Saturday, 24 January 2026

तुलसी ज इसे बिरवा नइ हे विस्तार से

तुलसी जइसे बिरवा नइ हे, नदिया नइ देवसरी जइसे ।
महदेव सहीं अउ देव नहीं, जगराखन हे न हरी तइसे ।।
कतको हरि भक्त भले जग में, नइ भक्त कहूँ सबरी जइसे ।
कबि के कुल के सिमोर सदा, कबि सुंदरलाल गड़ी तइसे ।।

धरती अनपब्बर रत्न भरे, नइ रत्न कहूँच मनी जइसे।
जग में कतको सग लाग-नता, प्रिय होय कहूँ न धनी जइसे ।।
जगजन्तुन देह भले कतको, नइ देह मनुष्यतनी जइसे।
कबि के सिरमौर छत्तीसगढ़ी, कबि सुंदर लाल  गनी तइसे ।।

जग कतको बजरंग तभो, नइ हे बजरंग बली जइसे ।

कतको रहि भक्ति रमे तबले, नइ हे वृषभानुलली जइसे।
सुख द्वारिका हे कतको हरि के, प्रिय हे नइ कुंज गली जइसे ।
मइके न सुहाय बिना मइया, ससुरार बिना सँइया जइसे। 

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