असकुस होगे मन मतंग हर, लोभ हरा के आगे
धमकिस लोभ सगा बन मन घर, साध सँवारत बड़का ।
मान-गउन नइ करिस ललक के, मन हर देइस हड़का।।
हीनमान ले लोभ भड़क के, लगिस ओरझे मन ले ।
मन हर हिरक निहारिस नइ तौ, ठाढ़ भइस दनदन ले।।
सगा-सहोदर अपन बलाइस, झगरा-रार कराये ।
लिगरी-लाई करिस लुहाइस, ओखी करिस सताये।
सबझन धमकिन दनदन-दनदन, मन हलहलित मताये।
मन मिटकाये रहिस कलेचुप, ओरझिन सब बगियाये।।
अपन-अपन ले जोर लगा के, लहुट गइन लस खाके।
फेर लहुट के जब-जब आइन, गइन अनादर पाके।।
असकुस होगे मन मतंग हर, लोभ हरा के आगे ।
छुछुवावै बर छोड़िस तब ले, डहर-डहर सुख छागे।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
१०/११/२०२५
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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