फिर अटल विश्वास का बदला धरातल
सकल अर्जित शब्द से पीछा छुड़ाने,
मौन को जब साधनाओं ने मनाये।
प्रश्नचिन्हों पर सभी विराम निश्चित,
श्वांस यह पूर्णाहुति के काम आये ।
अब किसी संदर्भ से विचलित नहीं,
हो रहा है मन सहज ही अब अचंचल ।
शब्दों से व्यवधान जब होने लगा।
फिर अटल विश्वास का बदला धरातल ।।
अब नहीं व्यभिचारिणी हो भावना,
घूमती मस्तिष्क में स्वच्छंद होकर।
मात्र अनहत नाद की आवृत्तियाँ ,
सुन रही हूँ आज अपना स्वत्व खोकर ।
मौन से अगणित हुआ आनंद जब ,
हो रहा मृदुभाव से परिपूर्ण पल पल ।।
शोभामोहन
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