेकिन
जिसमें ज्यादा कौशल था सब गाकर बोले
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चारों मुड़ा ले खुद ला तैं रूंधे हावस,
तहीं बता अब कोन डहर ले मैं हर आवौं।।
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मैं दंग - दंग ले बरहूं जे दिन,
ओ दिन तैं पतियाबे मोला ।।
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तुम जिन्कर किरपा ले संगी,
सफल भये हौ जिनगी मा,
वो मन के सन्मान करौ,
अउ उंकर पांव पखारौ जी
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झन खेदौ येती ओती,
कोनो ला बिचकावौ झन,
चाहत का हौ, भटके गड्या,
कभू अपन घर जावै झन ?
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हम्मन भइगे पुरखा मन के,
जस ला चगलत बइठे हन,
हम सब जिन के जीभे चलथे,
जांगर उंगर चलै नहीं
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डबकत आंसू ले कब्भू तो तैंहर, हाथ अंचो के देख, दुनिया खातिर होम करत तैं, अपनों हाथ जरो के देख।।
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बर पीपर अउ करगा कांदी, मानै चाहे झन मानै, दुरिहा दुरिहा तक बगरे हे मोर महक मैं जानत हौं ।।
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आज नही ते काली करबे ।
तैं ये घर ला खाली करबे ।।
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ठुमुक ले चंदा सरग ले उतरिस चटक चँदैनी । नीचे ले ऊप्पर तक जइसे लागे हवय निसेनी॥
अगर बगरगे झिलमिल झिलमिल चकमक
बनिस अगास ।
अमरित कस बरसै अँजोर अउ, मन बरसिस
बिसवास ॥
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गजब सहे हन आज ले संगी,
अउ आगू नइ सहे सकन ।
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छत्तीसगढ़ बर जीबो भइया,
छत्तीसगढ़ बर मरबो हम।
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ये कइसन करलाई होगे
घाट म अड़बड काई होगे
काठा-पइली-सेर नंदा गै
नोहर आना -पाई होगे
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बाबू-नोनी लिखौ-पढ़ौ साक्षर हो जाव ।
पढ़-लिख के अपन-अपन मुड़ी ला ठठाव ॥
पढ़े - लिखे बने करे , माथा ला ठोंक ।
दू सौ मा दस्खत कर , दू कोरी झोंक ॥
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अतका बात घलो नइ समझस
कइसन गाड़ीवान हवस
उँकरे बइला सोज रेंगथे
जेकर हाथ तुतारी हे
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जे बनिहारिन बर बिहाव मा
बत्ती धर के चलत रथे
ओकर करिया जिनगानी मा
दीया बारौ तब बनही
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'गज़ब पछीना गार गज़ल के खेत पलोए हे कौसल'
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जे आरूग अंटियावै तेला, अंटियावन दे छोड़ बुजा ला।
बिन मतलब मेछरावै तेला, मेछरावन दे छोड़ बुजा ला।।
जागौ जागौ कहिके मैहर,काकर काकर करौं
पैलगी,
सुते राहा तनिया के मोला खिसियावन दे छोड़ बुजा ला।।
कहे सुने के मजा तभे हे जब सकेल के कहिबे कौशल,
बिन मतलब फरियावै तेला फरियावन दे छोड़ बुजा ला।।
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एक घांव उन तुहर पाँव ला परिन तहां ले जै भगवान
उचकउचक के पांच बछर ले छरिन तहां ले जै
भगवान।।
काए फिकर हे, का चिन्ता हे, जनता भलुन पियास मरै,
सबले आगू अपन बगौना, भरिन तहां ले जै भगवान
कांदी हर तो एक्के हावय, खूंटा सबके अलग अलग
एक छोड़ के दूसर खूंटा, धरिन तहां ले जै भगवान।।
छत्तीसगढ़ महतारी के प्रति अगाध प्रेमपूर्ण होकर उनका स्तवन करते हुए कहते हैं कि-
हाथ म अँइठी पाँव म पैरी , कनिहा म चरलड़िया करधन ॥
गरा म पहिरे सुर्रा पुतरी, सूतामाला पाँव म पैजन ॥
हाथ के अंगरी मन मा मुँदरी , बिछिया पाँव के
