Monday, 10 November 2025

असकुस होगे मन मतंग हर, लोभ हरा के आगे (सार छन्द )

असकुस होगे मन मतंग हर, लोभ हरा के आगे 

धमकिस लोभ सगा बन मन घर, साध सँवारत  बड़का ।
मान-गउन नइ करिस ललक के, मन हर देइस हड़का।।
हीनमान ले लोभ भड़क के, लगिस ओरझे मन ले ।
मन हर हिरक निहारिस नइ तौ, ठाढ़ भइस दनदन ले।।

सगा-सहोदर अपन बलाइस, झगरा-रार कराये ।
लिगरी-लाई करिस लुहाइस, ओखी करिस सताये।

सबझन धमकिन दनदन-दनदन, मन हलहलित मताये।
मन मिटकाये रहिस कलेचुप, ओरझिन सब बगियाये।।
अपन-अपन ले जोर लगा के, लहुट गइन लस खाके।
फेर लहुट के जब-जब आइन, गइन अनादर पाके।।

असकुस होगे मन मतंग हर, लोभ हरा के आगे ।
छुछुवावै बर छोड़िस तब ले, डहर-डहर सुख छागे।।

शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
१०/११/२०२५

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