लालल लाला, लललल ललला, लालल लालल लललल लाला
गोड़तरी में, अब अधरिज ला, राख दया कर प्रभु गिरधारी ।।
हाथ बढ़ा तैं, अउ पत रख ले, जीव लगै जग गरगस भारी।
देखत रद्दा, मन गदकत हे, जोहत-जोहत खसलत बेरा ।
देखन तोला, मन तलफत हे, छूटत-टूटत अउ जग घेरा।। दोस भरे हौं, निचट अधम हौं, नाथ अपावन भटकत नारी।
तोर कती मैं, कब पग धरहूँ, पार लगे यह भव दह भारी।।
गोड़तरी में, अब अधरिज ला, राख दया कर प्रभु गिरधारी ।।
फूल दसे हे, मन-पुर कुरिया, साँसत में जिउ अधर बिचारी।।
देत हवै ये, मन परकम्मा, नैन डरे पथ अनचिन्हारी।।
गोड़तरी में, अब अधरिज ला, राख दया कर प्रभु गिरधारी ।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन ननद
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