अँगरी मन मा ।
छत्तीस रंग के सुग्घर लुगरा , फबै जेकर कंचन कस तन मा ॥
महतारी के लुगरा के अँचरा सबझन ला खूब सुहावय ।
मोर छत्तीसगढ़ के धजा हवा मां , लहरे लहर
लहरावय ॥
अपन समे मा कतको रचना,
अच्छा लिखिन लिखइया मन,
कौशल असन घलो ए जुग मा
गीत अउ गज़ल लिखइया हे।।
प्रस्तुत झलकियाँ मुकुंद कौशल जी के गहन छत्तीसगढ़ी काव्य साधना, समर्पण और सेवाभाव का उत्कृष्ट नमूना है। छत्तीसगढ़ी कविता के क्षेत्र में मुकुंद कौशल के नाम के बिना छत्तीसगढ़ी साहित्य पर चर्चा परिचर्चा संभव नहीं है । काव्य के माध्यम से उन्होने विभिन्न ज्वलंत विषयों को अपने अनूठे काव्य कौशल और शिल्पों के अभिनव प्रयोग से छत्तीसगढ़ी साहित्य में एक नयी लकीर खीचकर आगामी पढ़ी के लिए एक अलग ही पगडंडी का सृजन किया है । मूलतः गुजराती पृष्ठभूमि से होने की बाद भी छत्तीसगढ़ी भाषा को आत्मसात कर उन्होंने समरसता और तादात्म्य स्थापित करके छत्तीसगढ़ का रतन बेटा होने का जीवंत प्रमाण दिया है । उनकी रचनाएँ साक्षात् छत्तीसगढ़ी ग्राम्य जीवनशैली की सुंदर मनोरम शब्द चित्रकारी है। छत्तीसगढ़ी के सरल सहज निमर्ल सुंदर अनगढ़ उपमाओं के आश्रय से उन्होंने छत्तीसगढ़ी साहित्य को नवीनतम और शालीन भाषाशैली दी है, जिसके कारण छत्तीसगढ़ी साहित्याकाश में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में सदैव के लिए अंकित हो गया है। छत्तीसगढ़िया ग्राम्य जीवन के सजीव चितेरे कवि की रचनाएँ पाठकों के हृदय को स्पर्श कर रससिद्धि करने में समर्थ हैं। कौशल जी की भाषा ठेठ छत्तीसगढ़िया जनमानस की प्रवृत्ति, प्रकृति, की सरल सहज अभिव्यक्ति है, छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा यदा कदा परिलक्षित होती हैं । छत्तीसगढ़िया संस्कृति की प्रतिष्ठा विश्वव्यापी है, जिसे मुकुन्द कौशल जी ने ससम्मान हृदयंगम करके जन-जन तक पहुँचाने का श्रमसाध्य कार्य किया है, उनके उपकारों के लिए छत्तीसगढ़िया जनमानस सदैव उनका ऋणी रहेगा । छत्तीसगढ़ी लोकसांस्कृतिक कार्यक्रम चँदैनी गोंदा में उनके छत्तीसगढ़ी गीतों को जनमानस ने बहुत आदरभाव से सुनकर और गाकर सम्मान दिया है। आकाशवाणी सें कौशल जी के गीत का वर्तमान में भी प्रसारित होते हैं । समय के वक्षस्थल पर कविकर्म दायित्व निर्वाह के साथ ही साथ छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्षेत्र में नवाचार का द्वार खोलकर छत्तीसगढ़ी भाषा को समृद्ध करने का मुकुन्द कौशल जी ने समय सापेक्ष सर्वोत्तम प्रयास किया है ।
छत्तीसगढ़ी साहित्य को संस्कारित और परिमार्जित करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के संस्कृति विभागानंतर्गत राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ द्वारा एक बिजहा नामक कार्यक्रम चलाया गया था, जिसका नेतृत्व मुकुन्द कौशल जी को प्रदान किया गया था। पूरे छत्तीसगढ़ के नवांकुर काव्यकारों के खोज और रचनाओं का पुनरावलोकन मार्गदर्शन का कार्य कौशल जी ने अपने अनूठे कौशल के साथ निर्वाह किया था। उक्त बिजहा कार्यक्रम के अन्तर्गत सौभाग्य से मुझे भी सहभागिता का अवसर मिला था। उक्त कार्यक्रम के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य में नवीनता का संचार हुआ ।
मुकुन्द कौशल जी छत्तीसगढ़ी शब्दों के पारखी और कुशल शब्द शिल्पी हैं। शब्द संयोंजन कुशलता, ध्वन्यात्मकता और प्रवाह उनकी विशिष्टता है ।
छत्तीसगढ़ी काव्योत्कर्ष के अग्रिम पंक्ति के कवि मुकुंद कौशल जी की काव्य उपासना की मृदुल गूँज छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक नभ और लोकसाहित्यनभ में अनंतकाल तक ध्वनित होती रहेंगी।
शोभामोहन श्रीवास्तव
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