हरिवोलमना छन्द
जगकारन तैं। जगधारन तैं।।
विश्वभंर तैं। हरि तैं हर तैं।।
जे जानत हे। ते मानत हे।
नइ भानत हे। उही तानत हे।।
जगपोंसन तैं । जगतोसन तैं।।
परमेश्वर तैं। विश्वेश्वर तैं।।
सुरनायक तैं। सुखदायक तैं।।
बड़ उज्जर तैं। बड़ सुघ्घर तैं।।
भीतर घट तैं। बाहिर पट तैं।।
सबमें रमता। रखके समता।।
तन ला उजरा। मन ला उजरा।।
आँखी उघरा । चित्त ला सुघरा।।
पबरित गति दे। पबरित मति दे।।
दहरा गहिरा। भव ले बहिरा।।
सत ला सपड़ा। रहपट झपड़ा।।
सुधरै गत हा। बाँचै पत ला।।
अँगरी धरके । किरपा करके ।।
सुख बाट चला । सुघरा बुध ला ।।
कुछु ज्ञान नही । पहिचान नहीं।।
दुख दोख भगा। अउ भाग जगा।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८१ भादो अंधियारी पाख डोकरी नवमी क्रोधी तद्नुसार २६/०९/२४
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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