आल्हा छन्द
आगू डहर बनाये आँखी,
अउ पसलहूँ लगाये नाक।
एकक अंग ला गढ़े गढ़ैया,
ठउका धरके जोखा जाक।।
चेथी कोती आँखी होतिस,
तब कइसे करतेन बेवहार।
कहूँ दमादम हन के जातिस,
तब जँउहर हो जतिस हमार।
नाक कहूँ उबड़ी होतिस अउ,
पानी गिरतिस मूसरधार।
मरन हो जतिस उब्बुक चुब्बुक,
गुन धुन गड़हन गढ़े कुम्हार।।
नख चुन्दी के जइसे होतिस,
भँऊ बिरौनी के बढ़वार।
का का उदिम करे बर परतिस,
कतिक झाँकते हाथ ले टार।।
कान बिला कहूँ बंडू होतिस,
अलकरहा दिखते बुधियार।
बुड़हत काल में चसमा टाँगे।
करे बेवस्था सब सरकार।।
नइ तो खीला ठेंसे परतिस,
चसमा टाँगे दूनो कान।
तेकर सेती माने परही
सबले बड़का हे भगवान।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
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