सेकूलर चमचा छत्तीसी
सब चमचों को समझिऐ, सेकूलर पर्याय।
अंडबंड बातें करे, देखें ना अन्याय।।
राष्ट्र वादियों के संग रहते ।
वे सेकूलर स्वयं को कहते ।। १।।
भारत में ये पाये जाते।
जगह-जगह हड़काये जाते।।२।।
अपशब्दों से गंध मचाते ।
जातिवादियों के गुण गाते।।३।।
नया-नया गढ़ गढ़कर नारा।
खूब निभाते भाईचारा ।।४।।
और जब ये बन जाते चारा।
तब दिखता है दिन में तारा।।५।।
चाटुकारिता निरत तपस्या
राम नाम से उन्हें समस्या।।। ६।।
ना तो पढ़ लिख ज्ञान बढ़ाते ।
ना भविष्य की करते बातें ।। ७।।
ना दिखती पत्नी ना बच्चा।
दिखता नहीं उन्हें दिन अच्छा।।८।।
चाल सुहाती भेंड़ों वाली।
क्रोध नाक में मुँह में गाली।। ९।।
अपने घर में आग लगाते।
सत्य छुपाते झूठ बिछाते ।।१०।।
पकड़े रहते झूठ का खंभा ।
नाक कटे तो होता लम्बा।। ११।।
लुप्तप्राय हो रही प्रजाती।
लड़े-भिंड़े वे ताने छाती।।१२।।
वही श्रेष्ठ चमचे कहलाते ।
झूठा चरखा जो नित काते।।१३।।
भले आपके जैसी काया।।
लेकिन अतिविचित्र है माया।।१४।।
रटते रहते बापू-चाचा ।
भले तड़ातड़ पड़े तमाचा।। १५।।
झूठ चलाते पिद्दी-पिद्दी।
चाल-चलन से होते जिद्दी।।१६।।
सोये बेसुध बेचके घोड़ा ।
होते मगन छुपाकर फोड़ा।।१७।।
वंशवादियों में रम जाते।
चरण चूमते शीष झुकाते।।१७।।
बातें करते ठकुरसुहाती।
धर्म से बढ़कर कहते जाति।। १८।।
झूठ परोसें कर-कर चर्चा।
तब चलता है इनका खर्चा।। १९।।
भेस बदलकर छद्म ये ढ़ोंगी।
अपनी अलग बजाते पोंगी।।२०।।
खरपतवारों को सहलाते।
कीट-कीटाणु इनको भाते।। २१।।
स्वच्छ भले ऊपर का ढाँचा।
दूषित है वैचारिक साँचा ।।२२।।
वे अनगिन षडयंत्र रचाते ।
और कहानी रच बहलाते।।२३।।
पहन मुखौटा जनता छलते।
परजीवी बनकर वो पलते।। २४।।
छलावरण में वो हैं आते।
छ्द्म डिग्रियों से भरमाते।। २५।।
है अत्यन्त परिष्कृत शैली ।
और भावना कलुषित मैली।।२६।।
भ्रष्ट बीजाणु से ये जनमे ।
दया धर्म ना इनके मन में।। २७।।
विकट रोगाणुओं के कारक ।
यही विदेशी डिग्री धारक ।।२८।।
दाँत पेट में इनके होते ।
देश बढ़े तो जमकर रोते।। २९।।
डफली बजा बजाकर गाते।
आतंकी से इनके नाते।। ३०।।
देश हेतु हैं ये बीमारी ।
इनके नस-नस में गद्दारी।। ३१।।
बनकर बैठे गुंडा-दादा ।
खतरनाक दिल लिए इरादा ।। ३२। ।
देशवासियों अब पहचानो।
कहे लक्षणों को सच जानो।। ३३।।
गद्दारों से देश बचाओ ।
सब जन उठकर आगे आओ।। ३४।।
पढ़ कर सेकूलर छत्तीसी।
बात कहो तुम बस इत्ती सी।। ३५।।
वंदे मातरम जो गायेंगे।
वही भारतीय कहलायेंगे।। ३६।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
१७/१२/२५
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