Tuesday, 27 January 2026

छत्तीसगढ़ी घनाक्षरी दोहा

मनहरण घनाक्षरी 


बृषभानु राउर के अँगना खेलत राधा,
छुमछुम छनकत पैजनिया पाँव के।
पबरित घर द्वार पबरित बेवहार,
पबरित धुर्रामाटी राधारानी गाँव के।
पबरित अन-जल पबरित फूल फल,
सब ला हे आस राधा के अँचरा छाँव के।
बिरिज में गली गली फूल पान नार कली,
गोप ग्वाल लाल बाजे डंका राधा नाव के।। 

शोभामोहन श्रीवास्तव

छत्तीसगढ़ी दोहा

शुभ मुहरन साँवर बदन, गोसैंया श्री राम।
तोर छोड़ अब हे नहीं, अउ ककरो ले काम।।

कान जुगल कुंडल जुगल, चरन जुगल महराज।
नयन जुगल अउ कर जुगल, हिरदे हमर बिराज।

केसरटीका माथ में, गर-भर रिगबिग हार।
सीतामाई प्रान धन, रामचन्द्र सरकार।।

बिन सुमरन बिन भाव के, कइसे दरसन पान।
पापी जीव बिहाल ला, सूझत नइ भगवान।।

जइसे तरिया भर फुले, कमल सुगंध लुटाय।
भजन रमे जीउ आतमा, झटकुन दरसन पाय।

धनुष धरे रघुबर हमर, अंतस माँझ बिराज।
तोर भार अब जीव हे, तहीं राख जीव लाज।। 

कोटि-कोटि ब्रम्हाण्ड में, नइ जइसन आनंद। 
रधिया मुखमंडल कमल, हे अइसन मकरंद।। 

संतन-भौरा नाम रस, पीयत नहीं अघाय।
बिन चटके जग में फिरै, परमधाम घर जाय।। 

काम-कोह ला छोड़ झन, ओकर रद्दा मोड़। 
रोग-दोख कटही सहज, रख तो हरि मग गोड़।। 

जीव जबर हरि सँग जुड़े, उपजै तभे बिराग।
शोभामोहन गुरुकृपा, तहूँ जगा ले भाग।। 

शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव

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