छत्तीसगढ़ी बालगीत
पइधे ललबेंदरा ललबेंदरी।
झींकत फुदगत एकठन चेंदरी।।
पचरंग पचरंग कूदत छानी।
बबा कुदावत धरे कोकानी।।
रचनाकार
दू एक में दू ।
आ मोला छू।।
दू दूनी में चार।
हो जा तियार।।
दू तिया में छै।
ददा खेत गै।।
दू चँउक में आठ।
रेंग बने बाट।।
दू पंचे में दस।
हुसियार हस।।
दू छक्के में बारा।
मीठ खाबे ते खारा।।
दू सत्ते में चौदह।
सच बात कह।।
दू अट्ठे में सोला।
का होगे तोला।।
दू नियाव में अट्ठारा।
झन कर मारीमारा
दू दहाई में बीस।
झन कर रीस।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८० भाद्रपद शुक्लपक्ष षष्ठी तिथि
शोभामोहन श्रीवास्तव
[21/9, 15:45] Shobhamohan Shrivastava: शीर्षक - गिनती
एक दू तीन चार।
छत्तीसगढ़ के जय जयकार।
पाँच छै सात आठ।
स्कूल जाबो खावत साठ।।
नौ दस ग्यारह बारा।
खेले जाबो तुहँर पारा।।
तेरह चउदा पन्द्रह सोला।
स्कूल जाबो धरके झोला।।
सत्रह अट्ठारह उन्नीस बीस।
माथ नवाबो गुरुवर ईश ।।
रचनाकार
शोभामोहन श्रीवास्तव
द्वारा-मोहन लाल श्रीवास्तव, 23
ग्राम-भाँठागाँव वार्ड 17 जोशीपारा
विकासखंड पाटन
जिला दुर्ग छत्तीसगढ़
पिनकोड - 491111
मो. 91710 96 309
[21/9, 15:57] Shobhamohan Shrivastava: छत्तीसगढ़ी बालगीत
शीर्षक - बेंदरा बेंदरी
पइधे ललबेंदरा ललबेंदरी।
झींकत फुदगत एकठन चेंदरी।।
पचरंग पचरंग कूदत छानी।
बबा कुदावत धरे कोकानी।।
रचनाकार
शोभामोहन श्रीवास्तव
[21/9, 15:57] Shobhamohan Shrivastava: शीर्षक - हाथी
गदबिद गदबिद दँउड़त हाथी।
अब्बड़ झन हे वोकर साथी।।
सूपा कस हे वोकर कान।
घुँई घुँई आँखी देख मितान।।
रचनाकार
शोभामोहन श्रीवास्तव
[21/9, 15:57] Shobhamohan Shrivastava: शीर्षक - झड़ी
पड़पड़ पड़पड़ गिरै पानी।
गिरै ओरिया टपकै छानी।।
दाई राँधे भजिया रोटी।
तात तात झेलते हे छोटी।।
रचनाकार
शोभामोहन श्रीवास्तव
[21/9, 15:57] Shobhamohan Shrivastava: शीर्षक-बड़े बिहनिया
बड़े बिहनिया होत दुलारी।
पहिली घँसथे दाँत मुखारी।।
नहाखोर के बासी खाथे।
पल्ला दँउड़त स्कूल जाथे।।
रचनाकार
शोभामोहन श्रीवास्तव
[21/9, 15:57] Shobhamohan Shrivastava: शीर्षक - गिनती
एक दू तीन चार।
छत्तीसगढ़ के जय जयकार।
पाँच छै सात आठ।
स्कूल जाबो खावत साठ।।
नौ दस ग्यारह बारा।
खेले जाबो तुहँर पारा।।
तेरह चउदा पन्द्रह सोला।
स्कूल जाबो धरके झोला।।
सत्रह अठरह उन्नीस बीस।
माथ नवाबो गुरुवर ईश ।।
रचनाकार
शोभामोहन श्रीवास्तव
[21/9, 15:57] Shobhamohan Shrivastava: शीर्षक - एकतागीत
एक हे चंदा एक हे तारा।
एक सुरुज रगरग ले न्यारा।
एक हमर ये धरती दाई।
एक रहौ झन करौ लड़ाई।।
रचनाकार
शोभामोहन श्रीवास्तव
[21/9, 15:57] Shobhamohan Shrivastava: शीर्षक - महतारी
मोर महतारी सुघ्घर अब्बड़।
बूता करथे हड़बड़ हड़बड़।।
जब मैं करथौं कोनो गड़बड़।
वोहर करथे बड़बड़ बड़बड़।।
रचनाकार
शोभामोहन श्रीवास्तव
चलौ लगाबो भाई पेड़।
हमर खेत के चारो मेड़।।
ढोल पीटत मेघ आवत, दल सहित दरबर
वात्सल्य छंद
विधान - ललललाला ललललाला, ललललाला लल।
२३ मात्रिक,१४-९ यति,अंत लल।
उवत हे परबत उपर ले, रबि झलल झलमल।
फिलिंग ले झरना झरत अउ, करत कलकल कल।।
घड़ड़ घड़घड़ घड़ड़ घड़घड़, करत नभ जलधर।
तड़ित तड़कत पान फड़कत, बहत जल गरगर।।
कीच हरिचंदन बनत हे,
माथ लग हलधर।
ढोल पीटत मेघ आवत,
दल सहित दरबर।।
दसत मोती, सबो कोती,
सुख सिंगारे बर।
सोनहा रतिहा बिहनिया,
ऊँच हिमडोंगर।।
देत भाँवर नील साँवर, मेघ घन मनहर।
हे दसत शैवाल काई, के दरी हरियर।।
सोनबोड़ा नभ तनागे,
सातरंग सुघ्घर।
धोत पोंछत जल गगन के,
मइलहा तरुवर।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
२३/०७/२०२३
पतोरा
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