Saturday, 29 November 2025

मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा

मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा

तुम प्रात: गोधुली के वंदन ,
सुरभित केसर संदल के वन। 
छवि व्योम सदृश तन मृदु कंचन, 
मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम हो परिणय के पुष्प पत्र,
तुम सुहागिनी के अंग वस्त्र। 
तुम निश्चत विजय अमोघअस्त्र,
तुम शास्त्र सार विज्ञान सत्र।। 
मैं नयनों से बिखरी कजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम कार्तिक सरिता दीपदान,
तुम पार्थिव शंकर के समान। 
तुम सदा धर्मधूरी विधान, 
तुम संस्कृति के अमर प्राण।। 
मैं नववधु अलकों की गजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम विभावसु अर्चित शुभफल,  
प्रांगण पूजित शुभ तुलसीदल,
हृदकोश अपरिमित परम अतल,
तुम सदा सरल तुम सदा नवल,  
मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा, 
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम अर्थित आवाहित आगम,
अवग्राही राही पथ परम।
तुम पथ पाथेय अपार अगम,
तुम अचल अवस्थित सुख चरम,
मैं श्वासों की पथ हूँ अधरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम हो अनुनादित मधुरनाद, 
शांतिदायक हर्ताविशाद।
विश्वंभर के पावन प्रसाद,
दैदीप्यमान दिनकर संवाद।
मैं नववधु अलकों की गजरा,
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

तुम सदा सुवासित शुभ सुगंध,
भाषित भाषा पथ भाव बंध। 
प्रेमिल प्रलाप के महानंद,
मैं मैं तू कर बढ़ती झगड़ा।। 
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

सुख उदित भानु सम युगल चरण,
तुम परे पार पथ जन्म मरण,
मन व्योम वृहद तन मृदु कंचन,
मैं मरूथल मिथ्या मृग लहरा
मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा।

No comments:

Post a Comment

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...