तुलसी जइसे बिरवा नइ हे, नदिया नइ देवसरी जइसे ।
महदेव सहीं अउ देव नहीं, जगराखन हे न हरी तइसे ।।
कतको हरि भक्त भले जग में, नइ भक्त कहूँ सबरी जइसे ।
कबि के कुल के सिमोर सदा, कबि सुंदरलाल गड़ी तइसे ।।
धरती अनपब्बर रत्न भरे, नइ रत्न कहूँच मनी जइसे।
जग में कतको सग लाग-नता, प्रिय होय कहूँ न धनी जइसे ।।
जगजन्तुन देह भले कतको, नइ देह मनुष्यतनी जइसे।
कबि के सिरमौर छत्तीसगढ़ी, कबि सुंदर लाल गनी तइसे ।।
जग कतको बजरंग तभो, नइ हे बजरंग बली जइसे ।
कतको रहि भक्ति रमे तबले, नइ हे वृषभानुलली जइसे।
सुख द्वारिका हे कतको हरि के, प्रिय हे नइ कुंज गली जइसे ।
मइके न सुहाय बिना मइया, ससुरार बिना सँइया जइसे।
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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संस्कृत राम स्तुति
शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...
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